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हिमंत का एकछत्र राज

भाजपा की लगातार तीसरी जीत के पीछे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा के कल्याण कार्यक्रमों का विस्तार, चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन, पहचान वाली राजनीति की गोलबंदी और ध्रुवीकरण की रणनीति मुख्य वजह रही. इन सबने मिलकर असम की सियासी धुरी बदलकर रख दी.

हिमंत बिस्व शर्मा (फाइल फोटो)
हिमंत बिस्व शर्मा (फाइल फोटो)
अपडेटेड 19 मई , 2026

मार्च के एक उमस भरे दिन में नलबाड़ी में हिमंत बिस्व शर्मा खुली जीप में 14 घंटे तक खड़े रहे. सुबह 8.30 बजे से ही वे सड़कों के किनारे उमड़ी भीड़ का हाथ हिलाकर अभिवादन करते आगे बढ़ रहे थे.

हजारों लोग उन्हें छूने, चूमने, पानी की बोतलें, घर का बना खाना, फल, फ्रेम में जड़ी तस्वीरें, शैंपू की बोतल और फेस वॉश देने उमड़े चले आ रहे थे. उन्होंने अनजाने लोगों की बोतलों से पानी पिया, उनका दिया खाना खाया और अपनी 'जेड-प्लस’ सुरक्षा की हर बाधा को अनदेखा कर दिया.

किसी ने लिखित अर्जी पकड़ाई तो फटाफट पढ़ा, व्हॉट‍्सऐप पर उसकी फोटो खींची और मौके पर ही जरूरी निर्देश के साथ संबंधित अधिकारी को भेज दिया. रोड शो का काफिला रात 10:30 बजे खत्म हुआ. दस घंटे बाद उसे फिर से शुरू होना था.

असम ने 4 मई को अपना फैसला सुना दिया. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 126 सदस्यों वाली विधानसभा में 82 सीटें मिलीं, जो बहुमत के आंकड़े 64 से कहीं ज्यादा थीं. यह उसका अब तक का बेहतरीन प्रदर्शन था.

असम गण परिषद (एजीपी) की 10 और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) की 10 सीटों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (एनडीए) 100 सीटों का आंकड़ा पार कर गया. कांग्रेस की अगुआई और गौरव गोगोई के मुख्यमंत्री पद के चेहरे वाले छह पार्टियों का 'असम सोन्मिलितो मोर्चा’ के पाले में सिर्फ 24 सीटें आईं. उसमें कांग्रेस की अपनी सीटें भी 10 घटकर 29 से 19 हो गईं.

शर्मा के लिए जीतना ही काफी नहीं था, उसे बुलंदी पर ले जाना था. असम में भाजपा को 2026 में मिली सीटें अब तक किसी पार्टी को हासिल तीसरा बड़ा जनादेश है. कांग्रेस 2011 में 78 सीटें जीती थी, तब उस जीत में शर्मा का भी योगदान था. हालांकि तब मुख्यमंत्री तरुण गोगोई (गौरव के पिता) थे. उस साल शर्मा ने मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी के लिए जोर लगाया था लेकिन कांग्रेस आलाकमान राजी नहीं हुआ. शर्मा अगस्त 2015 में भाजपा में आ गए.

शर्मा ही भाजपा की 2016 और 2021 में जीत के मुख्य सूत्रधार थे लेकिन उन दोनों बार की जीत का श्रेय अकेले उन्हें नहीं मिला. इस बार वे ही पूरे चुनावी अभियान का इकलौता चेहरा थे. उन्हें यह मौका विधानसभा में कांग्रेस के टिकट पर 32 साल के वकील के तौर पर कदम रखने के 25 साल बाद मिला. इस लिहाज से देखें तो अपनी इस 'रजत जयंती’ (25वीं वर्षगांठ) के मौके पर उन्हें इससे बेहतर तोहफा भला क्या मिल सकता था.

रणनीति से चलते हैं वे
रणनीति के तहत काम तो उन्होंने 10 मई, 2021 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही शुरू कर दिया था. उन्होंने राज्य में ऐसी व्यूह रचना की, जिससे उन्हें हराना लगभग नामुमकिन हो जाए. इस पूरी कवायद के कई पहलू थे. खुद शर्मा का व्यक्तित्व, कल्याणकारी योजनाओं का ढांचा, नए परिसीमन से क्षेत्रों का नक्शा बदल डालना और लोगों की पहचान के साथ ध्रुवीकरण.

गुवाहाटी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले विकास त्रिपाठी कहते हैं, ''भाजपा ऐसे सिस्टम में बदल गई है, जिसकी नींव में ऊपर से नीचे तक फैलता मजबूत संगठन, शर्मा के इर्द-गिर्द बनाया गया प्रभा-मंडल और हिंदू मान्यताओं पर आधारित विचारधारा है. ऐसे सिस्टम के हावी हो जाने से असम में विपक्षी पार्टियों के लिए चुनावी मैदान में टिके रहना मुश्किल होता जा रहा है.’’

शर्मा की सियासी शख्सियत का कोई 'ऑफ-बटन’ नहीं है. वे सुबह सात बजे तक उठ जाते हैं और सबसे पहले अपना फोन उठाते हैं, जिसे वे अपने राजकाज का मुख्य जरिया बताते हैं. फाइलें निबटाने के लिए नौकरशाहों को अक्सर आधी रात के बाद उनके घर बुलाया जाता है.

चुनाव से पहले 19 फरवरी को गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर में प्रियंकी गांधी और गौरव गोगोई

उनका दिन देर रात 3 बजे से पहले खत्म नहीं होता. वे फल, अंकुरित अनाज, चाय, बिस्कुट और डाइट कोक पर गुजारा करते हैं. शाम करीब 6 बजे वे भरपेट असमिया थाली खाते हैं, जिसमें मछली होती ही है. वे शराब बिल्कुल नहीं पीते. हर सुबह संत श्रीमंत शंकरदेव की प्रार्थना करते हैं, जब भी समय मिलता है पढ़ते हैं, और मनोरंजन के लिए पैदल चलना और बैडमिंटन खेलना पसंद करते हैं.

राजकाज में देरी और रुकावटों को दूर करने के लिए वे फाइलों को इधर-उधर भेजने के बजाए एक ही समय में कई सचिवों को बुला लेते हैं. मसलन, जब केंद्र सरकार ने दो कागज मिलों को निजी कंपनियों के हाथ बेच दिया और काम ठप हो गया, मिलें बंद थीं तो कामगारों को दूसरी जगह भेजने को लेकर मामला ठन गया था.

ऐसे में उन्होंने शाम 5:30 बजे सभी संबंधित विभागों और कामगारों को एक साथ बुलाया और सुबह छह बजे तक सभी को राजी कर लिया. एक नौकरशाह कहते हैं, ''उनकी याददाश्त बहुत तेज है और वे हर हफ्ते समीक्षा कर छोटी-छोटी बातों पर भी नजर रखते हैं.’’ एक दूसरे नौकरशाह कहते हैं, ''वे किसी महफिल में भी बैठे हों तो भी जानकारी ही जुटा रहे होते हैं.’’

राज्य के फीडबैक सिस्टम के अलावा शर्मा ने अपना खुद का सिस्टम भी तैयार किया है. वे किसानों, चाय बागान मजदूरों, शिक्षकों, छात्रों, डॉक्टरों, सरकारी अधिकारियों, व्यापारियों, शिक्षाविदों और पार्टी कार्यकर्ताओं को फोन करते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर उनसे सीधे सवाल पूछते हैं. वे खुद अपने पास आने वाला लगभग हर व्हॉट्सऐप मैसेज पढ़ते हैं. कॉटन कॉलेज के पूर्व सहपाठियों का उनका नेटवर्क व्यवस्था में हर जगह उनके वफादार लोग तैयार कर चुका है. वे जिस नब्ज को टटोलते हैं, वह उनकी अपनी ही मिलती है.

कांग्रेस और भाजपा सरकारों में बतौर स्वास्थ्य मंत्री शर्मा के लंबे कार्यकाल से उन्हें अपनी छवि ऐसे नेता की गढ़ने में मदद मिली, जो लोगों के कल्याण के लिए काम करता है. उन्होंने डॉक्टरों के लिए ग्रामीण इलाकों में जाना अनिवार्य किया, मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई, विशेष स्वास्थ्य सेवाओं को जोड़ा और लोगों की मांगों पर फौरन कार्रवाई की. बाद में बतौर शिक्षा मंत्री उन्होंने शिक्षकों की भर्ती के लिए पारदर्शी परीक्षा प्रणाली शुरू की, जिससे हजारों युवाओं में यह विश्वास जगा कि नौकरी केवल काबिलियत (मेरिट) से ही मिलेगी.

वे जुझारूपन का दूसरा नाम रहे हैं. शर्मा कहते हैं, ''मैंने हमेशा मुश्किल पलों में साहसी फैसले किए हैं.’’ 2010 में तरुण गोगोई सरकार बड़े बांधों को लेकर एक्टिविस्टों के निशाने पर आ गई थी, तब बतौर मंत्री शर्मा सरकार के बचाव में सबसे आगे खड़े हुए. ​​2020 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर सोनोवाल सरकार को घेरा गया तो फिर उन्होंने मोर्चा संभाला. कोविड-19 के दौरान ज्यादातर जाने-माने लोग घरों में दुबके हुए थे, तब शर्मा ने स्वास्थ्य मंत्री के नाते पीपीई किट पहनकर अस्पतालों और आइसोलेशन वॉर्ड में जाकर मरीजों का हालचाल जाना.

जब शर्मा को घेरा जाता है, तो वे बचाव करने के बदले चर्चा का रुख ही मोड़ देते हैं. सितंबर 2025 में सिंगापुर में गायक जुबीन गर्ग की मौत बड़ा राजनैतिक धमाका बन सकती थी. सिंगापुर के जांच अफसर ने इसे हादसा करार दिया और इसे डूबने से हुई मौत बताया. लेकिन असम में विपक्ष के नेताओं ने इवेंट मैनेजर श्यामकानू महंत को लेकर एक अलग ही कहानी गढ़ ली. उस कहानी में राजनैतिक दम था, क्योंकि महंत परिवार के लोग शर्मा के करीबी माने जाते थे.

श्यामकानू के बड़े भाई 2023 तक असम के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) थे और फिर नवंबर, 2025 तक मुख्य सूचना आयुक्त रहे. उनका एक और भाई इस समय गुवाहाटी विश्वविद्यालय का कुलपति है. यही निकटता मुख्यमंत्री के खिलाफ लगाए गए आरोपों का आधार बन गई. लेकिन शर्मा ने विधानसभा में ऐलान किया कि जुबीन की हत्या की गई थी, जो सिंगापुर के फैसले के बिल्कुल उलट था. पुलिस ने महंत और कुछ अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिससे विपक्ष का नैरेटिव बेअसर हो गया.

सोशल इंजीनियरिंग का फायदा
शर्मा की श‌ख्सियत और तौर-तरीके राजनीति में बढ़त बनाते हैं, तो कल्याण योजनाओं का ढांचा जनादेश को पक्का करता है. मई 2021 से मार्च 2026 के बीच शर्मा की सरकार ने करीब 40 लाभार्थी योजनाएं चलाईं, जिसका लाभ असम की 75 फीसद आबादी को मिला. इसमें प्रमुख है 'अरुणोदय’, जिसके तहत महिलाओं के खाते में हर महीने नकद रुपए डाले जाते हैं.

उससे अब 38-40 लाख परिवारों को फायदा मिलने का दावा है. सोनोवाल के समय में इसे 830 रुपए हर महीने के साथ शुरू किया गया था, जो शर्मा के समय में बढ़कर 2021 में 1,000 रुपए, 2022 में 1,250 रुपए और जनवरी 2026 से 1,500 रुपए हो गया. फरवरी 2026 में चुनावों से कुछ हफ्ते पहले, हर लाभार्थी को 9,000 रुपए का एडवांस मिला, जिसमें चार महीनों का बकाया भुगतान और 3,000 रुपए 'बोहाग बिहू’ बोनस शामिल था.

इसके अलावा, शर्मा ने तेजी से सामने दिखने वाला विकास किया. गांवों की सड़कें लंबी हुईं, पुल और फ्लाइओवर बने, जो अक्सर तय समय से पहले ही पूरे हो गए. मोरीगांव में एक सेमीकंडक्टर यूनिट लगी. वादे के मुताबिक 1,00,000 से ज्यादा सरकारी नौकरियां दी गईं और अगले कार्यकाल के लिए 2,00,000 और नौकरियों का वादा किया गया.

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 20 से वित्त वर्ष 25 के बीच असम की वृद्धि दर 45 फीसद रही जबकि राष्ट्रीय औसत 29 फीसद था. उस दौरान यह किसी भी राज्य से सबसे तेज वृद्धि दर थी. पुलिस के बड़े अभियान के जरिए ड्रग्स की तस्करी पर रोक लगाई. गैंडों का शिकार दशकों से एक बड़ी श‌‌‌र्मिंदगी का सबब बना हुआ था, उस पर पूरी तरह रोक लगाई गई.

असम में 2023 में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं फिर से खींची गईं. पहले मुस्लिम मतदाताओं का करीब 35 सीटों पर काफी असर हुआ करता था, अब वह संख्या घटकर 22 रह गई. इससे भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए 13 और सीटें मिल गईं. और अंतत: उसके पाले में वहां की 18 सीटें आईं. कांग्रेस को इससे जबरदस्त झटका लगा. उसने अपनी 30 फीसद वोट हिस्सेदारी तो बनाए रखी, जो ज्यादातर मुसलमानों के बीच थी, लेकिन आबादी के कुछ ही सीटों पर सिमट जाने से उसे 10 सीटों का नुन्न्सान उठाना पड़ा.

फिर पहचान का मुद्दा सामने आया, जिस पर शर्मा ने ऐसे नए रास्ते खोले, जैसा असम में उनकी पार्टी के किसी और नेता ने पहले नहीं सोचा था. पिछले चार दशकों से बांग्लादेश से आए लोगों के विरोध में तैयार हुई असमिया पहचान की राजनीति धर्म के मामले में तटस्थ रही थी, भले ही ज्यादातर बाहरी मुसलमान ही थे. सोनोवाल 'जाति, माटी और भेटी’ (समुदाय, जमीन और घर) की बात करते थे, लेकिन शर्मा ने इस सोच को धार्मिक आत्मरक्षा की कहीं ज्यादा सख्त भाषा के साथ जोड़ दिया. उन्होंने हिंदू, असमिया और आदिवासी पहचान को एक ही राजनैतिक श्रेणी की तरह पेश किया.

उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में इस मेल-जोल की कवायद जोर से चलाई. उन्होंने आप्रवासी मूल के मुसलमानों के खिलाफ जबरदस्त बेदखली अभियान चलाए, जिससे स्थानीय लोगों की राय उनके पक्ष में मजबूत हुई. उन्होंने बहुविवाह और बाल विवाह पर रोक लगाने पर जोर दिया, जिसे मुस्लिम महिलाओं के बीच भी दबे स्वर में समर्थन मिला.

उन्होंने स्थानीय समुदायों से 'मियां’ लोगों को 'परेशान’ करने का आह्वान किया. वहां 'मियां’ बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों को कहा जाता है. इसका नतीजा 4 मई को ईवीएम से निकला. असम में हिंदू गोलबंदी का नजारा इतना सघन था, जो पहले कभी नहीं देखा गया था. कांग्रेस की 19 में से 18 सीटें मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलमानों ने जीती हैं.

इसके साथ सियासी जोड़तोड़ की मशीन भी चल रही थी. भाजपा ने जिन 90 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, उनमें तकरीबन 30 कांग्रेस, एजीपी और क्षेत्रीय तथा आदिवासी संगठनों से आए थे. लेकिन सामाजिक गुणा-भाग से भी बड़े दलबदल तो कुछ और ही थे. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने आखिरी बार 2011 में जीत हासिल की थी.

दो बार सांसद रह चुके प्रद्युत बोरदोलोई 2016 में मार्घेरिटा से अपना पिछला विधानसभा चुनाव हार गए थे. शर्मा ने इन दोनों को ही कद्दावर नेता के तौर पर पेश किया, उन्हें कांग्रेस के 'आखिरी हिंदू नेता’ का तमगा दिया, और उनके पार्टी छोड़ने का दोष गौरव पर नहीं, बल्कि कांग्रेस के वरिष्ठ मुस्लिम नेता रकीबुल हुसैन पर मढ़ा. इस बार शर्मा के नेतृत्व में इन दोनों ने ही जीत हासिल की.

विरोधी बौने साबित
असम के मौजूदा जनादेश ने शर्मा के सामने हर गंभीर चुनौती को बौना कर दिया. तीन बार के लोकसभा सदस्य और चुनावी अभियान में सबसे भरोसेमंद विकल्प गौरव चुनाव हार गए. निवर्तमान नेता प्रतिपक्ष देवब्रत सैकिया और कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रिपुन बोरा भी चुनाव हार गए.

विधानसभा में अब एकमात्र दिखाई देने वाले विपक्षी नेता 'रायजोर दल' के अखिल गोगोई ही बचे हैं. अखिल के खुद के अलावा उनकी पार्टी की असम के मूल निवासियों के बीच कोई खास जमीन नहीं बची है. यही वह जमीन है जहां से भविष्य में शर्मा के लिए कोई चुनौती खड़ी हो सकती है. असम के नए विपक्ष की बनावट में 24 में से 22 विधायक मुसलमान हैं. इससे शर्मा की ध्रुवीकरण की दलील मजबूत होती है कि विपक्ष धार्मिक विभाजन के दूसरी तरफ खड़ा है.

राष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ शर्मा भी भाजपा के प्रभावी मुख्यमंत्रियों में शुमार हो गए हैं. उन्होंने अपनी यह छवि ऐसे राज्य में मजबूत हिंदू गोलबंदी के जरिए बनाई है, जहां मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है.

इसके अलावा, वे हिंदी मीडिया में लगातार बने रहने के साथ बड़बोले बयानों में भी आगे रहे हैं, जो अक्सर पार्टी की तय सीमाओं से आगे निकल जाती है. उनका दूसरा कार्यकाल इस बात की परीक्षा लेगा कि क्या भाजपा उन्हें 'मोदी-शाह युग’ के बाद के दौर में संभावित दावेदार के तौर पर देखती है. उनके पास अपनी दावेदारी साबित करने के लिए पांच साल का समय है.ठ्ठ

10 मई, 2021 को मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंत बिस्व शर्मा ने ऐसे राज्य के निर्माण की दिशा में काम शुरू किया, जहां उनकी हार मुश्किल हो जाए. इस परियोजना के कई पहलू थे: व्यक्ति स्वयं, उनकी कल्याणकारी संरचना, नए सिरे से खींचा गया नक्शा और पहचान की राजनीति पर जोर.

शर्मा ने तेजी से विकास किया. गांवों की सड़कें लंबी हुईं, पुल और फ्लाइओवर अक्सर तय समय से पहले ही पूरे हो गए. मोरीगांव में एक सेमीकंडक्टर यूनिट लगी. वादे के मुताबिक 1,00,000 से ज्यादा सरकारी नौकरियां दी गईं. असम के नए विपक्ष की बनावट में 24 में से 22 विधायक मुसलमान हैं. इससे शर्मा की ध्रुवीकरण की दलील मजबूत होती है कि विपक्ष धार्मिक विभाजन के ठीक दूसरी तरफ खड़ा है.

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