
पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 मई को दिल्ली के पार्टी मुख्यालय पहुंचे तो उन्होंने पारंपरिक बंगाली पोशाक—धुती-पंजाबी—पहन रखी थी. उत्साहित कार्यकर्ताओं को संबोधित करते वक्त मोदी ऐसे नेता की संतुष्टि से बोल रहे थे, जिसने इस पल का दशक तक इंतजार किया. उन्होंने कहा, ''गंगोत्री से गंगासागर तक कमल खिल चुका है.’’
फिर हर राज्य का नाम लेकर, जैसे लंबी यात्रा के पड़ाव गिना रहे हों, उन्होंने गंगा के मैदान के राज्यों में भाजपा की जीत का जिक्र किया: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और अब आखिरकार पश्चिम बंगाल. उन्होंने घोषणा की कि पूरा गंगा क्षेत्र अब भाजपा-एनडीए के प्रभाव में है.
पखवाड़े भर पहले ही बिहार में बेहद सहज राजनैतिक बदलाव हुआ था, जहां सम्राट चौधरी राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने और मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा भेजे जाने के बाद पद से हट गए. इससे पहले पिछले साल पार्टी ने ओडिशा में पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को सत्ता से बाहर कर राज्य में पहला भाजपा मुख्यमंत्री बनाया था.
लेकिन सबसे बड़ी सफलता इस गर्मी में बंगाल में मिली, जहां भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया. पार्टी को 45.9 प्रतिशत वोट मिले और उसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन कार्यकाल में बने मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया. तृणमूल 40.8 प्रतिशत वोट शेयर के बावजूद सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि बाकी छह सीटें अन्य विपक्षी दलों के खाते में गईं.
बंगाल की जीत ने भाजपा को वह पूरा करने में मदद की है, जिसे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पौराणिक शब्दावली में अंग-बंग-कलिंग यानी बिहार, बंगाल और ओडिशा कहा. असम में भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उसके सहयोगियों ने लगातार तीसरी जीत दर्ज की और 126 में से 102 सीटें हासिल कीं. दक्षिण भारत में भी एनडीए को छोटी राहत मिली, जहां पुदुच्चेरी में सत्ता बरकरार रही.
लेकिन बंगाल निस्संदेह भाजपा के लिए सबसे बड़ा तोहफा है. भाजपा और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए बंगाल श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती है, जिन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी, जिससे आगे चलकर भाजपा बनी. सात दशकों तक उनके बनाए संगठन ने बंगाल में हर चुनाव लड़ा—मामूली सफलता के साथ, लेकिन ऐसे आंदोलन के धैर्य के साथ जो इतिहास को चुनावी चक्रों से कहीं बड़े नजरिए से देखता है.
बंगाल पहले लंबे समय तक वामपंथ और फिर आरएसएस की नजर में ऐसी नेता के शासन में रहा, जिन पर वह सत्ता बनाए रखने के लिए 'मुस्लिम तुष्टीकरण’ की राजनीति करने का आरोप लगाता रहा, जो उसकी नजर में ऐसी भारी विसंगति थी जिसे सुधारा जाना था. एक भाजपा नेता के शब्दों में, ''बंगाल जीतना सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं. यह घर वापसी है.’’

जीत की राह
अब पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा कोई एक बड़ा मौका नहीं था, न कोई जबरदस्त लहर और न ही कोई साफ राजनैतिक टूटन, जिससे अंदाजा लगाया जा सके कि भाजपा इतनी बड़ी जीत हासिल करेगी. पार्टी ने एक दशक तक चुपचाप ऐसा संगठन खड़ा किया, जिसका असर तब दिखा जब काम लगभग पूरा हो चुका था.
इस बदलाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ तीन सीटें और करीब 10 फीसद वोट मिले थे. इसके मुकाबले तृणमूल ने 211 सीटें और 44.9 फीसद वोट हासिल किए थे. बदलाव की पहली झलक 2019 में दिखी, जब भाजपा बंगाल में ममता बनर्जी की मुख्य चुनौती बनकर उभरी. लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 42 में से 18 सीटें जीत लीं—2014 के मुकाबले 16 सीट ज्यादा.
दूसरी ओर तृणमूल की सीटें 12 घटकर 34 से 22 रह गईं. लेकिन ममता ने बंगाल की शेरनी की अपनी छवि के अनुरूप खुद को मजबूत योद्धा साबित किया. 2021 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 215 सीटें और 48.5 फीसद वोट हासिल करके चौंका दिया. भाजपा ने भी अपनी स्थिति मजबूत की. उसकी सीटें बढ़कर 77 हो गईं और वोट 38.4 फीसद तक पहुंच गया. लेकिन यह बढ़त काफी हद तक कांग्रेस के सफाए और वाम दलों के वोटरों के पाला बदलने से आई थी, न कि ममता के मूल वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने से.
यह रफ्तार 2024 में धीमी पड़ गई, जब बंगाल में भाजपा की लोकसभा सीटें 18 से घटकर 12 रह गईं, जबकि तृणमूल की सीटें 22 से बढ़कर 29 हो गईं. इससे भी बड़ा झटका राष्ट्रीय स्तर पर लगा, जहां भाजपा की कुल सीटें 2019 की 303 से घटकर 240 रह गईं. पार्टी को 272 के बहुमत का आंकड़ा पार करने के लिए एनडीए सहयोगियों—जैसे एन. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड)—पर निर्भर होना पड़ा.
लेकिन हार मानना भाजपा की शैली नहीं रही. पार्टी फिर रणनीति बनाने में जुट गई और पश्चिम बंगाल के लिए अपना पूरा राजनैतिक खेल बदलने का फैसला किया. लोकसभा चुनाव में 240 सीटों के झटके के बाद कई राज्यों में मिली जीत ने उसका आत्मविश्वास बढ़ाया. सबसे पहले अक्तूबर 2024 के विधानसभा चुनाव में उसने हरियाणा में हार के मुंह से जीत छीन ली. एक महीने बाद एनडीए सहयोगियों के साथ महाराष्ट्र में बड़ी जीत की रचना की. फरवरी 2025 में दिल्ली में शानदार जीत मिली और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया गया. साल के अंत में बिहार भी आ गया. हर जीत के साथ भाजपा अपने सबसे बड़े लक्ष्य ममता के बंगाल के करीब पहुंचती गई.
लक्ष्य साफ था: 148 सीटों का साधारण बहुमत हासिल करना. लेकिन 2021 की तरह आक्रामक नारों और शोरगुल वाले अभियान से नहीं, बल्कि ज्यादा शांत, स्थानीय और सुनियोजित रणनीति के जरिए. 2026 के चुनाव में उतरी भाजपा, 2021 वाली भाजपा से काफी अलग थी. तब पार्टी 'दीदी ओ दीदी’ और 'पिशी जाओ’ जैसे नारों के साथ बेहद व्यक्तिगत हमले कर रही थी. इसका फायदा ममता बनर्जी ने उठाया. उन्होंने भाजपा के हमलों को अपने पक्ष में मोड़ लिया, घायल पैर दिखाते हुए व्हीलचेयर पर प्रचार किया, 'खेला होबे’ नैरेटिव को और मजबूत किया और कई सीटों पर अल्पसंख्यक वोटों का 85-90 प्रतिशत तक ध्रुवीकरण करा लिया.
बीमारी की पहचान और इलाज
भाजपा नेतृत्व को बंगाल में 2021 में मिली हार ने गंभीर मंथन के लिए मजबूर किया और पार्टी ने खुलकर अपनी कमियों का विश्लेषण किया. तीन बड़ी समस्याएं सामने आईं. एक, बंगाल में पार्टी कार्यकर्ता हतोत्साहित हो चुके थे. वर्षों की राजनैतिक हिंसा, बूथ स्तर पर डराने-धमकाने और चुनाव बाद हमलों ने उन्हें तोड़ दिया था. कार्यकर्ताओं को लगता था कि सबसे कठिन समय में केंद्रीय नेतृत्व उनके साथ मजबूती से खड़ा नहीं रहा.
दूसरे, पार्टी का जमीनी संगठन खोखला था. भाजपा जरूरत से ज्यादा दल-बदल कर आए नेताओं, पार्ट-टाइम नेताओं और सेलिब्रिटी पर निर्भर हो गई थी. ऐसे उम्मीदवार पहचान और कभी-कभी वोट तो दिला देते थे लेकिन उनके पास बूथ स्तर का नेटवर्क, स्थानीय भरोसा और संगठन खड़ा करने की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता नहीं थी. तीसरे, गुटबाजी ने संगठन की बची-खुची एकजुटता भी कमजोर कर दी थी. स्थानीय इकाइयां बंटी हुई थीं, वफादारियां संगठन के बजाय नेताओंं के प्रति थीं और राज्य नेतृत्व तथा जिला इकाइयों के बीच तालमेल अक्सर खराब रहता था.

उसके बाद मोदी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बंगाल अभियान की कमान संभालने को कहा. शाह ने समझ लिया था कि बंगाल को पारंपरिक चुनाव की तरह नहीं लड़ा जा सकता. इसके लिए ऐसी बहुस्तरीय रणनीति चाहिए थी, जिसकी सोच केंद्रीकृत हो लेकिन अमल विकेंद्रीकृत. उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक, भाजपा महासचिव सुनील बंसल को जिम्मेदारी दी.
बंसल पहले उत्तर प्रदेश में संगठन मजबूत कर चुके थे और 2024 में ओडिशा में पार्टी की जीत के रणनीतिकार थे. उन्हें सिर्फ बंगाल पर ध्यान देने और संगठन को जमीनी स्तर से फिर खड़ा करने का काम सौंपा गया. उन्होंने जिलों का लगातार दौरा किया, बंद कमरे में बैठकें कीं और बूथ तथा मंडल स्तर तक संगठन की कमजोरियों का जायजा लिया.
बंसल ने शुरुआत से ही समझ लिया कि बंगाल में भाजपा की समस्या संदेश या संसाधनों की नहीं, बल्कि संगठन की है. और इसका समाधान सिर्फ संघ के स्वयंसेवक नेटवर्क के जरिए ही संभव है. आरएसएस से लेकर विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ और राज्य के विश्वविद्यालय परिसरों में सक्रिय छात्र संगठनों तक—सभी सहयोगी संगठनों को एक समन्वित ढांचे में जोड़ा गया.
आरएसएस ने अगस्त 2024 में अपने सह-सरकार्यवाह आलोक कुमार को बंसल के साथ मिलकर काम करने के लिए भेजा. संघ से सिर्फ चुनाव प्रचार करने को नहीं कहा गया. उसके सहयोगी संगठनों को अभियान की रणनीति बनाने, बूथ स्तर की कमजोरियां पहचानने, उम्मीदवार चुनने और सबसे अहम, मतदान से पहले महीनों तक जमीन पर रणनीति लागू करने में शामिल किया गया.
मोदी और शाह के निर्देशन में बंसल ने अक्तूबर 2024 में सदस्यता अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य एक करोड़ सदस्य जोड़ना था. उन्होंने इस अभियान को सिर्फ संख्या बढ़ाने का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि संगठन को परतदार बनाने का औजार बना दिया. इसके तहत 'सक्रिय सदस्य’ की अवधारणा लाई गई—ऐसे कार्यकर्ता जिन्हें कम से कम 100 प्राथमिक सदस्य जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई.
इससे जमीनी स्तर पर जवाबदेह नेतृत्व की एक नई परत तैयार हुई. इससे सदस्यता विस्तार केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठन में गहराई तक जुड़ गया. मतदान के दिन तक भाजपा का दावा है कि करीब 60,000 सक्रिय सदस्य हैं, जिन्होंने लगभग 80 लाख प्राथमिक सदस्य बनाए.
इसके बाद पूरे अभियान को पांच जोन में बांटा गया. हर जोन की निगरानी एक केंद्रीय मंत्री और एक अनुभवी संगठनकर्ता की जोड़ी को सौंपी गई. पूरे राज्य में भाजपा ने करीब 9.5 लाख बूथ स्तर के कार्यकर्ता तैनात किए, यानी औसतन हर बूथ पर लगभग एक दर्जन कार्यकर्ता. उनके साथ तीन लाख से ज्यादा पन्ना प्रमुख भी लगाए गए, जिनमें हर एक को 60-70 मतदाताओं की सूची सौंपी गई. इससे घर-घर तक सीधा संपर्क स्थापित हुआ.
सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बूथों पर यह अनुपात लगभग हर 50-60 मतदाताओं पर एक कार्यकर्ता तक पहुंच गया. इतना ही महत्वपूर्ण था बंसल का निगरानी और अनुशासन पर जोर. देर रात वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रोजाना रिपोर्टिंग की व्यवस्था लागू की गई, जिसने कॉर्पोरेट शैली की समीक्षा प्रणाली तैयार कर दी. उनका संदेश साफ था—पार्टी में आगे बढ़ना नेतृत्व से करीबी पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन पर निर्भर करेगा.
इसके साथ ही भाजपा की बंगाल इकाई ने राज्य के 78,903 मतदान केंद्रों पर बेहद जमीनी चुनावी मशीनरी तैयार की. हर बूथ को सिर्फ प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि अपने आप में अलग राजनैतिक रणभूमि माना गया. कुल 294 विधानसभा सीटों में फैले इन बूथों की संख्या औसतन हर सीट पर 260-270 थी. भाजपा रणनीतिकारों ने 2019, 2021 और 2024 के चुनावी आंकड़ों का इस्तेमाल कर हर बूथ का राजनैतिक रुझान समझने के लिए लगातार अपडेट होने वाला विस्तृत डेटा ग्रिड तैयार किया.
इसके बाद पार्टी ने 294 सीटों को जीत की संभावना के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा. करीब 70 सीटों को कैटेगरी ए+ और 100 सीटों को कैटेगरी ए में रखा गया, जहां जीत की संभावना सबसे ज्यादा मानी गई. बाकी सीटों को बी, सी और डी श्रेणियों में बांटा गया. इसी आधार पर संसाधनों का बंटवारा किया गया. ए और ए+ श्रेणी की सीटों को कार्यकर्ताओं और फंड दोनों के मामले में सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिली.
योजनाएं और हिंदुत्व
सबसे ऊपर प्रधानमंत्री मोदी थे, जो पूरे अभियान की सबसे बड़ी ताकत बने. महिलाओं, अनुसूचित जातियों और आदिवासी समुदायों के बीच उनकी लोकप्रियता ने भाजपा को चुनावी मुकाबले में 'विश्वसनीय’ के रूप में पेश किया, जिसे प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और 'डिलीवरी आधारित शासन’ की छवि ने और मजबूत किया. इसके साथ ही पार्टी ने हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव की दोहरी रणनीति अपनाई. बंगाल में मुसलमान आबादी करीब 30 फीसद है और वे ममता का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक हैं. ऐसे में 'हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण’ भाजपा की रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन गया.
इस लामबंदी की तैयारी सिर्फ रैलियों के जरिए नहीं हुई, बल्कि योजनाबद्ध 'संत प्रवास’ अभियान चलाया गया. उसमें हिंदू संतों और धर्मगुरुओं की सार्वजनिक मौजूदगी के माध्यम से उस राजनैतिक अभियान को धार्मिक वैधता देने की कोशिश की गई. आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन और वहां हिंदू अल्पसंख्यकों पर कथित हमलों के मुद्दे को भी हिंदू गोलबंदी के लिए इस्तेमाल किया.
शाह का कथित घुसपैठियों को ''पहचानो, हटाओ और बाहर भेजो’’

का नारा भी असरदार साबित हुआ. इससे हिंदुत्व को महज विचारधारा नहीं, बल्कि 'अस्तित्व के सवाल’ के रूप में पेश किया गया. नतीजतन, दावा है कि करीब 65 फीसद हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में गए.
बांटो और जीतो
जब बात ममता के मजबूत मुस्लिम वोट बैंक को बिखेरने की आई, तो भाजपा ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई. बंगाल की मुस्लिम आबादी कुछ खास इलाकों में केंद्रित है. मुर्शिदाबाद में यह करीब 66 फीसद, मालदा में 51 फीसद और उत्तर दिनाजपुर में लगभग 50 फीसद है. दक्षिण 24 परगना (35 फीसद), नदिया (करीब 27 फीसद) और उत्तर 24 परगना (करीब 25 फीसद) जैसे जिलों में भी मुसलमान निर्णायक वोट बैंक माने जाते हैं.
इस पूरे समीकरण में एक अहम भूमिका चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की रही. इस प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची 7,66,37,529 से घटकर 6,82,51,002 रह गई. 27 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए. इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम बहुल जिलों से थी. मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में पहले से तृणमूल के प्रति नाराजगी के साथ मिलकर उसने भाजपा के लिए नए चुनावी अवसर पैदा किए.
भाजपा की रणनीति थी कि इन मुस्लिम बहुल इलाकों के आसपास चुनावी संतुलन को दो समानांतर तरीकों से बदला जाए. एक, हिंदू वोटों को जाति आधार पर एकजुट करना, खासकर एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के बीच, जो कई सीटों पर कुल मतदाताओं का 35-40 फीसद हिस्सा हैं. बीरभूम, नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे इलाकों में इसके लिए नामशूद्र दलितों, राजबंशियों, आदिवासी समूहों और कृषि आधारित ओबीसी समुदायों तक विशेष पहुंच बनाई गई. इसके साथ कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार और स्थानीय नेतृत्व में प्रतिनिधित्व भी बढ़ाया गया.
भाजपा की दूसरी रणनीति इन इलाकों में विपक्षी वोटों के बिखराव का फायदा उठाने की थी. हालांकि ममता को मुस्लिम समुदाय का भारी समर्थन मिलता रहा, लेकिन कई मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस और वाम दलों का 5-10 फीसद वोट अब भी बना हुआ था.
भाजपा के आंतरिक आकलन के मुताबिक, अल्पसंख्यक वोटों में सिर्फ 5-7 फीसद का भी बंटवारा कांग्रेस, माकपा नेतृत्व वाले वाम मोर्चे, इंडियन सेक्युलर फ्रंट और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के बीच हो जाए, तो 2021 में तृणमूल को मिली मुस्लिम वोटों की एकजुटता कमजोर पड़ सकती है. वक्फ संशोधन और ओबीसी वर्गीकरण में बदलाव जैसे मुद्दों ने भी अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर असहजता पैदा की. इसका फायदा यह हुआ कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट, कांग्रेस और वाम दल मुस्लिम वोटों में सेंध लगा पाए.
इसके साथ ही भाजपा ने गैर-अल्पसंक्चयक वोटों को 50-55 फीसद से ऊपर तक गोलबंद करने की रणनीति पर काम किया. इस रणनीति का बड़ा हिस्सा ओबीसी समर्थन हासिल करने और चुनावी नैरेटिव में सांप्रदायिक धार जोड़ने पर केंद्रित था. जब तृणमूल सरकार ने 2025 में राज्य की ओबीसी सूची का विस्तार किया, तब 76 नई जातियों को इसमें शामिल किया गया, जिनमें 67 मुस्लिम समुदाय से थीं—यानी कुल नए शामिल समूहों का करीब 88 फीसद.
भाजपा ने इस मुद्दे को बेहद चतुराई से उठाया. पार्टी ने ओबीसी का नया अर्थ 'वन-साइडेड बेनिफिशियरी क्लासेज’ बताना शुरू किया और आरक्षण सूची से बाहर रह गए महिष्य, तेली और साहा समुदायों को प्रशासनिक गफलत का नहीं, 'मुस्लिम तुष्टीकरण’ का शिकार बताया.
हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण खासकर शहरी पुरुष मतदाताओं के बीच निर्णायक साबित हुआ. मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत ज्यादा ग्रामीण इलाकों में केंद्रित थी, इसलिए शहरों में भाजपा की ओर हुआ झुकाव उसे चुनावी तौर पर असाधारण बढ़त दिलाने वाला साबित हुआ. इसी का नतीजा था कि भाजपा ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 68 और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 16 सीटों में भारी जीत हासिल की.
यह उस दलित, आदिवासी और ओबीसी गठजोड़ की गहराई दिखाता है, जिसे पार्टी ने दो वर्षों में लगातार तैयार किया था. यह सफलता सीधे भाजपा की बूथ प्रबंधन रणनीति का नतीजा थी—पार्टी को पता था कि किस बूथ पर कौन-सा समुदाय रहता है, उनकी कौन-सी शिकायतें असर डाल सकती हैं और कौन-से कार्यकर्ता भरोसे के साथ पहुंच सकते हैं.
भाजपा के दूसरे चुनावी औजार
इस जीत में अहम भूमिका निभाने वाले पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक भूपेंद्र यादव ने किसानों की परेशानी को बड़ा चुनावी मुद्दा माना. हुगली और बर्धमान में किसानों के साथ बातचीत से उन्हें पता चला कि खासकर आलू किसानों में भारी नाराजगी थी क्योंकि उन्हें लगातार नुक्सान उठाना पड़ रहा था. यह मुद्दा जल्द ही मोदी और शाह के भाषणों का केंद्रीय हिस्सा बन गया. भाजपा ने हुगली की 18 में से 16 और पूरब बर्धमान की 16 में 14 सीटों पर जीत दर्ज की.
भाजपा की एक और अहम रणनीति विधानसभा सीटों के हिसाब से 'चार्जशीट’ तैयार करना थी. पार्टी प्रवक्ता केया घोष की अगुआई में कार्यकर्ताओं ने 229 सीटों पर व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया. इस दौरान स्थानीय शिकायतें जुटाई गईं और सत्तारूढ़ व्यवस्था के खिलाफ आरोपों का दस्तावेज तैयार किया गया. भाजपा के 65 विधायकों की सीटों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया. घोष कहती हैं, ''हमने पांच महीने तक डेटा जुटाया. उसके बाद राज्य स्तर पर 10-12 लोगों की टीम ने उसकी प्रस्तुति और सत्यापन पर काम किया.’’
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि यह स्थानीय मुद्दों पर आधारित रणनीति चुनावी तौर पर काफी फायदेमंद साबित हुई. इससे अलग-अलग मतदाता समूहों को आकर्षित करने के लिए सूक्ष्म स्तर की रणनीतियां तैयार करने में मदद मिली. झुग्गी बस्तियों में पार्टी ने महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए हर महीने 3,000 रुपए भत्ता और लड़कियों की शिक्षा के लिए 50,000 रुपए सहायता जैसे वादों को प्रमुखता से उठाया.
वहीं ऊंची आवासीय इमारतों वाले इलाकों में रोजगार, सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं पर ज्यादा जोर दिया गया. आर.जी. कर मामले ने भी महिला मतदाताओं को भाजपा की ओर मोड़ने में मदद की, जब शाह ने इस घटना को ''बंगाल में महिलाएं सुरक्षित न होने’’ की मिसाल बताया. भाजपा ने इस नैरेटिव को कभी नहीं छोड़ा. पार्टी ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए आवासीय परिसरों के भीतर मतदान केंद्र बनाने की भी मांग की, जिसके बाद 20 सीटों पर ऐसे 69 बूथ बनाए गए.
इन तमाम कोशिशों का कुल असर यह हुआ कि तृणमूल की लंबे समय से बनी ताकत के तीन बड़े स्तंभ ''3 एम’’, यानी ममता, महिला और मुस्लिम—काफी हद तक कमजोर पड़ गए. दीदी के लिए यह हार उस राजनैतिक किले के ढहने जैसी है, जिसे वे अजेय मानती थीं. लेकिन भाजपा के लिए बंगाल सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं. यह पूर्वी भारत का राजनैतिक नक्शा बदलने के लिए एक दशक से चल रहे वैचारिक, संगठनात्मक और राजनैतिक अभियान का चरम बिंदु है.
उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक पूरे गंगा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर भाजपा ने दिखाया है कि वह सिर्फ चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं, बल्कि लंबे समय तक लगातार काडर निर्माण, सोशल इंजीनियरिंग और नैरेटिव तैयार करने में माहिर है और इस तरह वह समूचे राजनैतिक ढांचे को बदलने की क्षमता रखती है.
अब भाजपा बंगाल की इस जीत को इस सबूत के रूप में पेश करेगी कि कोई भी क्षेत्रीय गढ़ अटूट नहीं और कोई भी राजनैतिक व्यवस्था स्थायी नहीं होती. इसके साथ भारतीय राजनीति के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या यह उस दौर का अंत है, जब ताकतवर क्षेत्रीय नेता भाजपा की लगातार बढ़ती चुनावी मशीनरी के सामने टिक पाते थे?
बंगाल में 2021 के बाद से भाजपा के चुनावी प्रदर्शन से भाजपा तीन नतीजों पर पहुंची: पार्टी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं, जमीन पर संगठन खोखला है और गुटबंदी चरम पर है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जानते थे कि बंगाल में चुनाव के पारंपरिक तरीके काम नहीं आएंगे. वहां कई स्तरों की रणनीति की दरकार होगी, जिसका नजरिया तो केंद्रीकृत हो, लेकिन अमल के तरीके विकेंद्रित. उसकी योजना करीने से बनाई गई और हर बारीकी पर ध्यान दिया गया.
सुनील बंसल का सदस्यता अभियान परत-दर-परत संगठन तैयार करने में कामयाब साबित हुआ. उससे जमीनी स्तर पर एक मध्यम दर्जे का जवाबदेह नेतृत्व तैयार हुआ. उनका संदेश साफ था कि पार्टी में आगे बढ़ने के लिए नेताओं का करीबी होना नहीं, प्रदर्शन काम आएगा.
चुनाव आयोग के मतदाता सूचियों को नए सिरे से बनाने के लिए विशेष पुनरीक्षण अभियान के तहत कटे 91 लाख वोटर और मुसलमानों के एक तबके में तृणमूल के प्रति नाराजगी से भी भाजपा के लिए मौके खुले.
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदायों में पैठ, हर विधानसभा क्षेत्र के आरोप-पत्र, झुग्गी-बस्तियों और बहुमंजिला इमारतों के निवासियों के लिए करीने से बनाई गई रणनीतियों ने भाजपा के लिए अलग-अलग वोट बैंक बनाने में मदद की.
खिलाड़ी जिन्होंने पलटा सारा खेल
पश्चिम बंगाल का चुनाव कोई सामान्य चुनाव नहीं था. आखिर में यह केंद्र सरकार की शक्तियों और विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्ताओं के ध्रुवीकरण की तेज कोशिशों का करीने से किया गया अभियान साबित हुआ
अभियान के अगुआ- नरेंद्र मोदी :
प्रधानमंत्री ने पूरे प्रचार अभियान की ताकत में इजाफा किया. असल जंग वाले इस प्रदेश में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. महिला, आदिवासी और दलित समुदायों में उनकी अपील को सीधे नकद हस्तातंरण के वादे से बल मिला. यह कल्याण योजनाओं पर बहुत तक निर्भर ममता बनर्जी के 15 साल के राज की काट था. आखिर में विश्वसनीयता के दावे से पलड़ा झुक गया
पूरी बिसात के सूत्रधार- सुनील बंसल:
भाजपा महासचिव बंसल ने 2024 के लोकसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन से हताश पार्टी कार्यकर्ताओं में दम भरा और नया ढांचा खड़ा किया. उन्होंने जमीन से जुड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं को साथ लिया और पांच जोन उत्तर बंगाल, जंगल महल, दक्षिण बंगाल, दक्षिण-पश्चिम सीमा क्षेत्र और पश्चिमी क्षेत्र के लिए अलग-अलग चुनावी मॉडल तैयार किया
मोड़ लाने वाले - भूपेंद्र यादव:
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के जिम्मे वह तरीका तैयार करना था कि कैसे कल्याण कार्यक्रमों के वादे को लोगों तक पहुंचाया जाए, उस ओर मंत्रालयों का झुकाव तय किया और नीतियों को चुनावी फायदे में बदलने में मदद की
कमांडर इन चीफ -अमित शाह:
केंद्रीय गृह मंत्री खुद राज्य में प्रचार के आखिरी दिनों में दो हफ्ते तक डेरा डाले रहे और मुद्दा आधारित नारे उछालते रहे. वे काडर और कार्यकर्ताओं में राजनैतिक हिंसा का डर भी भगाते रहे और पक्का किया कि हर जिले की पार्टी इकाई में अनुशासन बना रहे
प्रमुख संयोजक - मंगल पांडेय:
बिहार के मंत्री पांडेय ने अभियान के संयोजन की रीढ़ की तरह काम किया, राज्य और केंद्रीय इकाई के बीच संवाद के पुल बने और बंगाल के अलग-अलग राजनैतिक हिस्सों में जिला स्तर की रिपोर्टिंग को संभालते रहे
अमल किया-कराया- समिक भट्टाचार्य::
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने इस जीत में अहम भूमिका निभाई और अपने अनुभव से योगदान दिया. उनके जिम्मे पुराने कार्यकर्ताओं को फिर जोड़ना और पार्टी में विभिन्न गुटों को एकजुट कराना था
रीढ़- आलोक कुमार:
आरएसएस के सह-सरकार्यवाह ने विश्व हिंदू परिषद के संत प्रवास कार्यक्रमों का संयोजन किया और जमीन पर वैचारिक झुकाव पैदा करने के लिए भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, सहकार भारती और अन्य को एकजुट किया और अभियान में लगाया
चुनौती बना चेहरा- शुभेंदु अधिकारी:
विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे और अब बंगाल के मुख्यमंत्री तेजतर्रार राजनैतिक परिवर्तनकारी की तरह सक्रिय हुए. उन्होंने दीदी को उनके गढ़ भवानीपुर में सीधी चुनौती दी, जिससे कड़े मुकाबले का नैरेटिव बना

