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चेतावनी भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र के लिए

भारत के विस्तृत रक्षा नेटवर्क पर मिथॉस जैसे मॉडलों से पैदा हो रहे खतरे से निबटने का एकमात्र समाधान है मजबूत, स्वदेशी एआइ संरचना का विकास.

national security
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 13 मई , 2026

मिथॉस जैसे एआइ मॉडल से पैदा हो रहे खतरे से निबटने का एकमात्र रास्ता मजबूत, स्वदेशी एआइ ढांचा तैयार करना है. भारत की रक्षा व्यवस्था सॉफ्टवेयर आधारित कम्युनिकेशन सिस्टम, सैटेलाइट नेटवर्क, रडार इंस्टॉलेशन, एयर डिफेंस सिस्टम और लॉजिस्टिक्स चेन के जाल पर टिकी है.

एंथ्रोपिक के क्लॉड मिथॉस जैसे उन्नत एआइ मॉडल इस व्यवस्था के लिए एक नए तरह का जोखिम लेकर आए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे एआइ सिस्टम गलत हाथों में पड़ जाएं, तो वे सैन्य स्तर के सॉफ्टवेयर को स्कैन कर छिपी या अब तक अनजान कमजोरियों को बहुत कम लागत में खोज सकते हैं.

पारंपरिक साइबर खतरों के विपरीत, जो मानव विशेषज्ञता और समय पर निर्भर होते हैं, ऐसे एआइ सिस्टम बड़े पैमाने पर कमजोरियां ढूंढ़ने और उनका फायदा उठाने की प्रक्रिया को ऑटोमेट कर सकते हैं, जिससे प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है.

सबसे खराब स्थिति में, दुश्मन रक्षा नेटवर्क में घुसपैठ कर सकते हैं, सैटेलाइट कम्युनिकेशन को बाधित कर सकते हैं, सैनिकों की आवाजाही और संसाधनों की तैनाती के लिए जरूरी लॉजिस्टिक्स चेन को तोड़ सकते हैं, और रडार तथा एअर डिफेंस सिस्टम की विश्वसनीयता से समझौता कर सकते हैं.

यह सब ऑपरेशनल तैयारियों को कमजोर कर सकता है और युद्ध की स्थिति में बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसे उन्नत एआइ को आक्रामक साइबर ऑपरेशन में शामिल करना भारत की रणनीतिक रक्षा तैयारी के तरीके में बुनियादी बदलाव की मांग करता है.

जयजीत भट्टाचार्य कहते हैं कि मिथॉस जैसे मॉडल का सबसे बड़ा खतरा यह है कि कमजोरियों की पहचान और उनके इस्तेमाल के बीच का समय बहुत कम हो गया है, और ये सिस्टम साइबर सुरक्षा उपायों के उन्हें ठीक करने से पहले ही खामियां खोज सकते हैं. वे कहते हैं कि ऐसे एआइ के कथित चीनी संस्करण भारत के विरोधियों तक पहुंच सकते हैं, जो जुड़े हुए सॉफ्टवेयर सिस्टम पर आधारित रक्षा, टेलीकॉम और ऊर्जा ढांचे के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं.

भट्टाचार्य कहते हैं, ''जो तकनीक सुरक्षा करने वालों को कमजोरियां पहचानने और उन्हें ठीक करने में मदद कर सकती है, वही दुश्मनों को हमले करने में भी मदद कर सकती है. भारत को नियंत्रित पहुंच वाला ढांचा बनाना होगा, रक्षा और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एआइ-रेड टीम टेस्टिंग अनिवार्य करनी होगी, स्वदेशी साइबर-एआइ क्षमता विकसित करनी होगी और इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय, सीईआरटी-इन (इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पॉन्स टीम.

, रक्षा मंत्रालय, डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन) तथा दूसरे रेगुलेटरों के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा.’’ मनोहर पर्रीकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस में शोध विश्लेषक रोहित कुमार शर्मा कहते हैं कि मिथॉस का मूल उद्देश्य सिस्टम को सुरक्षित करना है, इसलिए यह सही इस्तेमाल में फायदेमंद हो सकता है. लेकिन अगर यह गलत हाथों में चला जाए तो खतरा बन सकता है. वे यह भी मानते हैं कि मिथॉस को लेकर जो डर बना है, वह एआइ आधारित साइबर हथियारों की नई दौड़ की शुरुआत कर सकता है.


पेलोरस टेक्नोलॉजी के संस्थापक और सीईओ राहुल द्विवेदी कहते हैं कि मिथॉस जैसी उपलब्धि एक खतरनाक सचाई दिखाती है—एआइ ने संतुलन को हमलावरों के पक्ष में झुका दिया है. हमले और बचाव के बीच गति का फर्क बहुत बड़ा है. जहां बचाव में महीनों लग सकते हैं, वहीं हमले तेजी से हो सकते हैं. ऐसे में अमेरिका के सॉफ्टवेयर और चीन के हार्डवेयर पर निर्भर भारत का ढांचा खास तौर पर जोखिम में है. द्विवेदी के मुताबिक भारत को चार बड़े कदम उठाने होंगे. पहला, एक राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाना होगा जो रक्षा नेटवर्क और अहम ढांचों में इस्तेमाल होने वाले हर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में एआइ आधारित तरीके से लगातार कमजोरियां ढूंढ़े.

दूसरा, भारत को अपनी आक्रामक एआइ क्षमता भी विकसित करनी होगी, ताकि वह खुफिया क्षेत्र में मजबूती से काम कर सके. तीसरा, वैश्विक मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय अपने डेटा पर आधारित स्वदेशी एआइ मॉडल तैयार करने होंगे, ताकि नतीजे भारत के सुरक्षा माहौल के मुताबिक हों. और चौथा, प्रतिक्रिया का समय कम करना होगा, ताकि सिस्टम कुछ ही घंटों के भीतर खतरे को पहचान, ठीक और निष्क्रिय कर सके.

पाइ-लैक्स के सीईओ अंकुश तिवारी कहते हैं कि मिथॉस साइबर युद्ध में बड़ा बदलाव है. ''जिस तरह मशीन गन ने भारी मात्रा में फायरिंग कर रक्षा तंत्र को पीछे छोड़ दिया था, उसी तरह मिथॉस कमजोरियां खोजने का समय सैकड़ों घंटों से घटाकर कुछ सेकंड या मिनट कर देता है, जिससे असमान बढ़त मिलती है.’’ उनके मुताबिक मिथॉस फिलहाल खतरा है, लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह मजबूत सुरक्षा का साधन भी बन सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बदलते खतरों से निबटने के लिए संस्थानों को एयर-गैप्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर, सख्त डेटा नियंत्रण और ऐसे एआइ मॉडल विकसित करने होंगे जो पूरी तरह उनके अपने नियंत्रण में हों. आखिरकार मिथॉस यह साफ संकेत देता है कि अब तीसरे पक्ष के एआइ समाधान पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर तकनीकी ढांचा बनाना जरूरी है. 

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