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गतिरोध तोड़ने की राह

ऐतिहासिक महिला आरक्षण कानून को जल्दी लागू करने की कोशिश विपक्ष ने रोकी, अब सवाल है कि यह गतिरोध कैसे टूटे.

cover story: nari shakti act
भाजपा नेता 17 अप्रैल को संसद के बाहर

सत्रह अप्रैल की शाम नई लोकसभा में डिवीजन बेल बजी. ऊंची छत और मोर थीम वाला यह वही सदन था, जहां 31 महीने पहले जोरदार तालियों के बीच नरेंद्र मोदी सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कराया था. उसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद सीटें आरक्षित की गई थीं.

लेकिन इस बार माहौल बिल्कुल अलग था. तनाव, टकराव और सियासी खींचतान साफ दिख रही थी. जब स्पीकर ने नतीजा सुनाया—298 समर्थन में, 230 विरोध में—तो संविधान (131वां संशोधन) विधेयक जरूरी दो-तिहाई बहुमत से 60 से ज्यादा वोटों से पीछे रह गया. यह पहली बार था जब मोदी के दौर में कोई संवैधानिक संशोधन सदन में वोटिंग के दौरान गिर गया. इसकी गूंज संसद से बहुत दूर तक सुनाई दी.

ऐसे में सवाल है कि जब आंकड़े खिलाफ दिख रहे थे, तब भी मोदी सरकार ने इतना बड़ा दांव क्यों खेला? सत्तारूढ़ दल की रणनीति कई लक्ष्यों को एक साथ साधने की लगती थी. सबसे बड़ा मकसद था नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को जल्दी लागू करना. अगर कानून अपने ढर्रे चलते हुए आगे बढ़ता तो इसका अमल 2034 से पहले संभव न था. ऐसा इसलिए क्योंकि 2023 के कानून में साफ लिखा है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब कानून पास होने के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा.

नए संशोधन बिल का मकसद इस लंबी समयसीमा को छोटा करना था. सरकार चाहती थी कि भविष्य की जनगणना से इसे अलग कर जल्दी लागू किया जाए. इसके साथ एक अलग बिल भी लाया गया, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का रास्ता खोलने की बात थी. इसके पीछे तर्क यह था कि लोकसभा का आकार बढ़ाया जाए ताकि एक-तिहाई आरक्षण के लिए अतिरिक्त सीटें बनाई जा सकें और मौजूदा सीटों में कटौती या राजनैतिक टकराव से बचा जा सके.

पर्यवेक्षकों के मुताबिक, यह दांव सत्तारूढ़ भाजपा को हर तरह से फायदे वाला लग रहा था. पार्टी को भरोसा था कि विपक्ष के लिए महिला आरक्षण से जुड़े बिल का विरोध करना राजनैतिक रूप से आसान नहीं होगा. भारत के कुल मतदाताओं में महिलाएं लगभग आधी हैं. ऐसे में अगर बिल पास हो जाता, तो 2029 में लगातार चौथी जीत की राह में भाजपा को बड़ी बढ़त मिल सकती थी.

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फरवरी से ही प्रमुख विपक्षी नेताओं से संपर्क शुरू कर दिया था. उन्होंने बिल पास कराने के लिए समर्थन मांगा और भरोसा दिलाया कि सरकार इस बात को लेकर संवेदनशील है कि दक्षिणी राज्यों के हित प्रभावित न हों. पार्टी को लगा कि विपक्ष की कई पार्टियां सहमत हैं इसलिए संशोधन बिल आगे बढ़ाया गया.
लेकिन संसद में तस्वीर बदल गई. विपक्षी दलों ने रणनीति बदली और बिल का विरोध कर दिया.

उनका आरोप था कि सरकार महिला आरक्षण को सिर्फ मुखौटे की तरह इस्तेमाल कर रही है ताकि देश को गुमराह किया जा सके. कांग्रेस का दावा था कि असली मकसद 2029 से पहले परिसीमन पूरा करना है, ताकि सत्ताधारी दल अपनी चुनावी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाएं तय कर सके और जाति जनगणना के नतीजों को शामिल करने से बच सके. विपक्षी सदस्यों ने अप्रैल, 2025 में कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स के उस फैसले का भी हवाला दिया, जिसके तहत 2027 की जनगणना में 1931 के बाद पहली बार जातियों की गिनती शामिल की जानी है.

भाजपा का हिसाब यह था कि अगर विपक्ष बिल गिरा देता, जैसा कि हुआ, तो महिला सशक्तीकरण का विरोध करने का ठीकरा उसी के सिर फोड़ा जा सकता है. सच में यही हुआ. 18 अप्रैल को राष्ट्र के नाम प्रसारित संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टियों पर विधानसभाओं और संसद में महिलाओं की एंट्री रोकने का आरोप लगाया.

लेकिन विपक्ष ने यह पक्का कर दिया कि महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण कब मिले, लड़ाई अब सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं रहने वाली. उसने इसे अब एक कहीं बड़े और ज्यादा विस्फोटक मुद्दों से जोड़ दिया है—परिसीमन, जनगणना, जातीय गणना, अन्य ‌पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की दावेदारी, दक्षिणी राज्यों की चिंताएं और कुल मिलाकर भविष्य की किसी भी लोकसभा में सत्ता के गणित.

दूसरी तरफ, लगभग सभी दल इस बात पर सहमत हैं कि लोकसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण जरूरी है और इसे जल्दी लागू करना चाहिए. अब असल मुश्किल यह है कि इस मुद्दे को दूसरे विवादित सवालों में उलझाए बिना संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने का रास्ता कैसे निकले. इन्हीं बड़े सवालों के कुछ जवाब यहां तलाशने की कोशिश है:

कांग्रेस कार्यकर्ता 20 अप्रैल को जयपुर में प्रदर्शन करते हुए

प्र. 850 सीटों वाली लोकसभा पर सहमति क्यों नहीं बन सकी?
विशेषज्ञों का कहना है कि संवैधानिक संशोधन बिल की सबसे बड़ी कमजोरी यह नहीं थी कि उसने लोकसभा को बढ़ाकर 850 सीट करने का प्रस्ताव रखा. बिल में कहीं भी यह बताया ही नहीं गया कि यह संख्या तय कैसे की गई. यह बड़ी कमजोरी थी. सदन में शाह ने दक्षिणी राज्यों की चिंता दूर करने की कोशिश की. उन्होंने एक फॉर्मूला बताया, जो बिल के लिखित मसौदे में मौजूद नहीं था.

उनके मुताबिक, हर राज्य की मौजूदा लोकसभा सीटें 50 फीसद बढ़ाई जाएंगी, ताकि सभी राज्यों की हिस्सेदारी बनी रहे. यानी दक्षिणी राज्यों का मौजूदा 24 फीसद हिस्सा आगे भी 24 फीसद ही रहेगा. गृह मंत्री ने यह भी कहा कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटें तय करने के मुकाबले 50 फीसद के फॉर्मूले से दक्षिण के पांच राज्यों को 19 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी. जब विपक्षी सांसदों ने कहा कि बिल में ऐसी कोई गारंटी लिखी ही नहीं है, तो शाह ने एक असामान्य कदम उठाते हुए एक घंटे का स्थगन देने की पेशकश की, ताकि यह फॉर्मूला बिल में जोड़ा जा सके.

लेकिन विपक्ष की असली आपत्ति इससे कहीं गहरी थी. राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने उसी पर उंगली रखी. उनका तर्क था कि 50 फीसद की समान बढ़ोतरी से उत्तर और दक्षिण के बीच अंतर कम नहीं होगा, बल्कि और बढ़ जाएगा. मसलन, उत्तर प्रदेश की 80 सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी, जबकि तमिलनाडु की 39 सीटें सिर्फ 59 होंगी. यानी दोनों के बीच जो अंतर आज 41 सीटों का है, वह बढ़कर 61 हो जाएगा.

सिब्बल ने सिर्फ गणित की बात नहीं की, उन्होंने इसे चुनावी नक्शे से भी जोड़ा. उनके मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तरी पट्टी की 238 सीटों में से भाजपा ने 127 जीती थीं, जबकि विंध्य से नीचे के दक्षिण के पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 130 सीटों में उसे सिर्फ 29 सीटें मिली थीं. उनका कहना था कि हिंदी पट्टी की संख्या बढ़ने से जो राजनैतिक बढ़त बनेगी, यही वह संरचनात्मक फायदा है जिसे मौजूदा बिल स्थायी रूप देना चाहता था.

हालांकि हर कोई यह नहीं मानता कि 50 फीसद बढ़ोतरी वाले फॉर्मूले को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए था. एनआइटीटीई एजुकेशन ट्रस्ट के वाइस प्रेसिडेंट संदीप शास्त्री का कहना है कि अगर यह प्रस्ताव सिर्फ जबानी भरोसे के बजाए बिल में लिखित रूप में शामिल होता तो यह प्रक्रियात्मक रूप से दक्षिणी राज्यों की चिंता कम करने का ठीक तरीका हो सकता था.

लोकप्रिय धारणा के उलट, आबादी के हिसाब से देखें तो दक्षिण भारत के सभी राज्य इस समय लोकसभा में अपेक्षाकृत ज्यादा प्रतिनिधित्व रखते हैं. 50 फीसद की समान बढ़ोतरी से यह स्थिति और मजबूत हो जाती. वहीं उत्तर और पश्चिम के 11 ऐसे राज्य, जो अभी कम प्रतिनिधित्व वाले हैं, वे फिर भी पीछे रह जाते. इसके बावजूद दक्षिण के नेताओं का कहना है कि कोई भी परिसीमन ऐसा होना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता और राष्ट्रीय जीडीपी में उनके ज्यादा योगदान को मान्यता दे.

विपक्ष का अविश्वास सिर्फ अंदेशे पर आधारित नहीं है. इसके पीछे हाल के दो अनुभव हैं. पहला, जम्मू-कश्मीर का 2022 का परिसीमन. इसे 2019 के पुनर्गठन कानून के तहत जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई आयोग ने अंजाम दिया था. इसमें जम्मू को छह अतिरिक्त सीटें मिलीं और उसकी हिस्सेदारी 37 से बढ़कर 43 हो गई, जबकि कश्मीर को सिर्फ एक सीट मिली और वह 46 से 47 पर पहुंचा.

यह तब हुआ जब 2011 में घाटी की आबादी 68.9 लाख थी, जो जम्मू की 53.8 लाख आबादी से ज्यादा थी. दूसरा उदाहरण असम का 2023 परिसीमन है, जिसे चुनाव आयोग ने कराया था. वहां भी इसी तरह के आरोप लगे. मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों की संख्या 35 से घटकर 22 रह गई. ये हाल की सबसे चर्चित मिसालें हैं. हालांकि, कांग्रेस और दूसरी पार्टियों पर भी अतीत में कुछ राज्यों में ऐसे ही कदम उठाने के आरोप लगते रहे हैं.

प्र. क्या 543 सीटों वाली मौजूदा लोकसभा में 33 फीसद महिला आरक्षण असली विकल्प है?
जब विपक्ष पर यह आरोप लगा कि उसने जानबूझकर महिला आरक्षण लागू होने में देरी कराई है, तो उसका जवाब सीधा और राजनैतिक तौर पर असरदार था. अगर मकसद लोकसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए जल्दी आरक्षित करना है तो यह काम मौजूदा 543 सीटों के भीतर क्यों नहीं किया जा सकता? सुधार को परिसीमन का बंधक क्यों बनाया जाए? 543 का एक-तिहाई होता है 181 सीटें. सिद्धांत रूप से इन 181 सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है.

साथ ही यह व्यवस्था भी की जा सकती है कि अनुसूचित जाति की 84 और अनुसूचित जनजाति की 47 आरक्षित सीटों में भी एक-तिहाई हिस्सेदारी संबंधित वर्ग की महिलाओं को मिले. विपक्ष का कहना है कि इस रास्ते के कई फायदे हैं. पहला, महिला आरक्षण तुरंत लागू हो सकता है. इसके लिए जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. दूसरा, महिला न्याय का एजेंडा उत्तर-दक्षिण, जाति और संघीय टकराव जैसे विवादों में नहीं फंसेगा, जो अभी परिसीमन को घेरे हुए हैं.

इसका मूल गणित समझना मुश्किल नहीं है. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि असली अड़चन संवैधानिक ढांचे में है. मौजूदा महिला आरक्षण कानून यह नहीं कहता कि इसे वर्तमान लोकसभा की सीमाओं के भीतर तुरंत लागू किया जा सकता है. कानून साफ तौर पर इसे अगली संबंधित जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ता है. यानी अगर संसद अभी मौजूदा सदन में 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाहती है, तो लगभग तय है कि इसके लिए एक और संवैधानिक संशोधन करना पड़ेगा.

विशेषज्ञों की राय में, यह मानना कि नई जनगणना या परिसीमन के बिना मौजूदा 543 सीटों में से एक-तिहाई सीटें आरक्षित नहीं की जा सकतीं, संवैधानिक मजबूरी नहीं बल्कि नीतिगत वरीयता को अहमियत देना है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के संजीर आलम के मुताबिक, ''महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना जरूरी नहीं. 543 सीटों के भीतर इसे लागू करने के लिए संशोधन का रास्ता कानूनी तौर पर हमेशा से मौजूद रहा है.’’

कांग्रेस ने याद दिलाया कि 1992-93 में उसके शासनकाल में पारित 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के जरिए पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दिया गया था. इसके लिए राज्यों में कोई नई परिसीमन प्रक्रिया नहीं कराई गई थी. बाद में एक दर्जन से ज्यादा राज्यों ने यह आरक्षण बढ़ाकर 50 फीसद कर दिया. नतीजा यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर 10 लाख से ज्यादा निर्वाचित महिला प्रतिनिधि सामने आईं.

विधेयक के लिए तनी मुट्ठियां पटना में 20 अप्रैल को प्रदर्शन करतीं भाजपा महिला मोर्चा कार्यकर्ता

संसद में पहले जो महिला आरक्षण बिल लाए गए थे, उनमें भी परिसीमन की कोई शर्त नहीं थी. कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने लोकसभा में पार्टी का रुख साफ शब्दों में रखा. उन्होंने कहा, ''अगर आपने 2023 में हमारी बात मानी होती तो महिला आरक्षण 2024 में लागू हो चुका होता. हम कह रहे हैं कि महिला आरक्षण को परिसीमन से मत जोड़िए. ऐसा करेंगे तो हम समर्थन देंगे.’’

सरकार की दलील अलग थी. अगर मौजूदा 543 सीटों पर एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाए, तो किन सीटों को आरक्षित किया जाएगा? किस आधार पर किसी मौजूदा सांसद की सीट बदली जाएगी? भाजपा के एक नेता का कहना है कि राजनैतिक दलों के लिए यह बात जनता और अपने नेताओं को समझा पाना आसान न होगा, क्योंकि कई पुरुष सांसदों को अपनी सीट छोड़नी पड़ेगी ताकि वहां महिला उम्मीदवार उतारी जा सके.

इसके बाद रोटेशन का सवाल भी आता है. अगर 181 सीटें आरक्षित होंगी, तो हर चुनाव में सीटें बदलनी पड़ेंगी. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में, ''हर पांच साल में आप राजनैतिक नक्शे के एक-तिहाई हिस्से को रीसेट कर देंगे. इसका असर शासन और जवाबदेही दोनों पर पड़ेगा.’’

संसदीय बहस के जवाब में अमित शाह ने एक और तर्क दिया. उनके मुताबिक, अगर लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 की जाएं तो 283 महिलाएं संसद में पहुंच सकती हैं. यह संख्या मौजूदा 543 सीटों के हिसाब से निकलने वाली 181 सीटों से 100 से ज्यादा है. और ऐसा करते हुए बाकी सभी के लिए अनारक्षित सीटों की संख्या भी ज्यादा बनी रह सकती है.

प्र. परिसीमन की पहेली सुलझाने का सबसे उपयुक्त रास्ता कौन-सा है?
परिसीमन वह प्रक्रिया है, जिसमें हर जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं, ताकि आबादी बदलने के साथ प्रतिनिधित्व भी संतुलित बना रहे. संविधान के अनुच्छेद 81, 82 और 170 के तहत यह प्रक्रिया चलती है. इसका मूल सिद्धांत सीधा है: एक व्यक्ति, एक वोट, एक समान मूल्य.

भारत ने अब तक चार बार अपने निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली हैं—1952, 1963, 1973 और 2002 में. पहले तीन परिसीमन के बाद लोकसभा का आकार भी बढ़ा. 1951 की जनगणना के बाद 494 सीटें थीं, 1961 के बाद 522 और 1971 के बाद 543. इसके बाद यह ठहर गया.

इंदिरा गांधी ने 1976 में 42वें संशोधन के जरिए सीटों के नए बंटवारे पर रोक लगा दी. यह इमरजेंसी का दौर था और उसी समय उनकी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति भी आई थी. मकसद दक्षिण भारत को भरोसा देना था, जिसने उत्तर भारत के मुकाबले आबादी बढ़ने की रफ्तार को ज्यादा प्रभावी तरीके से काबू किया था. चूंकि सीटें आबादी के हिसाब से तय होती हैं, इसलिए नई जनगणना के आधार पर सीटें बांटने से उत्तर-दक्षिण का पहले से असहज अंतर और स्थायी रूप ले सकता था.

2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय आया चौरासीवां संशोधन भी इसी सोच पर आधारित था. इसने परिसीमन की समयसीमा को करीब 30 साल और आगे बढ़ा दिया. संदेश साफ था कि जिन राज्यों ने अपनी आबादी की रफ्तार रोकी, उन्हें संसद में इसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी. यह जरूरत तब भी वास्तविक थी और आज भी है. हिंदी पट्टी में कुल प्रजनन दर दक्षिण भारत के औसत से अब भी ज्यादा है.

बिहार में यह 3.0 और यूपी में 2.4 है, जबकि तमिलनाडु और केरल में 1.8, और कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश में 1.7 है. 84वें संशोधन ने अनुच्छेद 82 में बदलाव कर 1971 के आंकड़ों पर आधारित सीट हिस्सेदारी को 2026 के बाद पहली जनगणना प्रकाशित होने तक फ्रीज कर दिया.

2026 के बाद पहली जनगणना सामान्य तौर पर 2031 में होती. लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण भारत 2021 में जनगणना नहीं करा सका, इसलिए यह 2026 तक खिसक गई. यह डिजिटल जनगणना होगी, इसलिए इसके आंकड़े अगले साल आने की उम्मीद है. इससे परिसीमन का रास्ता खुलेगा. लेकिन यह प्रक्रिया आम तौर पर पूरी होने में दो से तीन साल लेती है, इसलिए 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले समय बहुत कम बचेगा.

एक और बड़ी चिंता यह है कि भारत की मौजूदा व्यवस्था परिसीमन आयोग के हाथ में बहुत ज्यादा अधिकार दे देती है. आलोचकों के मुताबिक यह आयोग 'दिखने में सर्वदलीय, लेकिन काम में एकतरफा’ हो सकता है. 2026 के बिल में प्रावधान था कि आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या सेवानिवृत्त जज करेंगे, जिनका चयन सरकार करेगी, जैसा पहले भी होता रहा है.

बाकी दो स्थायी सदस्य होंगे मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके नामित चुनाव आयुक्त, और संबंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त. हर राज्य के लिए 10 सहयोगी सदस्य रखने का प्रस्ताव था. इनमें पांच सांसद लोकसभा स्पीकर चुनते और पांच विधायक विधानसभा स्पीकर. लेकिन इनमें से किसी को वोट देने या दस्तखत करने का अधिकार नहीं होता.

विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि परिसीमन आयोग के फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, इसलिए पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का सवाल उठता है. पूर्व कैबिनेट सचिव के.एम. चंद्रशेखर कहते हैं, ''असल कमी तकनीकी समाधान की नहीं, भरोसे की है. यह भरोसा तभी लौट सकता है जब आयोग बनने से पहले उसकी संरचना पर व्यापक राजनैतिक सहमति बने, बाद में नहीं.’’ भरोसा बढ़ाने के लिए विशेषज्ञ कुछ सुझाव भी देते हैं. जैसे सहयोगी सदस्यों के चयन के लिए कानूनी दिशानिर्देश तय किए जाएं और विशेषज्ञों तथा सिविल सोसाइटी की भागीदारी के लिए औपचारिक संस्थागत जगह बनाई जाए.

नई दिल्ली में 13 अप्रैल को नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता

प्र. क्या जनगणना की मांग सच में जरूरी थी या सिर्फ देरी कराने की रणनीति?
लोकसभा में 2029 तक महिला आरक्षण लागू करने की गति बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार तीन कानून लेकर आई थी—परिसीमन बिल, 131वां संशोधन और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल. इन तीनों का मकसद मिलकर उन कानूनी व्यवस्थाओं को पूरा करना था, जिनकी जरूरत लोकसभा सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 सीट करने के लिए थी.

इन संशोधनों से संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में बदलाव होता, ताकि संसद यह तय कर सके कि परिसीमन के लिए कौन-सी जनगणना इस्तेमाल होगी. यानी 2026 की नई जनगणना के बजाए 2011 के आंकड़ों का उपयोग किया जा सकता था. अगर ऐसा होता तो महिला आरक्षण को भविष्य की जनगणना से जोड़ने वाली संवैधानिक डोरी कट जाती और यह व्यवस्था 2029 के आम चुनाव तक लागू हो सकती थी.

लेकिन विपक्ष ने इसे अलग नजर से देखा. उसके मुताबिक, यह कोशिश ओबीसी को संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की मांग को रोकने की साजिश थी. मौजूदा लोकसभा में अनुच्छेद 330 के तहत अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं. यानी कुल सदन का लगभग 24 फीसद हिस्सा. लेकिन ओबीसी के लिए कोई आरक्षण नहीं है. 18वीं लोकसभा में 138 ओबीसी सांसद हैं, जो कुल संख्या का करीब 25 फीसद हैं. वहीं 141 सवर्ण सांसद करीब 26 फीसद हैं. भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार है जब लोकसभा में ओबीसी प्रतिनिधित्व सवर्णों के लगभग बराबर पहुंचा है.

जब 2027 की जनगणना करीब एक सदी बाद पहली बार ओबीसी की प्रामाणिक संख्या सामने लाएगी, तब जिन पार्टियों ने अनिच्छुक सरकार से जाति जनगणना की मांग मनवाई है, वे सिर्फ नौकरी आरक्षण पर रुकने वाली नहीं हैं. अगला सवाल विधानसभाओं और संसद में हिस्सेदारी का होगा, ठीक वैसे ही जैसे एससी और एसटी को पहले से आरक्षण मिला हुआ है. जाति की राजनीति पर लंबा काम करने वाले पंजाब यूनिवर्सिटी के आशुतोष कुमार कहते हैं, ''बहस का केंद्र महिला आरक्षण से हटकर सामाजिक न्याय के गणित पर आ जाएगा.’’

समाजवादी पार्टी प्रमुख अ‌‌खिलेश यादव ने यह मांग साफ शब्दों में रखी: ओबीसी हिस्सेदारी के बिना महिला आरक्षण बिल्कुल नहीं. अगर ओबीसी आबादी आधे से ज्यादा निकलती है, जो एक संभावित स्थिति मानी जा रही है, तो आनुपातिक आरक्षण भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन सकता है. एक तरफ सवर्ण तबके की नाराजगी होगी, दूसरी तरफ ओबीसी वोट बैंक होगा, जिसे खोने का जोखिम पार्टी नहीं ले सकती. अगर ओबीसी आंकड़े आने से पहले परिसीमन जल्दी कर दिया जाता, तो इसकी गुंजाइश कम से कम एक पीढ़ी के लिए खत्म हो सकती थी.

लेकिन असली मुश्किल लागू करने में भी है. लोकसभा में ओबीसी आरक्षण के लिए अभी कोई स्पष्ट संवैधानिक ढांचा मौजूद नहीं है. पिछड़े वर्गों के अनुमान के लिए अंतिम रूप से जिस जाति गणना पर भरोसा किया जाता है, वह 1931 की है. मंडल आयोग ने पुराने आंकड़ों और अनुमान के आधार पर ओबीसी आबादी करीब 52 फीसद मानी थी.

2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी जरूर जुटाई गई थी लेकिन वे आंकड़े कभी इस तरह जारी नहीं हुए कि प्रतिनिधित्व के लिए राष्ट्रीय स्तर का तय आधार बन सके. इसी वजह से विपक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां 2027 में आने वाले जनगणना के आंकड़ों का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं क्योंकि लगभग 100 साल बाद पहली बार उनके पास ठोस और आधिकारिक आंकड़े होंगे.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकारी नौकरियों में लागू जाना-पहचाना 27 फीसदी का ओबीसी फॉर्मूला संसद पर लागू किया जाए, तो मौजूदा लोकसभा में यह संख्या करीब 147 सीटों तक पहुंचेगी. चूंकि 131 सीटें पहले से एससी और एसटी के लिए आरक्षित हैं, इसका मतलब होगा कि संसद की करीब आधी सीटें आरक्षित श्रेणी में चली जाएंगी.

जैसे ही संसद में ओबीसी आरक्षण के सिद्धांत को स्वीकार किया जाएगा, अगली मांग लगभग तय होगी—ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों में से एक-तिहाई सीटें ओबीसी महिलाओं को भी मिलनी चाहिए. ऐसी स्थिति में आरक्षण की कई परतें बन जाएंगी—सामान्य महिला, एससी महिला, एसटी महिला और ओबीसी महिला. इसे लागू करने के लिए पूरी तरह से नया संवैधानिक ढांचा बनाना पड़ेगा. जो बात ऊपर से सिर्फ एक-तिहाई महिला आरक्षण जैसी सरल दिखती है, वह असल में लिंग और जाति—दोनों आधारों पर बहुत जटिल पुनर्वितरण व्यवस्था बन जाएगी.

भाजपा की ओर से 15 अप्रैल को लखनऊ में आयोजित एक स्कूटर रैली में महिलाएं

प्र. क्या सीट बंटवारे के लिए दक्षिण का जीडीपी फॉर्मूला व्यावहारिक है?
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने 50-50 हाइब्रिड मॉडल सुझाया है. उनके मुताबिक, लोकसभा की नई सीटों में आधी आबादी के आधार पर और आधी राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी योगदान के आधार पर दी जानी चाहिए. भारत राष्ट्र समिति के के.टी. रामराव ने इससे भी सख्त फार्मूला रखा.

उनका कहना था कि परिसीमन ''देश के लिए वित्तीय योगदान’’ के आधार पर होना चाहिए. वहीं केरल कांग्रेस (एम) के नेता जोस के. मणि ने इससे ज्यादा संतुलित मॉडल पेश किया. उनके मुताबिक, सीट बंटवारे में आबादी के साथ जनसंख्या नियंत्रण में सफलता, आर्थिक योगदान, मानव विकास और सामाजिक प्रगति जैसे मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए. मणि का फॉर्मूला दरअसल वित्त आयोग के संसाधन बंटवारे वाले मानकों को राजनैतिक बहस में लाने जैसा है.

16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट, जिसे अर‌विंद पानग‌ड़िया की अगुवाई में तैयार कर 17 नवंबर, 2025 को राष्ट्रपति को सौंपा गया था, अभी संसद में पेश होनी बाकी है. इस रिपोर्ट में जनसांख्यिकीय प्रदर्शन की अहमियत बढ़ाई गई है और राजस्व बंटवारे के फॉर्मूले में जीडीपी योगदान का मानक भी जोड़ा गया है. (देखें ग्राफिक: क्या परिसीमन में राजस्व की साझेदारी के फॉर्मूले का इस्तेमाल हो सकता है?)

लेकिन यह तर्क पूरी तरह मजबूत नहीं माना जा रहा. वजह यह है कि जीडीपी के मामले में उत्तर और दक्षिण का अंतर अब घट रहा है. उत्तर भारत के पांच बड़े राज्य देश की जीडीपी में 29 फीसद हिस्सेदारी रखते हैं, जबकि दक्षिण भारत के पांच बड़े राज्यों का योगदान 31 फीसद है. संदीप शास्त्री इस बात को लेकर आशंकित हैं कि परिसीमन में जीडीपी जैसे आर्थिक मानक जोड़ना उल्टे विवाद बढ़ा सकता है.

उनके मुताबिक, ऐसे मानकों का राजनैतिक इस्तेमाल हो सकता है और इससे समाधान के बजाए अस्थिरता बढ़ेगी. विशेषज्ञों का कहना है कि सिद्धांत के स्तर पर भी लोकसभा के लिए जीडीपी को आधार बनाकर अहमियत देना मुश्किल विचार है. लोकसभा जनता का सदन है, जहां नागरिकों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, न कि टैक्स देने वाली इकाइयों या उत्पादन क्षमता का.

अगर जीडीपी सीट तय करने का आधार बन गया तो अमीर राज्यों को ज्यादा संसदीय ताकत इसलिए मिलेगी क्योंकि वे ज्यादा उत्पादन करते हैं, न कि इसलिए कि वहां ज्यादा लोग रहते हैं. संसद में बहस के दौरान भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी यही सवाल उठाया. उन्होंने कहा, ''जीडीपी तो बदलती रहती है. क्या इसका मतलब हर साल किसी राज्य की सीटें घटानी-बढ़ानी पड़ेंगी?’’

अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया जैसी किसी भी बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था में निचले सदन की सीटें राज्यों के वित्तीय योगदान के आधार पर नहीं बांटी जातीं. दक्षिणी राज्यों की चिंता से सबसे मिलता-जुलता अंतरराष्ट्रीय मॉडल अमेरिका का है. वहां प्रतिनिधि सभा यानी निचले सदन में सीटें राज्यों की आबादी के हिसाब से मिलती हैं, लेकिन सीनेट में हर राज्य को बराबर दो सीटें दी जाती हैं. भारत में राज्यसभा को डिजाइन के हिसाब से अभी यह भूमिका नहीं मिली है.

यहां सीटों का बंटवारा मोटे तौर पर लोकसभा की ताकत के अनुसार चलता है. 131वें संशोधन से यह असंतुलन और बढ़ सकता था, क्योंकि लोकसभा-राज्यसभा अनुपात 2.2 से बढ़कर 3.3 हो जाता. इसलिए असली समाधान यह नहीं है कि लोकसभा को आंशिक रूप से जीडीपी आधारित सदन बना दिया जाए. सही रास्ता यह है कि दोनों सदनों के लिए ऐसा व्यापक विस्तार फॉर्मूला तैयार किया जाए, जो बहस के दौरान उठी प्रमुख चिंताओं का संतुलित जवाब दे सके.

प्र. क्या है आगे बढऩे का सबसे उपयुक्त रास्ता?
भाजपा नेता निजी बातचीत में कहते हैं कि विपक्षी दलों से अब संवाद करना होगा खासकर शीर्ष नेताओं के स्तर पर. वजह साफ है कि ये बदलाव देर-सबेर लागू करने ही होंगे और इसके लिए संवैधानिक तथा विधायी प्रक्रिया जरूरी होगी. एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में, ''जो बिल गिरा, उसका मकसद बहस को पहले शुरू करना था और महिलाओं के आरक्षण के साथ आजाद भारत के सबसे जटिल परिसीमन को लागू करना था. यह काम अब भी होना है और इसके लिए विपक्ष को साथ लेना पड़ेगा.’’

विशेषज्ञों की मानें तो इस पूरे गतिरोध से निकलने का सबसे तेज और सबसे न्यायसंगत एक रास्ता है: यह मान लिया जाए कि भारत में प्रतिनिधित्व से जुड़े सभी सवाल एक ही संवैधानिक फैसले से हल नहीं हो सकते. यही 2026 की कोशिश की सबसे बड़ी कमजोरी थी. उसमें एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश हुई—महिला आरक्षण लागू करना, परिसीमन की समयसीमा बदलना, कौन-सी जनगणना आधार बने यह तय करना, लोकसभा का विस्तार करना और दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को शांत करना. यानी एक ही पैकेज में बहुत ज्यादा, बहुत जल्दी और राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील फैसले नत्थी कर दिए गए.

व्यावहारिक रास्ता चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ सकता है. सबसे पहले राजनैतिक दलों को इस मूल सुधार पर सहमति बनानी चाहिए कि महिलाओं को आरक्षण कैसे दिया जाए, बिना इसे परिसीमन के दलदल में फंसाए. दरअसल, परिसीमन पर अलग से बातचीत होनी चाहिए. इसके साथ ऐसे सुरक्षा उपाय भी तय हों कि बनने वाला आयोग राजनैतिक दबाव से मुक्त रहे.

साथ ही यह भी समझना होगा कि संसद में ओबीसी आरक्षण या महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटा, अपने आप में अलग संवैधानिक बहस और ठोस आंकड़ों की मांग करता है. अगर इस सवाल को महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया के बीच में निबटाने की कोशिश हुई, तो पूरा प्रयास फिर से पटरी से उतर सकता है.

इसी बीच 2027 की जनगणना हर हाल में पूरी होनी चाहिए. भारत प्रतिनिधित्व की नई व्यवस्था सिर्फ अनुमानित आंकड़ों या सर्वे के आधार पर तय नहीं कर सकता. परिसीमन शुरू होने से पहले संसद और राज्यों के सामने एक साफ, सार्वजनिक और भरोसेमंद ढांचा होना चाहिए.

कौन-सी जनगणना आधार बनेगी, सदन कितना बढ़ेगा और क्यों, क्या मौजूदा क्षेत्रीय हिस्सेदारी मोटे तौर पर सुरक्षित रहेगी, और सीटों की सीमाएं राजनीतिक फायदे के लिए बदली न जाएं, इसके क्या इंतजाम होंगे—इन सब पर पहले स्पष्टता जरूरी है. सीमाएं खींचने से पहले नियम तय होने चाहिए, बाद में नहीं. यह गतिरोध जल्द टूटना चाहिए ताकि भारत की महिलाएं संसदीय लोकतंत्र की इमारत में अपने हक का स्थान हासिल कर सकें. 

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