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त्रिकोणीय मुकाबला

तमिलनाडु दिलचस्प चुनावी जंग के लिए तैयार. डीएमके नेता और मुख्यमंत्री लगातार दूसरी पारी हासिल करने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे, तो एआइएडीएमके के मुखिया अपनी पार्टी को पुराने दिनों वाला गौरव फिर से दिलाने निकले. उधर एक बागी सुपरस्टार खेल बिगाड़ने की जुगत में हैं

cover story: tamil nadu  
डीएमके प्रमुख और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन तिरुचिरापल्ली में
अपडेटेड 30 अप्रैल , 2026

तमिलनाडु में 2026 का विधानसभा चुनाव कुल मिलाकर अपनी विरासत कायम करने की जंग है. एक तरफ सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कलगम (डीएमके) और उसके 71 वर्षीय मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन हैं, जो सत्ता में रहते हुए पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता दिलाने की कोशिश में जुटे हैं जो पहले कभी नहीं हुआ.

दूसरी ओर, उनके पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (एआइएडीएमके) तथा उसके महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) हैं. वे खुद को स्वतंत्र नेता के तौर पर स्थापित करने की ही नहीं, बल्कि पार्टी को फिर से खड़ा करने की भी लड़ाई रहे हैं. उनकी पार्टी 2016 में अपनी कद्दावर नेता, दिवंगत जे. जयललिता के निधन के बाद से कई तूफानों का सामना कर चुकी है.

यह मुकाबला ऐसे वक्त में हो रहा है जब सियासी परिदृश्य बीते वर्षों की तुलना में ज्यादा जटिल और अस्थिर है, इसलिए नतीजों का अनुमान लगाना मुश्किल है. लड़ाई अभी भी हमेशा की तरह डीएमके और एआइएडीएमके के बीच ही देखा जा रहा, मगर सतह के नीचे आ रहे बदलाव ज्यादा पेचीदा, त्रिकोणीय लड़ाई का इशारा कर रहे हैं.

यह पेचीदगी सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) की वजह से है, जो खुद को दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों के विकल्प के तौर पर पेश कर रही है. टीवीके खासकर नाराज युवा तबके और शहरी वोटरों के पुराने रुझान में खलल पैदा कर सकती है. 23 अप्रैल को होने वाले चुनाव में कई सियासी खिलाड़ियों के समीकरणों पर उसका असर पड़ सकता है.

इतिहास की अड़चन
सत्ताधारी पार्टी डीएमके इस चुनाव में मिथक को तोड़ने की उम्मीद कर रही है. पहली बार 1967 में सत्ता में आने के बाद से इस पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता नहीं मिली है. पार्टी के दिग्गज दिवंगत एम. करुणानिधि भी ऐसा कमाल नहीं कर पाए थे. इस चुनाव में इसी सिलसिले को तोड़ने के लिए उनके बेटे स्टालिन कटिबद्ध हैं.

पार्टी 2026 के चुनाव में काफी सोच-समझकर बनाई रणनीति के साथ उतरी है. इसमें व्यापक गठबंधन, संगठन की पूर्व तैयारी, ज्यादा आधुनिक और युवाओं की भी पसंदीदा के तौर पर पेश करने की कोशिश, और बूथ-स्तर पर गोलबंदी पर विशेष जोर है. डीएमके ने चुनाव की तैयारी काफी पहले 2025 की शुरुआत में ही शुरू कर दी थी. उस दौरान स्टालिन ने पार्टी के 'नान मुदलवन (मैं सबसे पहले)’ प्रोजेक्ट के तहत आने वाली सभी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा की.

जैसा कि बीते कुछ वर्षों से सभी चुनावी राज्यों की सरकारों में चलन रहा है, मुख्यमंत्री ने भी यह तय किया कि चुनाव की तारीखों के ऐलान होने से काफी पहले कल्याणकारी कार्यक्रमों के लाभार्थियों को उनका हक मिल जाए. वापसी के लिए थोड़े सत्ता-विरोधी रुझान का ध्यान रखा गया. विधायक दल में बड़े फेरबदल को इसका हल माना गया और 64 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए गए.

डीएमके ने बड़ा गठबंधन भी बनाया. उसने पुराने साथियों को साथ बनाए रखा और नए साथियों को जोड़ा. इसका मकसद जितना अपने सामाजिक आधार को बढ़ाना था, उतना ही विरोधी एआइएडीएमके गठबंधन को कमजोर करना भी था. नए साथियों में खास दिवंगत विजयकांत की पार्टी देसीय मुरपोक्कु द्रविड़ कलगम (डीएमडीके) और एआइएडीएमके के बड़े नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम हैं.

एआइएडीएमके प्रमुख ई. पलानीस्वामी चेन्नै में पार्टी के प्रचार के दौरान

डीएमडीके की कमान अब अभिनेता की पत्नी प्रेमलता विजयकांत के पास है. पार्टी 2011 वाला सुनहरा दौर काफी पीछे छोड़ चुकी है. उस वक्त वह सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, मगर उसके बाद से उसका प्रदर्शन लगातार गिरता गया. फिर भी, उससे डीएमके गठबंधन का वोट-बैंक बढ़ाने में मदद मिलेगी. उससे भी ज्यादा अहम यह कि उससे विपक्ष की संभावित एकजुटता कमजोर होती है.

सीट बंटवारे के फॉर्मूले को लेकर गठबंधन में कुछ बेचैनी जरूर दिखी, खासकर इसलिए क्योंकि डीएमडीके को वामपंथी पार्टियों और विदुतलै चिरुतैगल काच्चि (वीसीके) जैसे पुराने साथियों के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली हैं. सियासी विश्लेषक मुदलवन कहते हैं, ''गठबंधन में कुछ मतभेद हैं पर जमीनी स्तर पर एकजुटता कायम है और असर डाल रहा है. उसकी मदद से यह गठबंधन विरोधी एआइएडीएमके-भाजपा मोर्चे को 'परिसीमन’ जैसे विवादित मुद्दों पर घेरने में सफल रहा, जो आजकल सुर्खियों में है.’’

खासे ऊंचे दांव
कदम यही माहौल स्टालिन चाह रहे होंगे. मुख्यमंत्री हाल ही 'दक्षिण के चैंपियन’ बनकर उभरे हैं. उन्होंने केंद्र से मिलने वाले फंड और राज्यों की आर्थिक स्थिति पर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई और परिसीमन के खतरों के बारे में केंद्र को 'चेतावनी’ दी है. चुनाव प्रचार में वे दिग्गज नेता की तरह लोगों को संबोधित कर रहे हैं. उन्होंने जमीनी सियासी वार-पलटवार का जिम्मा अपने बेटे और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि तथा डीएमके की दूसरी पंक्ति के नेताओं पर छोड़ दिया है.

डीएमके की संगठनात्मक तैयारी उसके प्रतिद्वंद्वियों से आगे दिख रही है. पार्टी ने काफी पहले ही 'ओरानियिल तमिलनाडु (एकजुट तमिलनाडु)’ अभियान शुरू कर दिया था, जिसका मकसद सदस्यता अभियान का विस्तार करना और बूथ-स्तर तक नेटवर्क तैयार करना था. स्टालिन ने इस मामले में काफी ऊंचे लक्ष्य तय किए थे, और पार्टी कार्यकर्ताओं को समय से पहले ही चुनावी मोड में डाल दिया था. इससे पार्टी को अपने कमजोर क्षेत्रों की पहचान करने, गठबंधन में सीटों के तालमेल को लेकर बातचीत करने और अपने चुनावी संदेश को ज्यादा धारदार बनाने में भी मदद मिली.

डीएमके सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय रही और खुद मुख्यमंत्री ने इसकी कमान संभाल रखी है. यह बदलाव पार्टी के चुनाव चिह्न तक में नजर आता है. खबरों के मुताबिक, 'उगता सूरज’ में इस्तेमाल किया गया पीला रंग आजकल ज्यादा चमकीला कर दिया गया है, ताकि यह आज की युवा पीढ़ी (जेन ज़ी) की पसंद के अनुरूप दिखे.

इन बातों ने डीएमके गठबंधन को मजबूत स्थिति में ला दिया है. अगर वोट ट्रांसफर प्रभावी ढंग से हुआ तो गठबंधन को जबरदस्त लाभ मिल सकता है. वहीं, गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच पनप रही नाराजगी का असर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं पर पड़ा, और टीवीके कुछ अहम वोट-बैंक में सेंध लगाने में सफल हो गई, तो यह मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है.

विपक्ष का मोर्चा
आइएडीएमके 2026 के चुनाव में बेहद मुश्किल मोड़ पर खड़ी है. उसका वोट बैंक पुराने सहयोगियों और अलग हुए गुटों में बंटता दिख रहा, जबकि पार्टी नेतृत्व इस चुनाव को सत्ताधारी डीएमके के साथ दोतरफा मुकाबले के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है. पार्टी के शुरुआती दिनों से ही उसे कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दुरै करुणा कहते हैं, ''एआइएडीएमके 1972 में अपने गठन के बाद से कई चुनौतियों से गुजरी है मगर यह चुनाव अब तक का सबसे कठिन चुनाव साबित हो सकता है.’’

चुनाव प्रचार में पूर्व मुख्यमंत्री पलानीस्वामी पार्टी के मुख्य चेहरे हैं. उनकी छवि अच्छे प्रशासक की है, उन्होंने लगातार जोरदार प्रचार किया है, और कई मुद्दों पर डीएमके खेमे को कड़ी टक्कर दी है. उन्होंने सूखे से प्रभावित किसानों की दुर्दशा, पुलिस की ज्यादतियों के मुद्दे उठाए और सत्ताधारी पार्टी पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए.

थोड़ी देर से ही सही, पलानीस्वामी ने खुद को डीएमके के उस आरोप से काफी हद तक बरी कर लिया है कि वे 'भाजपा के गुलाम’ हैं, खासकर जिस तरह से उन्होंने अपनी राष्ट्रीय सहयोगी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे को हैंडल किया. भाजपा को आवंटित 27 सीटों में से बहुत कम सीटें ही ऐसी हैं, जिसे पार्टी अपना गढ़ मानती है. और अगर पलानीस्वामी खेमे की बातों पर यकीन किया जाए तो उन्होंने अपने पुराने विरोधी, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलै को भी चुनाव से बाहर बैठने पर मजबूर कर दिया है.

भगवा पार्टी भी नरम रवैया अपना रही है और ऐसा कम ही देखने को मिलता है. उसने 2021 और 2024 में मिली नाकामियों से सबक लिया है. भाजपा के एक सूत्र की मानें तो पार्टी ने राज्य में ''अपनी बात पर अड़े रहने के बजाए तालमेल बिठाने’’ पर ध्यान केंद्रित किया. उसने गठबंधन के व्यापक हितों के मद्देनजर एआइएडीएमके को अपने प्रमुख क्षेत्रों जैसे कोंगू बेल्ट (विशेषकर कोयंबत्तूर) में भी जगह देकर छोटे सहयोगी की भूमिका स्वीकार कर ली है.

वैसे, पलानीस्वामी गठबंधन को मजबूत करने से चूक गए हैं, जो कभी जयललिता के दौर की खासियत हुआ करती थी. 2016 में उनके न रहने के बाद हुई उथल-पुथल से पार्टी में सत्ता के कई केंद्र पैदा हो गए हैं. कभी पार्टी में एक शक्तिशाली हस्ती और जयललिता की पूर्व सहयोगी वी.के. शशिकला ने खुद की पार्टी बना ली है. इस बीच, जयललिता की ओर से चुने गए पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम ने पाला बदल लिया और डीएमके उम्मीदवार बन गए हैं.

इन टूटों के कारण वोट बैंक बंट जाता है जो ऐतिहासिक रूप से एकजुट एआइएडीएमके के बैनर तले इकट्ठा होता था. करुणा का कहना है कि शशिकला दक्षिण में अपने मुक्कुलातोर (थेवर) समुदाय के लोगों को लामबंद करके एआइएडीएमके के कुछ वोट काट सकती हैं. यह समुदाय पारंपरिक रूप से जयललिता के जनाधार का अहम हिस्सा रहा है. जवाब में एआइएडीएमके ने शशिकला के भतीजे टी.टी.वी. दिनकरन को अपने पाले में कर रखा है, फिर भी जनाधार में बिखराव का खतरा है.

जानकारों का कहना है कि चुनाव के ऐन पहले इन घटनाओं से एआइएडीएमके के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का चुनावी समीकरण डांवाडोल नजर आता है. पार्टी के भाजपा के साथ संबंध भी सहयोग और मतभेद के बीच झूलते रहे हैं. परिसीमन और अल्पसंख्यकों तक पहुंच जैसे मुद्दों पर एआइएडीएमके काफी संभलकर कदम बढ़ा रही है. पलानीस्वामी ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा के साथ यह गठबंधन केवल 'चुनाव के लिए’  है.

एनडीए की एक और सहयोगी पार्टी पट्टालि मक्कल काच्चि (पीएमके) के भीतरी हालात से मुश्किल बढ़ रही है. पार्टी के संस्थापक एस. रामदास और उनके बेटे अंबुमणि रामदास के बीच अनबन चल रही है, और पार्टी के अंदर इस फूट का असर उसके कार्यकर्ताओं पर साफ दिख रहा है. पीएमके के जनाधार में किसी भी तरह की सेंध एआइएडीएमके की उत्तरी तमिलनाडु की योजनाओं पर असर डाल सकती है, जहां पीएमके का वन्नियार समुदाय के वोटों के एक हिस्से पर अच्छा-खासा असर है.

चेन्नै के पास पेरंबूर में 30 मार्च को टीवीके के रोडशो में विजय 

शशिकला ने भी रामदास सीनियर के साथ मिलकर कुछ सीटों पर संयुक्त उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. एआइएडीएमके को राजनीति में नए-नए उतरे लोगों से भी टक्कर मिल रही है. अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके से यह उम्मीद की जा रही है कि वह सरकार विरोधी वोटों को अपनी ओर खींच सकती है, जो शायद एआइएडीएमके के पाले में जाते.

कुल मिलाकर, 2026 का चुनाव एआइएडीएमके के सामने बहुआयामी चुनौती पेश करता है. इसमें भाजपा के साथ असहज गठबंधन, सहयोगी दलों की आंशिक लामबंदी, और नए सियासी ध्रुव के रूप में टीवीके का उभरना शामिल है. पार्टी इस चुनाव को डीएमके के साथ सीधी टक्कर के तौर पर पेश कर रही, और उसने सरकार विरोधी लहर तथा किसानों की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया है. मगर जमीनी हकीकत यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों में वोटों में होने वाला जरा-सा भी बदलाव चुनाव नतीजों को काफी प्रभावित कर सकता है, और जयललिता के बाद के दौर के एआइएडीएमके का भविष्य भी तय कर सकता है.

जाना-पहचाना पर नया किरदार
फरवरी 2024 में अभिनेता विजय ने टीवीके के गठन की घोषणा की, तो लोगों में उत्सुकता से लेकर संशय तक था. तमिलनाडु में फिल्मी सितारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं. मगर दो साल बाद टीवीके ने इतनी हलचल मचा दी है कि अब यह सवाल कम पूछा जाता है कि क्या इस पार्टी का कोई महत्व है, बल्कि अब ज्यादा चर्चा यह होती है कि वह डीएमके और एआइडीएमके के वोट में कितना सेंध लगाएगी.

तमिल फिल्म जगत के कई अन्य बड़े सितारों की तरह, विजय का भी सुसंगठित प्रशंसक वर्ग है, जो समाज-कल्याण के कार्यों और स्थानीय स्तर पर लोगों को लामबंद करने में सक्रिय रूप से जुड़ा रहता है. मगर जैसा कि राजनीति में उतरे अन्य बदकिस्मत सितारों के अनुभव से जाहिर होता है, प्रशंसकों के ऐसे संगठन शायद ही कभी सियासी पूंजी में तब्दील हो पाते हैं.

टीवीके की खासियत यह है कि इसने उन नेटवर्कों को नए सिरे से इस्तेमाल किया है और ये नागरिक पहलकदमियों तथा चुनावी मुकाबलों में भाग ले रहे और संगठनात्मक आधार भी प्रदान कर रहे हैं. विजय ने टीवीके को द्रविड़ पार्टियों के विकल्प के तौर पर पेश किया है, और राष्ट्रीय पार्टियों से भी कुछ दूरी बनाए रखी है. मगर क्या इससे वे मौजूदा विकल्पों से असंतुष्ट मतदाताओं को अपनी ओर खींच पाएंगे?

उनके चुनाव प्रचार का तरीका काफी हद तक उनकी अपनी लोकप्रियता पर ही केंद्रित है. कई बार तो वे अपने चुनाव क्षेत्र में पार्टी के उम्मीदवार का नाम लेना भी भूल जाते हैं; वे बस मतदाताओं से खुद को और टीवीके के 'सीटी’ चुनाव चिह्न को समर्थन देने की अपील करते हैं.

इससे यह सवाल उठता है कि टीवीके की सांगठनिक पकड़ विजय की लोकप्रियता से परे कितनी गहरी है. राजनीति विज्ञानी रामू मणिवन्नन इसे 'व्यावहारिक राजनीति’ से जुड़ा सवाल मानते हैं. उनका तर्क है, ''अच्छे नेता जनता के बीच से उभरते हैं और फिर संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं. जो व्यक्ति जनता के बीच नहीं उतरा, वह जननेता नहीं लगता.’’

पार्टी के सियासी संदेशों से किसी वैचारिक बदलाव का संकेत भी नहीं मिलता. शासन-प्रशासन, सामाजिक न्याय और जन-कल्याण से जुड़े उनके विचार उसी व्यापक ढांचे के अनुरूप हैं जिसने दशकों से तमिलनाडु की राजनीति को परिभाषित किया है. स्थापित सियासी मॉडल को चुनौती देने के बजाए टीवीके खुद को उन जानी-पहचानी प्राथमिकताओं को लागू करने वाली एक नई ताकत के तौर पर पेश करती नजर आती है. पार्टी का जनाधार भी ऐसे वर्गों का लगता है, जो मौजूदा सियासी दलों के ढांचे से मजबूती से नहीं जुड़े हैं. उनमें युवा मतदाता और वे लोग शामिल हैं, जो पारंपरिक सियासी विकल्पों से निराश हो चुके हैं.

फिल्मी हस्ती से राजनेता बनने का विजय का यह सफर इस बात की अग्निपरीक्षा है कि क्या उनकी निजी साख सत्ता में तब्दील हो पाएगी. ऐसा लगता है कि टीवीके इस बदलाव को सुनियोजित तरीके से अंजाम देने की कोशिश कर रही है. वैसे, इस गति को बनाए रखने के लिए पार्टी के सांगठनिक ढांचे को मजबूत करना, नेतृत्व का विकास करना और लगातार सियासी रूप से सक्रिय रहना बेहद जरूरी होगा.

फिलहाल, टीवीके उलटफेर करने वाली ताकत दिखने की कोशिश कर रही है. ऐसे में क्या यह पार्टी मजबूत 'तीसरे ध्रुव’ के रूप में उभरेगी, या फिर 'वक्ती ताकत’ बनकर ही रह जाएगी? जो भी हो, इसने तमिलनाडु के चुनावी मुकाबले को एक त्रिकोणीय मुकाबले में तो बदल ही दिया है.

चाहे केंद्र से मिलने वाले फंड को लेकर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाना हो या परिसीमन के खतरों के बारे में केंद्र को 'चेतावनी’ देना, मुख्यमंत्री स्टालिन ने खुद को 'दक्षिण के चैंपियन’ के रूप में पेश किया. एआइएडीएमके को नए सियासी खिलाड़ियों से भी चुनौती मिल रही. माना जा रहा है कि अभिनेता विजय की टीवीके सत्ता-विरोधी वोटों को अपनी ओर खींच सकती है जो शायद एआइएडीएमके के पाले में जाते.

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