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इस बार महा मुकाबला

यह सियासी लड़ाई बेहद अहम. ममता की जीत उनकी बे जोड़ लोकप्रियता पर मुहर लगाएगी और वे हारीं तो पूरब में विपक्ष के आखिरी बड़े गढ़ में भाजपा काबिज हो जाएगी.

cover story: west bengal 
ममता बनर्जी 16 मार्च को कोलकाता की एक विरोध रैली में

परस्पर विरोधी नेता एक ही राह पर आगे बढ़ रहे थे हालांकि एकदम उल्टी दिशा में. ये थे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता, पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कभी उनके बेहद करीबी रहे लेकिन अब बंगाल भाजपा का चेहरा शुभेंदु अधिकारी. दोनों भवानीपुर की ओर जा रहे थे (शुभेंदु 2 अप्रैल को और ममता छह दिन बाद). यह वही चुनावी अखाड़ा है जहां 29 अप्रैल को इन दोनों के बीच सीधा मुकाबला है.

ममता के इस शिष्य ने पहले भी अपनी काबिलियत साबित की है; 2021 में उन्होंने अपनी गुरु से नंदीग्राम छीन लिया था, और इस बार ममता के उनके ही गढ़ में फिर वही कमाल दोहराने की कोशिश में हैं. उधर, ममता खुद को न सिर्फ बंगाली अस्मिता की रक्षक के तौर पर पेश कर रहीं, बल्कि खुद को पीड़ित और ऐसी इकलौती योद्धा साबित करने में जुटी हैं जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार की साझा ताकत का अकेले ही सामना कर रही हैं.

वे रैली दर रैली में दोहराती हैं, ''कुल 19 राज्यों और केंद्र सरकार ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोल रखा है...लेकिन मैं आम लोगों के लिए लड़ाई जारी रखूंगी.’’ शुभेंदु के दो अप्रैल को सर्वे बिल्डिंग (वही जिला चुनाव कार्यालय जहां उन्होंने अपना पर्चा भरा था) तक निकाले गए जुलूस ने ममता की बात को ही सही साबित किया. वह किसी चलते-फिरते तमाशे से कम नहीं था, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, शुभेंदु और बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सजे-धजे वाहन पर 1.7 किलोमीटर का सफर तय किया. इस दौरान रास्ते में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे थे.

भीड़ सिर्फ स्थानीय लोगों की नहीं थी; बल्कि पूर्वी मेदिनीपुर, हावड़ा और घटाल जिलों तक से समर्थक जुटाए गए थे. इसके उलट, ममता 8 अप्रैल को अपने घर से बाहर निकलीं—जो सर्वे बिल्डिंग से लगभग एक किलोमीटर दूर है—और पैदल ही वह दूरी तय की. उनके साथ कोई तामझाम न था, बस कुछ करीबी सहयोगी थे. वहां जुटी भीड़ छोटी लेकिन पूरी तरह स्थानीय लोगों की थी.

ब्रांड ममता को गढ़ना
ममता इस चुनाव को सिर्फ सत्ता में वापसी के लिए ही नहीं, बल्कि कड़ी चुनौतियों के बीच अपने राजनैतिक वजूद को बचाने की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही हैं, ठीक जैसे संकट में घिरा कोई भी शासक अपने राज्य की रक्षा करता है. उन्होंने बंगाल में भाजपा की बढ़त पहले भी रोकी है, 2021 के विधानसभा चुनाव में भी—जब तृणमूल ने बंगाल की 294 सीटों में से 215 पर जीत हासिल की थी—और 2024 के आम चुनाव में भी—जिसमें उन्होंने भाजपा को 2019 में मिलीं कुल 42 में से 18 सीटों की संख्या को घटाकर 12 कर दिया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 अप्रैल को सिलीगुड़ी में प्रचार अभियान के दौरान

इस बार अगर वे यही कमाल फिर दोहरा पाती हैं तो शीला दीक्षित को पीछे छोड़कर देश की सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाली पहली महिला बन जाएंगी. साथ ही, इससे 2029 के आम चुनाव से पहले उनके देश की सबसे सशक्कत विपक्षी नेता बनने का रास्ता भी साफ हो जाएगा.

लेकिन सबसे पहले उन्हें सत्ता-विरोधी लहर, भर्ती घोटालों को लेकर लोगों की नाराजगी और (खासकर 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में मेडिकल छात्रा 'अभया’ के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना के मद्देनजर) महिला सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर काबू पाना होगा और साथ ही बेरोजगारी, आम  सुविधाओं की कमी और औद्योगिक विकास के अभाव जैसी पुरानी समस्याओं से भी निबटना होगा.

बहरहाल, उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ती है, खासकर ग्रामीण बंगाल में, जहां ममता का हेलिकॉप्टर देखते ही लोगों में उत्साह की लहर दौड़ जाती है. उनके लिए वे आज भी 'दीदी’ हैं, जो उनके कल्याण के लिए काम करेंगी और उनके अधिकारों के लिए लड़ेंगी.

ममता ने हमेशा चुनावी मुकाबले को बंगाल की पहचान बचाने की लड़ाई के तौर पर पेश किया है और खुद को 'बंगाली पहचान’ का प्रतीक बताती रही हैं. उनका आरोप है कि 'बाहरी’ पार्टी भाजपा इसी पहचान को बदलने की साजिश रच रही है. तृणमूल का दावा है कि यह उत्तर भारतीय 'हिंदुत्ववादी’ पार्टी, 'माछ-भात’ खाने वाले बंगालियों की खान-पान संस्कृति को भी नहीं बख्सेगी, अगर यह पार्टी सत्ता में आ गई तो बहुत संभव है कि बंगालियों पर शाकाहार थोप दे. इससे इतर, ममता एक अधिक समावेशी नारा भी देती हैं, ''जे लड़छे सोबार डाके, से जिताबे बांग्ला मां के.’’ यानी सबके लिए लड़ने वाला ही बंगाल मातृभूमि को जीत दिलाएगा.

तृणमूल की नेता खुद के सताए होने के नैरेटिव को कई अन्य मुद्दों के सहारे और धार दे रही हैं—जैसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर), चुनाव से पहले पुलिस अधिकारियों का तबादला, और चुनाव के बीच परिसीमन विधेयक लाने की कोशिश. ममता का आरोप है कि परिसीमन विधेयक भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की बड़ी साजिश है जिसका मकसद मोटे तौर पर राज्य को बांटना है—या तो उसे तीन हिस्सों में बांटकर, या उसके कुछ हिस्सों को पड़ोसी इलाकों में मिलाकर उसकी पहचान और चुनावी ताकत को कमजोर करना.

वे लोगों को यह भी याद दिलाती हैं कि कैसे पहले भाजपा नेताओं और उसके एमएलए-एमपी ने तर्क दिया था कि उत्तर बंगाल और जंगलमहल को अलग राज्य बना दिया जाना चाहिए. यह आरोप चस्पां होता भी लगता है. ममता यह अंदेशा भी जताती हैं कि चुनाव बाद अगर भाजपा बहुमत से पीछे रह गई, तो 'ऑपरेशन लोटस’ शुरू करेगी और तृणमूल विधायकों को खरीदकर अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी.

एसआइआर झटका
नावी लिहाज से देखें तो मजबूत अल्पसंख्यक जनाधार ममता के लिए एक बड़ा फायदा है. 2011 में  बंगाल की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 27.01 फीसद थी, जो अब अनुमानत: 30 फीसद से ज्यादा हो गई है. 2021 के विधानसभा चुनावों से मुसलमान बड़े पैमाने पर ममता के पीछे लामबंद हुए हैं.

यह गोलबंदी नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर उपजे डर का नतीजा भी है. 2021 में 74 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों—जिनमें मुस्लिम आबादी 40 से 90 फीसद के बीच है (मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी और दक्षिणी दिनाजपुर, 24 परगना, कोलकाता, हावड़ा, पूर्वी बर्धमान और बीरभूम वगैरह)—में तृणमूल ने 71 सीटें जीतीं. हालांकि, तृणमूल ने उन 49 सीटों में भी 27 पर जीत हासिल की, जहां 90 फीसद से ज्यादा हिंदू मतदाता हैं (बाकी 22 सीटें भाजपा के खाते में गईं). इससे यह भी पता चलता है कि हिंदुओं का एक बड़ा तबका भाजपा की ज्यादा आक्रामक हिंदुत्ववादी अपील को नापसंद करता है.

बहरहाल, एसआइआर के कारण समीकरण थोड़े जटिल हो सकते हैं. इस अभियान से वोटर लिस्ट में 91 लाख से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं. इसकी सबसे ज्यादा चपत तृणमूल के दो प्रमुख वोट बैंकों—महिलाओं और मुसलमानों पर पड़ी है. अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और हटाए गए श्रेणियों के तहत 27 लाख पुरुषों के मुकाबले करीब 31 लाख महिला मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. जिला-स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, उत्तरी दिनाजपुर और नदिया जैसे मुस्लिम-बहुल इलाकों में सबसे ज्यादा नाम काटे गए हैं.

कोलकाता स्थित पब्लिक पॉलिसी रिसर्च संस्था सबर इंस्टीट्यूट के अनुसार, करीब 25 फीसद मुस्लिम आबादी वाले नंदीग्राम में कटे नामों में 94.5 फीसद नाम मुसलमानों के हैं. भवानीपुर में यह आंकड़ा 40.1 फीसद है, जहां मुसलमानों की आबादी 20 फीसद है. यहीं ममता का घर है. भाजपा के गढ़ भी प्रभावित हुए हैं. मतुआ-बहुल इलाकों में निचली जाति के हिंदू मतदाताओं के नाम कटे हैं.

ये आंकड़े इसलिए काफी मायने रखते हैं क्योंकि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत मामूली रहा है. 2021 में 36 सीटों का फैसला 5,000 से कम वोटों के अंतर से हुआ था. कुल मिलाकर, जैसा रवींद्र भारती यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर बिस्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, 177 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 में जीत के अंतर से ज्यादा है. उनमें 119 सीटें तृणमूल ने जीती थीं और 57 पर भाजपा ने सफलता हासिल की थी.

अभिषेक फैक्टर
धर, ममता के भतीजे और तृणमूल के मुख्य रणनीतिकार अभिषेक बनर्जी ने पार्टी की आंतरिक कार्यसंस्कृति बदलकर उसे वफादारी के बजाय प्रदर्शन और डेटा विश्लेषण आधारित बनाया है. इस बार, उन्होंने नीचे से ऊपर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की. पूरे राज्य में ब्लॉक स्तर की बैठकें की गईं, जिनका उद्देश्य सिर्फ संगठन मजबूत करना ही नहीं, बल्कि एसआइआर से जुड़ी समस्याओं से निबटना भी था. सत्ता विरोधी रुझान के मुकाबले के लिए पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे और 15 की सीटें बदल दीं. इससे असंतोष उपजा और मुर्शिदाबाद के नाओदा जैसी जगहों पर झड़पें भी हुई हैं लेकिन अभिषेक ने इन आपसी मतभेदों को सुलझाने की जिम्मेदारी खुद संभाल ली.

तृणमूल के इस युवा नेता ने एक ऐसी रणनीति भी अपना रखी है जिसे उनके सहयोगी '3डी फाइटॅ’ बताते हैं. वे हर रोज 3-4 रैलियां करते हैं, संगठन के मुद्दे सुलझाते हैं, और उन मतदाताओं की मदद पर भी नजर रखते हैं जिनका एसआइआर में नाम कट गया है. तृणमूल को उम्मीद है कि वह अपनी सीटों की संख्या 2021 में जीती 215 सीटों से बढ़ाने में सफल रहेगी.

उसे 15,000 से कम वोटों से जीत के अंतर वाली सीटों पर सफलता के साथ अपना 'मिशन 250’ पूरा कर पाने का भरोसा है. ममता और अभिषेक जहां बड़ी रैलियां कर रहे हैं, वहीं छोटी-छोटी बैठकों के जरिए बूथ-स्तर पर लोगों तक पहुंचने के प्रयास भी तेज कर दिए गए हैं. हर विधानसभा क्षेत्र में एक वॉर रूम बनाया गया है, जिसमें 20 सदस्यों का स्टाफ काम करता है. करीब 1,00,000 शैडो एजेंट बूथ-स्तरीय अधिकारियों पर नजर रख रहे हैं और मतदाता सूची में बदलाव कराने में लोगों की मदद कर रहे हैं.

तृणमूल को ममता की जन-कल्याणकारी नीतियों के सहारे महिलाओं और युवाओं का वोट बटोरने का पूरा भरोसा है. उनकी सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना के तहत सामान्य वर्ग की महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए और आरक्षित वर्ग की महिलाओं को 1,700 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है. योजना के लाभ 22 लाख लोगों को मिल रहा है, जिसके लिए सालाना 267 लाख करोड़ रुपए का बजट रखा गया है और कुल 740 लाख करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं.

राज्य के युवाओं के लिए भी ऐसी ही योजना युवा साथी चल रही है. इसके तहत 21 से 40 साल के बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1,500 रुपए मिलते हैं. यह सहायता उन्हें पांच वर्ष या जब तक नौकरी नहीं मिल जाती, तब तक देने का प्रावधान है. योजना के लिए अब तक लगभग 1 करोड़ आवेदन मिल चुके हैं और पैसे देने का काम भी शुरू हो गया है.

अब भाजपा ने वादा किया है कि वह इस रकम को बढ़ाकर हर महीने 3,000 रुपए कर देगी. इस पर तृणमूल ने चुनौती दी है कि भाजपा पहले दिल्ली में अपना ऐसा ही वादा पूरा करके दिखाए. अभिषेक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ''प्रधानमंत्री ने खुद दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले यह वादा किया था कि भाजपा सरकार दिल्ली की हर महिला को 2,500 रुपए देगी. एक साल बीत चुका है लेकिन दिल्ली की एक भी महिला को पांच पैसे तक नहीं मिले.’’

इन मुख्य योजनाओं के अलावा तृणमूल अपनी दुआरे सरकार योजना की तर्ज पर घर-घर स्वास्थ्य सेवा शुरू करने का भी वादा कर रही है. इस योजना का नाम 'दुआरे चिकित्सा’ है, जिसके तहत हर ब्लॉक और शहर-कस्बे में सालाना स्वास्थ्य शिविर लगाने का वादा है.

तृणमूल के अभिषेक बनर्जी 6 अप्रैल को हरिश्चंद्रपुर में एक रैली में शिरकत करते हुए

भाजपा की रणनीति
भाजपा के लिए बंगाल अधूरे सपने की तरह है. संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि होने के नाते यह राज्य पार्टी की उस व्यापक वैचारिक परियोजना का हिस्सा बना हुआ है, जिसके तहत बंगाली हिंदू मातृभूमि को बांग्लादेश बनने से बचाना है. इसके लिए पार्टी ने सुनील बंसल की अगुआई में बड़े पैमाने पर सांगठनिक बदलाव किए. चुनाव से जुड़े कामों की देखरेख के लिए बंगाल  से बाहर के 700 से ज्यादा लोगों को तैनात किया गया. उनमें हर विधानसभा क्षेत्र के लिए एक और हर संगठनात्मक जिले के लिए एक व्यक्ति की तैनाती की गई है, और ये सभी चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव को रिपोर्ट करते हैं.

इसके अलावा, सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को अलग-अलग समूहों में बांटा गया है. 2021 के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2019 और 2024 के आम चुनावों के आंकड़ों का बूथ-वार विश्लेषण किया गया. इसके आधार पर ही पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बंगाल में चुनावी नतीजा बहुत कम वोटों के अंतर से तय होता है, इसलिए भाजपा कार्यकर्ता उन सभी से घर-घर जाकर मिल रहे हैं, जो पार्टी के प्रति उदार नजरिया रखते हैं. खास तौर पर उन लोगों से संपर्क साधा जा रहा है, जिनके बारे में लगता है कि उन्होंने किसी न किसी चुनाव में भाजपा को वोट दिया है. उन बूथों को भी लक्षित किया गया है जहां भाजपा के वोट अचानक बढ़े हैं.

फिर, संघ ब्रिगेड ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही काम शुरू कर दिया था. उसने लगभग 1,00,000 छोटी-मोटी बैठकें कीं, जिनमें भाजपा की कल्याणकारी योजनाओं, कानून-व्यवस्था के मुद्दों और खासकर 'अभया’ मामले (उनकी मां उत्तरी 24 परगना के पानीहाटी से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं) पर विमर्श को आगे बढ़ाया गया.

भाजपा के अनुमान के मुताबिक, एक सामान्य बूथ पर 150 से 300 मतदाता होते हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने निर्देश दिया है कि हर बूथ पर 10-15 और मतदाता जोड़े जाएं. इससे 250-300 बूथ वाले किसी निर्वाचन क्षेत्र में 2,500-3,000 अतिरिक्त वोट मिल सकते हैं, जिससे करीबी मुकाबले वाली सीटों पर हार-जीत का अंतर बदल सकता है.

पार्टी क्षेत्रवार चुनावी रणनीति पर भी काम कर रही है. हर क्षेत्र की निगरानी का जिम्मा एक केंद्रीय मंत्री और संगठन के एक अनुभवी व्यक्ति (आम तौर पर संघ से जुड़े) को सौंपा गया है. उत्तर बंगाल पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ बना हुआ है; पार्टी ने 2019 में यहां लोकसभा की 8 में से 7 सीटें और 2021 में विधानसभा की 30 से ज्यादा सीटें जीती थीं. अब की चुनाव प्रचार में राजबंशी समुदाय की एसटी दर्जे की मांग और कोच-राजबंशी भाषा को मान्यता दिलाने पर खासा जोर दिया गया है.

चाय बागान मजदूरों की बदहाली (जिससे लगभग दस लाख मजदूरों के प्रभावित होने का अनुमान है) और सीमा सुरक्षा के मुद्दे भी प्रचार का हथियार बने. यहां सीटों की संख्या 35-40 तक पहुंचाने के लिए भाजपा को 2 फीसद वोटों के स्विंग की जरूरत है. जंगलमहल में जीत-हार का अंतर काफी कम रहा है.

2021 में भाजपा ने यहां 16 सीटें जीती थीं, जिनमें कई 5,000 से भी कम का अंतर रहा था. भाजपा अपने कल्याण नैरेटिव को लोगों तक पहुंचाने के लिए संघ से जुड़े संगठनों का इस्तेमाल कर रही है, और तृणमूल की तरफ से आदिवासियों की कथित उपेक्षा के मुद्दे को भी भुनाने की कोशिश में जुटी है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को भी मैदान में उतारा गया है.

दक्षिण बंगाल में तृणमूल अब भी मजबूत स्थिति में हैं. वहां भाजपा ने अपने लक्ष्य काफी सीमित कर रखे हैं—वोटिंग में 3-5 फीसद की बढ़ोतरी, हर सीट पर 3,000 से 6,000 वोट बढ़ाना और व्यापारियों, महिलाओं और निक्वन-मध्यम वर्ग के मतदाताओं के बीच पहुंच बनाकर उन्हें समूहों में एकजुट करना.

सीमावर्ती जिलों में मतुआ समुदाय की भूमिका निर्णायक है, उन्हें जोड़ने के लिए भाजपा ने नागरिकता से जुड़े रुख को नरम कर लिया है—खासकर एसआइआर पर विवाद पर. दरअसल, पार्टी चाहती कि मतुआ समुदाय उससे नाराज न हो और बनगांव में उसकी पकड़ बनी रहे. गृह राज्य के चुनाव से फुर्सत पा चुके असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा को इन इलाकों में चुनाव प्रचार के लिए उतारा गया है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 2 अप्रैल को कोलकाता में एक रोड शो के दौरान

अल्पसंख्यक विभाजन
भाजपा को उम्मीद है कि अल्पसंख्यक अब लामबंद नहीं रहेंगे और इन वोटों के विभाजन से टीएमसी को नुक्सान होगा. कांग्रेस भी अपनी वापसी की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ रही है, खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में. पूर्व सांसद तथा तृणमूल छोड़कर कांग्रेस में लौटीं मौसम बेनजीर नूर मालदा की मालतीपुर सीट से उम्मीदवार हैं. उनका मानना है कि मुस्लिम मतदाता शायद ममता के पीछे वैसे लामबंद न हों जैसे 2021 में थे.

वे कहती हैं, ''माननीय मुख्यमंत्री के कुछ कामों और बयानों से यहां के लोग नाराज हैं.’’ वे मोथाबाड़ी में प्रदर्शनों के बाद वकील मोफक्करुल इस्लाम की गिरफ्तारी और ममता की उस टिप्पणी का जिक्र करती हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर तृणमूल सत्ता में नहीं आई तो ''एक समुदाय विशेष’’ दूसरे को खत्म कर देगा.

मुर्शिदाबाद में 9 अप्रैल को प्रचार करते कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी

बहरामपुर में एक और चुनावी जंग छिड़ी हुई है, जहां कांग्रेस के पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी का मुकाबला तृणमूल के नारू गोपाल मुखर्जी और भाजपा के मौजूदा विधायक सुब्रत मैत्रा से है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका दोनों ने ही मालदा और मु‌र्शिदाबाद में रैलियों को संबोधित करना शुरू कर दिया है.

वाममोर्चा भले ही अब कमजोर पड़ चुका हो, फिर भी अहम फैक्टर है. 2024 के लोकसभा चुनावों की तरह 6.3 फीसद वोट शेयर के साथ, अगर यह जनाधार बनाए रखता है तो नतीजों पर काफी असर डाल सकता है.

तृणमूल के लिए चुनौतियां और भी हैं. 13 अप्रैल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली में आइपैक के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को कथित कोयला घोटाले में गिरफ्तार कर लिया. अभिषेक ने इसे तृणमूल को धमकाने की भाजपा की एक और साजिश बताया, ''चुनाव से ठीक 10 दिन पहले चंदेल की गिरफ्तारी न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि बराबरी के चुनावी मैदान के मूल विचार के खिलाफ है. यह डराने-धमकाने की राजनीति है.’’

धुआंधार प्रचार
जपा आलाकमान ने खुद मैदान संभाल लिया है. 23 अप्रैल को पहले चरण के मतदान वाली 152 सीटों पर करीब 500 रैलियों की योजना बनाई गई है. प्रधानमंत्री मोदी बंगाली मतदाताओं से भाजपा को एक मौका देने की अपील कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''पिछले कई दशकों में बंगाल ने कई पार्टियों पर भरोसा किया. उन सबने लोगों को धोखा दिया.

माकपा के बिकास रंजन भट्टाचार्य 6 अप्रैल को कोलकाता में रोड शो करते हुए

भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड मजबूत है.’’ गृह मंत्री शाह ने राज्य में करीब 15 दिन बिताए हैं. काफी सोच-समझकर उत्तर बंगाल, जंगलमहल, सीमावर्ती जिलों और औद्योगिक क्षेत्रों में उनकी यात्राओं का कार्यक्रम बनाया गया. कहा जा रहा है कि उन्होंने 170 सीटों का लक्ष्य रखा हैै. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी प्रचार के लिए पहुंचे हैं, जो कहते हैं कि बंगाल में सिर्फ बांग्ला ही बोली जाएगी, उर्दू भाषियों को घर वापस जाना होगा.

भाजपा ने इस बार ममता पर सीधे निजी हमले न करने का फैसला किया है. 2021 में ममता इन हमलों को राजनैतिक फायदे के लिए भुनाने में सफल रही थीं; उन्होंने घायल पैर के साथ चुनाव प्रचार किया और 'खेला होबे’ का नारा बलंद किया. इस बार, भाजपा परिवर्तन की अपील कर रही है, जिसे उसने 'पलटानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार’ के नारे में पिरोया है.

पार्टी ज्यादा आर्थिक मदद देने, महंगाई भत्ते का बकाया चुकाने, 45 दिनों के अंदर 7वां वेतन आयोग को लागू करने, नौकरी के उम्मीदवारों के लिए उम्र सीमा में छूट देने और समान नागरिक संहिता लागू करने का भी वादा कर रही है. शाह ने कहा कि बांग्लादेश के बजाय दिल्ली का शासन बेहतर है; तो अभिषेक ने पूछा कि अगर ऐसा है, तो केंद्र सरकार ने शेख हसीना को शरण क्यों दे रखी है?

शुभेंदु पार्टी की सशक्त आवाज हैं, और ममता के साथ उनका मुकाबला इस चुनाव का केंद्रबिंदु है. नंदीग्राम और भवानीपुर से लड़ने का मकसद ममता को दो मोर्चों पर उलझाना है. भवानीपुर में उनका सीधा मुकाबला ममता से है, वहीं नंदीग्राम में तृणमूल के पवित्र कर मैदान में हैं. पवित्र कर स्थानीय नेता हैं, जिनकी जमीन पर खासी मजबूत पकड़ है. वे 2020 में शुभेंदु के साथ ही भाजपा में शामिल हुए थे लेकिन 17 मार्च को तृणमूल में लौट आए.

भाजपा को यह भी उम्मीद है कि समिक भट्टाचार्य की नियुक्ति से पार्टी की छवि नरम बनाने में मदद मिलेगी. समिक भट्टाचार्य संघ-समर्थित नेता हैं, जो 'भद्रलोक’ संस्कृति वाले हैं और कवि शक्ति चट्टोपाध्याय के करीबी रहे हैं. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष भी कद्दावर हस्ती हैं, जिनकी नेतृत्व पर दावेदारी है.

लेकिन, असली मुकाबला कहीं और ही है. ममता और मोदी, दोनों ही बंगाल से अपने नाम पर वोट की अपील कर रहे हैं. ममता सवाल करती हैं, ''आप देश के प्रधानमंत्री हैं, या बंगाल के मुख्यमंत्री?’’ अगर वे जीत जाती हैं तो 2029 के आम चुनावों के पहले ही भाजपा के लिए यह चुनौती और भी कड़ी हो जाएगी. ममता बनर्जी खुद को बंगाली अस्मिता और पहचान की रक्षक के तौर पर ही नहीं, बल्कि अपने राज्य में चुनाव आयोग की एसआइआर संबंधी कवायद की पीड़ित के तौर पर भी पेश कर रही हैं.

ममता बनर्जी खुद को बंगाली अस्मिता और पहचान की रक्षक के तौर पर ही नहीं, बल्कि अपने राज्य में चुनाव आयोग की एसआइआर संबंधी कवायद की पीड़ित के तौर पर भी पेश कर रही हैं.

भाजपा को लगता है कि कांग्रेस में जान लौटने की संभावना है और कुछ वाम समर्थकों की वजह से अल्पसंख्यक वोट बंट सकते हैं, जो सीएए/एनआरसी के डर से तृणमूल कांग्रेस की ओर गोलबंद हो गए थे. बूथ स्तर की रणनीति के तहत भाजपा हर बूथ पर 10-15 वोटर जोड़ने की उम्मीद कर रही है, जिससे हर क्षेत्र में 2,500-3,000 अतिरिक्त वोट जुड़ सकते हैं. ये मुकाबले में काफी फर्क ला सकते हैं.

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