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अभी सब कुछ सवालों के घेरे में

युद्धविराम का नतीजा खाड़ी देशों के भविष्य, क्षेत्रीय शांति और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने जा रहा है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन कैन 6 अप्रैल को वाशिंगटन डी.सी. में
अपडेटेड 21 अप्रैल , 2026

सात अप्रैल की देर रात अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्ते के युद्धविराम ने उस जंग से थोड़ी राहत दी है, जो खतरनाक तरीके से बेकाबू होती जा रही थी. इससे पहले के छह हफ्तों तक दुनिया भर के लोग, खासकर होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से सबसे ज्यादा प्रभावित दक्षिण और पूर्व एशिया के देश लगातार खबरों पर नजर बनाए हुए थे और किसी सकारात्मक संकेत का इंतजार कर रहे थे.

लोगों की बेचैनी इस वजह से और बढ़ गई थी क्योंकि इस जंग के मकसद साफ नहीं थे. यह भी स्पष्ट नहीं था कि अमेरिका, इज्राएल और खाड़ी देशों के बीच किसी अंतिम लक्ष्य को लेकर सहमति है या नहीं. राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी 'मैडमैन थ्योरी' के तहत बातचीत में दबाव बनाने के लिए बेहद आक्रामक और डराने वाली भाषा का इस्तेमाल किया.

उन्होंने ईरान की सभ्यता खत्म करने तक की धमकी दी, जबकि कुछ हमले ऐसे थे जिन्हें युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है. इज्राएल की रणनीति अलग दिखती है. वह ईरान को एक नाकाम देश में बदलने की दिशा में बढ़ता नजर आता है, जिसे दोबारा खड़ा होने में दशकों लग जाएं. ईरान का मकसद साफ है: हुकूमत बचाए रखना. इसके लिए ईरानी या बाहरी लोगों को कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई के लिए यह जंग पहले ही बहुत नुक्सान कर चुकी है जो इलाके में अमेरिका के करीबी सहयोगी माने जाते हैं. इन देशों ने अपने लोगों की सुरक्षा और समृद्घि के लिए वर्षों से जो निवेश किया था, वह काफी हद तक नष्ट हो चुका है.

अमेरिका और खाड़ी देशों के रिश्ते 1930 के दशक से हैं, जब अमेरिकी कंपनियों ने यहां के विशाल तेल भंडारों की खोज और दोहन में मदद की थी. उसके बाद ब्रिटेन ने जब स्वेज नहर के पूर्वी इलाके से खुद को बाहर कर लिया, तो अमेरिका ने उसकी जगह ले ली. 1971 में बहरीन में ब्रिटिश नौसेना के पुराने ठिकाने को अमेरिकी नौसेना ने अपने कब्जे में लिया. आज वहां 8,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक और उनके परिजन रहते हैं.

उसके बाद के वर्षों में अमेरिका ने पूरे इलाके में अपने सैन्य ठिकाने बनाए. कतर में यूएस सेंट्रल कमान का मुख्यालय स्थापित किया गया, जबकि कुवैत, यूएई और सऊदी अरब में भी कई ठिकाने बनाए गए. इनमें से कई ठिकानों को हाल की जंग में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से काफी नुक्सान हुआ है. जीसीसी ब्लॉक की स्थापना 1981 में खास तौर पर ईरान से आने वाले खतरे के जवाब में की गई थी.

आज इस ब्लॉक के चार देश—बहरीन, कुवैत, कतर और सऊदी अरब—अमेरिका के 'प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी' हैं, जिसका मतलब है कि उन्हें अमेरिकी रक्षा संसाधनों तक खास पहुंच मिलती है. यूएई, भारत की तरह ही, 'प्रमुख रक्षा साझीदार' है, जिससे रक्षा सहयोग और व्यापार में उसे विशेष सुविधा मिलती है.

खाड़ी के सुन्नी देश शिया बहुल ईरान को हमेशा एक खतरे के तौर पर देखते रहे हैं, यहां तक कि शाह पहलवी के दौर में भी ऐसा ही था. इसकी वजह उसकी बड़ी आबादी है, जो अब 9 करोड़ से ज्यादा है, और उसकी मजबूत सैन्य ताकत. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, जब ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, यह खतरा और गहरा हो गया. इसी वजह से जीसीसी देश अमेरिका के और करीब आते चले गए. 2008 में सऊदी शाह अब्दुल्ला ने एक अमेरिकी प्रतिनिधि से साफ कहा था कि वॉशिंगटन को 'सांप का सिर काट देना चाहिए', यानी तेहरान में सत्ता बदलनी चाहिए.

लेकिन शाह अब्दुल्ला की अपील और ट्रंप के इस दावे के बावजूद कि ईरान में सत्ता बदल चुकी है, फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आता कि अमेरिका और इज्राएल मिलकर ईरान की मौजूदा सत्ता को गिरा पाएंगे. उल्टा, कट्टरपंथी मजबूत हुए हैं. जिन आम ईरानी लोगों से बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, वह फिलहाल दूर की बात लगती है. अब अमेरिका के सहयोगी देश ऐसे ईरान से मुकाबिल हैं जो जख्मी और बदले की भावना से भरा हुआ है. उसके नजदीकी निशाने जीसीसी देश हो सकते हैं.

आगे का रास्ता 
खाड़ी देशों की आर्थिक हालत के लिए एक और अहम सवाल है: होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने को लेकर क्या समझौता होता है. अगर ऐसा कोई नतीजा नहीं निकलता जो इस अहम समुद्री रास्ते पर पूरी तरह आवाजाही बहाल करे, तो खाड़ी की अर्थव्यवस्थाएं और संकट में आ सकती हैं. ईरान के हमलों से पहले ही खारे पाने को पीने योग्य बनाने वाले (‌‌डिसैलिनेशन) प्लांट, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर और पेट्रोकेमिकल संयंत्रों को भारी नुक्सान हुआ है.

ऐसे में होर्मुज का बंद रहना इन देशों के लिए दोहरी मार जैसा है. इस जलडमरूमध्य के बंद होने का असर सिर्फ इसी इलाके तक सीमित नहीं रहा. दुनिया भर में इसकी गूंज सुनाई दी है. जितनी जल्दी यह रास्ता पूरी तरह खुलेगा, उतनी जल्दी जीसीसी देश अपने अलग-अलग निर्यात को फिर से पटरी पर ला पाएंगे. यह निर्यात सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सप्लाइ चेन के लिए जरूरी है, जिससे अरबों लोगों की जरूरतें पूरी होती हैं. इस बीच ट्रंप का इस रास्ते को खुलवाने की जिम्मेदारी से पीछे हटना दूसरे देशों के लिए मौका बन गया है.

चीन, जापान और यूरोपीय देश अब समाधान निकालने की कोशिश कर सकते हैं, खासकर जब फिलहाल लड़ाई रुकी हुई है. लेकिन इसमें एक विडंबना भी छिपी है. हो सकता है कि इस पूरी स्थिति का एक नतीजा यह निकले कि ईरान का इस जलडमरूमध्य पर और ज्यादा नियंत्रण मजबूत हो जाए. वह चाहे 'टोल बूथ' मॉडल के जरिए हो या फिर इस वजह से कि उसने यह दिखा दिया है कि वह जब चाहे इस रास्ते को बंद कर सकता है.

कम से कम फिलहाल तो यही लगता है कि जीसीसी देश अमेरिका के साथ मजबूती से जुड़े रहेंगे. उनके पास अमेरिका से मिले रक्षा संसाधन, खासकर वे महंगे इंटरसेप्टर जिनसे वे ईरान के सस्ते ड्रोन गिरा रहे हैं, तेजी से कम हो रहे हैं और उन्हें जल्द नई आवक चाहिए. खासकर अगर ईरान की मौजूदा सत्ता बनी रहती है, तो खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अब भी अमेरिका के हजारों सैनिकों की मौजूदगी पर निर्भर रहना होगा. 

गजा में इज्राएल की बेतहाशा तबाही, जिसने खाड़ी देशों की जनता की राय को बुरी तरह प्रभावित किया था, अब पीछे छूटती दिख रही है. दक्षिण लेबनान में उसका मौजूदा हमला और जातीय सफाए जैसी कार्रवाई भी खाड़ी नेतृत्व के लिए फिलहाल मुख्य मुद्दा नहीं है. ऐसे में इज्राएल और खाड़ी देशों के बीच रिश्तों के सामान्य होने की संभावना बन सकती है, बहरीन और यूएई से आगे भी, जो पहले ही अब्राहम समझौते के जरिए शामिल हो चुके हैं.

अब जब अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बन गई है, तो क्या यह कहा जा सकता है कि हम आगाज के अंत में हैं, या फिर ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज्राएल की जंग के अंत की शुरुआत है? इस सवाल का जवाब सिर्फ खाड़ी देशों के भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे इलाके की शांति और सुरक्षा और दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के लिए भी यकीनन बहुत गहरे असर वाला होगा. खतरा कई तरह का है. लेकिन यह कहना गैर-मुनासिब नहीं कि यह लगातार बनी अनिश्चितता उस भारी तबाही, जानमाल के नुक्सान और अस्तित्व के संकट को न तो छिपा सकती है और न ही उसका बहाना बन सकती है, जो इस गैर-जरूरी और बेमतलब जंग ने अब तक पैदा कर दी है.

अमेरिका और इज्राएल के लिए ईरान की मजहबी हुकूमत को गिरा पाना मुश्किल लगता है. इसके उलट हुआ यह है कि कट्टरपंथी और ज्यादा मजबूत होकर उभरे हैं. खाड़ी में अमेरिका के सहयोगियों को अब बेहद जख्मी और प्रतिशोध की भावना से भरे ईरान का सामना कर पड़ रहा.

डॉ. स्टेफनी टी.विलियम्स (सीनियर फेलो, सेंटर फॉर मिडिल ईस्ट पॉलिसी, ब्रूकिंग्स, वाशिंगटन डी.सी.)

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