
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन 2021 तक एक दशक से उभरते नेता के तौर पर देखे जाते थे जो अपने दिवंगत पिता और द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) के दिग्गज नेता एम. करुणानिधि की छत्रछाया में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. 2026 का विधानसभा चुनाव अलग है. यह उनके और द्रमुक के लिए ज्यादा मायने रखता है. 73 वर्षीय स्टालिन मुख्यमंत्री के रूप में अपना पहला कार्यकाल पूरा कर चुके हैं और अब उनके कामकाज को जनता की कसौटी पर परखने का मौका है.
द्रमुक की सत्ता में वापसी एक दशक के लंबे इंतजार के बाद हुई थी. उससे पहले ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) का राज था. तभी 2018 में करुणानिधि के निधन के बाद स्टालिन को न सिर्फ पार्टी की कमान संभालनी पड़ी बल्कि चुनावी और सांगठनिक मोर्चे पर कई जटिल चुनौतियों से भी रू-ब-रू होना पड़ा. 2021 में द्रमुक ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 133 सीटें जीतीं जबकि उसके सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस ने कुल मिलाकर 159 सीटों पर सफलता हासिल की. अन्नाद्रमुक महज 66 सीटों पर सिमट गई.
पांच साल बाद प्रचार के रुख में बदलाव साफ दिखता है. स्टालिन के कार्यकाल के दौरान 'द्रविड़ मॉडल’ राजकाज पर जोर था. मतलब यह कि कल्याणकारी योजनाओं की डिलिवरी लोगों तक पहुंचाना, सामाजिक न्याय और संघवाद के नजरिए को मजबूती से आगे बढ़ाना. पार्टी का 2026 का घोषणापत्र 'द्रविड़ मॉडल 2.0’ की बात करता है जिसमें योजनाओं के विस्तार और लोगों तक उसकी पहुंच बढ़ाने पर फोकस किया जाना है.
द्रविड़ मॉडल 2.0
द्रमुक का नैरेटिव मुख्यत: 2021 से शुरू या विस्तारित प्रमुख योजनाओं पर टिका है. इनमें कलैगनार मगलीर उरिमै तोगै योजना शामिल है, जिसके तहत घर की मुखिया महिला को सीधे नकद लाभ (डीबीटी) मिलता है; महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा; स्कूली बच्चों के लिए मुख्यमंत्री ब्रेकफास्ट योजना; लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली पुदुमै पेन पहल; युवाओं के कौशल विकास पर केंद्रित नान मुदलवन कार्यक्रम; और मक्कलै तेडी मरुतुवम (दरवाजे पर स्वास्थ्य सेवा) जैसी तमाम योजनाएं हैं. योजनाओं को इस तरह बनाया गया है कि हर जाति और वर्ग में लोगों को इनका फायदा मिल सके.
पार्टी के आंकड़े बताते हैं, करीब 13.1 लाख महिलाओं को डीबीटी योजना का लाभ मिला है. सरकार पिछले वित्त वर्ष में 11.2 फीसद आर्थिक विकास दर का हवाला देकर यह बताने की कोशिश कर रही है कि कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार आर्थिक प्रदर्शन की कीमत पर नहीं हुआ है. सूत्रों के मुताबिक, उन निर्वाचन क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया जा रहा है, जहां 2021 में जीत का अंतर बहुत कम था.
जंग के कई मोर्चे
इसी के साथ द्रमुक ने इस चुनाव को केंद्र-राज्य संबंधों के बीच बड़ी लड़ाई के तौर पर पेश किया है. दरअसल, द्रविड़ पार्टी खुद को देश के संघीय ढांचे के भीतर तमिलनाडु की स्वायत्तता की रक्षक के तौर पर पेश करती है.
स्टालिन की सियासत में संघवाद पर खास जोर है. द्रमुक ने केंद्र से ज्यादा वित्तीय आवंटन की मांग को दोहराया है, जिसमें राज्यों के लिए माल और सेवा कर (जीएसटी) के राजस्व में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग शामिल है. उसने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और एनईपी (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) जैसे प्रस्तावों के मुखर विरोध के साथ उच्च शिक्षा में केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षाओं को खत्म करने की मांग भी उठाई है. पार्टी शिक्षा को फिर से राज्य सूची में डालने की हिमायती रही है और हिंदी को जबरन थोपने के विरोध के पुराने रुख पर कायम है.
पार्टी का यह रुख कोई नया नहीं है लेकिन अब रणनीतिक इरादे से उन पर जोर दे रही है. चुनाव को 'तमिलनाडु बनाम दिल्ली’ की लड़ाई बनाकर द्रमुक क्षेत्रीय पहचान को मजबूत और राज्य में भाजपा के विस्तार की धार कुंद करना चाहती है. स्टालिन के बेटे उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन तो यह तक कह चुके हैं कि यह चुनाव ''हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सीधी लड़ाई है.’’
राज्य में मुख्य विपक्षी दल पूर्व मुख्यमंत्री एडापडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) की अगुआई में अन्नाद्रमुक ही है लेकिन उसके लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की छतरी में अपना पुराना दबदबा बनाए रखना आसान नहीं रह गया है. द्रमुक की तरह उसे भी बड़ा और सशक्त गठबंधन बनाए रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
दिवंगत विजयकांत की पार्टी देसिय मुरपोक्कु द्रविड़ कलगम (डीएमडीएक) अब द्रमुक खेमे में है और अन्नाद्रमुक के बागी नेता ओ. पन्नीरसेल्वम भी द्रमुक से हाथ मिला चुके हैं. कभी दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सबसे ताकतवर सहयोगी रहीं वी.के. शशिकला ने अपनी अलग पार्टी बना ली है और पट्टालि मक्कल काच्चि (पीएमके) के संस्थापक एस. रामदास के साथ गठबंधन के तहत मैदान में हैं.
रामदास को उनकी ही पार्टी के उस गुट ने अलग-थलग कर दिया है जिसकी अगुआई उनके बेटे अंबुमणि रामदास कर रहे हैं. अंबुमणि अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बने हुए हैं. इसमें उन्हें 18 सीटें मिली हैं जो भाजपा को मिली 27 सीटों के बाद दूसरी सबसे बड़ी संख्या है. शशिकला के भतीजे टी.टी.वी. दिनकरण और उनकी पार्टी अम्मा मक्काल मुनेत्र कलगम (एएमएमके) भी एनडीए का हिस्सा है और 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
गौरतलब है कि अन्नाद्रमुक गठबंधन में शामिल छोटी पार्टियां भाजपा के चुनाव चिह्न 'कमल’ पर लड़ रही हैं. यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में असामान्य माना जा सकता है जो बदलते राजनैतिक समीकरणों का संकेत हो सकता है. इनमें कई पार्टियां अन्नाद्रमुक के मुकाबले भाजपा को ज्यादा तरजीह देती हैं.
भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय नेता मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर ईपीएस का नाम लेने से बचते रहे हैं. सो, यह समझना मुश्किल नहीं कि अन्नाद्रमुक प्रमुख को ताने क्यों सुनने पड़ते हैं. उन पर आरोप लगता है कि उन्होंने पार्टी को 'उत्तर भारतीय’ भाजपा के हाथों गिरवी रख दिया है. मुख्यमंत्री स्टालिन इसे ''अदिमै शासनम’’ यानी गुलामी बताते हैं.
द्रमुक-अन्नाद्रमुक की दो-ध्रुवीय राजनीति से इतर राज्य की छोटी पार्टियां भी वोट शेयर पर खासा असर डाल सकती हैं. इसमें अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) को काफी अहम माना जा रहा है. कुछ सर्वे बताते हैं कि पार्टी दो अंकों में वोट शेयर हासिल कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो नतीजे काफी चौंकाने वाले हो सकते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक जानकार प्रियन श्रीनिवासन का कहना है कि विजय के इर्द-गिर्द बना राजनैतिक माहौल काफी अप्रत्याशित है.
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि विजय किस पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे. श्रीनिवासन के मुताबिक, ''जहां भी विजय जाते हैं, वहां भारी भीड़ जुटती है. क्या पार्टी अन्नाद्रमुक को मिलने वाले द्रमुक-विरोधी वोटों मे सेंध लगाएगी? या द्रमुक के अल्पसंक्चयक वोटों में? या युवा वोटों को आकृष्ट करेगी जो पहले सेंतमिलन सीमान की पार्टी नाम तमिलर काच्चि (एनटीके) को मिले थे (2021 में 6.6 फीसदी)? अभी कुछ नहीं कह सकते.’’
नए समीकरण उभरे
तमिलनाडु की चुनावी राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण के बजाए जातिगत समीकरणों, क्षेत्रीय तालमेल और कल्याणकारी योजनाओं से ज्यादा प्रभावित होती है. पारंपरिक रूप से द्रमुक गठबंधन को पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों, अल्पसंख्यकों और शहरी वर्ग के हिस्से का समर्थन मिलता रहा है.
उत्तरी तमिलनाडु में रामदास का प्रमुख वोट बैंक माना जाने वाला वन्नियार समुदाय एक और अहम ओबीसी समूह है. दक्षिणी जिलों में थेवर समुदाय का पारंपरिक वर्चस्व रहा है, और अन्नाद्रमुक को इन मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन हासिल है. राज्य के पश्चिमी हिस्सों में कोंगू वेल्लाल गौंडर भी ऐतिहासिक रूप से अन्नाद्रमुक समर्थक रहे हैं (यह क्षेत्र अब महत्वपूर्ण चुनावी अखाड़ा बन गया है, क्योंकि हाल में द्रमुक ने यहां अपनी पैठ बढ़ाई है).

2026 के चुनावों में उभरते नए समीकरणों में एक युवा मतदाता हैं. तमिलनाडु में कुल मतदाताओं में हर पांचवां वोटर 30 वर्ष से कम उम्र का है (20.7 फीसद या 1.17 करोड़), और यह बेहद ऊर्जावान समूह अक्सर लीक से हटकर मतदान करता है. पिछली बार उन पर एनटीके के तमिल राष्ट्रवादी नारों का खासा असर दिखा था; इस बार चुनाव में बहुत संभव है कि विजय को उनका समर्थन मिल जाए.
यही वजह है कि राजनैतिक दल अपनी डिजिटल पहुंच बढ़ाने और युवाओं को ध्यान में रखकर अपने संदेश तैयार करने में ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. स्टालिन तो एक इंस्टाग्राम-फ्रेंड्ली रील प्रोग्राम चलाते हैं, जिसका नाम है 'वाइब विद एमकेएस.’ उसमें वे जेन-ज़ी जैसे छात्रों, खिलाड़ियों और अन्य के साथ अनौपचारिक और गैर-राजनैतिक बातचीत करते हैं. द्रमुक ने नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए 'ओरानियिल तमिलनाडु’ नाम से अभियान चला रखा है.
इस बीच, पुराने चुनावी हथकंडे बदस्तूर जारी हैं. द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों के बीच मतदाताओं को मुफ्त रेवड़ियां बांटने के मामले में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी है, चाहे फ्रिज देने की घोषणा हो या नकद, वाउचर, कर्ज माफी या फिर सब्सिडी का वादा. विपक्षी दलों ने कानून-व्यवस्था को भी मुख्य मुद्दा बनाया है. इसमें पुलिस की मनमानी और दुरुपयोग के बढ़ते मामले शामिल हैं.
कुल मिलाकर, 2026 का चुनाव तमिलनाडु के लिए बदलाव का दौर साबित होने वाला है. द्रविड़ पार्टियों का दबदबा तो अब भी कायम है लेकिन कुछ नए खिलाड़ी और एक राष्ट्रीय पार्टी धीरे-धीरे जगह बना रही हैं. द्रमुक की चुनौती है कि 'द्रविड़ मॉडल’ की पकड़ बनाए रखे.
अन्नाद्रमुक की चुनौती सत्ता-विरोधी रुझान को भुनाने की है. सबको विजय की टीवीके से होने वाले नुक्सान के लिए तैयार रहना होगा. नतीजा चाहे जो हो, 2026 का चुनाव तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय करने वाला होगा.

