
पिनाराई विजयन 2021 में जब लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने 40 साल पुराने एक मिथक को तोड़ दिया. उनकी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की अगुआई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और विपक्षी कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को बारी-बारी से सत्ता में आते देखा जाता था.
तमाम उम्मीदों को और 2019 के आम चुनाव में 19-1 की जीत पर सवार होकर सत्ता में लौटने की यूडीएफ की आशाओं के विपरीत एलडीएफ ने अपनी सीटों की संख्या में सुधार किया, जो 2016 में 140 में से 91 से बढ़कर 2021 में 99 हो गईं. केरल आज फिर उसी दोराहे पर खड़ा है—2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य ने फिर यूडीएफ (18 सीटें) के पक्ष में बढ़-चढ़कर मतदान किया.
2025 में स्थानीय निकाय चुनाव में भी कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष ने यूडीएफ को करारा झटका दिया, यहां तक कि पिछले साल हुए उपचुनाव में भी नीलांबर की सीट छीन ली. तो क्या 2026 माकपा के 80 वर्षीय कद्दावर नेता के लिए राजनैतिक सफर का अंत साबित होगा या यह उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत होगी? अगर 4 मई को पहला विकल्प सच निकलता है तो इसका अर्थ देश में वामपंथ के आखिरी किले का ढह जाना भी होगा.
पार्टी के महासचिव एम.ए. बेबी यूडीएफ के खतरे को सिरे से खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ''स्थानीय निकाय चुनाव अलग हैं. ये चुनाव तय करेंगे कि राज्य पर किसकी हुकूमत होगी.’’ हैटट्रिक की कोशिश में पिनाराई और एलडीएफ दोहरा नैरेटिव गढ़ रहे हैं. पहला निरंतरता, प्रगति और विकास के 'केरल मॉडल’ के बारे में है.
दूसरे का लक्ष्य नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से केरल के साथ हो रहे कथित भेदभाव को सामने लाना है, चाहे वह वायनाड के भूस्खलन के पीड़ितों को वित्तीय सहायता देने से इनकार करना हो, या विझिंजम बंदरगाह के लिए वित्तीय पैकेज न देना, या बहुतेरे वादों के बाद भी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) न देना, या फिर हाइ-स्पीड रेल कॉरिडोर.
बेबी कहते हैं, ''चाहे सड़कें हों या बुनियादी ढांचा, वायनाड में पुनर्वास हो या सामाजिक सुरक्षा, वाम मोर्चा सरकार ने 2021 में किए सभी वादे पूरे किए. और यह सब राज्य को उसका हक देने से इनकार करके वित्तीय तौर पर केरल का गला घोंटने की मोदी सरकार की हरसंभव कोशिश के बावजूद हुआ है.’’
पिनाराई एक बार फिर एलडीएफ के चुनाव अभियान की अगुआई करेंगे. वे अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र धर्मादम से चुनाव लड़ेंगे, जो कन्नूर जिले में माकपा का मजबूत गढ़ है. पार्टी ने अस्सी बरस के बुजुर्ग मुख्यमंत्री को चुनाव लड़ाने की खातिर विधायकों के लिए तय दो कार्यकाल की सीमा से छूट दे दी. वाम गठबंधन का नारा है—'एलडीएफ के सिवा कौन?’
और उसका इरादा 'जमीन पर दिख रहे बुनियादी ढांचे’ को जनता के सामने लाना है. पिनाराई ने 29 मार्च को मीडिया से कहा, ''कांग्रेस और भाजपा महज अपने झूठ दोहरा रही हैं. एलडीएफ अपने ट्रैक रिकॉर्ड, अच्छे राजकाज के तरीकों और जरूरतमंदों के लिए किए गए कल्याणकारी उपायों के आधार पर जनादेश मांग रहा है.’’

इनमें 11 लाख करोड़ रुपए की परियोजनाएं शामिल हैं, जिनके लिए केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (केआइआइएफबी) से पैसा मिला है, और जिन पर या तो अभी काम चल रहा है या पूरी हो चुकी हैं. इन परियोजनाओं में परिवहन (तटीय और पहाड़ी राजमार्ग), ऊर्जा (ट्रांसग्रिड 2.0), शिक्षा (हाइ-टेक स्कूल) और स्वास्थ्य सेवा (बायो 360 लाइफ साइंसेज पार्क) से जुड़े काम शामिल हैं.
भूस्खलन के पीड़ितों के वास्ते वायनाड पुनर्वास परियोजना का पहला चरण पूरा कर लिया गया है. विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट के विस्तार के दूसरे चरण पर भी काम चल रहा है. 62 लाख पात्र गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्रतिमाह 1,600 रुपए से बढ़ाकर 2,000 रुपए कर दी गई है. साथ ही एलडीएफ का दावा है कि उसने राज्य में 'बेघरों की समस्या को जड़ से खत्म करने’ के लिए लाइफ मिशन परियोजना के तहत 5,00,000 घर बनाकर दिए हैं.
मगर तब भी सत्ता-विरोधी भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. पिनाराई ने राज्य पर पूरी सख्ती से 10 साल राज किया, राज्य को बाढ़, भूस्खलनों और कोविड के दौरान रास्ता दिखाया और ई-गवर्नेंस की शुरुआत की, लेकिन भ्रष्टाचार, मनमानी और ज्यादती के आरोप भी लगे. सीट बांटने के फैसले भी इस बार एक और दुखती रग हैं.
माकपा के कई कद्दावर नेता बागी हो गए. उनमें प्रमुख राज्य समिति के पूर्व सदस्य और पिनाराई के पहले कार्यकाल में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे जी. सुधाकरन हैं, जो पहले अपने गढ़ रहे अंबालापुझा से निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ेंगे. उनकी बगावत को यूडीएफ की शह मिल रही है. कोविड के दौरान हालात का बेहतर प्रबंधन करने वालीं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा 'टीचर’ की भी उपेक्षा हो रही है. टिकटों के आवंटन को लेकर वे उत्साहित नहीं हैं.
बदलाव की बयार
लडीएफ जहां कुछ डांवाडोल दिख रहा है, कांग्रेस की अगुआई वाला यूडीएफ ऊपर चढ़ता नजर आ रहा है. गठबंधन ने ठान लिया है कि वह एक और कार्यकाल विपक्ष में नहीं बिताएगा. लोकसभा चुनाव और स्थानीय निकायों के चुनाव में जीत ने उसकी उम्मीदें बढ़ा दी हैं.
विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियां बहुत पहले ही शुरू हो गईं जब तेलंगाना में पार्टी की जीत के सूत्रधार चुनावी रणनीतिकार सुनील कानूगोलू को लाया गया. हरेक निर्वाचन क्षेत्र में सबसे अच्छे उम्मीदवार की पहचान के लिए तीन सर्वे करवाए गए. सहयोगी दलों केरल कांग्रेस (जोसेफ गुट) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आइयूएमएल) के साथ सीटों के बंटवारे की बातचीत भी तेजी से आगे बढ़ी.
कांग्रेस 2026 के चुनाव को एलडीएफ के 10 सालों के भ्रष्टाचार और वित्तीय बदइंतजामी पर जनमत संग्रह के तौर पर पेश कर रही है. पिनाराई 2.0 सरकार की चौथी सालगिरह के जश्न पर खर्च किए गए 100 करोड़ रुपए इसकी एक मिसाल है.
कांग्रेस नेता और वायनाड के पूर्व सांसद राहुल गांधी ने 29 मार्च को पथनामथिट्टा में हुई रैली से माहौल गरमा दिया, जहां भगवान अयप्पा को समर्पित मशहूर सबरीमाला पहाड़ी मंदिर स्थित है. इस सवाल पर कि 'स्वर्णम कट्टातु अरप्पा? (भगवान का सोना किसने चुराया?’ भीड़ ने गरजदार जवाब दिया, 'सघाक्कालाने अयप्पा (कॉमरेडों ने चुराया, अयप्पा)’. इससे माकपा के लिए पहाड़ी मंदिर से गायब सोने का मामला मुश्किल का सबब बन गया.
विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन को पूरा भरोसा है कि यूडीएफ 110 सीटें जीतेगा. वे कहते हैं, ''लोग सरकार से तंग आ चुके हैं. पिछले साल हुए स्थानीय निकायों के चुनावों के बाद यह जगजाहिर था. राज्य में कुशासन खत्म करने के लिए वे हमें वोट देकर सत्ता में लाएंगे.’’
कांग्रेस के अभियान में उस वक्त नई जान और जोश आ गया जब 25 मार्च को मोदी सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन (एफसीआरए) विधेयक पेश किया और केरल में भाजपा के ईसाई मेलजोल की हवा निकालने का मौका दे दिया. हालांकि, फिलहाल इसे टाल दिया गया है, लेकिन यह विधेयक व्यक्तियों, संस्थाओं और कंपनियों की तरफ से विदेशी धन स्वीकार और इस्तेमाल करने को नए नियम-कायदों के दायरे में लाता है.
केरल के चर्चों में इसका विरोध होने लगा, क्योंकि उन्हें डर है कि इसके प्रावधानों से उनके कामकाज पर बुरा असर पड़ेगा. चुनाव विश्लेषक सनीकुट्टी अब्राहम कहते हैं, ''एफसीआरए विधेयक जिस समय लाया गया, वह केरल में कांग्रेस के लिए एक तरह से वरदान था. चर्च और ईसाई समुदाय संशोधनों से परेशान थे. वे अब कांग्रेस और यूडीएफ के पीछे गोलबंद होंगे. यह दक्षिण और मध्य केरल में कांग्रेस को चुनाव अपनी झोली में डाल लेने में मदद करेगा.’’

अलबत्ता, जीतने के लिए कांग्रेस की अगुआई वाले यूडीएफ को अपने नेताओं की एक-दूसरे से होड़ करती महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगानी होगी. उम्मीदवारों के चयन के दौरान सतीशन, दिल्ली में रह रहे सांसद और महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष रमेश चेन्नितला के बीच खींचतान की चर्चा थी, लेकिन सतीशन इसे खारिज करते हैं. यूडीएफ को अपना चुनावी गणित भी दुरुस्त करना होगा.
सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को 90 से ज्यादा सीटें मिलीं, लेकिन प्रमुख सवाल यह है कि सहयोगी दल, आइयूएमएल (मालाबार में) और मध्य केरल में ईसाई मतदाताओं पर अच्छा-खासा असर रखने वाले केसी (जे), पार्टी को अपने वोट दिलवा पाएंगे या नहीं.
जनमत सर्वेक्षणों ने मल्लापुरम और वायनाड सरीखे उत्तरी जिलों में, जहां आइयूएमएल और कांग्रेस के नेटवर्क काफी मजबूत हैं, यूडीएफ को बढ़त दिखाई है. लेकिन कोट्टयम, एनार्कुलम, इडुक्की और त्रिशूर जिलों समेत मध्य केरल ही वह जगह है जहां वे यह लड़ाई जीतेंगे या हारेंगे. इस इलाके में 40 से ज्यादा सीटें आती हैं और जीतने के लिए कांग्रेस को यहां अपने 2021 के खराब प्रदर्शन को बदलना होगा.
इस चुनाव में एलडीएफ और यूडीएफ दोनों के मंसूबों में पलीता लगाने का काम भाजपा की अगुआई वाला एनडीए कर सकता है, जिसने केरल में महत्वाकांक्षा और चुनाव अभियान दोनों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. पार्टी ने न केवल अपने उम्मीदवारों की सूची जल्दी जारी की बल्कि 'मरातातू इनी मारुम (जो नहीं बदला अब बदलेगा)’ नारे के साथ अपने चुनावी इरादों को भी कई गुना ऊंचा उठा दिया.
यहां पार्टी की महत्वाकांक्षा में उस नेमोम सीट को दोबारा जीतना प्रमुख है जो आरएसएस की मजबूत मौजूदगी के साथ हिंदू बहुल निर्वाचन क्षेत्र है और जिसने 2016 में पार्टी को उसका पहला और अकेला विधायक दिया था. दूसरी 'जीतने लायक’ सीटों में मंजेश्वर उत्तर में, पलक्कड़, और त्रिशूर तथा तिरुवनंतपुरम के कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. पार्टी नए राज्य अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर, और के. सुरेंद्रन और केंद्रीय मंत्री वी. मुरलीधरन सरीखे दिग्गज नेताओं पर भरोसा करके चल रही है. रणनीति हिंदू वोटों को गोलबंद करने और ईसाई समुदाय से मेलजोल का प्रतिफल हासिल करने की है.
कड़ा मुकाबला
तीन दशकों से राज्य चुनावों पर नजर रख रहे राजनैतिक विश्लेषक ए. जयशंकर को पलड़ा अभी भी एलडीएफ के पक्ष में झुका लगता है. वे कहते हैं, ''पिनाराई के खिलाफ नकारात्मक लहर है लेकिन वामपंथी विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में मोटे तौर पर अब भी लोकप्रिय हैं. अगर एलडीएफ जीतता है, तो यह दक्षिण केरल ही होगा जो उन्हें बचाएगा—तिरुवनंतपुरम, कोल्लम, अलप्पुझा, पथनामथिट्टा, कोट्टायम और इडुक्की.’’ इन जिलों में 53 सीटें हैं, जिनमें से 2021 में एलडीएफ ने 44 जीती थीं.
हरिपाद से चुनाव लड़ रहे चेन्नितला को ऐसा होता नहीं दिखता. वे कहते हैं, ''लोग एलडीएफ की भ्रष्ट हुकूमत से आजिज आ गए हैं. पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे और कांग्रेस का समर्थन कर रहे सीपीआइ(एम) के बागियों की संख्या तो जरा देखिए. सीपीआइ(एम) का मजबूत गढ़ कन्नूर तक इस बार यूडीएफ के पक्ष में वोट देगा.’’
इस सबके बीच दो बातें तमाम राजनैतिक पार्टियों के गुणा-भाग को उलट-पुलट सकती हैं: नए मतदाता और महिलाएं. राज्य में 20 से कम उम्र के 4,66,000 नए मतदाताओं के नाम दर्ज हुए हैं, और करीब 47.7 लाख महिला मतदाता 40 से कम उम्र की हैं. वे 9 अप्रैल को कैसे वोट डालते हैं, इससे केरल स्टोरी में कुछ नाटकीय मोड़ आ सकते हैं.

