
एक दिग्गज, दूसरी जुझारू शेरनी, तीसरा अपनी काबिलियत साबित कर चुका राजनैतिक वंशज, और चौथा राजनैतिक दांवपेचों का महारथी. आने वाले विधानसभा चुनावों में ऐसी कद्दावर शख्सियतों के बीच मुकाबला है जिनमें से हरेक का राष्ट्रीय महत्व के एक न एक इलाके पर दबदबा है.
पश्चिम बंगाल में लगातार चौथे कार्यकाल की तलबगार ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ ऊंचे दांवों की लड़ाई लड़ रही हैं, वही भाजपा जो इस राज्य को पूरब के अब तक हासिल न हो सके बड़े इनाम की तरह देखती है. केरल में पिनाराई विजयन के लिए दांव वजूद से जुड़े हैं:
हार न केवल अस्सी बरस के इस वयोवृद्ध मुख्यमंत्री का बल्कि वामपंथ का भी राजनैतिक शोकगीत लिख सकती है, और कांग्रेस को दक्षिण के पांच राज्यों में से तीन की सत्ता सौंप सकती है. असम और तमिलनाडु में मुकाबला वहां के दिग्गजों के पैर और मजबूती से जमाने का है.
सत्ता में कायम रहे तो एम.के. स्टालिन और हेमंत बिस्व सरमा की साख और हैसियत और पुख्ता होगी, और चुनावी जीत लंबे समय तक चलने वाली राजनैतिक पूंजी में बदल जाएगी. आगे के पन्नों में हम हरेक सियासी क्षत्रप की संभावनाओं और चुनौतियों का विश्लेषण कर रहे हैं.
चौथी पारी की तैयारी
पश्चिम बंगाल के पांडवेश्वर में लाउदोहा गांव के तपते आसमान में 26 मार्च को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर आया हेलिकॉप्टर जमीन पर उतरा, तो वहां जमा भारी भीड़ में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का चुनावी नारा गूंज उठा, 'जोतोई कोरो हमला, आबार जितबे बांग्ला’ (चाहे जितना करो हमला, फिर जीतेगा बांग्ला). लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रहीं जुझारू ममता अब चौथे कार्यकाल के लिए जंग में हैं.
लेकिन अब उनका मुकाबला सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से ही नहीं है. वे चुनाव आयोग को भी निशाने पर ले रही हैं, जो 7.66 करोड़ मतदाताओं की सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के जरिए करीब 11 फीसद नाम हटा रहा है. ममता का आरोप है कि इसके जरिए तृणमूल समर्थक वोटरों के नाम काटने की जुगत की गई है, ताकि चुनावी पलड़ा भाजपा की ओर झुक जाए.
इस साल राज्य विधानसभा चुनाव दो चरणों में—23 और 29 अप्रैल—बेहद विवादास्पद एसआइआर के बीच लड़ा जा रहा है, जिससे ऐसी अनिश्चितता छाई है, जो पहले कभी नहीं देखी गई. पहली बार किसी बड़े चुनाव का ऐसे वक्त ऐलान किया गया, जब वोटर लिस्ट ही तैयार नहीं हो पाई है. एसआइआर से उजागर हुए आंकड़े ही तृणमूल के सियासी हथियार बन गए हैं.
63.6 लाख नाम हटा दिए जाने के बाद 60 लाख से ज्यादा नामों पर अभी भी फैसला होना बाकी है. लगभग 49.6 लाख नामों की जांच हो चुकी है, और शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि 45 फीसद नाम हटाए जा सकते हैं. ममता सीधे तौर पर चुनाव आयोग पर निशाना साध रही हैं. उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की खिल्ली उड़ाने के लिए उन्हें 'वैनिश’ यानी गायब कुमार कहना शुरू कर दिया है.
एसआइआर की कथित चोट के बावजूद ममता के भतीजे तथा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का दावा है कि पार्टी 2021 के सीटों के आंकड़े को पार कर जाएगी. हालांकि तृणमूल में अंदरखाने हल्की बेचैनी है. पार्टी के आकलन के मुताबिक, नाम हटाने का यह सिलसिला जारी रहा, तो करीब 20 सीटों के नतीजों पर असर पड़ सकता है.

इससे तृणमूल की सीटों की संख्या 215 से घटकर 195 के आसपास रह सकती है. जिन 60.6 लाख नामों पर अभी फैसला होना बाकी है, उनमें करीब 28 लाख महिलाएं हैं, जो ममता की मुख्य वोटर हैं. अलग-अलग वर्गों के तहत अब तक 31 लाख से ज्यादा महिलाओं के नाम हटाए जा चुके हैं, जबकि पुरुषों के मामले में यह संक्चया करीब 27 लाख है.
कल्याण योजनाओं की फसल
ममता का सामना आज चुनाव आयोग से क्यों न हो, मगर उन्होंने लंबे वक्त से कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए मजबूत चुनावी बिसात बिछाई है. फरवरी 2021 में शुरू हुई 'लक्ष्मी भंडार’ योजना के तहत अब तक 2.21 करोड़ महिलाओं को आर्थिक मदद मिल चुकी है. अब यह मासिक भत्ता सामान्य वर्ग के लिए 1,500 रुपए और अनुसूचित जाति (एससी) तथा अनुसूचित जनजाति (एसटी) परिवारों के लिए 1,700 रुपए हो गया है.
इसी तरह 'रूपश्री’ योजना के तहत 22 लाख से ज्यादा महिलाओं को शादी में मदद के तौर पर 25,000 रुपए की राशि मिली है. सो, कोई हैरानी नहीं कि लाउदोहा रैली में ममता को भीड़ में मौजूद महिलाओं से 'उलुलु’ करने को कहना नहीं पड़ा. यह ऐसी पारंपरिक गूंज है जो अब उनकी सभाओं की पहचान बन चुकी है. यह आवाज गूंज उठी और उनके भाषण के बीच-बीच में सुनाई देती रही.
कल्याणकारी योजनाओं का जाल कमजोर तबकों और अलग-अलग पेशों से जुड़े लोगों के बड़े दायरे तक फैला हुआ है. 'कर्मसाथी’ (प्रवासी श्रमिक) योजना प्रवासी मजदूरों को सुरक्षा देती है, जबकि 'श्रमश्री’ योजना 31.8 लाख ऐसे मजदूरों को हर महीने 5,000 रुपए की मदद देने का वादा करती है जो काम की तलाश में वापस लौटे हैं.
इन दोनों योजनाओं को मजदूरों की मदद में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है. 'जय जोहार’ और 'तपसिली बंधु’ जैसी पेंशन योजनाओं के तहत 14.6 लाख एससी और एसटी बुजुर्गों को 9,108.45 करोड़ रुपए बांटे गए हैं.
किसानों को 'कृषक बंधु’ योजना के तहत 27,016 करोड़ रुपए मिले हैं, और 'बांग्ला शस्य बीमा’ के तहत फसल बीमा ने 1.13 करोड़ किसानों को सुरक्षा दी है, जिसमें 3,938 करोड़ रुपए के दावों का निबटारा किया गया है. इस पहल का मकसद युवा मतदाताओं तक भी पहुंचना है. 'बांग्लार युवा साथी’ योजना के तहत बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1,500 रुपए का भत्ता दिया जाता है.
पार्टी का चुनावी घोषणापत्र 'दीदीर 10 प्रोतिज्ञा’ नए वादों का समूह होने के बजाए पहले से आजमाए हुए कल्याणकारी मॉडल का ही विस्तार है. इसके मूल में 'दुआरे चिकित्सा’ (दरवाजे पर इलाज) है. यह 'दुआरे सरकार’ (दरवाजे पर सरकार) मॉडल पर आधारित है और पूरे राज्य में सालाना शिविरों के जरिए लोगों के घर-घर तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जाएंगी.
घोषणापत्र में व्यापक कल्याणकारी तंत्र का भी वादा है. इसमें कहा गया है कि जब तक तृणमूल सरकार रहेगी, 'लक्ष्मी भंडार’ योजना जारी रहेगी. इसके अलावा, 30,000 करोड़ रुपए का कृषि प्रोत्साहन, सभी के लिए आवास और पाइप से पीने का पानी, तथा पेंशन और शिक्षा के बुनियादी ढांचे का विस्तार भी इसमें शामिल है. इसके साथ ही एक आर्थिक नजरिया भी पेश किया गया है.
इसके तहत कल्याणकारी योजनाओं को आर्थिक विकास से जोड़कर बंगाल की मौजूदा 20 लाख करोड़ रुपए की अर्थव्यवस्था को दोगुना करने और राज्य को पूर्वी भारत का व्यापारिक प्रवेश-द्वार (ट्रेड गेटवे) बनाने का लक्ष्य रखा गया है. राजनैतिक पंडित बिस्वजीत भट्टाचार्य कहते हैं, ''ग्रामीण बंगाल में ममता की योजनाओं और उनके लाभार्थियों का नेटवर्क बहुत मजबूत है और उन्हें ज्यादातर वोट इसी तबके से मिलते हैं. इसके उलट, शहरी क्षेत्रों में सत्ता-विरोधी लहर तेज है.’’
दोहरी आक्रामकता
भाजपा दो मोर्चों पर लड़ रही है. पहला, तृणमूल सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है और दूसरा, यह हिंदू-विरोधी है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में 28 मार्च को 14-सूत्री आरोप-पत्र जारी किया. उन्होंने ममता सरकार पर भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था की नाकामी और सुरक्षा में चूक के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि इस बार चुनाव 'डर और भरोसे’ के बीच है.
आरोप-पत्र में महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सरकारी निकम्मेपन की भी बातें हैं. भाजपा ने आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की पीड़िडि़ता डॉक्टर की मां रत्ना देबनाथ को भी चुनाव मैदान में उतारा है. अगस्त 2024 में इस बलात्कार और हत्याकांड से पूरा देश दहल उठा था. राज्य भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का मानना है कि उनकी पार्टी पहली बार बंगाल की सत्ता पर काबिज होगी. उनका कहना था, ''लोगों ने मन बना लिया है. तृणमूल जाएगी, तृणमूल जा रही है. तृणमूल तो पहले ही जा चुकी है. दुनिया की कोई ताकत उसे सत्ता में वापस नहीं ला सकती.’’

भाजपा ने कोई औपचारिक घोषणापत्र जारी नहीं किया है लेकिन 'अन्नपूर्णा भंडार’ का वादा किया है. यह ममता के 'लक्ष्मी भंडार’ का जवाब है. उसमें ज्यादा नकदी खाते में डाली जाएगी. पार्टी ने सातवें वेतन आयोग को लागू करने और सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर राज्य कर्मचारियों के लंबे समय से अटके बकाए का भुगतान करने का भी वादा किया है.
पार्टी ने इसी समय-सीमा के भीतर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन आवंटित करने का भी संकल्प लिया है, जो उसके 'घुसपैठ विरोधी’ एजेंडे पर जोर देने के लिए है. भाजपा लगातार 'तुष्टीकरण-मुक्त’ और 'भ्रष्टाचार-मुक्त’ सरकार बनाने की भी बात करती है. रोजगार के मोर्चे पर भाजपा भर्ती घोटालों से प्रभावित उम्मीदवारों को सरकारी नौकरी के लिए पांच साल की उम्र में छूट देने का वादा कर रही है. पार्टी ने पारदर्शी प्रक्रियाओं के तहत सभी खाली पदों को भरने का भी वादा किया है.
पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा के वोट शेयर में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. कांग्रेस और वाम मोर्चा पूरी तरह से ढह गए हैं. भाजपा की वोट हिस्सेदारी 2016 में 10 फीसद से बढ़कर 2021 में 37.9 फीसद हो गई. हालांकि यह अभी भी तृणमूल के 48 फीसद वोट से करीब 10 फीसद अंक कम है. पार्टी सूत्रों का मानना है कि सत्ता में आने की उनकी संभावनाएं काफी बढ़ी हैं लेकिन उन्हें अभी भी काफी भरपाई करनी बाकी है.
भाजपा में 2021 में शामिल हुए प्रतिपक्ष के नेता तथा पूर्व तृणमूल नेता शुभेंदु अधिकारी भगवा पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हैं. उन्होंने 2021 में नंदीग्राम में ममता को 1,956 वोटों से हराया था, जिसके चलते बाद में ममता को भवानीपुर से चुनाव लड़ना पड़ा.
इस बार वे ममता को उनके ही गढ़ भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं, और साथ ही नंदीग्राम में अपने पूर्व सहयोगी पवित्र कर (जो अब तृणमूल में हैं) के खिलाफ अपनी सीट का बचाव भी कर रहे हैं. शुभेंदु 'हिंदुत्व के पोस्टर बॉय’ बने हुए हैं. उनके अलावा जबरदस्त भाषण-कला के लिए सराहे जाने वाले समिक भट्टाचार्य को 'भद्रलोक’—यानी शिक्षित और सुसंस्कृत बंगाली वर्ग—को लुभाने के लिए आगे किया गया है.
कांग्रेस और वामपंथी दल इस बिखरे चुनावी माहौल में अनिश्चितता की एक और परत जोड़ देते हैं. इस बार ये दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. इन पार्टियों ने पिछली रणनीतिक साझेदारियों को तोड़कर मुकाबले को बहु-कोणीय लड़ाई में बदल दिया है. मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में कांग्रेस का संगठन आधार कुछ हद तक बचा हुआ है, इसलिए वहां वोटों का छोटा-सा हिस्सा भी निर्णायक साबित हो सकता है.
2021 के नतीजों से यह साफ हो गया था कि तृणमूल और कांग्रेस के बीच अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे से भाजपा संख्याबल न होने के बावजूद दो सीटें जीतने में कामयाब रही. लेकिन इस बार भाजपा को देश भर में 'अवैध बांग्लादेशियों को बाहर निकालने’ के नाम पर बांग्ला बोलने वालों—खासकर मुसलमानों—के कथित उत्पीड़न के नतीजों का सामना करना पड़ सकता है.
यह ऐसा मुद्दा है, जिसे तृणमूल ने हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. अब जब मतदाताओं का समूह ही दबाव में है, तो कांग्रेस और वामपंथी उम्मीदवारों की मौजूदगी एक बार फिर वोटों को इस हद तक बांट सकती है कि करीबी मुकाबले वाली सीटों के नतीजे ही बदल जाएं.
बहरहाल, पश्चिम बंगाल में 2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता-विरोधी रुझान और कल्याण योजनाओं से ही तय नहीं होगा, यह इस पर भी निर्भर करेगा कि किसे वोट देना है. एसआइआर से मतदाता सूची बदलती है तो उसका भी नतीजों पर फर्क पड़ सकता है.
एसआइआर से जुड़े झटकों के बावजूद, तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी का दावा है कि पार्टी 2021 के अपने 215 सीटों के आंकड़े को पार कर जाएगी. हालांकि, पार्टी में भीतर ही भीतर असहजता है.
भाजपा ने अपने आरोप पत्र में तृणमूल सरकार को 'हिंदू-विरोधी’ बताया है. इसके अलावा भ्रष्टाचार, कानून और सुरक्षा अव्यवस्था समेत 14 कथित 'नाकामियों’ को सूचीबद्ध करके चुनाव को 'डर और भरोसे’ के बीच एक विकल्प बताया है.
- अर्कमय दत्ता मजूमदार

