
हेमंत बिस्व सरमा बीते 15 साल से असम में चुनाव जीतने की सबसे भरोसमंद मशीन रहे हैं. उन्होंने अक्सर अपने दम पर विधानसभा, लोकसभा के चुनाव और यहां तक कि गणित फंसने पर राज्यसभा की सीटें भी जितवाईं. उन्होंने कांग्रेस को नतीजे दिए. 2015 में पाला बदलने के बाद, भाजपा को भी नतीजे दिए.
मगर 2026 अलहदा है. सरमा पहली बार किंगमेकर नहीं, बल्कि बतौर मुख्यमंत्री किंग की तरह मैदान में हैं. उनके एक करीबी कहते हैं, ''इस बार वे खुद वह प्रोडक्ट हैं जिसे बेच रहे हैं, किसी और मुख्यमंत्री पद के चेहरे के लिए नहीं. इसलिए मुनाफा ज्यादा होना चाहिए.’’
सरमा के लिए जीतना भर काफी नहीं, वे बड़ी जीत चाहते हैं. भाजपा पहली बार असम में 2016 में 126 सदस्यों की विधानसभा में 60 सीटों के साथ सत्ता में आई, जो बहुमत के लिए जरूरी 64 के आंकड़े से चार कम थीं. सहयोगी दलों के समर्थन से एनडीए की सीटों की संख्या 86 थी, जिसके दम पर सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने.
2021 में भाजपा ने अपनी 60 सीटें बनाए रखीं और वोट हिस्सेदारी 29 से बढ़ाकर 31 फीसद कर ली. एनडीए की कुल सीटों में अलबत्ता 11 की गिरावट आई, जो मुख्यत: इसलिए हुआ क्योंकि सहयोगी दल असम गण परिषद (अगप) 14 सीटों से घटकर नौ पर आ गई.
इस बार सरमा यह साबित करना चाहते हैं कि वे असम के अब तक के सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्री हैं. वे चाहते हैं कि एनडीए की सामूहिक सीटों की संख्या छलांग लगाकर 90 के पार पहुंच जाए, जिसमें भाजपा अकेले 70 से ऊपर हो—यह आंकड़ा 2011 में कांग्रेस को मिली 78 सीटों के करीब लेकिन फिर भी उससे कुछ कम हैं; 2011 में कांग्रेस को मिली ये सीटें इस सदी में किसी भी एक पार्टी को मिली सबसे ज्यादा सीटें थीं और उस जीत के प्रमुख कर्ताधर्ता सरमा ही थे.
9 अप्रैल को होने जा रहे चुनाव उनके राजकाज के मॉडल पर जनमत संग्रह भी होंगे, और यह मॉडल है हिंदू पहचान पर बेधड़क जोर देना, खुद को बुनियादी ढांचे और औद्योगिक निवेश के जरिए सामाजिक-आर्थिक वृद्धि के सूत्रधार के रूप में पेश करना और एहतियात से लाभार्थियों का जबरदस्त वोट बैंक विकसित करना.

चुनौती बहुत बड़ी है और खासकर उस राज्य में जहां आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी अनाधिकारिक हिसाब से 40 फीसद से ज्यादा—2011 की जनगणना के मुताबिक 34 फीसद—है, और जो कांग्रेस या ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) को वोट देते रहे हैं. यह चुनौती सरमा की भड़काऊ बातों से और पेचीदा हो जाती है.
उनका चुनाव अभियान मियां (बांग्लादेशी मूल के मुसलमान प्रवासियों के लिए इस्तेमाल स्थानीय शब्द) के खिलाफ आह्वान की बुनियाद पर गढ़ा गया है. उन्होंने ऐलान किया कि उन्हें उनके वोटों की जरूरत नहीं, उन्होंने देशज समुदायों से उन्हें ''परेशान’’ करने की अपील की और वादा किया कि इस कार्यकाल में ''उनके हाथ-पैर तोड़ने’’ के बाद अपने अगले कार्यकाल में वे ''उनकी कमर तोड़’’ देंगे...
नई सीमाएं खींचीं
जपा की मौजूदगी बढ़ाने की उनकी रणनीति 2023 में शुरू हुई जब असम के विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं नए सिरे से निर्धारित की गईं. जहां पहले मुसलमानों का 35 सीटों पर असर हुआ करता था, परिसीमन के बाद वे 22 रह गईं. ये वे सीटें हैं जो ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस और एआइयूडीएफ के खाते में जाती रही थीं.
उनके गठबंधन ने 2021 में भाजपा के 33 फीसद वोटों के मुकाबले कांग्रेस को 30 फीसद वोट पाने में मदद की तो भी इस वोट हिस्सेदारी को महज 29 सीटों में बदला जा सका, जो असम के 35 जिलों में से महज 13 से मिली थीं. अब जब मुस्लिम आबादी का असर और भी कम सीटों तक सिमटकर रह गया है, वोटों के सीट में बदलने की संभावना और कम है. कांग्रेस और एआइयूडीएफ के बीच गठबंधन के बगैर दोनों पार्टियों के मूल वोट बैंक बंट जाएंगे.
इधर अगप के उतारे 13 मुस्लिम उक्वमीदवारों में से कई एआइयूडीएफ के दलबदलू हैं. इन क्षेत्रों में बहुकोणीय मुकाबले से मुस्लिम वोटों के बंटने की संभावना है, जिसका खमियाजा कांग्रेस और सहयोगी दलों को उठाना पड़ सकता है.
चार और वजहें भाजपा के पक्ष में काम करती दिख रही हैं. ये हैं सरमा की निजी लोकप्रियता, बुनियादी ढांचे के मामले में उनकी सरकार का रिकॉर्ड, कल्याणकारी योजनाओं का विशाल ढांचा और अवैध प्रवासियों को लेकर लगातार ध्रुवीकरण. सरमा की लोकप्रियता सियासी परिघटना की तरह है. आम लोगों के सामने उनकी छवि दो दशकों से काम करने और वादे पूरे करने वाले शख्स की तरह पेश की गई है.
कहा जाता है कि मुख्यमंत्री तकरीबन चौबीस घंटे सक्रिय और मुस्तैद रहते हैं और छोटे-छोटे ब्योरों का ध्यान रखते हैं. उनका दिन सुबह 7 बजे अफसरशाहों और राजनैतिक सहयोगियों के साथ फोन पर बातचीत से शुरू होता है और अक्सर रात 3 बजे तक चलता है, जब फाइलों को मंजूरी देने के लिए अफसरों को आधी रात के बाद भी बुलाया जाता है.
वे सफर कर रहे होते हैं तो निर्देश व्हाट्सऐप पर दिए जाते हैं. एक अफसरशाह कहते हैं, ''वे विभागों के बीच फाइलों की उछल-कूद से बचते हैं और मंजूरी देने के लिए बहुत-से सचिवों को अक्सर एक साथ बुला लेते हैं.’’ एक अन्य अफसर जोड़ते हैं, ''उनकी फोटोग्राफिक मेमोरी है और वे साप्ताहिक समीक्षाओं के साथ छोटे-छोटे ब्योरों पर भी नजर रखते हैं.’’
वादों पर खरे
रमा सरकार ने सरकारी नौकरियों के लिए पारदर्शी भर्ती परीक्षाएं आयोजित कीं. 1,00,000 से ज्यादा सरकारी नौकरियां देकर अपना वादा भी निभाया है. वे अपने अगले कार्यकाल में दोगुनी नौकरियां देने का वादा कर रहे हैं. सड़क मार्ग का विस्तार हुआ है, रिकॉर्ड समय में पुल और फ्लाइओवर बनाए गए हैं, और राज्य में सेमीकंडक्टर इकाइयों समेत औद्योगिक निवेश भी बढ़ा है. आरबीआइ का आंकड़ा बताता है कि देश का सबसे तेजी से बढ़ने वाला राज्य असम ही है, जिसने वित्त वर्ष 2020 और 2025 के बीच 45 फीसद की वृद्धि दर्ज की है, जो 29 फीसद के राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी ज्यादा है.
दूसरी उपलब्धियां भी हैं. सरमा सरकार की कल्याणकारी योजनाएं लगभग 60-70 लाख परिवारों तक पहुंचती हैं—यानी करीब 2.5 से 3 करोड़ तक लोगों को इनका फायदा मिल रहा है. इसका मतलब है कि असम की 3.5 करोड़ आबादी में करीब 75-85 फीसद लोग किसी न किसी योजना के दायरे में हैं. अनुमान है कि 2021-26 के बीच सरकार ने इन योजनाओं पर 30-35,000 करोड़ रुपए खर्चे.
कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्र दो अलग-अलग चुनावी विचारधाराओं को दर्शाते हैं—एक प्रदर्शन-आधारित निरंतरता और विकास पर केंद्रित है, तो दूसरा कल्याणकारी गारंटियों पर. भाजपा के 75 पन्नों के 'संकल्प पत्र’ में 31 प्रमुख वादे किए गए हैं, जिसमें 5 लाख करोड़ रुपए के निवेश से बुनियादी ढांचागत विकास, 18,000 करोड़ रुपए का बाढ़-सुरक्षा मिशन, दो लाख सरकारी नौकरियां, 'अरुणोदय’ योजना को विस्तार और 10 लाख लोगों को स्वरोजगार के लिए सहायता प्रदान करना शामिल है.
कांग्रेस ने जवाब में महिलाओं, बुजर्गों, मूल निवासियों और जेन-ज़ी को केंद्र में रखकर पांच वादे किए हैं—महिलाओं को अपने व्यवसाय की शुरुआत के लिए बिना शर्त 50,000 रुपए का मासिक नकद हस्तांतरण, 25 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा कवर, बुजुर्गों के लिए 1,250 रुपए की मासिक पेंशन और एक समर्पित मंत्रालय, 10 लाख मूल निवासियों को जमीन का अधिकार, और असम के दिवंगत संगीतकार जुबिन गर्ग के लिए 100 दिनों के भीतर न्याय.

और फिर घुसपैठ भी एक बड़ा मुद्दा है. बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ से असमिया भाषा और संस्कृति खत्म होने का खतरा, राज्य के सबसे ज्यादा भावनात्मक मुद्दों में एक है. भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में राज्य की अस्मिता सुरक्षित रखने के कुछ तरीके सामने रखे हैं, मसलन, समान नागरिक संहिता, 'लव जिहाद’ और 'जमीन जिहाद’ के खिलाफ कार्रवाई और घुसपैठियों को असम से बाहर करने के लिए कानून लागू करना. सरमा बार-बार 'मियां’ लोगों का जिक्र करते हैं, जो हिंदू और वहां के मूल आदिवासी वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश है.
सरमा की अपनी निजी अपील के अलावा भाजपा-आरएसएस की संगठनात्मक मशीनरी और पार्टी की आर्थिक ताकत भी चुनाव में अहम भूमिका निभा रही है जो पार्टी के 'चार-स्तंभ’ पर केंद्रित नैरेटिव को हर संभावित वोटर तक पहुंचाती है. इन दोनों ही मामलों में कांग्रेस कमजोर नजर आ रही है. बूथ स्तर पर अब भी पार्टी के कार्यकर्ताओं की कमी दिखती है, जबकि भाजपा की जमीनी पकड़ हर चुनावी चक्र में बढ़ती जाती है.
कड़ी टक्कर की तैयारी
इसके पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री सरमा और उनके मंत्रियों के कड़े प्रचार के बावजूद 43 वर्षीय गौरव गोगोई की शानदार जीत से उत्साहित होकर कांग्रेस ने पिछले साल मई में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था. तब चुनाव को एक साल से भी कम समय रह गया था. कम समय और कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं के युवा पीढ़ी के साथ काम करने में असहजता से उनको थोड़ी मुश्किल हो गई है.
फिर भी गौरव गोगोई ने कांग्रेस की अगुआई में छह दलों का एक गठबंधन तैयार किया है—असोम सोम्मिलितो मोर्चा (एएसएम). इसमें अखिल गोगोई का रायजोर दल और लुरिनज्योति गोगोई की असोम जातीय परिषद (एजेपी) शामिल हैं और गौरव को खुद को इसकी तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है.
भाजपा-विरोधी मतदाताओं को उम्मीद है कि तीन गोगोई नेताओं के साथ आने से ऊपरी असम में अहोम वोटों का ध्रुवीकरण होगा; इस क्षेत्र में 27 विधानसभा सीटें आती हैं. सरमा की पहचान निचले असम के ब्राह्मण के तौर पर है, जिसे ऊपरी असम में खास स्वीकार्यता हासिल नहीं है. अहोम मतदाताओं ने पिछले चुनावों में कम से कम आठ सीटों के नतीजे पलटने में अहम भूमिका निभाई थी.

विपक्ष का नैरेटिव खासकर दो बातों पर है—सरमा और उनकी पत्नी पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप, और मुख्यमंत्री का मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिक अभियान. पूरे राजनैतिक करिअर के दौरान सरमा परिवार को बढ़ते कारोबार—मीडिया हाउस, चाय के बागान, स्कूल और दूसरे व्यवसाय—से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा है.
विपक्ष बोर असोम यानी ऐसा असम बनाने का वादा कर रहा, जिसमें हर समुदाय को सम्मान के साथ जुड़ाव महसूस हो. भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के जवाब में कानूनी तरीके लागू करने की प्रतिबद्धता भी जता रहा है जिसमें धार्मिक या जातीय आधार पर किसी भी समुदाय को निशाना बनाने को अपराध घोषित करने जैसे कदम शामिल हैं. सरमा की तरफ से इस नजरिए को कांग्रेस प्रोजेक्ट करार दिया गया है, जिसका मकसद असम को बांग्लादेशी आप्रवासियों के लिए शरणस्थली बनाना है.
बहरहाल, यह तो 9 अप्रैल को असम की जनता ही तय करेगी कि क्या सरमा का रणनीति से बनाया गया दबदबा बरकरार रहेगा या फिर राज्य चुनाव मैदान के सबसे आत्मविश्वासी महारथी को नतीजे से चौंका देगा.

