वैश्विक व्यापार में खासा दबदबा रखने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य कंटेनर शिपिंग के उन रास्तों के लिए भी बेहद अहम है जो भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था का आधार हैं. इसके दक्षिणी तट पर बसा दुबई अब वैश्विक बाजारों तक पहुंच के लिए भारत के पुनर्निर्यात के वास्ते अहम है; इसे विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स ढांचे और मुक्त व्यापार क्षेत्रों का मजबूत सहारा हासिल है.
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच द्विपक्षीय व्यापार का सालाना मूल्य अब 100 अरब डॉलर (93,801 करोड़ रु.) से भी ज्यादा हो गया है, जिससे यह देश हमारे शीर्ष तीन व्यापारिक साझेदारों में एक बन गया है. अकेले यूएई को भारत से होने वाला निर्यात—जिसमें 7,000 से ज्यादा तरह के उत्पाद शामिल हैं—वित्त वर्ष 2026 में 39 अरब डॉलर (36,596 करोड़ रु.) रहने का अनुमान है.
भारत के लिए यह संकट तात्कालिक और गंभीर है. पश्चिम की ओर जाने वाले हमारे माल का करीब 15-20 फीसद हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात के जेबेल अली और खोर फक्कन जैसे खाड़ी देशों के बंदरगाहों पर निर्भर करता है. ये बंदरगाह चालू हैं लेकिन मार्च मध्य से युद्ध के बाद से इनकी कार्यक्षमता सीमित हो गई है. भारतीय विदेश व्यापार संस्थान में विश्व व्यापार संगठन अध्ययन केंद्र के प्रमुख प्रीतम बनर्जी कहते हैं, ''सुरक्षा चिंताओं के कारण बड़े मालवाहक जहाज इस क्षेत्र में जाने से बच रहे हैं और इससे लागत का पूरा ढांचा बदल गया है.''
रॉटरडैम और एंटवर्प जैसे उत्तरी यूरोप के केंद्रों पर माल भेजने वाले निर्यातकों को अब प्रति कंटेनर 1,800 से 2,200 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है. वहीं भारत-यूरोप मार्गों पर कंटेनर माल ढुलाई की दरों में 12 से 25 फीसद की वृद्धि हुई है. ये आंकड़े युद्ध के जोखिम और शिपिंग में आई कमी दर्शाते हैं.
वहीं, अब लॉजिस्टिक्स चेन पर भी असर दिखने लगा है. शिपिंग कंपनियों ने या तो जहाजों की संख्या कम कर दी है या उनके मार्ग बदल दिए हैं. कुछ कंपनियां तो लाल सागर और स्वेज कॉरिडोर को पूरी तरह से छोड़कर केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे रास्तों को चुन रही हैं. इससे उनकी लागत और आवाजाही का समय दोनों ही बढ़ गए हैं.
नतीजा: दुनियाभर में जहाजों की कमी, माल ढुलाई की बढ़ी दरें, कंटेनरों की भारी किल्लत. यही नहीं, 17 मार्च से युद्ध के जोखिम वाले बीमा की दरें भी बढ़ गई हैं, जिससे खाड़ी देशों की ओर जाने वाले जहाजों पर आकार और मार्ग के आधार पर 50,000 से 2,00,000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है.
इन बदलावों का असर साफ नजर आने लगा है. बाजार हिस्सेदारी का निर्धारण कारखाने के मूल्य के बजाए माल ढुलाई लागत से होने लगा है. कपड़ा, इंजीनियरिंग और केमिकल जैसे क्षेत्रों में, जहां कुल निर्यात मूल्य का 5 से 15 फीसद हिस्सा केवल माल ढुलाई का होता है—खर्च में मामूली वृद्धि भी मुनाफे को खत्म कर रही है. लघु, छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए स्थिति और भी गंभीर है. निर्यात की लंबी होती अवधि, देय भुगतान में देरी और माल ढुलाई के भारी शुरुआती खर्च से कार्यशील पूंजी पर दबाव बना हुआ है.
क्या किया जा रहा
सरकार ने 19 मार्च को निर्यातकों के लिए 497 करोड़ रुपए की रेजिलिएंस ऐंड लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन (रिलीफ) योजना की घोषणा की है. इसका मुख्य उद्देश्य बढ़ते लॉजिस्टिक्स और जोखिम संबंधी खर्चों से व्यापारियों को राहत देना है. योजना खास तौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) पर केंद्रित है क्योंकि वही बढ़ती कीमतों से सबसे ज्यादा परेशान हैं.
बनर्जी कहते हैं, ''यह योजना बेहद अहम है क्योंकि यह जोखिम से जुड़ी लागतों को कम करने में मदद करती है, जहां व्यापारियों पर सबसे ज्यादा आर्थिक दबाव है.'' इसके अलावा, भारत अब अपना खुद का एक घरेलू 'प्रोटेक्शन ऐंड इंडेम्निटी क्लब' बनाने की तैयारी भी कर रहा है, ताकि भविष्य में हमें समुद्री बीमा के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर न रहना पड़े.
और क्या करने की जरूरत
भारतीय निर्यात संगठनों के संघ (एफआइईओ) के महानिदेशक अजय सहाय कहते हैं, ''अभी हम जो देख रहे हैं, वह सीधे-सीधे ऑर्डर रद्द होने के बजाए शिपमेंट में देरी और लागत पर बातचीत ज्यादा है.'' इसमें 'सीजनल बफर' की भी एक अहम भूमिका है. दरअसल, रमजान से पहले पश्चिम एशियाई बाजारों के आयातकों ने काफी ज्यादा स्टॉक जमा कर लिया था, इसलिए फरवरी और मार्च के शुरू में शिपमेंट काफी मजबूत रहे.
निर्यातकों का कहना है कि होर्मुज में रुकावट का पूरा असर आने वाले हफ्तों में महसूस होने की संभावना है क्योंकि रमजान के बाद मांग के पैटर्न सामान्य हो जाएंगे और स्टॉक की खपत शुरू हो जाएगी.
सहाय का कहना है कि मौजूदा तनाव एक बड़ी आर्थिक मंदी में तब्दील न हो पाए इसके लिए ज्यादा क्रेडिट सपोर्ट, तेजी से रिफंड मुहैया कराने और एक्सपोर्ट क्रेडिट इंश्योरेंस एजेंसियों से ज्यादा बेहतर रिस्क कवर मिलना जरूरी है. वहीं, निर्यातक जिस पूंजी उपलब्धता की कमी का सामना कर रहे हैं, उसे सिर्फ लॉजिस्टिक्स समर्थन से हल नहीं किया जा सकता. मौजूदा बाधा ने निर्यात मामले की भारत की लॉजिस्टिक्स से जुड़ी ढांचागत कमजोरियों को लेकर बहस फिर से तेज कर दी है.

