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भारत किस तरह चुका रहा है ईरान युद्ध की कीमत

ईरान युद्ध से पैदा हुए संकट से निबटने के लिए मोदी सरकार ने तत्परता के साथ फौरी प्रतिक्रिया वाले उपायों से आगे बढ़कर एक संगठित और व्यवस्थित संकट प्रबंधन की दिशा में पहल की है

ईरान युद्ध की कीमतः इलस्ट्रेशन: तन्मय चक्रवर्ती
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

ईरान युद्ध के तीन हफ्ते बीत चुके हैं, और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने पहले ही घोषित कर दिया है कि तेल के अकूत भंडार वाले पश्चिम एशिया में ऊर्जा संसाधनों को भयंकर नुक्सान पहुंचा है. यह 1970 के दशक के दो बड़े तेल संकटों और 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद उपजे प्राकृतिक गैस संकट—तीनों को मिलाकर हुए नुक्सान के बराबर है.

इससे भी बुरा यह कि 28 फरवरी को जंग शुरू होने के वक्त इज्राएल और अमेरिका की सेनाएं मिलकर ईरानी शीर्ष नेतृत्व के खात्मे और उसकी एटमी तथा मिसाइल क्षमता नष्ट करने की कोशिश में जुटी थीं. लेकिन अब इस युद्ध के कई अन्य देशों को अपनी चपेट में लेने के अलावा एक भीषण इलाकाई जंग बनने का अंदेशा बढ़ रहा है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था को पहले ही भारी झटका लग चुका है; विकास दर धीमी पड़ चुकी है और महंगाई आसमान छू रही है. कुल मिलाकर मौजूदा हालात ने छह साल पहले कोविड-19 महामारी की वजह से अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने की यादें ताजा करा दी हैं.

रूस-यूक्रेन के बीच संघर्ष के उलट भारत को ईरान युद्ध का बुरा असर पहले से ही झेलना पड़ रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हम अपने कच्चे तेल का करीब 85 फीसद हिस्सा आयात करते हैं, जिसमें से 55-60 फीसद तेल खाड़ी देशों से आता है. आपूर्ति का 40 फीसद से ज्यादा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो इस जंग का प्रमुख अखाड़ा बना हुआ है.

भारत की निर्भरता सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं, हम 60 फीसद एलपीजी आयात करते हैं; और हमारे एलएनजी आयात का करीब आधा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ऊर्जा के अलावा, खाड़ी क्षेत्र भारत के विदेशी भुगतान संतुलन के लिए भी बहुत अहम हैं. इस क्षेत्र में एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, जो हर साल करीब 50 अरब डॉलर (4.67 लाख करोड़ रुपए) भारत भेजते हैं.

ये एनआरआइ की तरफ से भेजी जाने वाली कुल रकम का करीब एक-तिहाई हिस्सा है. व्यापारिक संबंध भी खासे मजबूत हैं; भारत अपना करीब 15-17 फीसद निर्यात इसी क्षेत्र में करता है. साथ ही, इससे हमें खाद और पेट्रोकेमिकल्स जैसी जरूरी चीजें भी उपलब्ध होती हैं, जो सीधे तौर पर हमारे कृषि और उद्योग जगत के लिए काफी मायने रखती हैं.

ईरान में संघर्ष इन सभी चीजों को एक साथ प्रभावित कर रहा है. कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल में करीब 12-15 अरब डॉलर का इजाफा कर देती है, जिससे महंगाई, रुपए की कीमत और चालू खाता घाटा बढ़ता है.

इसका खराब असर पहले से ही कई प्रमुख सेक्टरों में नजर आने लगा है. व्यापक स्तर पर देखें तो ऊर्जा की कीमतें और महंगाई का बोझ बढ़ने से आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ने का अंदेशा है. जमीनी स्तर पर एलपीजी की कमी और ईंधन की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी सीधे आम घरों का बजट बिगाड़ रही है.

मोदी सरकार ने फौरन दखल देते हुए व्यवसायों के बजाए आम घरों को एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति पक्की की. खाने-पीने की छोटी-मोटी जगहों और रेस्तरांओं के बंद होने का खतरा मंडरा रहा है, और खाना पकाने के लिए इसी ईंधन पर निर्भर परिवारों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

इस बीच, निर्यात पर भी बुरा असर पड़ रहा है. क्रिसिल रेटिंग ने 40 बड़ी सिरेमिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों—जिनकी उद्योग की कुल कमाई में एक चौथाई हिस्सेदारी है—के विश्लेषण में पाया कि होर्मुज का रास्ता बंद होने के कारण निर्यात से होने वाली कमाई 6-7 फीसद (करीब 1,300 करोड़ रुपए) घट सकती है. भारत के प्लास्टिक निर्यात का कुल मूल्य 13 अरब डॉलर (1.21 लाख करोड़ रुपए) है. लेकिन कंटेनरों की कमी और माल ढुलाई की बढ़ती लागत के कारण यह निर्यात बाधित हो गया है.

खेती-बाड़ी भी बड़े संकट का सामना कर रही है. खाड़ी देशों से खाद की सप्लाइ पर बहुत ज्यादा निर्भरता की वजह से इसमें किसी भी तरह की बाधा आगामी खरीफ फसल पर बुरा असर डाल सकती है, जिससे खाने-पीने की चीजों की महंगाई और बढ़ सकती है.

वित्तीय बाजार में भी काफी उतार-चढ़ाव दिखाई दे रहा है; निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा है और जंग शुरू होने के महज तीन हफ्तों के भीतर निवेशकों की 48 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा यानी करीब 10 फीसद संपत्ति डूब गई है. गोल्डमैन सैक्स ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अपने पहले के अनुमान 6.5 फीसद को घटाकर 5.9 फीसद कर दिया है.

हालांकि, मोदी सरकार ने तत्परता के साथ सिर्फ प्रतिक्रिया देने वाले उपायों से आगे बढ़कर एक व्यवस्थित संकट प्रबंधन की पहल की है. कोविड संकट से सीख लेते हुए ईंधन की सप्लाइ पर नजर रखने, कीमतों को स्थिर करने और जहां संभव हो, वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति पक्की करने के लिए उच्च-स्तरीय अंतर-मंत्रालयी समूह और निगरानी तंत्र सक्रिय किया गया है.

उर्वरक-एलपीजी जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देने, रणनीतिक भंडारों का प्रबंधन करने और कमजोर उपभोक्ताओं को राहत देने के साथ-साथ सप्लाइ रूट्स को खुला रखने के लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास भी किए जा रहे हैं. कुल मिलाकर ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्थिरता—तीनों को एक साथ प्रभावित करने वाले इस संकट का प्रबंधन एक बेहद मुश्किल भरा काम साबित होने वाला है.

आगे के पन्नों में हम इस संकट के प्रभावों के पूरे दायरे को विस्तार से समझेंगे, अब तक उठाए गए कदमों का आकलन करेंगे, और यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि जिस वैश्विक संकट का सामना आज दुनिया कर रही है, उससे निबटने के लिए भारत को और क्या-कुछ करने की जरूरत है.

ईरान युद्ध से पैदा हुए संकट से निबटने के लिए मोदी सरकार ने तत्परता के साथ फौरी प्रतिक्रिया वाले उपायों से आगे बढ़कर एक संगठित और व्यवस्थित संकट प्रबंधन की दिशा में पहल की है.

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