
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 फरवरी की शाम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन किया, तो यह शायद उनकी सबसे अहम विदेश और आर्थिक नीति से जुड़ी बातचीत थी. यह बेहद सोच-समझकर तैयार की गई रणनीति का आखिरी कदम था, जो कुछ वैसा ही बड़ा आर्थिक दांव था जैसा 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के जरिए खेला था.
पिछले कई महीनों से मोदी इसका रास्ता तैयार कर रहे थे, ताकि आजादी के बाद देश की सबसे बड़ी वैश्विक व्यापार पहल को अंजाम दिया जा सके. इसका नतीजा यह होना था कि भारत उन देशों के साथ व्यापार करार पर दस्तखत करे जिनकी कुल जीडीपी 600 खरब डॉलर (5,440 लाख करोड़ रु.) है, यानी दुनिया की करीब आधी अर्थव्यवस्था. ये बड़े समझौते एक नई व्यापार सोच को साफ करते हैं.
अब भारत खुलापन और संरक्षणवाद के बीच झूल नहीं रहा. वह साफ तौर पर दुनिया की सबसे मजबूत और सख्त अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुकाबले और साझेदारी के लिए खुद को तैयार कर रहा है. दशकों तक बड़ा घरेलू बाजार होने की वजह से भारतीय उद्योग भीतर ही भीतर सुरक्षित और सहज बना रहा. लेकिन अब, जैसा एक विशेषज्ञ ने कहा, भारत के ग्रोथ मॉडल को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है, ताकि उसके केंद्र में मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और वैश्विक जुड़ाव हों.
ट्रंप को किया गया मोदी का फोन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ एक संतुलित और फायदेमंद समझौता पक्का करने के लिए था, जिसकी जीडीपी अकेले 300 खरब डॉलर (2,720 लाख करोड़ रु.) है. तब तक भारत-अमेरिका रिश्तों में उतार-चढ़ाव का दौर चल रहा था, जिसमें गिरावट ज्यादा दिख रही थी. ट्रंप ने पिछले साल अगस्त से अमेरिका में भारतीय आयात पर 50 फीसद टैरिफ लगा दिया था, जो ब्राजील के साथ सबसे ज्यादा दर थी. इससे रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा, हालांकि दोनों नेता सार्वजनिक तौर पर खुद को अच्छा दोस्त बताते रहे.
प्रधानमंत्री की मजबूरियां
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है. ऐसे में भारी टैरिफ ने खासकर टेक्सटाइल, रत्न तथा जवाहरात और चमड़ा जैसे श्रम-आधारित सेक्टरों में भारतीय निर्यातकों पर असर डालना शुरू कर दिया था. ये हालात लंबे समय तक बने रहते, तो भारत की तेज आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लग सकता था और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ने का खतरा था. अमेरिका से टैरिफ कम करवाना प्रधानमंत्री के लिए मजबूरी बन गया था, लेकिन अमेरिका के साथ संतुलित और फायदेमंद समझौता नहीं हो पाता, तो उसके राजनैतिक नतीजे भी बेहद गंभीर हो सकते थे.
अब वक्त आ गया था कि मोदी दो बड़े दांव चलें, जिन पर कुछ समय से काम चल रहा था. पहला कदम था भारतीय वार्ताकारों को 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ मुक्त व्यापार संधि (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट या एफटीए) पर दस्तखत करने की मंजूरी देना. यूरोपीय संघ की कुल जीडीपी 200 खरब डॉलर (1,810 लाख करोड़ रु.) है और वह चीन से मामूली अंतर से पीछे, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.
भारत के लिए ईयू सबसे बड़ा माल व्यापार साझेदार है और भारत के कुल वाणिज्यिक निर्यात का 11 फीसद हिस्सा वहीं जाता है. इसके उलट, ईयू के कुल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2.4 फीसद है और वह उसके नौवें नंबर का व्यापार साझेदार है. लिहाजा, इस रिश्ते को और बड़ा करने की संभावनाएं बहुत ज्यादा थीं.

मोदी और उनकी टीम ने अतीत की गलतियों से सबक लिया था. उसी अनुभव ने उन्हें अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों के साथ समझौते करने की समझ और तैयारी दी. जैसा कि केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इंडिया टुडे से कहा, ''हमने बातचीत में साफ और सीधी बात करने का तरीका अपनाया और निष्पक्ष समझौतों पर जोर दिया, ताकि सामने वाले समझें कि भारत भरोसेमंद साझेदार है जो भविष्य में उनकी अर्थव्यवस्था को भी आगे बढ़ाएगा. हमारा मकसद आसान मौकों को पकड़ना था न कि परफेक्ट के चक्कर में अच्छे मौके गंवाना. हमने उनकी और उन्होंने हमारी संवेदनशीलताओं का सम्मान किया.’’ (देखें, बातचीत)
यह मोदी के पहले कार्यकाल की असमान और हिचकिचाहट भरी व्यापार नीति से एक बड़ा बदलाव था, जब सरकार एफटीए को लेकर काफी संदेह में रहती थी. 2019 में भारत ने 15 देशों के रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) की बातचीत से खुद को अलग कर लिया था. सरकार डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर खोलने को लेकर सतर्क थी और खासकर चीन से आयात बढ़ने की आशंका थी. आर्थिक रूप से यह संकेत था कि भारत अभी ऐसे बड़े समझौते के लिए तैयार नहीं है, जहां उसकी पकड़ सीमित हो. फिर कोविड आया, सप्लाइ चेन में झटके लगे और दुनिया भरोसेमंद साझेदारों के आधार पर खुद को नए सिरे से संगठित करने लगी.
रुख में बदलाव
भारत ने 2020 के बाद के वर्षों में निर्यात बढ़ाने की दिशा में तेज मोड़ लिया. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि अर्थव्यवस्था के अहम इंजन माने जाने वाले निर्यात, खासकर सामान के निर्यात, ठहराव का शिकार होने लगे थे. सेवाओं का निर्यात जरूर तेजी से बढ़ा और वैश्विक सफलता की कहानी बना, लेकिन उसने माल निर्यात की कमजोरी को ढक दिया.
कुल मिलाकर निर्यात भारत की जीडीपी का करीब 21 फीसद है, लेकिन वैश्विक निर्यात का महज 2.5 फीसद ही है, जबकि चीन में यह आंकड़ा 15 फीसद तक पहुंचता है. भारत की विकास दर अब काफी हद तक सरकारी पूंजीगत खर्च और सार्वजनिक खपत पर टिकी है. निजी निवेश और निर्यात दोनों ही अपना बोझ नहीं उठा पा रहे. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का जीडीपी में हिस्सा 17 फीसद ही रहा है, जबकि मोदी सरकार ने एक दशक पहले इसे 25 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य रखा था.
देर से ही सही, लेकिन यह साफ हो गया कि निर्यात में प्रतिस्पर्धा के बिना मैन्युफैक्चरिंग की बढ़त टिकाऊ नहीं हो सकती. बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने, वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ने और बाहरी जोखिम कम करने के लिए भारत को दुनिया के बाजार में पहले से कहीं ज्यादा बेचना होगा. यह भी समझ बढ़ी कि कुछ गिने-चुने बाजारों पर ज्यादा निर्भर रहना रणनीतिक जोखिम है.
एक और सबक यह था कि घरेलू स्तर पर संरक्षणवाद से अपने आप प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ती. ऊंचे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं के बावजूद, खासकर चीन पर भारत की आयात निर्भरता बढ़ती रही. नीति बनाने वालों को यह भी एहसास हुआ कि जब वैश्विक पूंजी और सप्लाइ चेन विकल्प तलाश रही हैं, भारत तभी स्वाभाविक चीन+1 विकल्प बन सकता है जब वह वैश्विक वैल्यू चेन में जुड़े.
एफटीए की बौछार
इसलिए, सरकार ने तेजी से कई व्यापार समझौतों पर बातचीत शुरू की और उन पर दस्तखत भी किए. हाल के वर्षों में भारत ने मॉरिशस (2021), यूएई (2022), ऑस्ट्रेलिया (2022) और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (ईएफटीए) (2024) के साथ समझौते किए. पिछले ही साल भारत ने ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ तीन बड़े व्यापार समझौतों पर दस्तखत किए. इस दौर की खासियत सिर्फ रफ्तार नहीं है, बल्कि तरीका भी है. बातचीत के लिए साफ सिद्धांत और कुछ स्पष्ट रेड लाइन पहले से तय कर ली गईं.
इनमें एक अहम फैसला यह था कि भारत 'बेहतरीन’ देशों के साथ समझौते करे—ऐसे विकसित देश जिनसे सीधी टक्कर नहीं है और जिनके साथ पूरक साझेदारी बन सकती है. गोयल कहते हैं, ''कांग्रेस और मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने एक बुनियादी गलती की थी. उन्होंने फ्री ट्रेड डील ऐसे देशों के साथ की जो ज्यादातर हमारे प्रतिस्पर्धी थे, यानी विकासशील या कम विकसित देश. जापान और कोरिया को छोड़कर वे विकसित देशों से बात करने का भरोसा नहीं जुटा पाए.’’ जापान और कोरिया के साथ हुए समझौतों में भी भारत को बाद में व्यापार घाटे का सामना करना पड़ा. अब मोदी सरकार उन समझौतों की फिर से समीक्षा और दोबारा बातचीत की प्रक्रिया में है.
भारत ने यह भी तय किया कि वह बड़े बहुपक्षीय ब्लॉक में शामिल होने के बजाए द्विपक्षीय समझौतों को तरजीह देगा, ताकि उसके पास ज्यादा मोलभाव की ताकत रहे. आरसीईपी जैसे बड़े समूह में शामिल होने से कई संवेदनशील क्षेत्रों को जोखिम हो सकता था. द्विपक्षीय समझौतों में भारत अपने संवेदनशील सेक्टरों की बेहतर सुरक्षा कर सकता है, उदारीकरण की रफ्तार खुद तय कर सकता है और शर्तों को ज्यादा सटीक ढंग से आकार दे सकता है.
वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि उन्हें साफ निर्देश था कि ''खुलना है, लेकिन धीरे और समझदारी से, बिना लापरवाही के.’’ टैरिफ कटौती चरणों में की गई, जहां जरूरत थी वहां कोटा लगाया गया और जिन उत्पादों को बाहर रखना था, उन्हें साफ तौर पर अलग रखा गया. जैसे ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के समझौतों में सिर्फ महंगी और प्रीमियम वाइन और शराब पर ड्यूटी कम की गई ताकि घरेलू शराब कंपनियों पर असर न पड़े.

यह संतुलित तरीका खास तौर पर कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अहम था. भारत ने यूरोपीय संघ को समझाकर डेयरी समेत कई कृषि उत्पादों को समझौते से बाहर रखा. ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी भारत ने चरणबद्ध तरीका अपनाया. सिर्फ महंगी और हाइ-एंड गाड़ियों को सीमित तौर पर आयात की इजाजत दी गई, ताकि घरेलू कंपनियों को नुक्सान न हो. इसके अलावा मंत्रालय ने सभी बड़े सेक्टरों के साथ लंबी बातचीत की, ताकि उनकी चिंताओं को समझकर समाधान निकाला जा सके.
इस तरह के चरणबद्ध कदम का मकसद उद्योग को बदलाव के लिए समय देना और राजनैतिक विरोध को कम करना था. यहां तक कि स्वदेशी जागरण मंच ने भी इन समझौतों का विरोध नहीं किया, जो संघ परिवार से जुड़ा है और आत्मनिर्भरता का जोरदार समर्थक माना जाता है. उसके संयोजक अश्वनी महाजन ने कहा, ''हम दुनिया से अपने दरवाजे बंद करने के पक्ष में नहीं हैं. लेकिन दूसरों से व्यवहार करते समय वे हम पर शर्तें न थोपें. हमने ये समझौते बराबरी के आधार पर किए हैं.’’
करार की कला
साल भर से अमेरिका के टैरिफ को लेकर अनिश्चितता ने खास तौर पर श्रम-आधारित सेक्टरों पर दबाव डाला. यूरोपीय संघ में उसका संतुलन मिला. उसके पास बड़ा बाजार है और आयात की भारी मांग है, लेकिन वहां भारत की हिस्सेदारी अभी भी कम है. यूरोपीय संघ के साथ समझौता होने का पहला संकेत तब मिला जब यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और ईयू काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा को भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया.
परेड के अगले दिन मोदी और दोनों नेताओं की मौजूदगी में भारतीय और ईयू अधिकारियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता होता, लेकिन एक हफ्ते बाद अमेरिका के साथ हुए समझौते ने इसे पीछे छोड़ दिया. ईयू के साथ समझौते के तहत भारत को यूरोपीय बाजार में 97 फीसद टैरिफ लाइनों पर विशेष पहुंच मिली, जो कुल व्यापार मूल्य के 99.5 फीसद को कवर करती है. उसमें 70.4 फीसद टैरिफ लाइनें शामिल हैं, जो भारत के 90.7 फीसद निर्यात को कवर करती हैं, जहां श्रम-आधारित अहम सेक्टरों के लिए तुरंत ड्यूटी खत्म कर दी गई.
महत्वपूर्ण बात यह थी कि भारत चाहता था कि अमेरिका से समझौता करने से पहले ईयू के साथ एफटीए पक्का हो जाए ताकि यूरोप वही शर्तें न मांगे जो अमेरिका से तय हों. साथ ही जब मोदी ने ट्रंप से बात की, तब उनके पास ईयू समझौते का उदाहरण था, जिससे दिखाया जा सके कि भारत अमेरिकी व्यापार पर अपनी निर्भरता कम करना शुरू कर चुका है. हाल ही में भारत दौरे पर आए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की गर्मजोशी और महीनों की तनातनी के बाद भारत-चीन रिश्तों में आई नरमी भी संकेत थे कि भारत के पास अमेरिका के अलावा भी विकल्प हैं. इससे भारत की मोलभाव की ताकत और मजबूत हुई.
अमेरिकियों के लिए ट्रंप के करीबी सहयोगी सर्जियो गोर की भारत में राजदूत के तौर पर नियुक्ति रंग लाने लगी. गोर की ट्रंप तक सीधी पहुंच है और ट्रंप प्रशासन में व्यापक संपर्क हैं. उन्होंने अलग-अलग विभागों के जटिल तंत्र में तालमेल बैठाकर अंतरिम व्यापार समझौते की जमीन तैयार की. इसका अंतिम पड़ाव मोदी और ट्रंप के बीच 40 मिनट की फोन बातचीत रही, जिसमें दोनों ने मतभेद सुलझाए और डील पक्की कर ली. उसके तुरंत बाद ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर बताया कि वे भारत पर टैरिफ 50 फीसद से घटाकर 18 फीसद कर रहे हैं और भारत ने रूसी तेल की खरीद घटाने का वादा किया है.
गोयल के मुताबिक, ये लगातार बड़े समझौते दिखाते हैं कि ''भारत छाया से बाहर निकल आया है. आज भारत बेहद आत्मविश्वासी देश है. वह विकसित देशों से बराबरी के साथ बातचीत करता है.’’ उनके नजरिए में एफटीए सिर्फ टैरिफ पर सौदेबाजी नहीं हैं बल्कि भारत की भविष्य की दिशा तय करने का औजार हैं.
वे उन्हें भारत की बड़ी यात्रा से जोड़ते हैं—करीब 40 खरब डॉलर (362 लाख करोड़ रु.) की अर्थव्यवस्था से 300 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने तक, 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर. गोयल इसे ''30-30-30 की ताकत’’ कहते हैं, 300 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था, जिसे 30 साल तक 30 साल से कम उम्र की आबादी का जनसांख्यिकीय लाभ सहारा देगा. और यह सब एक ऐसे नेतृत्व के तहत जो जोखिम लेने को तैयार है.
यूरोप और अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी इसी नए और साहसी व्यापार नजरिए की सबसे साफ झलक है. ये आसान साझेदार बिल्कुल नहीं हैं. इन बाजारों में टैरिफ तो सिर्फ शुरुआत है. असली कसौटी है मानकों का पालन, टिकाऊपन के नियम और क्वालिटी के सख्त पैमाने. यूरोप के लिए भारत के साथ समझौते की अहमियत सिर्फ बाजार के आकार में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि यह भारतीय निर्यातकों को किस तरह की चुनौती देता है.
यूरोपीय संघ तक विशेष पहुंच इसलिए कीमती है क्योंकि वहां मानक बेहद कड़े हैं. फूड सेफ्टी, ट्रेसबिलिटी, पर्यावरण नियम और प्रोडक्ट क्वालिटी तय करेंगे कि भारतीय सामान वहां कितनी मजबूती से जगह बना पाता है. इस तरह यह समझौता देश के भीतर सुधार और अपग्रेड का दबाव भी बनाता है.
अमेरिका के साथ समझौता थोड़ी अलग हकीकत दिखाता है. यहां ताकत की राजनीति भी साफ नजर आती है. यह भारतीय निर्यातकों पर लटकी भारी टैरिफ की तलवार हटाता है और कारोबार में भरोसा लौटाता है. लेकिन यह भी दिखाता है कि अनिश्चित दुनिया में बातचीत करते समय कुछ समझौते करने पड़ते हैं. आलोचकों ने सवाल उठाया है कि भारत ने स्थायी टैरिफ रियायतें दीं जबकि अमेरिका की रियायतें शर्तों वाली और पलट सकने वाली हैं.
इस पर गोयल कहते हैं कि पूरी प्रक्रिया सोच-समझकर और संतुलित तरीके से की गई है. वे कहते हैं, ''हमारी अमेरिका के साथ समझदारी बनी कि अगर हर किसी के लिए बराबरी का टैरिफ हटाया जाता है, तो हमारे पास भी अपनी छूट पर विचार करने का मौका होगा. इसलिए काफी सोचा-समझा और संतुलित रिश्ता है.’’
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर अमित बत्रा कहते हैं, ''ब्रिटेन और ईयू के साथ व्यापार समझौते बेहद सकारात्मक कदम हैं और उपलब्ध जानकारी से लगता है कि ये दो दशक पहले हुए समझौतों की तुलना में कहीं ज्यादा गहरे और व्यापक हैं. अमेरिकी करार के पूरे ब्यौरे अभी नहीं आए हैं, लेकिन यह व्यापार उदारीकरण की दिशा में पहल का संकेत है.’’
फिर भी, अमेरिकी करार विवाद लेकर आया है. सबसे बड़ा सवाल उस कथित इरादे को लेकर है कि भारत अगले पांच साल में अमेरिका से 500 अरब डॉलर (45.3 लाख करोड़ रु.) का सामान खरीदेगा, जबकि अभी अमेरिका से आयात करीब 46 अरब डॉलर (4.2 लाख करोड़ रु.) का है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि इस लक्ष्य के लिए भारत को अमेरिका से आयात तीन गुना करना पड़ेगा और उन्होंने मोदी सरकार पर अमेरिका के आगे 'सरेंडर’ करने का आरोप लगाया.
लेकिन गोयल इस आंकड़े को सोचा-समझा और व्यावहारिक बताते हैं. वे कहते हैं, ''हमने बहुत सोच-समझकर विश्लेषण किया है. आज भी हम ऐसे ही उत्पाद दुनिया भर से करीब 300 अरब डॉलर (27.2 लाख करोड़ रु.) के आयात करते हैं और हमारी जरूरत तेजी से बढ़ रही है.’’ वे बताते हैं कि भारत को ऊर्जा उत्पाद, आइसीटी हार्डवेयर, हाइ-टेक सेमीकंडक्टर चिप, कोयला, विमान और कीमती धातुओं की बड़ी मात्रा में जरूरत है. वे कहते हैं, ''अगले पांच साल में हमें ऐसे उत्पादों के करीब 20 खरब डॉलर (181.3 लाख करोड़ रु.) के आयात की जरूरत पड़ेगी.’’
दूसरी चिंताएं
अनिश्चितता कृषि को लेकर भारी है. भारत के कृषि बाजार को खोलने की राजनीति बेहद संवेदनशील है. मोदी सरकार कह चुकी है कि अनाज और दूसरे संवेदनशील कृषि क्षेत्र किसी भी समझौते से बाहर हैं. लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिम दस्तावेज में यह नहीं बताया गया है कि किन चीजों को बाहर रखा गया है. अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते की पूरी जानकारी शायद मार्च के मध्य तक ही सामने आएगी.
इन दोनों समझौतों में भारत के सामने और भी जोखिम हैं. आज का वैश्विक व्यापार सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है. असली चुनौती मानक, सर्टिफिकेशन, प्रोडक्ट क्वालिटी, जलवायु से जुड़े नियम और कंपनियों की क्षमता है कि वे लागत, नियमों के पालन और रफ्तार के मामले में कितना टिक पाती हैं. खासकर छोटी और मझोली कंपनियों के लिए यह आसान नहीं है.
व्यापार विशेषज्ञ बिस्वजीत धर कहते हैं, ''दुर्भाग्य से कई नीति-निर्माता अब भी यह नहीं समझते कि टैरिफ से आगे भी दुनिया है, जहां विकसित देशों ने कई तरह की रुकावटें खड़ी कर दी हैं. यूरोप ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएमएम) लागू किया है और पर्यावरण तथा स्वास्थ्य मानकों पर सख्ती से अमल कराता है.
हम अपने निर्यातकों को इन कड़े मानकों के लिए ठीक से तैयार ही नहीं करते.’’ भारत ऐसे जटिल समझौते कर ले और उन पर अमल की क्षमता न बना पाए, तो पहले जैसा एफटीए विरोध फिर सामने आ सकता है. आयात बढ़ सकते हैं, निर्यात सीमित रह सकता है और फिर राजनैतिक स्तर पर उन्हें ''अनुचित समझौते’’ कहकर घेरा जा सकता है.
कई भारतीय कंपनियां घरेलू बाजार पर ही निर्भर रहीं और वैश्विक मानकों के हिसाब से खुद को उतना तैयार नहीं किया. धर कहते हैं, ''औद्योगिक उन्नयन की जो सोच होती है—जैसे सही सेक्टर चुनना, प्रदर्शन के आधार पर दबाव बनाना या बड़े पैमाने पर उत्पादन की मांग करना—उसे भारत में शायद ही कभी अनुशासन के साथ लागू किया गया. अब यह करना ही होगा.’’ इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को कारोबार करना आसान बनाना होगा, चाहे लॉजिस्टिक की लागत कम करना हो, जरूरी कच्चे माल पर ड्यूटी घटानी हो या नियमों की भीड़ को कम करना हो—इन सब पर ठोस कदम उठाने होंगे.
एक और बड़ी कमजोरी है नवाचार. धर का कहना है कि कोई भी मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति लगातार आरऐंडडी, नई टेक्नोलॉजी और उत्पादकता में निवेश किए बिना नहीं बन सकती. भारत में आरऐंडडी पर कुल खर्च जीडीपी का 0.6 फीसद है, जबकि चीन में 2.5 फीसद और अमेरिका में 4 फीसद है.
खुलने का मतलब सिर्फ विदेशी करार नहीं है, बल्कि देश में अमल करना भी है. मौका ऐतिहासिक है. अगर मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और वैश्विक वैल्यू चेन में जुड़ाव मजबूत हो, तो इसका असर 1991 के आर्थिक सुधारों जितना बड़ा हो सकता है.
ये बड़े सौदे भारत के नए सिद्धांत का संकेत: सबसे अधिक मांग वाली अर्थव्यवस्थाओं से प्रतिस्पर्धा भी और उनका साथ भी भारत ने माना कि निर्यात के बिना मैन्युफैन्न्चरिंग की वृद्धि टिकाऊ नहीं. रोजगार व मूल्य शृंखला में आगे बढ़ने के लिए कहीं अधिक बेचना होगा दुनिया को
मौजूदा दौर की बातचीत में कायदों का एक स्पष्ट लेखाजोखा नजर आता है: विकसित देशों से जुड़ना जिनसे हमारी सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि जिनके साथ पूरक साझेदारी की संभावना है. ईयू में पहुंच में वरीयता मिलना इसलिए बहुत अहम है कि उसके मानक कड़े हैं. एफटीए घरेलू उद्योग को अपग्रेड होने के लिए प्रेरित कर सकता है.

