बजट 2026 एक रणनीतिक कमजोरी को पाटने की कोशिश करता है. भारत अपनी दुर्लभ मृदा या रेयर अर्थ सप्लाइ के लिए विदेश पर निर्भर है. अप्रैल 2025 में इसका असर तब दिखा, जब देश की ऑटोमोबाइल कंपनियां अचानक संकट में फंस गईं. वजह: रेयर अर्थ मैग्नेट्स की कमी. ये इलेक्ट्रिक और पारंपरिक, दोनों तरह की गाड़ियों में इस्तेमाल होते हैं. यह झटका चीन से आया. अमेरिका के साथ बढ़ते ट्रेड टकराव के बीच बीजिंग ने अचानक रेयर अर्थ मैग्नेट्स के निर्यात पर ब्रेक लगा दिया.
इस निर्भरता को घटाने के लिए बजट ने पिछले साल शुरू की गई नीतियों को आगे बढ़ाया है. केंद्र सरकार ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे खनिज संपन्न राज्यों को सपोर्ट देने का प्रस्ताव रखा है ताकि वहां डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर विकसित किए जा सकें. कॉरिडोर में माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को जोड़ा जाएगा.
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स (आरईपीएम)साधारण इंडस्ट्रियल मैग्नेट्स के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकतवर होते हैं. मोटर, स्टीयरिंग सिस्टम, ब्रेक्स और ऑडियो इक्विपमेंट से लेकर हाइ-टेक और कंज्यूमर प्रोडक्ट्स तक, आधुनिक ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की रीढ़ यही हैं. वित्त वर्ष 25 में भारत ने 53,748 टन रेयर अर्थ मैग्नेट्स इंपोर्ट किए.
रेयर अर्थ मिनरल्स एक जगह सघन मात्रा में नहीं मिलते, इसलिए इनका उत्खनन मुश्किल और महंगा होता है. चीन हर साल करीब 1.4 लाख टन रेयर अर्थ मेटल्स बनाता है. जबकि अमेरिका 38,000 टन के साथ दूसरे नंबर पर है. सरकारी कंपनी आइआरईएल (इंडिया) लि. के जरिए देश की रेयर अर्थ ऑक्साइड क्षमता सिर्फ 5,000 टन से थोड़ी ज्यादा है.
अप्रैल 2025 में शुरू हुई नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत भारतीय भू सर्वेक्षण को 2031 तक 1,200 एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी दी गई है. नवंबर में घोषित 7,280 करोड़ रुपए की एक स्कीम का मकसद सालाना 6,000 टन की इंटीग्रेटेड आरईपीएम मैन्युफैक्चरिंग क्षमता खड़ी करना है.
जानकार मानते हैं कि अगर भारत को घरेलू जरूरतों का एक हिस्सा पूरा करना है, तो रिफाइनिंग कैपेसिटी बड़े पैमाने पर बढ़ानी होगी. प्रस्तावित कॉरिडोर इसमें मदद कर सकते हैं, क्योंकि इससे प्रोसेसिंग यूनिट्स को जमीन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंस तक बेहतर पहुंच मिलेगी.

