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तेज रफ्तार के अनेक उपाय

तेज रफ्तार रेल, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और जलमार्गों के एकीकृत नेटवर्क से लागत घटेगी, आवाजाही सुधरेगी और क्षेत्रीय विकास को रफ्तार मिलेगी.

Union Budget: mobility
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 मार्च , 2026

ऐसे वक्त में जब लॉजिस्टिक्स की ऊंची लागत भारत की प्रतिस्पर्धा पर बोझ बनी हुई है, बजट अपनी प्राथमिकताओं को लेकर बिल्कुल साफ है. मकसद है दूरी को आर्थिक तौर पर छोटा करना. इसके लिए यात्रियों और माल ढुलाई, दोनों के लिए हाइ-कैपेसिटी नेटवर्क साथ-साथ खड़े किए जा रहे हैं और रेल, सड़क व जलमार्गों को एक ही कनेक्टिविटी ग्रिड में जोड़ा जा रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इन्हें ''ग्रोथ कनेक्टर्स’’ कहा है.

इस विजन के केंद्र में तीन मेगा प्लान हैं. सात नए हाइ-स्पीड रेल कॉरिडोर, एक नया ईस्ट-वेस्ट डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और 20 और नेशनल वॉटरवे. बजट में इनके लिए अलग रकम तो नहीं बताई गई है, लेकिन जानकारों के मुताबिक, अगले कुछ साल में इन पर करीब 16 लाख करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं.

करीब 4,000 किलोमीटर में फैले सात हाइ-स्पीड पैसेंजर कॉरिडोर बहुत बड़े हैं. उत्तर और पूर्व भारत में दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी कॉरिडोर से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के बीच एक नई आर्थिक रीढ़ तैयार हो जाने की उम्मीद है. सरकार मानती है कि इससे टूरिज्म, सर्विसेज और ट्रेड को मजबूती मिलेगी और रास्ते में आने वाले दूसरे शहरों भी फायदा होगा.

पश्चिम और दक्षिण भारत में उभरता हाइ-स्पीड रेल नेटवर्क मुंबई, पुणे, हैदराबाद, बेंगलूरू और चेन्नै को जोड़ते हुए देश के सबसे प्रोडक्टिव इंडस्ट्रियल और टेक बेल्ट में सफर का समय काफी घटा देगा. रेलवे का कहना है कि इन रूट्स पर यात्रा समय में भारी कटौती होगी. मसलन, दिल्ली से वाराणसी का सफर मौजूदा 8-10 घंटे से घटकर करीब 3.5 घंटे का रह सकता है.

2026-27 के लिए तय 12.2 लाख करोड़ रुपए के पूंजी खर्च के लक्ष्य में से लगभग आधा हिस्सा ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर जाएगा. अधिकारियों का कहना है कि हाइ-स्पीड रेल का अगला फेज काफी हद तक देसी तकनीक पर आधारित होगा. इंडस्ट्री में इसे लेकर उत्साह है. रोलिंग स्टॉक बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनी एल्स्टॉम इंडिया के एमडी ओलिवियर इवॉसां कहते हैं, ''यह कदम मैन्युफैक्चरिंग, स्किलिंग और कुल मिलाकर कम्युनिटी इंपैक्ट में आधुनिकता लाने में मददगार होगा.’’ 

माल ढुलाई की रफ्तार बढ़ाने के लिए सरकार ईस्ट-वेस्ट डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का प्रस्ताव लेकर आई है, जो डानकुनि (पश्चिम बंगाल) से सूरत तक जाएगा और झारखंड, बिहार, ओडिशा व महाराष्ट्र से होकर गुजरेगा. पैसेंजर लाइनों से बल्क और कंटेनर ट्रैफिक को अलग करने से भीड़ घटेगी और औद्योगिक राज्यों के बीच सामान तेजी से पहुंचेगा.

पीआरसीएल के पूर्व एमडी और चार्टर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ लॉजिस्टिक्स ऐंड ट्रांसपोर्ट के सेक्रेटरी जनरल संजीव गर्ग कहते हैं, ''पूरब से कोयला, स्टील, लौह अयस्क, तैयार स्टील और अन्य बल्क कमोडिटीज पश्चिम के बंदरगाहों तक तेजी से पहुंचेंगी. हावड़ा-मुंबई फ्रेट कॉरिडोर की योजना पहले से मौजूद थी.’’

नदी परिवहन का दायरा भी बढ़ेगा. फिलहाल 111 नेशनल वॉटरवे चालू हैं और अगले पांच साल में 20 और जुड़ेंगे. जलमार्गों से फ्रेट मूवमेंट 2013-14 के 18.1 एमटी से बढ़कर 2024-25 में 145.5 एमटी पहुंच गया है. ऑपरेशनल लंबाई अब 5,155 किमी से ज्यादा है.

पारादीप पोर्ट अथॉरिटी के पूर्व चेयरमैन रिंकेश रॉय बताते हैं, ''महानदी सिस्टम पर नेशनल वॉटरवे-5 लंबे समय से प्लान में है. बड़ी चुनौती ब्राह्मणी नदी के 300 किमी हिस्से में पर्याप्त पानी बनाए रखना है.’’ इसके लिए डैम और बैराज जैसे लंबे समय वाले प्रोजेक्ट्स की जरूरत पड़ेगी.

महानदी कोलफील्ड्स का बड़ा कोयला हब तालचेर होने के कारण ढुलाई  के वास्ते रेलवे के लिए अतिरिक्त रास्ते जरूरी हैं. क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर आनंद कुलकर्णी के मुताबिक, ''वॉटरवेज से प्रति टन-किमी फ्रेट लागत रेलवे से 20 फीसद और सड़क से 60 फीसद सस्ती पड़ती है.’’

इन पहलों को एक साथ देखें तो यह लंबी अवधि का दांव है—बड़ा पैमाना, एकीकरण और कम प्रदूषणकारी ट्रांसपोर्ट. नतीजा होगा कम लॉजिस्टिक्स लागत, बेहतर मोबिलिटी और क्षेत्रीय विकास को नई रफ्तार.

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