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केमिस्ट्री सही करने का समय

केमिकल पार्क और कार्बन कैप्चर जैसे कदम उद्योग को एकीकृत और टिकाऊ बनाने के प्रयास तेजी से हो रहे हैं

Cover Story Union Budget: Chemical parks
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 मार्च , 2026

बजट 2026 देश की दीर्घकालिक औद्योगिक रणनीति में रसायन क्षेत्र को मजबूती देता है. उसमें फौरी प्रोत्साहन के बजाए ढांचागत सुधार को प्राथमिकता दी गई है. अल्पकालिक राहत देने के बजाए सरकार ने केमिकल पार्क के जरिए समूचे क्षेत्र के विकास पर जोर दिया है और उद्योग को टिकाऊ लक्ष्यों और ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव से जोड़ा है.

उसमें खाद और रसायन जैसे ज्यादा ऊर्जा खपत वाले क्षेत्र के लिए कार्बन कैप्चर या कार्बन उत्सर्जन घटाने की पहल भी शामिल है. क्षमता निर्माण के नजरिए से केमिकल पार्क  बनाना लंबे समय से उद्योग की मांग रही है. इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च की निदेशक खुशबू लखोटिया बताती हैं, ''रसायन क्षेत्र में सही इन्फ्रास्ट्रक्चर और सहयोगी उद्योगों के साथ समूचा माहौल मायने रखता है क्योंकि कई क्षेत्र आपस में गहराई से जुड़े होते हैं.’’

मसलन, कॉस्टिक सोडा प्लांट बतौर बाइ-प्रोडक्ट क्लोरीन बनाता है, सख्त निबटान नियमों के मद्देनजर, क्लोरीन का इस्तेमाल करने वाले उद्योग पास में ही होना चाहिए. चीन ने एकीकृत हब के जरिए रसायन क्षेत्र में दबदबा कायम किया है, जहां बड़े पैमाने पर उत्पादन, दक्षता और सब मिलकर लागत की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाते हैं. यह समग्र माहौल की एकजुटता की पहल भारत में अभी भी काफी हद तक गायब है, इसलिए बजट की यह घोषणा महत्वपूर्ण कदम है.

पिछले अनुभव सावधानी बरतने के लिए आगाह करते हैं. 2007 में गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में चार पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रो-रसायन निवेश क्षेत्रों (पीसीपीआइआर) को मंजूरी दी गई थी. गुजरात के दाहेज के अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर, माल ढुलाई और पर्यावरण मंजूरी के अभाव में कहीं भी बेहतर प्रदर्शन नहीं हो पाया है.

इसके मद्देनजर वित्त वर्ष 2026-27 में तीन डेडिकेटेड केमिकल पार्कों के लिए बजट में 600 करोड़ रुपए का आवंटन नए इरादे का संकेत देता है. लखोटिया कहती हैं, ''यह जरूरी कदम है, भले ही अगले एक-दो वर्षों में उसका फौरन असर न दिखे. यह लंबे समय में प्रतिस्पर्धा और क्षमता निर्माण का उपाय है.’’ जुलाई 2025 में नीति आयोग की रिपोर्ट 'रसायन उद्योग’ वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में देश की भागीदारी को बढ़ावा’’, इस ओर इशारा करती है. उसमें भारत की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी को 3.5 फीसद से बढ़ाकर 6 फीसद करने के लिए विश्व स्तरीय केमिकल हब बनाने की सिफारिश की गई है.

साथ ही एक और जरूरी घोषणा की गई है. बजट में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (सीसीयूएस) बढ़ाने के लिए पांच साल में 20,000 करोड़ रुपए के खर्च का प्रस्ताव किया गया है. यह कारखानों से निकलने वाले उत्सर्जन और कचरे को दोबारा इस्तेमाल या भूमिगत भंडारण का उपक्रम हो सकता है ताकि रसायन, स्टील, सीमेंट और बिजली जैसे क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम हो.

देश के निर्यात का 15-17 फीसद यूरोपीय संघ के देशों में होता है. वहां कड़े पर्यावरण मानक लागू हैं. इससे उसकी जरूरत और बढ़ जाती है. हालांकि यूरोपियन यूनियन का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी कार्बन-उत्सर्जन वाले उत्पादों पर टैरिफ के दायरे में अभी रसायन क्षेत्र नहीं आता है, लेकिन इसके बढ़ने की संभावना निर्यात के मामले में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए उत्सर्जन में कमी जरूरी बना देती है.

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