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इंडिगो विमान संकट के लिए आखिर कौन जिम्मेदार?

हजारों उड़ानें रद्द होने से लाखों मुसाफिरों पर आफत आ पड़ी थी.देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में फैली अव्यवस्था और अफरातफरी के लिए आखिर कौन जिम्मेदार?

cover story: aviation
5 दिसंबर को बेंगलूरू हवाई अड्डे पर अपना लगेज खोजते यात्री

चार दिसंबर को दोपहर का वक्त था, बेंगलूरू के केंपेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सब कुछ अस्त-व्यस्त हो चुका था. डिपार्चर बोर्ड रह-रहकर चमक रहे थे, फिर कुछ भी दिखना बंद हो गया. एअरलाइन काउंटर खाली पड़े थे, लोग हैरान-परेशान इधर-उधर भाग रहे थे.

टर्मिनल पर सैकड़ों बैग जहां-तहां बिखरे पड़े थे, लावारिस और किसी दावेदार के बिना. यह नजारा किसी हवाई अड्डे के लिए परेशान करने वाला ही होता, फिर यह तो देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में से एक की बात है.

42 वर्षीय एनिमेशन डिजाइनर रितुपर्णा सरकार इस अफरा-तफरी के बीच भ्रमित खड़ी थीं, उनके हाथ में टिकट था, जो उन्होंने हफ्ते भर पहले बुक किया था. उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय एनिमेशन फेस्टिवल में मुंबई जाना था, जिसका आयोजन खुद उन्होंने ही किया. वे आयोजन से एक दिन पहले पहुंचना चाहती थीं.

लेकिन हवाई अड्डे पर अराजकता फैल चुकी थी. वे कहती हैं, ''हालात रेलवे स्टेशन से भी बदतर थे. हर संभावित उड़ान का सामान वहीं पड़ा था. किसी को नहीं पता था कि वह किसका है. कोई भी देखने वाला नहीं था.’’ एअरलाइन कर्मचारी कोई जवाब नहीं दे रहे थे. रितुपर्णा 14 घंटे तक फंसी रहीं. उन्हें अपने गंतव्य के लिए उड़ान नहीं मिली.

दो दिन पहले भुवनेश्वर में बीसेक साल की उम्र के दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर संगम दास और मेधा क्षीरसागर हवाई अड्डे पर बैठे बार-बार घड़ी देख रहे थे. उन्हें उस रात कर्नाटक के हुबली में होने वाले अपनी शादी के रिसेप्शन में पहुंचना था, उनके इंडिगो विमान को सुबह ही उड़ान भरनी थी लेकिन लगातार 'लेट’ हो रही थी.

रिश्तेदारों के अलावा करीब 700 मेहमान रिसेप्शन स्थल पर उनका इंतजार कर रहे थे. आखिरकार, एअरलाइन ने घोषणा की कि उनकी उड़ान रद्द कर दी गई है. उसके बाद युवा जोड़ा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपने रिसेप्शन में शामिल हुआ.

पूर्वोत्तर में 50 वर्षीय स्कूल टीचर मंजुरी पालित 5 दिसंबर को गुवाहाटी एअरपोर्ट पर फंसी रहीं, उनके पति का शव कार्गो होल्ड में रखा था. उन्हें अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर को कोलकाता ले जाना था. अस्पताल की क्लीयरेंस से लेकर स्थानीय अधिकारियों की अनुमति तक सारी कागजी कार्रवाई पूरी करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी थी. लेकिन सुबह की उड़ान अटक गई. शव को सुरक्षित रखने के उपाय सिर्फ 48 घंटे तक ही कारगर रहते हैं. समय तेजी से बीतता जा रहा था.

सरकार, दास, क्षीरसागर और पालित, सबने उस एअरलाइन से यात्रा करना चुना था जिसे देश में सबसे भरोसेमंद माना जाता रहा है. आखिरकार, इंडिगो ने समय की पाबंदी को वादे और फिर ऐसे बड़े ब्रांड में तब्दील कर दिया था जिसने उसे 'भारत की पसंदीदा’ बना दिया. यह देश की सबसे बड़ी एअरलाइन भी बन गई, जिसका घरेलू उड़ानों के 60 फीसद से ज्यादा बाजार पर कब्जा रहा है.

मौजूदा संकट गहराने से पहले, यह 400 से ज्यादा विमानों का बेड़ा चलाती थी और रोजाना लगभग 2,300 उड़ानें भरती थी. 90 से ज्यादा घरेलू और करीब 45 अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों तक फैली इसकी उड़ान सेवाओं से हर रोज औसतन पांच लाख यात्री सफर करते थे. समय पर उड़ान भरना इंडिगो के लिए सिर्फ पैमाना नहीं बल्कि साख का हिस्सा रहा है.

लगभग दो दशकों तक उसने लोगों को घरेलू उड्डयन क्षेत्र में कुछ ऐसा अनुभव कराया, जिसे अमूमन दुर्लभ माना जाता रहा है—उम्मीद पर खरी, दक्षता और उचित किराया. एयरलाइन ने सुपर-कूल रुख दर्शाने के लिए उड़ान पहचान का अपना कोड '6ई’ (जो जल्दी में बोलने पर सेक्सी समझ आता है) रखा.

दिसंबर के पहले हफ्ते में उस ब्रांड इमेज को करारा झटका लगा. 4 से 6 दिसंबर के बीच सब कुछ बेपटरी हो गया जब अभूतपूर्व ढंग से 2,948 उड़ानें रद्द की गईं. 5 दिसंबर को ही 1,588 इंडिगो उड़ानें रद्द हुईं. हजारों यात्री लाउंज में फंसे रहे, जिससे एअरपोर्ट पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया. हवाई किराया आसमान छूने लगा, क्योंकि यात्रियों ने हड़बड़ी में दूसरी एअरलाइंस के टिकट खरीदे.

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने न सिर्फ बढ़ते विमान किराए पर नियंत्रण के लिए बल्कि लगातार गहराते संकट पर काबू पाने के लिए भी इंडिगो की कथित गैर-जिम्मेदारी और लापरवाही पर कड़ी कार्रवाई वाले कदम उठाए. मौजूदा संकट से पहले, इंडिगो का मार्केट कैप 25 अरब डॉलर (2.3 लाख करोड़ रुपए) था और वित्त वर्ष 25 में टैक्स के बाद भारी मुनाफा 7,258 करोड़ रुपए रहा था. तो फिर इंडिगो प्रबंधन ने इतनी बुरी तरह नियंत्रण कैसे खो दिया? पूरे मामले में इंडिगो को गड़बड़ी की जिम्मेदारी लेनी होगी लेकिन देश के डीजीसीए समेत उड्डयन नियामक भी इस सबके लिए कम जिम्मेदार नहीं है. वजहें ये हैं:

नियमों पर न चलना
असल समस्या एक तकनीकी नियम की शुरुआत से शुरू हुई जिसके बारे में अब तक कुछ ही यात्रियों ने सुना था—फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (एफडीटीएल). इससे तय होता है कि पायलट कितने समय तक काम कर सकते हैं, उन्हें कितना आराम मिलना चाहिए, और वे रात के समय में कितनी लैंडिंग कर सकते हैं. ये एअरलाइन सुरक्षा के अदृश्य ढांचे के तौर पर काम करते हैं, जिन्हें थकान दूर करने और सुरक्षा मानदंडों में सुधार के लिहाज से डिजाइन किया गया है.

वर्षों से भारतीय पायलट यूनियनें और सुरक्षा के पैरोकार तर्क देते रहे हैं कि देश के उड्डयन नियम पुराने हो चुके हैं और थकान से जुड़े नियम पायलट के जीवन के अधिकार से अलग नहीं किए जा सकते. यही नहीं, इस मामले में वे एअरलाइंस और डीजीसीए दोनों को कोर्ट तक भी खींच ले गए थे. लंबी वार्ता प्रक्रिया और अदालती दखल के बाद आखिरकार डीजीसीए ने नागरिक उड्डयन आवश्यकताओं के अनुभाग 7, शृंखला जे, भाग-3 (संशोधन 2) के अंतर्गत नियमों को नए सिरे से निर्धारित किया.

नए एफडीटीएल नियमों के तहत पायलटों के लिए साप्ताहिक विश्राम अवधि 36 घंटे से बढ़ाकर लगातार 48 घंटे कर दी गई. रात्रि उड़ान नियमों को और सख्त किया गया, जिसमें रात्रि ड्यूटी की परिभाषा को सुबह 5 बजे के बजाय मध्यरात्रि से सुबह 6 बजे तक विस्तारित किया गया. प्रति पायलट रात्रि में लैंडिंग की संख्या पहले छह की तुलना में घटाकर केवल दो कर दी गई. साथ ही, रात्रि पाली के अंतर्गत किसी भी पायलट को लगातार दो रातों से अधिक के लिए ड्यूटी पर नहीं लगाया जा सकता था. एअरलाइन संचालकों से पायलटों की थकान संबंधी त्रैमासिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की अपेक्षा भी की गई.

भारत के नए एफडीटीएल नियम अमेरिका के फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) और यूरोपियन यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (ईएएसए) के मानकों से भी ज्यादा सख्त हैं—रात्रिकालीन लैंडिंग हफ्ते में दो पर सीमित की गई है (एफएए-3, ईएएसए-2), हफ्ते की ड्यूटी अधिकतम 60 घंटे तक सीमित की गई है (एफएए-60, ईएएसए-60), और 48 घंटे हर हफ्ते आराम अनिवार्य किया गया है (एफएए-30, ईएएसए-36).

ये नियम पिछले भारतीय नियमों की तुलना में काफी सख्त है, रात्रिकालीन लैंडिंग को इस तरह सीमित किया गया है जैसा एफएए और ईएएसए भी नहीं करते. थकान से जुड़े विज्ञान और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के आधार पर नियामक ने इस साल दो चरणों में 22 खंड वाले नए एफडीटीएल को लागू करने का फैसला किया.

1 जुलाई को 15 आसान नियम लागू किए गए, जिसमें पायलटों के लिए अधिकतम दैनिक उड़ान समय को नौ घंटे से घटाकर आठ घंटे करना और अधिकतम दैनिक लैंडिंग की संख्या शामिल थी. दूसरा चरण 1 नवंबर को लागू हुआ, जब बाकी सात नियम लागू किए गए, जिसमें रात की ड्यूटी पर सख्त सीमाएं और अनिवार्य साप्ताहिक आराम के समय को 36 से बढ़ाकर 48 घंटे किया जाना शामिल था.

तलवार की धार पर उड़ान
अब ऐसा भी नहीं कि नए एफडीटीएल नियम अचानक आए हों. संशोधित नियम जनवरी 2024 में अधिसूचित किए जा चुके थे, जिससे एअरलाइंस को इसकी तैयारी के लिए करीब दो साल का समय मिला. पायलटों के हर महीने कम घंटे उड़ान भरने संबंधी नियम के मद्देनजर एअरलाइंस को उतनी ही संख्या में उड़ानें संचालित करने के लिए अधिक पायलटों की भर्ती की जरूरत थी.

अपने विमानों को अधिकतम घंटों तक हवा में रखने के लिए बहुत कम बजट पर काम करने पर गर्व करने वाली इंडिगो के लिए नए एफडीटीएल ने कई जटिलताएं खड़ी कर दीं.

उसका पूरा अर्थशास्त्र ऐसा था कि पायलटों के काम के घंटों में मामूली कमी के लिए भी बड़ी संख्या में भर्ती की जरूरत थी. दूसरी एअरलाइंस ने व्यवस्था बना ली. आलोचकों का तर्क है, इंडिगो ने ऐसा नहीं किया. एअर डेक्कन के संस्थापक तथा दो दशक पहले देश के उड्डयन क्षेत्र में तब्दीली लाने वाले कैप्टन जी.आर. गोपीनाथ कड़ा बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

उनके मुताबिक, इंडिगो सही समय पर पायलटों की भर्ती करने में नाकाम रही. उनके मुताबिक, इसे बस घमंड ही कहा जा सकता है. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''उन्हें लग रहा होगा कि इतने बड़े, दबदबे वाले हैं कि देरी करेंगे या आनाकानी करेंगे, तो डीजीसीए को झुकना पड़ेगा. उन्हें लगा कि नियम उन पर लागू नहीं होंगे.’’

नवंबर से पहले कुछ हफ्तों में जो हुआ, उसे लापरवाही से ज्यादा सोची-समझी साजिश कहा जा सकता है. जैसे-जैसे दूसरे चरण को लागू करने की समयसीमा नजदीक आ रही थी, डीजीसीए ने एअरलाइंस से तैयारियों की रिपोर्ट मांगनी शुरू कर दी. इसके अलावा, एअरलाइंस को सर्दी के दिनों की भी अपनी योजनाएं बतानी होती हैं. यह बताना होता है कि कोहरे वाले महीनों में संचालन का प्रबंध कैसे करेंगी, जब उत्तर भारत के कोहरे का असर पूरे नेटवर्क पर पड़ता है.

इंडिया टुडे को मिले रिकॉर्ड से पता चलता है कि तैयारियों का जायजा लेने के लिए अक्तूबर और नवंबर के बीच कम से कम चार बैठकें हुईं. 12 अक्तूबर को रेगुलेटर ने दूसरे चरण की तैयारियों और क्रू की उपलब्धता की समीक्षा की. 23 अक्तूबर को सर्दियों की योजना के साथ इन मुद्दों पर भी चर्चा हुई.

उसके बाद तिमाही संचालन तैयारियों की बैठक हुई. एक बार भी इंडिगो सहित किसी एअरलाइन ने पायलटों की कमी का कोई जिक्र नहीं किया. यही नहीं, 10 नवंबर को तो इंडिगो ने डीजीसीए को बाकायदा औपचारिक तौर पर आश्वस्त किया कि उसके पास पर्याप्त क्रू है. 13 नवंबर को कोहरे को लेकर की गई तैयारी बैठक भी बिना किसी तरह की चिंता जताए संपन्न हो गई.

सर्दियों को लेकर इंडिगो की योजना महत्वाकांक्षी थी. उसने 403 विमानों का इस्तेमाल करके नवंबर में 64,000 से ज्यादा उड़ानें भरने का इरादा जताया था, जो पिछली सर्दियों की तुलना में 10 फीसद ज्यादा है. कागज पर सब कुछ ठीक लग रहा था. सरकारी अधिकारी अब कह रहे हैं कि उन्हें गुमराह किया गया. उनमें से एक ने एअर इंडिया का जिक्र किया, जिसने थकान से जुड़े नियमों को समयसीमा से दो हफ्ते पहले ही लागू कर दिया था.

वे कहते हैं, इंडिगो ने ''हमें अंधेरे में रखा.’’ नवंबर के आखिरी हफ्ते में व्यवस्था चरमराने लगी. चक्रवात दित्वाह ने चेन्नै और दक्षिणी तट के कुछ हिस्सों में तबाही मचाई, जिससे विमान और क्रू फंस गए, जबकि उन्हें उस समय होना कहीं और चाहिए. 29 नवंबर को इंडिगो ने चेन्नै से अपने पूरे एटीआर फ्लीट नेटवर्क को ग्राउंड कर दिया, क्योंकि पायलटों की मौजूदगी की स्थिति पूरी तरह गड़बड़ा गई थी.

कुप्रबंधन का रोस्टर
महीने के अंत तक डीजीसीए के डेटा से पता चला कि इंडिगो ने नवंबर में 59,438 उड़ानें भरीं, और करीब 1,200 रद्द हुईं, जिनमें 750 एफडीटीएल और रोस्टर संबंधी कारणों से जुड़ी थीं. इंडिगो के 403 विमान उतारने की योजना के बजाए केवल 344 विमान ही उड़ान भर रहे थे. समय की पाबंदी का आंकड़ा अक्तूबर के 84 फीसद से गिरकर 67 फीसद पर पहुंच गया.

उड़ानों का संचालन अब भी हो रहा था लेकिन व्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी. दिसंबर की शुरुआत में पोल खुलने लगी. 1 दिसंबर को इंडिगो ने करीब 2,300 उड़ानें (घरेलू और अंतरराष्ट्रीय) भरीं और रद्द थोड़ी ही हुईं. 2 दिसंबर को रद्द घरेलू उड़ानों की संख्या 133 पर पहुंच गई. यही वह दिन था जब समस्या मौसम और योजना से हटकर उस सॉफ्टवेयर पर पहुंच गई जिसने एअरलाइन को व्यवस्थित कर रखा था.

इंडिगो का क्रू मैनेजमेंट सिस्टम अमेरिकी कंपनी जेपसेन का बनाया है, जिसका इस्तेमाल लुफ्थांसा, टर्किश एअरलाइंस और एअर फ्रांस जैसी बड़ी वैश्विक एअरलाइंस करती हैं. ये जटिल डेटा को ऑप्टिमाइज करके खुद रोस्टर तैयार कर देता है, और आराम के अनिवार्य घंटे जैसे कड़ाई से लागू होने वाले नियामक प्रतिबंधों और वरीयता जैसी 'नरम’ प्राथमिकताओं में संतुलन स्थापित करता है. रियल टाइम में क्रू को ट्रैक करता है और गड़बड़ी होने पर उन्हें फिर री-एलोकेट करता है.

अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इंडिगो बहुत कम क्रू बफर के साथ काम कर रहा था, जिससे विमानों का इस्तेमाल दिन में 11-12 घंटे तक हो गया. जब नए एफडीटीएल नियमों ने पायलटों की उपलब्धता घटा दी, तो हिसाब-किताब गड़बड़ा गया. उड़ान के लिए उपलब्ध विमानों के साथ अनथके क्रू की संख्या काफी नहीं थी. विशेषज्ञों का कहना है कि सॉफ्टवेयर फेल होने का एक कारण यह था कि उससे एक असंभव समीकरण के आधार पर रोस्टर तैयार करने की उम्मीद की जा रही थी.

उड्डयन उद्योग के जानकार इसकी तुलना 2022 में साउथवेस्ट एअरलाइंस संकट से करते हैं, जब खराब मौसम के दौरान क्रू-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर पायलटों और विमानों के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाया और हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं. इंडिगो के मामले में चक्रवात के असर, थकान संबंधी नए नियम और बहुत कम स्टाफ ने कुल मिलाकर संकट को विकराल बना दिया. किसी एक से संकट पैदा नहीं होता, लेकिन सब कुछ एक साथ घटित होने से एअरलाइन की पूरी व्यवस्था चौपट हो गई.

3 दिसंबर से बिगड़ी स्थिति ऐसी कहानी बयां करती है, जिसमें कोई विकल्प ही नहीं बचा था. उस दिन, इंडिगो ने 257 घरेलू उड़ानें रद्द कीं. 4 दिसंबर को रद्द होने वाली उड़ानों की संख्या बढ़कर 611 घरेलू और 14 अंतरराष्ट्रीय पर पहुंच गई. 5 दिसंबर तक उसने इमरजेंसी ब्रेक लगा दिया, 1,588 घरेलू और 35 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द हुईं और बमुश्किल 706 सेवाएं ही संचालित हो पाईं. सीईओ पीटर एल्बर्स ने एक वीडियो जारी कर माफी मांगी और सिस्टम को 'रीबूट’ करने का ऐलान किया. जब हवाई अड्डों पर अफरा-तफरी फैल गई और नारे लगने लगे, तो सरकार भी जागी.

घमंड की घटा
पायलटों को यह सफाई खोखली लगी. फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स के कैप्टन सी.एस. रंधावा कहते हैं, ''यह अफरातफरी इस संकट की वजह से नहीं हुई.’’ वे कहते हैं, ''उन्होंने समय पर सिस्टम अपडेट नहीं किया और नए नियमों के अनुसार स्टाफ भी नहीं रखा.’’ नवंबर के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं. उस महीने इंडिगो की उड़ान रद्द करने की दर 1.9 फीसद थी, जो उद्योग के औसत से थोड़ी ही अधिक थी. रंधावा का कहना है, ''चीजें इसलिए नहीं गड़बड़ाईं कि उन्होंने नियम लागू किए, बल्कि इसलिए कि उन्होंने लागू ही नहीं किए.

समस्या तब सामने आई जब सिस्टम पर दबाव पड़ा.’’ दरअसल एसोसिएशन ने नवंबर में दिल्ली हाइकोर्ट में एक अवमानना याचिका दाखिल की कि दूसरे चरण के अमल के मामले में एअरलाइंस को छूट और राहत दी जा रही है. जैसे ही इंडिगो जमीन पर अटकी, देश भर में हवाई किराए आसमान छू गए. दिल्ली-बेंगलूरू फलाइट का किराया 80,000 रुपए तक पहुंच गया जो 700 फीसद बढ़ोतरी थी. 6 दिसंबर को सरकार ने किराए पर सीमा लगाने के लिए दखल दिया. बहाली धीरे-धीरे हुई. रोजाना सैकड़ों उड़ानें रद्द हो रही थीं. आखिरकार 8 दिसंबर को आंकड़ा दहाई अंक में आया.

केंद्रीय नागरिक विमानन मंत्री के. राम मोहन नायडू ने संसद में इस मामले को 'मिसमैनेजमेंट’ बताया. उन्होंने कहा, ''सभी एअरलाइंस ने बदलाव की मांग की थी. छूट दी गई थी. यह सब इंडिगो के परिचालन और चालक दल की रोस्टर व्यवस्था में गड़बड़ी के कारण हुआ है.’’

दिल्ली में 9 दिसंबर को नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू के साथ इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स

डीजीसीए कारण बताओ नोटिस पर इंडिगो के इस जवाब से संतुष्ट नहीं था कि वह ''सही कारण का पता नहीं लगा पाई है’’ और जांच के लिए उसे 15 दिन का समय चाहिए. इस पर नियामक ने सर्दियों में इंडिगो की उड़ानें 10 फीसद कम कर दीं और एअरलाइन के गुरुग्राम मुख्यालय में रोजमर्रा की निगरानी के लिए अपने अधिकारियों को बैठा दिया.

जो नियम सभी एअरलाइंस के लिए बने थे, आखिर उसने इंडिगो को क्यों जमीन पर ला पटका? क्योंकि इंडिगो दूसरी एअरलाइंस जैसी नहीं है. पिछले डेढ़ दशक में यह एअरलाइन विमानन उद्योग में सबसे अनूठी रही है. पिछले दो दशकों में जब दूसरी एअरलाइंस बंद हो गईं या एक से दूसरे पुनर्गठन में उलझती गईं, तो इंडिगो लगातार क्षमता, विमान मार्ग और मुनाफे के पंख फैलाती रही.

इसके दबदबे का कारण खर्च पर सख्त नियंत्रण रहा: एक ही एअरक्राफ्ट फैमिली, पास-पास सीटें, तेजी से काम और फालतू के कम से कम तामझाम. एअरलाइन के पास एअरबस ए320 के विमान हैं जिनकी संख्या सितंबर 2025 तक 417 थी. एक ही मेक के विमान होने से प्रशिक्षण, रखरखाव और खरीद को केंद्रीकृत करने में मदद मिली, जिससे वित्त वर्ष 24 में इंडिगो की लागत प्रति उपलब्ध सीट किलोमीटर (सीएएसके) 3.71 रुपए प्रति किमी (इसमें ईंधन शामिल नहीं) तक रही, जो एशिया में सबसे सस्ती है. जानकारों के मुताबिक, उसकी सबसे करीबी भारतीय प्रतिस्पर्धी विमानन कंपनी एअर इंडिया का सीएएसके बहुत ज्यादा है. इस तरह की दक्षता स्टाफ में भी है, खासकर नवंबर में उसके 5,085 पायलटों में.

इस बचत का कारण था रोजाना 12 घंटे के इस्तेमाल का लक्ष्य और 30 मिनट से कम के भीतर परिचालन को अंजाम देना, जिससे उसे किराया कम रखने और विमान को उड़ाते रहने में मदद मिली. विमान के भीतर गर्म खाना न परोसने की नीति से केट‌रिंग (खानपान) का वजन घटा, कम ईंधन जला और उपकरण खर्च कम हुआ; क्रू प्रोसीजर के मानकीकरण, जो उसके अपने आइफ्लाइ ट्रेनिंग में थे, से कार्यदक्षता को मजबूत रखने में मदद मिली. यह सब स्टाफ में भी हुआ: इंडिगो का पायलट-विमान अनुपात 13:1 था, जो दुनिया में सबसे कम है.

इंडिगो ने सर्दियों की शुरुआत 400 से ज्यादा विमानों से की, लेकिन उसके पास उड़ान के लिए 5,085 पायलट ही थे, वहीं एअर इंडिया (मुख्य एअरलाइन) के पास 187 का बेड़ा था और लगभग 6,350 पायलट थे यानी 34:1 का अनुपात—जिससे उसके पास काफी गुंजाइश थी, जो इंडिगो के पास बिल्कुल नहीं थी. इंडिगो का मॉडल बड़ा पैमाना और कम लागत के लिहाज से विकसित किया गया था, इसलिए उसमें सब कुछ एकदम सही से चलना बेहद जरूरी था: ज्यादा लोड फैक्टर, लंबी ड्यूटी के दिन, व्यस्त शेड्यूल और कम से कम ढील.

जब थकान के नए नियमों ने पायलटों के घंटे घटा दिए तो एअरलाइन के पास इस झटके से बचने का कोई मार्ग नहीं था, लिहाजा, उड़ानें रद्द होने लगीं, समय पर उड़ानें भरभरा गईं और मार्केट वैल्यू तेजी से लुढ़की. कम सीएएसके, अधिक उपयोग, बेहद कम स्टाफ जैसी जिन खासियतों ने इंडिगो को ऊंचाई पर पहुंचाया, अब ऐसे मार्केट में उन सबकी सीमा साफ दिखने लगी जहां एक भी नियम बदलने से देश की सबसे बड़ी एअरलाइन के पंख कट सकते थे.

वित्तीय दबाव का असर पहले ही दिखने लगा था. उसके वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि बिजनेस मॉडल हाल में वित्तीय दबाव का सामना करने लगा था. इंडिगो की वित्त वर्ष 25 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक उसके 5,456 पायलटों सहित 41,049 कर्मचारी हैं और उसका वेतन बिल बहुत ज्यादा है. इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में शुद्ध लाभ घटकर 2,176.3 करोड़ रुपए रह गया जो वित्त वर्ष 25 की आखिरी तिमाही में 3,067.5 करोड़ रुपए था.

वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही में विमानन कंपनी ने 2,582.1 करोड़ रुपए का नुक्सान दर्ज किया. इस बीच, उसका वेतन बिल वित्त वर्ष 25 की चौथी तिमाही में 1,947.2 करोड़ रुपए से बढ़कर वित्त वर्ष 26 की दूसरी तिमाही में 2,044.8 करोड़ रुपए हो गया. दूसरे शब्दों में, बहुत कम मार्जिन के कारण कम गुंजाइश थी. सो, इंडिगो धीमी गति से नए पायलटों की भर्तियां कर रही थी.

लोकसभा में बताए गए आंकड़ों के मुताबिक संकट की आंधी से पहले, इस मार्च में एअरलाइन के पायलटों की संख्या 5,463 थी, जो दिसंबर में 5,085 रह गई यानी 7 फीसद की कमी आई. इससे पायलटों की सालाना छुट्टी का कोटा भी घट गया. प्राइमस पार्टनर्स की प्रज्ञा प्रियदर्शिनी कहती हैं, ''उन्हें लगा कि लचीलेपन से काम चल सकता है. मगर यह सोच उलटी पड़ गई.’’

विमानन हलके में दो टूक बात कही जा रही है: इंडिगो को लगा कि नियामक मान जाएगा. कुछ हद तक, उसने ऐसा किया भी—10 फरवरी तक छूट दे दी. लेकिन यह बहुत देर से आई. इंडिगो के बोर्ड में पुराने नियामक, प्रशासक और उड्डयन क्षेत्र के बड़े नाम शामिल हैं, जिससे उसका दबदबा बढ़ जाता है. संभव है कि इससे लापरवाही भी बढ़ी होगी. कंपनी के एक अधिकारी ने निजी तौर पर माना, ''गलती तो हुई है.’’

इंडिगो के चेयरमैन विक्रम मेहता ने 10 दिसंबर को एक वीडियो बयान में हर प्रभावित आदमी से माफी मांगी. उन्होंने कहा, ''पिछले हफ्ते गड़बड़ियां जानबूझकर नहीं, बल्कि कई आंतरिक और अप्रत्याशित बाहरी वजहों से हुईं. इसमें मामूली तकनीकी खामियां, सर्दियों के लिए शेड्यूल परिवर्तन, प्रतिकूल मौसम, एविएशन सिस्टम में भीड़ बढ़ने, और नए नियमों के अमल शामिल थे.’’ उन्होंने यह भी कहा कि बोर्ड ''बाहरी तकनीकी विशेषज्ञों की मदद लेगा’’और समस्या की मूल वजहें पता करेगा.

विमानन सलाहकार जितेंद्र भार्गव कहते हैं: ''यह जरूरत से ज्यादा विश्वास और लापरवाही का नतीजा है. विमानन उद्योग में सबसे जरूरी है शेड्यूल की साख. अगर इंडिगो इतने कम समय में और पायलट नहीं जुटा सकी थी तो तो उसे उड़ानों में कटौती कर देनी चाहिए थी.’’

जरूरी हैं सुधार
नागरिक विमानन मंत्रालय यह दिखाने में लगा है कि उसने संकट संभाल लिया है. यह साफ है कि अधिकारियों को एअरलाइन के आंकड़ों पर भरोसा नहीं हो रहा है. इसलिए इंडिगो के दफ्तरों में उन्होंने अपने लोगों को बैठा दिया है. डीजीसीए के महानिदेशक फैज अहमद किदवई ने इंडिया टुडे को बताया, ''हर 15 दिन में, उन्हें हमें बताना होगा कि वे कितनी अतिरिक्त भर्तियां कर रहे हैं. अगर हिसाब नहीं बैठा तो और भी उड़ानें रोक दी जाएंगी. हम देखेंगे कि उनके पास उड़ानों के लिए पर्याप्त लोग हैं या नहीं.’’ विशेषज्ञों का मानना है कि डीजीसीए का भी दोष कम नहीं है, उसे इंडिगो के बयानों पर विश्वास नहीं करना चाहिए था, या 10 फीसद उड़ान इजाफे की छूट नहीं देनी चाहिए थी.

परेशान यात्रियों को रिफंड दिलाने के साथ-साथ सरकार बैग-लगेज को भी ट्रैक कर रही है. सभी रद्द उड़ानों के लगभग 9,000 बैग देश भर में बड़ी संख्या में यात्रियों को लौटाए (घर तक पहुंचाए) जा रहे हैं. मंत्रालय ने एअरलाइंस से रिफंड देने को भी कहा है. 21 नवंबर से 7 दिसंबर के बीच करीब 9,60,000 यात्रियों की बुकिंग कैंसिल की गईं और उन्हें रिफंड दिया गया, जो 827 करोड़ रुपए था. फिर भी, ऋतुपर्णा सरकार जैसे मुसाफिरों को रिफंड का इंतजार है. वे कहती हैं, ''मैं उनके पीछे ऐसे भागती नहीं रह सकती.’’

इंडिगो ने 11 दिसंबर को 10,000 रुपए के वाउचर जारी किए, जो अगले 12 महीने तक यात्रा के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. यह उन यात्रियों के लिए है जो 3-5 दिसंबर को अटक गए थे. इसके अलावा उड़ान के समय और सरकारी निर्देश के मुताबिक, 5,000-10,000 रु. मुआवजे की शक्ल में देना है.

डीजीसीए ने संकेत दिया है कि अब वह गंभीर है. सरकार ने यात्री सुरक्षा नियमों को सख्त करने का वादा किया है, जबकि वह जानती है कि भारत में मुआवजे की व्यवस्था वैश्विक मानकों से बहुत पीछे है. इन नियमों के मुख्य प्रावधानों में घरेलू उड़ानों में दो घंटे और इंटरनेशनल फ्लाइट में तीन घंटे से ज्यादा की देरी पर नाश्ता/खाना, रात भर की देरी पर होटल में रुकना, कैंसिलेशन पर पूरा रिफंड या री-असाइनमेंट शामिल हैं.

लेकिन ये उसके मुकाबले कुछ भी नहीं हैं जो ब्रिटेन जैसे देशों में यात्रियों को दिए जाते हैं—दूरी और देरी के आधार पर (अगर 14 दिन से पहले बताया गया हो, असामान्य परिस्थितियों को छोड़कर) रदद् उड़ान के लिए प्रति व्यक्ति 110-520 पाउंड तक का मुआवजा. भारत के उलट, वहां यात्रियों के अधिकार सबको पता हैं और उन्हें लागू करना आसान है. नायडू और उनकी टीम के पास काम बहुत है.

दो के दबदबे का रोग
यह संकट कुछ ऐसे सुधारों की जरूरत बताता है जो भारत के घरेलू विमानन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं. महामारी के बाद इस क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि हुई है. यात्रियों की संख्या 2022 में 12.3 करोड़ से बढ़कर 2023 में 15.2 करोड़ हो गई और यह 2024 में 16.1 करोड़ तक पहुंच गई. कारण मध्य वर्ग की बढ़ती ट्रैवल आकांक्षा और रीजनल कनेक्टिविटी में इजाफा है. लेकिन दो ही ऑपरेटर हैं जिनके पास कुल मिलाकर लगभग 700 हवाई जहाज हैं और जो 1.4 अरब लोगों के देश को सेवा दे रहे हैं.

नागरिक विमानन मंत्री नायडू ने कहा है कि यह हिस्सा इतना बड़ा है कि पांच और एअरलाइंस मजे से उड़-चल सकती हैं. पिछले 20 साल में भारत में एअरलाइंस शुरू कम हुई हैं और बंद ज्यादा हुई हैं; वित्तीय हिचकोलों के कारण एक दर्जन से ज्यादा एअरलाइंस बंद हो गई हैं. ज्यादा झटका किंगफिशर एअरलाइंस से लगा है, जो 2012 में भारी कर्ज के कारण दिवालिया हो गई थी; कभी मार्केट लीडर रही जेट एअरवेज के 2019 में पंख टूट गए; और गो फस्र्ट ने 2023 में दिवालिया होने का ऐलान कर दिया.

भारतीय विमानन कंपनियां लागत के बोझ तले भी दबी हुई हैं जिसमें एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) कमाई का 40-45 फीसद पी जाता है. 11 फीसद का केंद्रीय उत्पाद शुल्क और 29 फीसद तक राज्यों की ऊंची वैट दर और जीएसटी व्यवस्था से बाहर होने से भारी कराधान एअरलाइन का मार्जिन कम कर देता है.

इंडिगो और एअर इंडिया ने दूसरों के लिए मार्केट एक्सेस को रोककर 'डुओपॉली’ नहीं बनाई. उड्डयन सलाहकार फर्म सीएपीए के सीईओ कपिल कौल कहते हैं, ''यह बाजार की नाकामी से बना है, इसलिए यह कोई मोनोपॉली नहीं है.’’ अब असली परीक्षा यही है कि ऐसे सुधार लाए जाएं, जिससे बाकी विमानन सफर की कहानी जमीन पर न आ जाए.

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