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दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुने गए डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया को किस नजरिए से देखते हैं?

अमेरिका के लोगों ने दूसरी बार डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अपनी आस्था जताई है. ऐसे में भारत और बाकी दुनिया इस बात के लिए अपने को तैयार कर रही कि व्यापार और भू-राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में 47वें राष्ट्रपति के अमेरिका-प्रथम के एजेंडे का आखिर क्या मायने होगा?

जीत के बाद जोश से भरे डोनाल्ड ट्रंप विक्ट्री स्पीच देने के लिए पत्नी मेलानिया के साथ फ्लोरिडा के वेस्ट पाम बीच में स्टेज पर
जीत के बाद जोश से भरे डोनाल्ड ट्रंप विक्ट्री स्पीच देने के लिए पत्नी मेलानिया के साथ फ्लोरिडा के वेस्ट पाम बीच में स्टेज पर
अपडेटेड 18 नवंबर , 2024

अगर जटिल को सरल शब्दों में बयान करने की क्षमता ही असली प्रतिभा है तो अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की ऐतिहासिक वापसी उसकी उम्दा मिसाल कही जा सकती है. जीत के बाद फ्लोरिडा में पहले भाषण में ट्रंप ने अपना एजेंडा दो-टूक मगर असरदार ढंग से जाहिर किया. उन्होंने कहा, "असल है आम समझ. हम सुरक्षित सीमाएं चाहते हैं. हम सुरक्षा चाहते हैं. हम चाहते हैं कि सब अच्छा और सुरक्षित हो. हम बेहतरीन शिक्षा चाहते हैं. मजबूत और सशक्त फौज चाहते हैं और आदर्श स्थिति में हम उसका उपयोग नहीं करना चाहते. मैं युद्ध शुरू करने नहीं जा रहा. मैं युद्घों को रोकने जा रहा हूं. हम फिर अमेरिका को सुरक्षित, ताकतवर, समृद्ध और मुक्त बनाएंगे."

भाषण के अंत में उन्होंने कहा, ''हम वादे करते हैं. वादे निभाते हैं.'' कुछ ही राजनेताओं के पास ऐसी दो-टूक और साफ विश्व-दृष्टि है, जिसने शायद अमेरिकी मतदाताओं का दिल छू लिया. लोगों ने ट्रंप के खिलाफ विभिन्न संघीय अदालतों में चले यौन शोषण और अन्य गंभीर अपराधों को नजरअंदाज करके भारी बहुमत से उनकी वापसी कराई.

ट्रंप के तमाम वादे वही हैं जो उन्होंने 2016-2020 के दौरान पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति पद पर जीत की खातिर किए थे. उनमें से वे कुछ पर ही अमल कर पाए, वह भी सीमित सफलता के साथ. यही वजह थी कि राष्ट्रपति जो बाइडन ने लगातार दूसरा कार्यकाल हासिल करने का उनका प्रयास नाकाम कर दिया. लेकिन यह सब थोड़े अंतराल के लिए ही रहा क्योंकि ट्रंप फिर पूरे जोश के साथ लौटे हैं और 20 जनवरी, 2025 को औपचारिक सत्ता पाने के बाद अमेरिकियों के सपने पूरे करने का बुलंद इरादा रखते हैं.

ज्यादातर दुनिया घबराई-सी इंतजार कर रही है. जैसा कि वाशिंगटन डीसी स्थित कार्नेगी एंडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो और भारत-अमेरिका संबंधों के शीर्ष विशेषज्ञ एश्ले टेलिस कहते हैं, "हम उथल-पुथल भरे राष्ट्रपति कार्यकाल के गवाह बनने जा रहे हैं. ट्रंप बेहद आत्मविश्वास से भरे हैं और उनके साथ शागिर्दों और पैदल सिपाहियों की ऐसी टोली है जो उन्हें क्रांति दूत मानती है. वे जड़ पर चोट करने को आतुर हैं. वे ऐसे कदम उठाएंगे जिनके बारे में पहले किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोचा भी नहीं होगा. एकाधिकारवादी स्थिरता में पारंपरिक अमेरिकी भूमिका के संदर्भ में गंभीर फेरबदल के पूरे आसार हैं."

पहले कार्यकाल की तरह दूसरे कार्यकाल में भी ट्रंप घरेलू एजेंडे पर सबसे ज्यादा जोर देंगे, और उनकी विदेश नीति उसी के मुताबिक होगी, जो अपने देश को लेकर क्रांतिकारी एजेंडा उनके दिमाग में है. दूसरी बार चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप की टीम 'एजेंडा 47' नाम का घोषणापत्र लेकर आई, जिसमें घरेलू और विदेशी मोर्चे की प्रमुख नीतिगत पहल की सूची है, चाहे उनसे अमेरिकी कांग्रेस की शक्तियां कमजोर ही क्यों न होती हों. इनमें सरकारी नौकरशाही का आकार घटाना और प्रशासनिक नियुक्तियों का पुनर्गठन शामिल है, ताकि वे उन लोगों को बाहर कर सकें जिन्हें "दुष्ट नौकरशाह" कहते हैं और उनके लिए राह बना सकें, जो उनकी नीति के माकूल हैं.

मसलन, अमेरिकी न्याय विभाग में ट्रंप ने 100 अमेरिकी वकीलों की नियुक्ति का वादा किया है जो अन्य चीजों के अलावा कंजरवेटिव्स के प्रति पूर्वाग्रह और वाम झुकाव वाले कानूनी फर्मों से मोर्चा ले सकें. अपराध के लिए कड़े कानून बनाने वादा किया है, जिसमें मानव तस्करों और नशीले पदार्थ का धंधा करने वाले को मौत की सजा होगी.

अन्य क्षेत्रों में भी ट्रंप की योजनाएं घरेलू स्तर पर चिंता बढ़ाने वाली हैं. मसलन, शिक्षा क्षेत्र में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के मौजूदा एक्रीडेटरों को बदलकर ऐसी व्यवस्था लाने की योजना है, जो रिपब्लिकन पार्टी के मूल्यों के अनुरूप हो. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के हूवर फाउंडेशन में सीनियर फेलो प्रोफेसर सुमित गांगुली ट्रंप की योजना को "घरेलू स्तर पर रीगन क्रांति को जिंदा रखने" की कोशिश करार देते हैं. अमेरिका के सबसे सफल राष्ट्रपतियों में शुमार किए जाने वाले रोनाल्ड रीगन ने 1981-1989 में अपने कार्यकाल के दौरान टैक्स घटाकर और अर्थव्यवस्था को लालफीताशाही से मुक्त कर आर्थिक पुनरुद्धार की नींव रखी थी. उसके अलावा शीत युद्ध से निबटने के लिए कुछ बड़ी पहलकदमियां भी की थीं. हालांकि, रीगन ने माना कि सत्ता का विकेंद्रीकरण है और कुछ ऐसे मामले हैं, जो राष्ट्रपति कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं. लेकिन गांगुली को डर है कि ट्रंप कहीं "मानक संस्थागत प्रक्रिया की अड़चनें कुचलकर ही न रख दें." यही उनकी विदेश नीति में भी हो सकता है, क्योंकि नए राष्ट्रपति अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे.

नई विश्व अव्यवस्था

आखिरकार ट्रंप की नजर में दुनिया क्या है? सीधे शब्दों में कहें तो जिसमें अमेरिका के हित सबसे पहले हों और बाकी सभी देशों के हित दूर कहीं दूसरे स्थान पर हों. ट्रंप प्रमुख मुद्दों पर बराबरी के लेन-देन वाले अपने नजरिये को बेबाकी से रखते हैं और उनका मानना है कि अमेरिका की स्थिति में गिरावट इसलिए आई क्योंकि विश्व व्यवस्था दुरुस्त बनाए रखने के लिए उसने हर किसी का खर्च उठाया, लेकिन बदले में उसे खास फायदा नहीं मिला. वे कहते हैं, "इन लोगों ने हमारा हिस्सा खा लिया." बाइडन के दौर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहतर कर रही है, लेकिन खुदरा महंगाई और रोजगार दर में कम वृद्घि जैसे मुद्दों पर केंद्रित प्रचार अभियान से ट्रंप को कामगार वर्ग के अमेरिकियों का समर्थन मिला, जो सबसे अधिक दबाव झेल रहा है. फिर, प्रवासियों, खासकर अवैध प्रवासियों की वजह से खतरे का नैरेटिव भी खूब गूंजा, जिसके मुताबिक, वे अमेरिकी नौकरियां छीन लेंगे. जनवरी, 2025 में कार्यभार संभालने पर पहला कदम उठाने का उनका वादा है, "अवैध आप्रवासियों का सबसे बड़ा निर्वासन कार्यक्रम" शुरू करना.

हालांकि, ट्रंप सबसे ज्यादा अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को ध्वस्त करने पर आमादा हैं, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसी संधियां और संस्थाएं बनाई गईं, जिन्होंने अमेरिकी वर्चस्व को कायम रखते हुए दुनिया के अधिकांश हिस्सों में शांति और समृद्धि के लिए उदार व्यवस्था को बढ़ावा दिया. युद्ध के बाद पद संभालने वाले अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने एक व्यापक विदेश और व्यापार नीति अपनाई. उसके तहत व्यापार और निवेश की मुक्त व्यवस्था के जरिए और यहां तक कि विश्व शांति को खतरे में डालने वाली ताकतों के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप करके वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया गया.

दूसरी तरफ ट्रंप अपनी 3-डी नीति—डिसरप्ट (तोड़ो), डिसइंगेज (फोड़ो) और डिग्लोबलाइज (वैश्वीकरण से हटो)—के जरिए उसके एकदम उलट राह पर चलना चाहते हैं. उनके इस एजेंडे की झलक पहले कार्यकाल में ही मिल चुकी है, जब उन्होंने चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू किया, 2014 के पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते समेत कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौतों से हाथ खींच लिए, और नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) सहयोगियों को यह कहकर नाराज कर दिया कि अमेरिका उन्हें मुफ्त में सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने वाला नहीं, और उन्हें अपना रक्षा खर्च बढ़ाना चाहिए.

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में सीनियर फेलो तन्वी मदान कहती हैं कि "अस्थिर रुख और तात्कालिक हितों को तरजीह देने की आदत" ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भी सबसे बड़ी चिंता होगी. ट्रंप के अचानक फैसले लेने की आदत से पार पाना और भी मुश्किल है. हो सकता है कि आज वे चीन के साथ प्रतिस्पर्धा की बात करें और कल उसके साथ कोई करार कर लें. ट्रंप ऐसे समय पर राष्ट्रपति पद संभालने जा रहे हैं, जब दुनिया दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का सामना कर रही है—रूस-यूक्रेन जंग और इज्राएल-गजा संघर्ष.

पहली चुनौती पर ट्रंप का दावा है कि वे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन पर समझौते के लिए मना लेंगे और सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर जंग रुकवा देंगे. गजा संघर्ष के बारे में भी उनका दावा तो यही है लेकिन पूरे दमखम के साथ नहीं किया गया है. नाटो सहयोगियों के प्रति उनका रुख पूर्ववत ही रहने की संभावना है—वे उनसे सुरक्षा के लिए अधिक कीमत चुकाने को कहते रहेंगे. टेलिस कहते हैं, "अगर अमेरिका को कोई कीमत चुकानी पड़े तो ट्रंप कोई भी अंतरराष्ट्रीय नेतृत्वकारी भूमिका नहीं निभाना चाहेंगे."

उनका मानना है कि ट्रंप ताइवान की रक्षा समेत तमाम प्रमुख अमेरिकी नीतियों को लेकर सवाल खड़े करें और यह भी हो सकता है कि उसको लेकर चीन से कोई सौदा कर लें. मदान की चिंता यह है कि अमेरिका ऐसे संघर्षों में उलझना नहीं चाहेगा और अंत में यह भी कह सकता है, "रूस, तुम यूरोप संभालो और चीन तुम एशिया संभालो. अमेरिकी राष्ट्रपति का एशिया से पूरी तरह हट जाना भारत के हित में नहीं है."

कई जानकारों को अंदेशा है कि अगर ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में भी संकीर्ण और पृथकतावादी एजेंडा जारी रखते हैं तो अमेरिका का रुतबा घट सकता है. इससे आगे चलकर बड़े वैश्विक संघर्ष खड़े हो सकते हैं. राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के शासनकाल के दौरान प्रमुख नीति-निर्माता रहीं कोंडालीजा राइस ने चुनाव परिणाम आने से पहले फॉरेन अफेयर्स में एक लेख में सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन का कोई उल्लेख किए बिना आगाह किया, "सर्वनाश की तरफ ले जाने वाले नए चार कदम—लोकलुभावनवाद, स्वदेशीवाद, पृथकतावाद और संरक्षणवाद—आज साथ मिलकर चल रहे हैं और राजनैतिक केंद्र को चुनौती दे रहे हैं. सिर्फ अमेरिका ही उनकी राह रोकने और भविष्य में आगे न बढ़ने देने में सक्षम हो सकता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय विदेश नीति के लिए समर्थन तभी जुटाया जा सकता है, जब राष्ट्रपति ऐसी स्पष्ट तस्वीर पेश कर पाए कि अमेरिकी सक्रियता के बिना दुनिया कैसी होगी. ऐसी दुनिया में यूक्रेन को हराने के बाद उत्साहित पुतिन और शी अपनी अगली विजय की ओर कदम बढ़ाएंगे...अमेरिकी नेताओं को जनता को याद दिलाना चाहिए कि अनिच्छा से ही सही अमेरिका को बार-बार संघर्ष में खींचा गया है—चाहे 1917 हो या 1941 और 2001. अलग-थलग रहना कभी भी देश की सुरक्षा या समृद्धि के हक नहीं रहा."

व्यापार पर झटके

ट्रंप बुद्धिमानी भरी किसी सलाह पर गौर करने के कायल नहीं हैं. अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने यह सोच बना ली थी कि दूसरों ने लंबे समय तक अमेरिका की उदारता का फायदा उठाया है और अब उन्हें इसका बदला चुकाना चाहिए. नीतिगत बदलावों की सूची में सबसे ऊपर है टैरिफ में भारी वृद्धि (यह उनके शब्दकोश का सबसे सुंदर शब्द है). हालांकि, यह वैश्विक व्यापार प्रणाली, खासकर विश्व व्यापार संगठन के असर को नष्ट कर सकता है. लेकिन ट्रंप को इसकी परवाह नहीं है क्योंकि उनका मानना है कि यह अमेरिका के हित में नहीं है. वे अमेरिका के चारों तरफ संरक्षणवाद की दीवारें खड़ी करना चाहते हैं, जो वैश्वीकरण के खात्मे की शुरुआत हो सकती है.

ट्रंप का मुख्य निशाना तो चीन है, लेकिन भारत भी उससे अछूता नहीं है, जिसे वे "टैरिफ किंग" कहते हैं. अमेरिका के साथ व्यापार अमूमन चीन के अनुकूल रहा है, जिससे ट्रंप पहले कार्यकाल में भी भन्नाए थे. उन्होंने असंतुलन ठीक करने के लिए चीन पर बहुत दबाव डाला, लेकिन यह चीन के पक्ष में ही झुका रहा. 2023 में अमेरिका के साथ 575 अरब डॉलर के माल व्यापार में 279 अरब डॉलर के साथ चीन फायदे में रहा. ट्रंप ने चीनी आयात पर टैरिफ में 60 फीसद बढ़ोतरी की कौल उठाई है, जिससे दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच खाई चौड़ी हो सकती है.

भले वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'सच्चा दोस्त' होने का दावा करें लेकिन 35.3 अरब डॉलर का व्यापार लाभ भारत के हक में है. ट्रंप अमेरिका को भारतीय निर्यात पर टैरिफ 10 फीसद तक बढ़ा सकते हैं. भारत ट्रंप के पहले कार्यकाल में उनके ऐसे संकल्प का खामियाजा भुगत चुका है. 2019 में उन्होंने अमेरिका की सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीपीएस) के तहत टैरिफ पर नई दिल्ली को मिलने वाला तरजीही दर्जा वापस ले लिया था. जीपीएस 6.3 अरब डॉलर या अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले 12 फीसद सामान पर लागू होता है. स्टील और एल्युमीनियम आयात पर टैरिफ में भी क्रमश: 25 और 10 फीसद की वृद्धि की गई. भारत सिर्फ जवाबी कार्रवाई कर सकता था, और उसने भी बादाम, अखरोट, छोले और सेब समेत अमेरिका से आयात किए जाने वाले 29 सामानों पर अच्छा-खासा टैरिफ लगा दिया.

कई विशेषज्ञों की राय है कि दूसरे कार्यकाल में ट्रंप और भी सख्त रुख अपना सकते हैं. यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम (यूएसआइएसपीएफ) के अध्यक्ष मुकेश अघी आगाह करते हैं, ''ट्रंप भारी-भरकम टैरिफ लगाकर सिर्फ भारत और चीन ही नहीं, बल्कि अन्य देशों से आयात के लिए अमेरिका के दरवाजे बंद करने जा रहे हैं. लेन-देन संबंधी अनिश्चितताएं भी उपजेंगी, क्योंकि नीति में लगातार बदलाव होने से भारत का निर्यात बाधित हो सकता है.''

कुछ लोग चीन के साथ व्यापार के प्रति ट्रंप के सख्त रुख को भारत के लिए एक अवसर के तौर पर देखते हैं. उनका मानना है, इससे भारतीय सामान ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं. हालांकि, टेलिस इस उत्साह की हवा निकालने में कोई देरी नहीं करते. उन्हें इस मद में निर्यात में मामूली वृद्धि की ही उम्मीद है. उनके मुताबिक, "आखिरकार, भारत न तो गुणवत्ता और न ही कीमत के मामले में चीन से होड़ कर सकता है. यही नहीं, ये सारी गतिविधि वैश्विक बाजार में निजी खिलाडिय़ों के हाथों में है, इसलिए भारत मुकम्मल विकल्प नहीं बन सकता."

टेलिस को जहां गुंजाइश दिखाई देती है, वह है रक्षा क्षेत्र. टेलिस भारतीय निर्यातकों को यह अवसर भुनाने की सलाह देते हैं. भारत ने ट्रंप के पहले कार्यकाल में जिस तरह जवाबी व्यापारिक कदमों का इस्तेमाल किया था, उससे विशेषज्ञ इत्तेफाक नहीं रखते. उनकी सलाह है कि हमें अमेरिका के साथ बेहतर तालमेल के लिए कुछ शुल्कों में रियायत देनी चाहिए. इस तरह की वार्ताओं का अनुभव रखने वाले एक अधिकारी कहते हैं, "हमें हर व्यापार सौदे को संतुलित करने की कोशिश करने के बजाए व्यापक तस्वीर देखनी चाहिए कि हम कहां व्यापार कर सकते हैं. ट्रंप सरकार ऐसे कदमों से खुश होगी जिसमें दोनों को ही फायदा हो."

टकराव का एक अन्य संभावित बिंदु प्रवासियों, खासकर अवैध प्रवासियों पर ट्रंप की नीति है. वैसे तो अपने वादे के मुताबिक वे अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए सख्त कदम उठाएंगे. अवैध प्रवासियों पर ट्रंप की कार्रवाई का असर सिर्फ दक्षिण अमेरिकी लोगों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि अवैध प्रवासियों में एक बड़ी संख्या अनुमानित 7,25,000 भारतीयों की भी है. अमेरिका में बसने के इच्छुक इन लोगों में ज्यादातर पंजाब और गुजरात के हैं. पिछले साल बाइडन प्रशासन ने इनमं  से 1,100 से ज्यादा लोगों को भारत वापस भेज दिया था.

इससे भी बुरा पहलू तो यह है कि ट्रंप गैर-आव्रजक श्रमिकों के लिए एच1बी वीजा की संख्या घटाने के पक्षधर हैं. अभी यह सालाना 85,000 तक सीमित है और उनमें अधिकांश भारतीयों को मिलते हैं. ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में जीवनसाथी का वर्क परमिट वापस ले सकते हैं और ऐसे वीजा जारी करने के नियमों को और ज्यादा सख्त बना सकते हैं. हालांकि, यह कदम खुद ट्रंप के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है. उनकी प्रतिबंधात्मक व्यापार नीति के अलावा बड़े पैमाने पर निर्वासन से अमेरिका में महंगाई और कीमतें बढ़ने का अंदेशा है, क्योंकि वस्तुओं का उत्पादन महंगा हो जाएगा.

भारत कैसे निबटे ट्रंप से

नई दिल्ली के लिए ट्रंप की वापसी उतनी चिंताजनक नहीं है, जितनी दुनिया के दूसरे देशों के लिए है. मोदी के शब्दों में कहें तो सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले दो दशकों में भारत और अमेरिका दोनों "अतीत की झिझक से बाहर आ चुके हैं." उनके बीच रणनीतिक साझेदारी बढ़ी है और प्रगाढ़ता भी. पहले कार्यकाल में व्यापार पर चीन विरोधी रुख के कारण ट्रंप ने भारत को शी जिनपिंग की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ एशियाई ढाल के तौर पर देखा. ट्रंप प्रशासन ने भारत से रक्षा प्रौद्योगिकी और सैन्य उपकरण के करार किए जो सिर्फ खास करीबी सहयोगियों के लिए थे. हालांकि, बाइडन ने ही अत्याधुनिक ड्रोन बिक्री सौदों को मंजूरी दी और पहली बार भारत में जेट इंजन उत्पादन की अनुमति देकर भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचाया.

बाइडन और मोदी ने सेमी-कंडक्टर चिप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और वायरलेस टेलीकम्युनिकेशन सहित कई महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर सहयोग बढ़ाने के लिए भी करार किया. टेलिस के मुताबिक, "अमेरिका-भारत ने उच्च प्रौद्योगिकी पर सहयोग बढ़ाने से पहले हर पहलू को परखा. सबसे अहम बात यह है कि साझेदारी केवल सरकारों के बीच ही नहीं है, बल्कि यह उद्यमी और टेक्नोलॉजी समूहों के बीच भी बनी है. हमें भारतीय और अमेरिकी उद्यमियों के लिए ऐसे अवसर बनाने होंगे जिससे वे दीर्घावधि के लिए साझेदारी की अन्य संभावनाएं तलाश सकें."

हालांकि, जानकार मानते हैं कि इससे निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि ट्रंप मनमौजी हैं, वे कब क्या करेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता. भारत-अमेरिका रिश्तों के एक जानकार कहते हैं, ''मामला दोनों तरफ बराबरी का ही है. इसलिए भारत और अमेरिका दोनों को यह एहसास होना चाहिए कि उनके लिए एक-दूसरे का सहयोग कितना जरूरी है. 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के आकांक्षी भारत के लिए अमेरिका से बेहतर कोई साझीदार नहीं हो सकता.

वहीं, व्यापारिक दृष्टिकोण रखने वाले ट्रंप को समझना होगा कि भारत एक बड़ा मिड्ल क्लास बाजार और टैलेंट पूल है, और अमेरिका के आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिहाज से भारत के साथ अधिक निकटता से जुड़ना महत्वपूर्ण है. मसलन, अमेरिका में 2022 में डॉक्टरों ने जिन दवाओं की सलाह दी, उनमें 40 फीसद भारतीय कंपनियों की थीं. इससे दाम कम होने से अमेरिका के स्वास्थ्य खर्च में सालाना 219 अरब डॉलर की बचत हुई.

किसी ने हारी बाजी अमेरिकी उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस वाशिंगटन डीसी की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में चुनाव में अपनी हार स्वीकारते हुए

भारत को उन अवसरों को भुनाने में सबसे आगे रहना होगा, जो ट्रंप प्रशासन मुहैया करा सकता है. चीन का जोखिम घटाना अमेरिकी कंपनियों के लिए बेहद मायने रखता है, और यह भारतीय कंपनियों को कई प्रमुख क्षेत्रों में उनके साथ भागीदारी का मौका भी देता है. मोदी सरकार को यह तय करना होगा कि इन कंपनियों के लिए समान अवसर उपलब्ध हों. नीतियों में पारदर्शिता और स्थिरता के साथ कारोबार में सहूलियत की सुविधा पर भी ध्यान देना होगा.

यूएसआइएसएफ से जुड़े मुकेश अघी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत के चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद (क्वाड) को साथ मिलकर साझा बाजार में बदलने का महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं. उनका मानना है कि यह इन चारों देशों के आर्थिक विकास के लिए एक मंच बन सकता है. संयुक्त रूप से इन देशों की जीडीपी 350 खरब डॉलर है. उन्होंने कहा कि ये चारों देश प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और अन्य प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं और चाहें तो आर्थिक मोर्चे पर नया एजेंडा स्थापित कर सकते हैं.

हालांकि, इस बारे में कोई ठोस कुछ नहीं कह सकता कि ट्रंप ऐसी बहुपक्षीय भागीदारी अपनाना चाहेंगे या नहीं, खासकर तब जब उनकी 'मेक इन अमेरिका' नीति—जिसे बाइडन ने भी अपनाया था—मोदी की मेक इन इंडिया पहल से टकराती है. या फिर क्या वे भारत में अमेरिका की उत्पादन क्षमता को कुछ बढ़ावा देंगे? जैसा, मदान का कहना है, "यह इस पर निर्भर करेगा कि ट्रंप चीन के मामले में क्या रुख अपनाते हैं. बीजिंग के प्रति आक्रामक रुख अपनाने से ट्रंप प्रशासन भारत के साथ जुड़ने को उच्च प्राथमिकता देगा. इसके अलावा, भारत और अमेरिका दोनों को अपने मतभेदों को सुलझाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी, जिसमें कुछ बड़े मुद्दे भी शामिल हैं."

व्यापार मुद्दे के अलावा जलवायु परिवर्तन पर ट्रंप का रुख भी चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि वे कार्बन उत्सर्जन घटाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन और ग्रीनटेक डेवलपमेंट को फंड देने की बाइडन की पहल को बंद करने के पक्षधर हैं. अमेरिकी घरेलू तेल उद्योग को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने का ट्रंप का "ड्रिल-बेबी-ड्रिल" नारा वैश्विक जलवायु परिवर्तन आंदोलन के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है, जबकि भारत उसकी प्रतिबद्धता जताता रहा है.

इसका एक सकारात्मक पहलू यह है कि नई दिल्ली पर कोयले के इस्तेमाल को चरणबद्ध ढंग से खत्म करने की योजनाओं में तेजी लाने का यूरोपीय दबाव घटेगा. वैसे, ट्रंप हरित ऊर्जा परियोजनाओं पर सख्ती से रोक नहीं लगा पाएंगे, ताकि उनके सबसे मुखर समर्थक और टेस्ला प्रमुख इलॉन मस्क अपनी कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कार निर्माता बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकें.

बहरहाल, भारत के पास एक और चीज है, जिसकी वजह से ट्रंप इन संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहेंगे और वह है हाइ-प्रोफाइल और समृद्ध प्रवासी भारतीयों की 45 लाख आबादी, जिन्हें लुभाने में वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे. जनवरी में कमला हैरिस उपराष्ट्रपति पद से हट जाएंगी तब उपराष्ट्रपति पद के लिए चुने गए जे.डी. वैंस की पत्नी उषा वैंस ट्रंप प्रशासन में भारतीय रंग कायम रखेंगी. ट्रंप मनमौजी नेता हैं और व्यक्तिगत कूटनीति के प्रति संवेदनशील भी हैं. इसलिए गले मिलने, रैलियां करने और 'नमस्ते ट्रंप' जैसे मोदी के पुराने पैंतरे कारगर साबित हो सकते हैं.

इसमें कोई दो-राय नहीं कि राष्ट्रपति ट्रंप की जीत अमेरिका में सबसे बड़ी राजनैतिक वापसी में से एक है. लेकिन यह बात भी डंके की चोट पर कही जा सकती है कि ट्रंप के बारे में कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल है. और यही वजह है कि उनका दूसरा कार्यकाल दुनिया के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है.

नजरिया ट्रंप का

नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अर्थव्यवस्था, आव्रजन, टैरिफ के जरिए अमेरिकी नौकरियों की रक्षा और विदेशी मामलों पर तरह-तरह के वादे किए, जिससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिली. इस सिलसिले के ये रहे उनके हालिया बयान, जो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में दिए

बड़ा मंच जापान के ओसाका में 2019 के जी20 समिट के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ

अर्थव्यवस्था पर

मेरी योजना के तहत, अमेरिकी कर्मचारी अब दूसरे देशों के लोगों के हाथ अपनी नौकरी खोने को लेकर चिंतित नहीं होंगे. इसके बजाय दूसरे देशों के लोगों को अमेरिका में अपनी नौकरी की फिक्र करनी होगी.

हम अमेरिकी उत्पादकों के लिए बेहद कम करों और नियम-कायदों के साथ संघीय भूमि के विशेष क्षेत्र स्थापित करेंगे...और एक उत्पादन राजदूत नियुक्त करेंगे, जिसका एकमात्र कार्य...दुनिया भर में जाना और प्रमुख निर्माताओं को अपना सामान समेट कर वापस अमेरिका आने के लिए राजी करना होगा.
—25 सितंबर, सवाना, जॉर्जिया

प्रवासन पर

वे हमारे देश के खून में जहर घोल रहे हैं...सिर्फ दक्षिण अमेरिका से ही नहीं, वे अफ्रीका, एशिया और पूरी दुनिया से हमारे देश में आ रहे हैं.
—17 दिसंबर, 2023, न्यू हैम्पशायर

पद की शपथ लेने के तुरंत बाद मैं अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा निर्वासन कार्यक्रम शुरू करूंगा.
—23 अक्तूबर,  डुलुथ, जॉर्जिया

टैरिफ पर

वे बेहद शातिर लोग हैं... वे अपने खेल में माहिर हैं, और इसका इस्तेमाल हमारे खिलाफ करते हैं. लेकिन भारत सख्त है. ब्राजील बेहद सख्त है...चीन सबसे सख्त है. लेकिन हम टैरिफ के जरिए चीन से निबट रहे हैं.

तो, भारत बहुत ज्यादा धज्जियां उड़ाता है... वे (मोदी) अगले हफ्ते मुझसे मिलने आ रहे हैं. और मोदी, वे शानदार हैं. मेरा मतलब है, शानदार आदमी.
—18 सितंबर, मिशिगन

विदेश नीति पर

रूस और यूक्रेन के लोग मर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि उन्हें मरने से रोकूं और मैं यह कर दूंगा...मैं 24 घंटे में यह कर दूंगा.
—सीएनएन टाउन हॉल, मई 2023

अगर हमारे पास एक दमखम वाला राष्ट्रपति होता, एक ऐसा राष्ट्रपति जिसका पुतिन सम्मान करते...तो वे कभी यूक्रेन पर आक्रमण नहीं करते.
—जुलाई 2024

इसे (गजा पट्टी में इज्राएल-हमास संघर्ष) खत्म करो, शांति की ओर रुख करो और लोगों की हत्या बंद करो.
—अप्रैल 2024 में एक रेडियो साक्षात्कार में

इस कार्यकाल में भी ट्रंप का घरेलू एजेंडा उनके लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है. उनकी विदेश नीति उन्हीं अतिवादी सुधारों के भरोसे होगी जो कि अपने देश को लेकर उनके दिमाग में हैं.

इस कार्यकाल में भी ट्रंप का घरेलू एजेंडा उनके लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है. उनकी विदेश नीति उन्हीं अतिवादी सुधारों के भरोसे होगी जो कि अपने देश को लेकर उनके दिमाग में हैं.

बड़ा जीवंत है ये रिश्ता

अमेरिका-भारत साझेदारी के चार प्रमुख स्तंभ रहे हैं: दोनों के बीच होने वाला कुल व्यापार, रक्षा सौदे, टेक्नोलॉजी में नए करार और भारतीयों का अमेरिका प्रवासन. उन्हीं का एक जायजा

बड़ा मंच जापान के ओसाका में 2019 के जी20 समिट के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ

व्यापार
✪ भारत का अपने सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर अमेरिका के साथ 35.3 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस है. ट्रंप की ऊंची टैरिफ का निशाना चीन होगा पर भारत भी बख्शा नहीं जाएगा.
✪ पहले कार्यकाल में ट्रंप ने भारत और दूसरे देशों से स्टील के आयात पर 25 फीसदी और एल्युमिनियम पर 10 फीसदी टैरिफ लगाया

टेक्नोलॉजी

✪ 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने आइसीईटी (यूएस-इंडिया इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल ऐंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी) शुरू किया.
✪ इसका मकसद भारत के संपन्न स्टार्टअप ईकोसिस्टम और अमेरिका के टेक जाएंट्स के बीच की खाई को पाटना है.
✪ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग समेत आठ प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई. अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप के इन पहलकदमियों को समर्थन देने की उम्मीद है.

रक्षा
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा व्यापार में भी पिछले दशक में खासी बढ़ोतरी हुई है

✪ रक्षा सामग्री की अहम आवक: सी-17 ग्लोबमास्टर III परिवहन विमान, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस, पी-8आइ पोसिडॉन समुद्री टोही विमान, एएच-64 अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर, सीएच-47 चिनुक हेलिकॉप्टर, एमएच-60आर सीहॉक हेलिकॉप्टर, एम777 हॉवित्जर
✪ लंबित सौदे: भारत अमेरिकी निर्माता जनरल एटॉमिक्स से 31 एमक्यू-9बी सीगार्डियन/प्रिडेटर ड्रोन खरीदेगा और उसके लिए अक्तूबर में 34,500 करोड़ रुपए का सौदा हुआ था; तेजस मार्क 2 के लिए एफ-414 जेट इंजन; छह एएच-64 अपाचे (फॉलो-ऑन ऑर्डर) हेलिकॉप्टर

आप्रवासन
✪ भारतीय अमेरिका में सबसे तेजी से बढ़ते आप्रवासी समूहों में एक हैं, और वे फिलहाल कुल आप्रवासी आबादी का लगभग छह फीसद हैं
✪ एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष क्षेत्रों खासकर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य सेवा में विदेशी श्रमिकों को नियुक्त करने की अनुमति देता है. सालाना जारी होने वाले 85,000 एच-1बी वीजा में से लगभग 70 फीसद भारतीयों को मिलता है. अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने अमेरिका प्रथम एजेंडे के तहत इस वीजा पर सख्ती लगा दी थी.
✪ दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने भारतीय समेत सभी अवैध आप्रवासियों पर कोड़ा फटकारने का संकल्प लिया है. इनकी संख्या 7,25,000 बताई जाती है. और पिछले साल 1,100 को भारत वापस भेजा गया था27 लाख भारत में जन्मे प्रवासी 2022 में अमेरिका में रह रहे थे

प्रमुख मुद्दों पर सीधे-सीधे लेन-देन वाले अपने रवैए को लेकर ट्रंप कोई शर्म-संकोच नहीं करते. उनका मानना है कि हर किसी का बिल अमेरिका के ही भरने की नौबत आ गई और इसीलिए उसका पतन हुआ.

एक नजर व्हाइट हाउस के आईने में

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में हुईं अहम घटनाएं और भारत के साथ उनके खट्टे-मीठे संबंध

हैरी एस. ट्रुमैन (1945-1953)
✪ 'ट्रुमैन डॉक्ट्रिन' ने अमेरिका की नई राह गढ़ी, शीत युद्ध की शुरुआत
✪ सेना में भेदभाव खत्म किया
✪ अमेरिका कोरिया युद्ध में शामिल हुआ (1950)
मीठा: अकाल का सामना कर रहे भारत को खाद्य सहायता दी
खट्टा: शीत युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति से खटास की शुरुआत

हैरी एस. ट्रुमैन (1945-1953)

ड्विाइट डी. आइजनहावर (1953-1961)
✪ कोरिया युद्ध खत्म; 1953 में कम्युनिस्ट विरोधी दक्षिण पूर्व एशियाई संधि संगठन (सीटो) का गठन
मीठा: भारत यात्रा पर आने वाले अमेरिका के पहले पदस्थ राष्ट्रपति (1960); आर्थिक सहायता, भारत को चीन के खिलाफ संतुलनकारी के रूप में देखा गया
खट्टा: पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध घनिष्ठ हुए जब वह बगदाद संधि के तहत सीटो में शामिल हुआ

जॉन एफ. कैनेडी (1961-1963)
✪ बे ऑफ पिग्स: क्यूबा में शासन के तख्तापलट की नाकाम कोशिश
✪ क्यूबा मिसाइल संकट सोवियत संघ की मदद से सुलझ गया
मीठा: चीन के साथ लड़ाई के बाद और इस दौरान आर्थिक/ सैन्य सहायता; तीसरी पंचवर्षीय योजना के लिए 1 अरब डॉलर की मदद
खट्टा: सैन्य कार्रवाई के जरिए गोवा का अधिग्रहण करने पर भारत की आलोचना

लिंडन बी. जॉनसन (1963-1969)
✪ 1964 के नागरिक अधिकार अधिनियम पर हस्ताक्षर. नस्ल, रंग, धर्म आदि के आधार पर भेदभाव गैरकानूनी घोषित
✪ वियतनाम युद्ध में बढ़ी हुई भागीदारी (1964-)
मीठा: हरित क्रांति को समर्थन; खाद्य सहायता जारी, लेकिन घटी मात्रा के साथ
खट्टा: 1965 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई में तटस्थ रहा

रिचर्ड निक्सन (1969-1974)
✪ अपोलो 11 मिशन ने पहली बार मानव को चंद्रमा पर उतारा
✪ चीन यात्रा (1972) से चीन-अमेरिकी संबंधों में नए युग की शुरुआत; वॉटरगेट कांड (1972-74)
मीठा: 3 अरब डॉलर मूल्य के खाद्य भुगतान पर ब्याज माफ
खट्टा: 1971 के युद्ध में पाकिस्तान का समर्थन, छठे बेड़े को बंगाल की खाड़ी में जाने का आदेश

रिचर्ड निक्सन (1969-1974)

गेराल्ड फोर्ड (1974-1977)
✪ सैगोन के अंत के साथ ही वियतनाम में अमेरिकी भागीदारी खत्म (1975)
मीठा: 'अधिक उत्पादक दीर्घावधि संबंधों के लिए' भारत-अमेरिकी संयुक्त आयोग गठित 
खट्टा: इंदिरा गांधी के आपातकाल की आलोचना; भारत यात्रा स्थगित

जिमी कार्टर (1977-1981)
✪ अमेरिका ने मिस्र और इजराइल के बीच शांति संधि की पहल की (1978)
✪ तेहरान में अमेरिकी बंधक संकट ('79)
मीठा: 1978 में भारत यात्रा, गुड़गांव में एक गांव का नाम कार्टरपुरी किया गया; भारत-अमेरिकी व्यापार बढ़ा
खट्टा: अफगानिस्तान में सोवियत आक्रमण की आलोचना न करने पर अमेरिका भारत से चिढ़ा; प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर से इनकार किया, भारत ने संवर्धित यूरेनियम की बात नकारी

रोनाल्ड रीगन (1981-1989)
✪ सामरिक रक्षा पहल एंटी मिसाइल शील्ड (1983); ईरान-कोंट्रा मामला
मीठा: भारत को जेट इंजन, सुपरकंप्यूटर देने पर राजी; श्रीलंका में भारतीय हस्तक्षेप का समर्थन; इंदिरा और राजीव गांधी की अमेरिका की राजकीय यात्रा
खट्टा: पाकिस्तान को 2.5 अरब डॉलर का हथियार पैकेज

जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (1989-1993)
✪ कम्युनिस्ट साम्राज्यों के ढहने के साथ ही शीत युद्ध की समाप्ति
✪ पहला खाड़ी युद्ध (1991) इराक की हार के साथ खत्म हुआ
मीठा: घरेलू वित्तीय संकट (1991) से निबटने के लिए भारत को आइएमएफ कर्ज का समर्थन
खट्टा: खाड़ी युद्ध के दौरान मुंबई में अमेरिकी सैन्य विमानों में ईंधन भरे जाने पर बवाल खड़ा हो गया

बिल क्लिंटन (1993-2001)
✪ अमेरिकी मदद से ओस्लो समझौते के फलस्वरूप वेस्ट बैंक, गजा में फलस्तीनियों की स्वयं की सरकार की अनुमति
मीठा: भारत की राजकीय यात्रा (2000) से अमेरिकी नीति में बदलाव की शुरुआत; उसने भारत के आर्थिक रूप से संभावनाशील होने को मान्यता दी
खट्टा: पोकरण एटमी परीक्षण के बाद भारत पर प्रतिबंध; पाकिस्तान को मदद फिर से शुरू

बिल क्लिंटन (1993-2001)

जॉर्ज डब्ल्यू. बुश (2001-2009)
✪ 9/11 हमले से आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई की शुरुआत; तालिबान बेदखल 
✪ इराक के साथ जंग, सद्दाम शासन का पतन
मीठा: भारत-अमेरिकी एटमी करार से भारत वैश्विक नाभिकीय अलगाव से बाहर आया; भारत को घनिष्ठ सहयोगी के रूप में मान्यता के कदम
खट्टा: पाकिस्तान को गैर-नाटो साथी देश का दर्जा

बराक ओबामा (2009-2017)
✪ ओसामा बिन लादेन मारा गया (2011); इराक युद्ध खत्म
मीठा: बड़े रक्षा साझेदार के रूप में भारत का कद बढ़ाया; एशिया-प्रशांत की स्थिरता में भारत की भूमिका की जरूरत बताई
खट्टा: भारत को एनएसजी में शामिल कराने में नाकाम

डोनाल्ड ट्रंप (2017-2021)
✪ अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से बाहर हुआ
मीठा: अमेरिका-भारत व्यापक वैश्विक सामरिक साझेदारी; अमेरिका ने चीन के साथ सीमा विवाद के दौरान भारत का समर्थन किया
खट्टा: भारत को प्राथमिकताओं वाली सामान्यीकृत प्रणाली से बाहर किया गया जिसके तहत अमेरिकी बाजारों में शुल्क मुक्त निर्यात की इजाजत थी 

डोनाल्ड ट्रंप (2017-2021)

जो बाइडन
(2021-)
✪ अफगानिस्तान से वापसी; व्यापार, जासूसी, ताइवान को लेकर चीन के संग तनाव
मीठा: प्रधानमंत्री मोदी की 2023 की अमेरिकी यात्रा के दौरान अंतरिक्ष, 5जी-6जी और सेमीकंडक्टरों में कई समझौते; जीई एफ414 जेट इंजन, सामरिक खुफिया और काफी कुछ समझौते हुए
खट्टा: खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश में भारत का हाथ होने के आरोपों से संबंधों में खटास

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत में शायद उस तरह की फिक्र या घबराहट न पैदा हो जैसा कि दूसरे देशों में होने वाली है. भारत और अमेरिका, जैसा कि मोदी कहते हैं, 'इतिहास के ऊहापोह और झिझक' से उबर आए हैं. अब उनके बीच मजबूत रणनीतिक रिश्ते हैं.

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