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महाराष्ट्र : वजूद बचाने की जंग में शिंदे मारेंगे बाजी या उद्धव करेंगे वापसी?

महाराष्ट्र के चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है. छह पार्टियों के साथ दो गठबंधनों के बीच जटिल मुकाबला. ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया. यह दो क्षेत्रीय गठजोड़ों को गुमनामी में भेज सकता है तो दो को ताज भी दिला सकता है. राष्ट्रीय राजनीति पर भी उसका सीधा असर पड़ने जा रहा

अगस्त में लाडकी बहिन योजना के लोकार्पण के दौरान महायुति के नेता
अगस्त में लाडकी बहिन योजना के लोकार्पण के दौरान महायुति के नेता
अपडेटेड 6 नवंबर , 2024

सबसे पहले वस्तुस्थिति पर एक नजर डालते हैं. 1990 में महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार बनने के बाद बीते 30 साल में राज्य में छह विधानसभा चुनाव हुए हैं, और उनमें किसी भी पार्टी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला. इसका मतलब है कि गठबंधन सरकारें राज्य की नियति बन चुकी हैं. भारत की आर्थिक राजधानी में आगामी विधानसभा चुनाव भी ज्यादा अलग नहीं होंगे, सिवाय इसके कि राज्य ने बीते पांच वर्ष में तीन मुख्यमंत्री और तीन सरकारें देखी हैं.

दो बड़े क्षेत्रीय दल दो-फाड़ हो चुके हैं. इससे अप्रत्याशित गठबंधन वजूद में आए और सियासी दशा-दिशा भी बहुत विखंडित हो चुकी है. इस बार दो प्रमुख गठबंधन चुनाव मैदान में हैं. एक ओर सत्तारूढ़ महायुति (महागठबंधन) है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे वाला शिवसेना गुट और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शामिल है.

उनका मुकाबला इंडिया ब्लॉक के एमवीए यानी महा विकास अघाड़ी (महाराष्ट्र के विकास के लिए महागठबंधन) से है. इसमें पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अगुआई वाली शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी शिवसेना (यूबीटी), गठबंधन के मुख्य सूत्रधार शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) और कांग्रेस शामिल हैं.

मुंबई में पार्टी की एक सभा के दौरान एमवीए नेता

दोनों ही गठबंधन और उसके घटक अपने-अपने वजूद की महा-जंग में कूद चुके हैं. यह जंग न सिर्फ उनका बल्कि राज्य और कुछ मायने में देश का भविष्य भी तय करेगी. महाराष्ट्र न केवल देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला राज्य है, बल्कि 48 सीटों के साथ लोकसभा सीटों की संख्या के मामले में भी दूसरे नंबर पर आता है. इस साल आम चुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा की सीटों की संख्या 14 घट गई. पार्टी को 2019 में 23 के मुकाबले 2024 में सिर्फ नौ सीटें मिलीं.

दूसरे प्रमुख राज्य यूपी में भी सीट घटने के साथ भगवा पार्टी 240 सीटों पर सिमट गईं, जो बहुमत से 32 कम हैं. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा झटका था, जिन्होंने पहले दो कार्यकाल की तरह इस बार भी भाजपा को अपने बलबूते पूर्ण बहुमत मिलने की उम्मीद लगा रखी थी.

वैसे, हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों से पार्टी को जरूर संजीवनी मिली, और इस आश्चर्यजनक जीत ने उसका मनोबल बढ़ा दिया. मगर असल मायने रखते हैं महाराष्ट्र के चुनाव. भाजपा गठबंधन की जीत मोदी के लिए केंद्र में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने में मददगार होगी. वहीं, हार तीसरे कार्यकाल को अनिश्चितता की तरफ बढ़ा सकती है.

इस चुनाव में न केवल भाजपा बल्कि दोनों गठबंधनों के अन्य दलों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है. दो गुटों के बीच जंग का नतीजा तय करेगा कि असली शिवसेना कौन है. इसी तरह एनसीपी में पवार सीनियर और उनके भतीजे अजित अपने-अपने गुटों का झंडा बुलंद रखने के लिए एक-दूजे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं. हरियाणा में चौंकाने वाली हार के बाद अगर कांग्रेस की मदद से एमवीए भाजपा की अगुआई वाले महायुति को सत्ता से बाहर करने में सफल रहा तो भाजपा की सियासी पूंजी में सेंध लगने के साथ राहुल गांधी के अभियान को भी मजबूती मिलेगी.

और कांग्रेस अगली बड़ी लड़ाई यानी बिहार विधानसभा चुनाव में खुद को मजबूत स्थिति में खड़ा कर पाएगी. बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) की 15 लोकसभा सीटों पर जीत के बाद, भाजपा केंद्र सरकार की स्थिरता के लिए उस पर बहुत ज्यादा निर्भर है. अगर महाराष्ट्र और फिर बिहार में भाजपा हार जाती है तो वह मोदी सरकार के लिए बड़ी परेशानी होगी और शासन के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है.

महाराष्ट्र में एमवीए मनोवैज्ञानिक लाभ के साथ चुनाव मैदान में होगा. विपक्षी गठबंधन ने हालिया चुनाव में राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 31 पर कब्जा जमाया, जबकि महायुति के खाते में सिर्फ 17 सीटें आई थीं. कांग्रेस ने 13 सीटों के साथ शानदार प्रदर्शन किया, जबकि शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) ने क्रमश: नौ और आठ सीटें जीतीं. वैसे, कई चुनौतियां भी हैं. एमवीए ने ज्यादा संख्या में सीटें जीतीं, इसके बावजूद दोनों गठबंधनों को मिले वोटों का अंतर सिर्फ 2,00,000 से थोड़ा ही अधिक था.

एमवीए को 288 विधानसभा क्षेत्रों में से 158 में बढ़त मिली और महायुति को केवल 125 में, फिर भी 31 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 5,000 से कम रहा. विधानसभा चुनावों में मुद्दे आम चुनाव से एकदम अलग होते हैं, ऐसे में यह तय कर पाना मुश्किल ही है कि नवंबर में कांटे की इस टक्कर में मतदाताओं का रुख किसका पलड़ा भारी करेगा.

राष्ट्रीय स्तर पर भी ये चुनाव बेहद अहम हैं. भाजपा की अगुआई वाले महायुति की जीत से मोदी को केंद्र में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद मिलेगी, वहीं हार उनके तीसरे कार्यकाल को अनिश्चितता की ओर ढकेल सकती है और इंडिया गठबंधन को मजबूत कर सकती है.

सेना बनाम सेना

आखिर शिवसेना का कौन-सा गुट विजेता बनकर उभरेगा, इसका फैसला काफी हद तक आगामी चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा. 2019 में भाजपा और अविभाजित शिवसेना गठबंधन ने राज्य की 288 सीटों में से 161 पर जीत हासिल की, जिसमें भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिली थीं.

मगर शिवसेना को मुख्यमंत्री पद न मिलने से नाराज उद्धव ठाकरे ने गठबंधन तोड़ लिया था. उन्होंने अविभाजित एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर एमवीए बनाया तथा मुख्यमंत्री बन गए. मगर जून 2022 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा जब उनके डिप्टी एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और पार्टी के 39 विधायकों को अपने साथ लेकर भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे.

मुंबई में 12 अक्तूबर को शिवसेना के अपने-अपने गुट की दशहरा रैली में एकनाथ शिंदे

लोकसभा चुनाव में असली शिवसेना की लड़ाई बराबरी पर रही, जब शिवसेना (यूबीटी) ने नौ सीटें हासिल कीं, जो शिंदे की सेना से सिर्फ दो ज्यादा थीं. अब, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ाई का दूसरा दौर होगा और इसमें जीत हासिल करने वाला ही बालासाहेब ठाकरे और शिवसेना की विरासत का असली हकदार होगा.

ठाकरे वाली सेना फिलहाल संघर्ष करती दिख रही है क्योंकि लोकसभा चुनाव में मुंबई, कोंकण और मराठवाड़ा क्षेत्रों में उनका मूल मराठी जनाधार घटता दिखा है. पार्टी कुछ सीटें आसानी से जीत गई, मगर इसका मूल कारण मुसलमानों का समर्थन था. शिवसेना (यूबीटी) नेताओं का मानना है कि शिंदे और उनके 'गद्दार विधायकों’ के खिलाफ सत्ता और धन के लालच में पार्टी तोड़ने का नैरेटिव इस चुनाव में असर करेगा. उनका कहना है कि पार्टी के कुछ मूल मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में 'मोदी को वोट दिया’ होगा, पर राज्य चुनाव में वे शिवसेना के प्रति अपनी निष्ठा बरकरार रखेंगे.

वहीं, शिंदे वाली शिवसेना का कहना है कि 90,000 करोड़ रुपए से अधिक की कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत ठाकरे या एमवीए के प्रति किसी भी तरह की सहानुभूति पर भारी पड़ेगी. शिंदे ने तो खासकर मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना का श्रेय लेने के साथ गठबंधन सहयोगियों भाजपा और एनसीपी को पीछे छोड़ दिया है.

यह गरीब परिवारों की करीब 2.5 करोड़ महिलाओं को 1,500 रुपए प्रति माह प्रदान करने की योजना है. शिंदे के लिए सत्ता में हिस्सेदारी अपने गुट को एकजुट रखने के लिहाज से भी बेहद अहम है. वैसे अभी तक तो वे अपने पूर्व नेता ठाकरे से बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि एमवीए ने अभी अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने की शिवसेना (यूबीटी) की मांगों को दरकिनार कर दिया है. ठाकरे गुट का कहना है कि उन्हें सीएम उम्मीदवार घोषित करने से यूबीटी गुट को एकजुट रखने में मदद तो मिलेगी ही, शिंदे खेमे में चले गए कुछ नेताओं को भी वापसी के लिए लुभाया जा सकेगा.

मुंबई में 12 अक्तूबर को शिवसेना के अपने-अपने गुट की दशहरा रैली में उद्धव ठाकरे

बहरहाल, सेना के दोनों गुटों के लिए यह अपना वजूद बचाने की लड़ाई है. एमवीए की जीत शिंदे का सफाया कर सकती है तो महायुति की जीत भविष्य में ठाकरे के कद को बहुत घटा देगी. शिंदे सेना के पूर्व सांसद राहुल शेवाले कहते हैं कि नतीजे तय करने में लाडकी बहिन जैसी योजनाओं की अहम भूमिका होगी. दरअसल, पूरा चुनाव अभियान एमवीए के 'महाराष्ट्र गौरव’ बनाम महायुति की 'लाभार्थी’ योजनाओं पर केंद्रित लगता है.

शेवाले कहते हैं, ''प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में करीब 70,000 महिलाएं लाडकी बहिन लाभार्थी हैं. उनमें अगर आधी भी हमें वोट देती हैं तो भी बहुकोणीय लड़ाई में फायदा हमें ही मिलेगा.’’

उधर, एमवीए का ध्यान 'केंद्रीय एजेंसियों का डर’ दिखाकर दो बड़ी पार्टियों को बांटने की 'राजनैतिक दुर्भावना’ को मुद्दा बनाने पर है. एमवीए नेता कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी मुद्दे के तौर पर बेअसर मान रहे हैं. उनका दावा है कि भारी-भरकम खर्च वाली लोकलुभावनी योजनाएं भले मध्य वर्ग की वोटिंग में थोड़ा उलटफेर करें, मगर लाभार्थियों में से अधिकांश मुस्लिम और दलित हो सकते हैं, जो महायुति का स्वाभाविक मतदाता वर्ग नहीं है.

शिंदे की ताकत

● शिंदे गुट को अब भी शिवसेना नेताओं और विधायकों के बड़े हिस्से का समर्थन हासिल है.

● गरीब महिलाओं के लिए लाडकी बहिन समेत 90,000 करोड़ रुपए की नई कल्याणकारी योजनाओं का श्रेय शिंदे खुद को देते हैं.

● चुनाव आयोग ने उनके पक्ष में फैसला दिया, उन्हें शिवसेना का मूल नाम और तीर धनुष का चुनाव चिह्न दिया.

● लोकसभा चुनाव में बहुत खराब प्रदर्शन नहीं किया, लड़ी गई 15 सीटों में से सात पर जीत हासिल की.

उद्धव की ताकत

● ठाकरे नाम और सहानुभूति का फैक्टर अभी भी शिवसेना (यूबीटी) के लिए तुरुप का पत्ता.

● पार्टी को उम्मीद है कि शिंदे गुट के खिलाफ उसका यह नैरेटिव काम आएगा कि शिंदे और उनके ''गद्दार विधायकों’’ ने पार्टी तोड़ दी.

● करो या मरो वाली इस चुनावी जंग में शिवसेना के वफादार उद्धव के समर्थन में एकजुट हो सकते हैं.

● पार्टी कांग्रेस के और मुस्लिम वोट को अपने पाले में करने में काफी हद तक कामयाब रही है.

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पवार बनाम पवार

सतारा के फलटण में आयोजित एक सार्वजनिक सभा में शाही परिवार के पूर्व सदस्य संजीवराजे नाइक निंबालकर और स्थानीय एनसीपी विधायक दीपक चव्हाण एनसीपी (एसपी) गुट में शामिल हुए. इस मौके पर सभा को संबोधित करते हुए पार्टी प्रमुख शरद पवार ने हुंकार भरी, ''चिंता न करो... 84 साल का हो या 90 का, यह बूढ़ा अभी रुकने वाला नहीं है. यह बूढ़ा तब तक आराम नहीं करेगा जब तक पक्का न कर ले कि महाराष्ट्र सही रास्ते पर है."

जुलाई 2023 में जब भतीजे अजित पवार ने महायुति का हिस्सा बनने के लिए एनसीपी के अधिकतर विधायकों के साथ उनकी पार्टी को दो-फाड़ कर दिया था, तब मीडिया ने पवार सीनियर से पूछा था कि अब पार्टी को भरोसा दिलाने वाला चेहरा कौन होगा. इस पर पवार ने बस यही कहा था, "शरद पवार." बाद के घटनाक्रम ने उनकी बात को सही भी साबित किया.

शरद पवार बारामती में

लोकसभा चुनाव में एनसीपी (एसपी) ने जिन 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से आठ पर जीत हासिल की, जबकि अजित की एनसीपी ने जिन चार सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें सिर्फ एक पर जीत पाई. सीनियर पवार ने भतीजे को अपने पारिवारिक गढ़ बारामती में भी करारी शिकस्त दी, जहां उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने अजित की पत्नी सुनेत्रा पवार को हरा दिया. वह भी तब जब अजित को भी शिवसेना की तरह एनसीपी का नाम और अधिकृत चुनाव चिह्न घड़ी मिल गया था.

ऐसे में शरद खेमे को नया नाम और चुनाव चिह्न अपनाना पड़ा, जो तुरही बजाता एक व्यक्ति है. अजित खेमे की मौजूदा स्थिति भांपकर ही निंबालकर और पूर्व मंत्री राजेंद्र शिंगणे जैसे कुछ विश्वस्त सहयोगी भतीजे का साथ छोड़कर सीनियर पवार के खेमे में लौटने को बेताब हुए हैं.

पवार के एक सहयोगी के मुताबिक, "साहेब (पवार सीनियर को इस नाम से जाना जाता है) को जनसमर्थन मिल रहा है क्योंकि लोग उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखते हैं, जो दिल्ली में सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ खड़ा है, जिसकी गूंज राज्य के इतिहास में भी सुनाई देती है." पवार सीनियर इस वक्त जितने लोकप्रिय हैं, उतने पहले कभी नहीं दिखे.

जब 2023 में अजित को महायुति का हिस्सा बनाया गया, उस वक्त माना जा रहा था कि वे महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने के लिए ऐसा कुछ कर पाएंगे जो शिंदे नहीं कर सकते. अजित समर्थक उन्हें सीएम-इन-वेटिंग तक बताने लगे थे. मगर अब शिंदे वह व्यक्ति बन चुके हैं, जिनके तरकश में तीरों की कमी नहीं है और अजित चुपचाप अपनी लड़ाई जारी रखते हुए सियासी गुमनामी से बचने के लिए सम्मानजनक संख्या में सीटें लाने की जुगत में लगे हैं.

मुंबई में अपने एनसीपी गुट की बैठक में अजित पवार

ऐसे संकेत हैं कि उन्हें गठबंधन में सबसे कम सीटें मिल सकती हैं जो करीब 60 हो सकती हैं, जबकि भाजपा को 160 और शिंदे को करीब 70 सीटें मिल सकती हैं. वैसे, कुछ चीजें अभी भी अजित के पक्ष में हैं. एक तो यह कि भाजपा के पास पश्चिमी महाराष्ट्र में शरद पवार से मुकाबले की कोई पुख्ता रणनीति नहीं है, जहां अजित अभी भी सबसे प्रबल दावेदारी रखते हैं; और दूसरी बात मूल एनसीपी के अधिकतर स्थानीय क्षत्रप भतीजे के साथ हैं, जो 'फ्रैंचाइजी मॉडल’ की राजनीति में काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं.

शरद की ताकत

● शरद पवार को एमवीए की धुरी माना जा रहा, एक ऐसा शख्स जिसने मोर्चा संभाल रखा है.

● एनसीपी (एसपी) ने अजित गुट को लोकसभा चुनाव में करारी मात दी, उसे 8 सीटें मिलीं, अजित गुट को केवल एक.

● शरद की लोकप्रियता आज जितनी कभी नहीं रही, उनके साथ अविभाजित एनसीपी के मूल वोटरों और ग्रामीण जनता की सहानुभूति है.

● कुछ क्षेत्रों में संभावित मराठा एकजुटता उनकी मदद कर सकती है.

अजित की ताकत

● अजित के पास 40 एनसीपी विधायक और पार्टी का आधिकारिक नाम तथा घड़ी सिंबल है.

● वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने महिलाओं के लिए लाडकी बहिन स्कीम का श्रेय लेने की कोशिश की है.

● अजित भाजपा के लिए पश्चिम महाराष्ट्र में अभी भी बेहद अहम हैं. पार्टी 'फ्रैंचाइजी मॉडल’ की राजनीति में काफी फायदेमंद साबित हो सकती है.

● अजित की महिला-हितैषी छवि उनकी मदद कर सकती है.

भाजपा बनाम कांग्रेस

महाराष्ट्र में भाजपा की मौजूदगी भले कुछ ज्यादा मजबूत हो, मगर राष्ट्रीय मंच पर असर के मद्देनजर पार्टी राज्य में कांग्रेस की पैठ फिर बढ़ने से सतर्क है. देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में 13 सीटें जीत लीं, जो भाजपा से चार ज्यादा थीं, वैसे उसकी 16.7 फीसद वोट हिस्सेदारी भाजपा के 26.7 फीसद की हिस्सेदारी से काफी कम थी (वजह कांग्रेस का कम सीटों पर चुनाव लड़ना था).

बेशक, कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) के समर्थन की बदौलत भी हुआ. भाजपा की असली फिक्र यह है कि 2014 के विधानसभा चुनाव में 122 सीटों के शिखर से 2019 में उसकी संख्या घटकर 105 रह गई थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी बढ़त सिर्फ 83 विधानसभा क्षेत्रों में थी. महायुति के चुनाव जीतने और सरकार बनाने के लिए भाजपा को कम से कम 80 सीटें जीतनी होंगी, ताकि बागडोर उसके हाथ में बनी रहे.

साथ ही उसे यह भी उम्मीद करनी होगी कि शिंदे की शिवसेना और अजित की एनसीपी बाकी 65 सीटें लेकर आएं, ताकि 145 सीटों के बहुमत के आंकड़ों को छुआ जा सके.

जलगांव में एक रैली में महायुति नेताओं के साथ पीएम मोदी

एक बड़ा मसला उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लेकर है, जो कभी भाजपा के स्टार प्रचारक और पूर्व मुख्यमंत्री थे, लेकिन बाद में उन्हें मुख्यमंत्री शिंदे के नीचे दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने को मजबूर होना पड़ा. उधर सरकार की नीतियां और राजकाज शिंदे लगातार अपनी मुट्ठी में करते गए हैं. फडणवीस की छवि को भी भारी झटका लगा है क्योंकि आम राय यही है कि शिवसेना और एनसीपी में टूट-फूट के दोषी वही हैं.

वे बतौर गृह मंत्री हाल में एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी हत्याकांड और मुंबई के पास बदलापुर में नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी अक्षय शिंदे की 'पुलिस मुठभेड़' में मौत के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं. फडणवीस अब एक पीआर अभियान के जरिए अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रहे हैं और खुद को 'देवा भाऊ’ के रूप में ब्रान्ड कर रहे हैं, जिसने विकास और जनता के लिए काम किया.

भाजपा की एक बड़ी दुखती रग पार्टी से मराठों का मोहभंग है, जो मनोज जरांगे-पाटील के नेतृत्व में आरक्षण के लिए आंदोलन में दिखाई देता है. मराठा समुदाय (आबादी में लगभग 12-16 फीसद) मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र क्षेत्रों में प्रभावी है, जहां 104 सीटें हैं. इसके जवाब में भाजपा अपने 'माधव’ फॉर्मूले पर आश्रित है, ताकि पिछड़े माली, धनगर और वंजारी वोटों को गोलबंद किया जा सके.

लेकिन जाति/धर्म के 450 वर्गों में बंटे पिछड़ों को एक ओबीसी पहचान में लामबंद करना मुश्किल है. मराठवाड़ा (46 सीटें) के अलावा, भाजपा अपने गढ़ विदर्भ (62 सीटें) में भी कृषि संकट और ग्रामीण असंतोष की वजह से पिछड़ी हुई है. भाजपा के सामाजिक गठबंधनों में मतभेद पहले से ही उभर रहे हैं. मराठा-कुनबी जाति समूह के बाद दूसरा सबसे बड़ा सामाजिक समूह धनगर (गड़रिया समुदाय) भाजपा से इसलिए नाराज है क्योंकि वह उन्हें आदिवासी का दर्जा देने के 2014 के चुनावी वादे से मुकर गई.

राहुल गांधी अमरावती में राज्य कांग्रेस नेताओं संग

महायुति ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी उपायों को मंजूरी देकर ब्राह्मणों, राजपूतों, लिंगायतों और अगरियों जैसे छोटे जाति समूहों का सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की है. इसके अलावा वह अपने मूल हिंदुत्व वाले मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए ध्रुवीकरण की राजनीति पर जोर दे रही है.

एक भाजपा नेता के मुताबिक, उन्हें उम्मीद है कि एमवीए के लिए मुस्लिम और अल्पसंख्यक मतदाताओं की लामबंदी की खबरें हिंदुओं में 'जवाबी गोलबंदी’ पैदा करेंगी. भाजपा को इसका भी बड़ा फायदा है कि संघ परिवार के काडर जमीन पर पार्टी के लिए काम करना शुरू कर चुके हैं. फिर, प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता, 'डबल इंजन’ सरकार सरीखे कई मुद्दे भी अपनी भूमिका निभाएंगे.

लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस की पांत में कई कमजोरियां हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राधाकृष्ण विखे-पाटील समेत पहले तथा दूसरे दर्जे के नेताओं के भाजपा में चले जाने से कांग्रेस कमजोर हुई है. मगर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को इससे राहत महसूस होती है कि पार्टी के मूल वोट आधार—मुस्लिम, आदिवासी और दलित—में एकजुटता दिख रही है, जैसा कि लोकसभा के नतीजों से स्पष्ट हो गया. विदर्भ के नतीजों से यह भी संकेत मिला कि किसान पार्टी की ओर लौट रहे हैं.

कांग्रेस के एक पदाधिकारी का कहना है, ''कृषि क्षेत्र संकट और सत्ता विरोधी लहर से भाजपा को विदर्भ में नुन्न्सान होगा.’’ इस क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है, इसलिए कांग्रेस अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए किसी एक नेता के बजाए स्थानीय क्षत्रपों पर भरोसा कर रही है. पार्टी नेताओं का दावा है कि उन्हें लोकप्रिय जनादेश मिल रहा है और उनका मानना है कि उनके मुख्य आकर्षण राहुल गांधी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. पार्टी ने उन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है, जहां से उनकी भारत जोड़ो यात्रा गुजरी थी.

बहरहाल, महाराष्ट्र की यह चुनावी लड़ाई लगातार दो-तरफा होती जा रही है, मगर दोनों प्रमुख मोर्चों को छोटे दलों और गठबंधनों से भी जूझना पड़ सकता है. मसलन, 'परिवर्तन महाशक्ति मराठा नेताओं और किसान समूहों का तीसरा मोर्चा है. उसका नेतृत्व कोल्हापुर राजवंश के पूर्व सांसद संभाजीराजे छत्रपति कर रहे हैं.

इसके अलावा, बाबासाहेब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए); राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस); असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) और मनोज जरांगे-पाटील का मराठा मोर्चा भी मैदान में है. ये मोर्चे एमवीए और महायुति दोनों की योजनाओं में खलल पैदा कर सकते हैं. ये सभी बातें इस चुनाव को महा-उलझन वाला चुनावी मुकाबला बनाती हैं.

भाजपा की ताकत

● संघ परिवार काम में जुट चुका है. भाजपा की मशहूर चुनावी मशीनरी ने वापस अपनी रफ्तार पकड़ ली है.

● कांग्रेस से आए कुछ दल-बदलुओं समेत मजबूत स्थानीय नेता मैदान में उतर चुके हैं.

● फिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर जोर दे रही है. उसे उम्मीद है कि एमवीए के लिए अल्पसंख्यक वोटों के एकजुट होने से हिंदू वोटों का ''जबावी ध्रुवीकरण’’ होगा.

● उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस खुद को नई शक्ल दे रहे हैं और 'देवा भाऊ’ (प्यारे भाई) के रूप में खुद की ब्राडिंग कर रहे हैं.

कांग्रेस की ताकत

● ऐसा लगता है कि उसके मूल वोटर मुसलमान, दलित और आदिवासी उसके पास वापस लौट आए हैं.

● विदर्भ इलाके में लोकसभा नतीजे से संकेत मिलता है कि कृषक वर्ग का भी उसके प्रति झुकाव हुआ है.

● लोकसभा चुनाव नतीजों ने उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त दी. इस पार्टी ने महाराष्ट्र में 13 सीटें हासिल कीं जो अन्य पार्टियों के मुकाबले सबसे अधिक हैं.

● राहुल गांधी ने खुद को मतदाताओं को लुभाने वाला असरदार शख्स साबित किया है. उनकी दो यात्राएं जिधर से गुजरीं, वहां पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा.

मुंबई  (36)

● किफायती आवास की कमी के कारण मध्य वर्ग शहर की सीमाओं से बाहर जाने को मजबूर.

● झुग्गी पुनर्विकास परियोजनाओं में देरी, धारावी की झुग्गी बस्तियों में रहने वालों में नाराजगी.

● बेस्ट बसों सहित सार्वजनिक परिवहन का बुनियादी ढांचा बदहाल.

ठाणे और कोंकण  (39)

● वधावन बंदरगाह, विरार-अलीबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर और बारसू में पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी जैसी परियोजनाओं को लेकर नाराजगी क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर पर्यावरण और आजीविका प्रभावित होने की आशंका.

● बेरोजगारी के कारण रायगढ़ जैसी जगहों से युवाओं का पलायन.

● फसलों के नुक्सान और राहत उपायों के अभाव में आम के किसान परेशान.

● मराठों की ओबीसी श्रेणी में शामिल करने की मांग से अच्छी-खासी संख्या वाले कुनबी जैसे महत्वपूर्ण समूहों में गुस्सा.

पश्चिम महाराष्ट्र (58)

● नौकरियों की कमी, महाराष्ट्र से गुजरात जा रही बड़ी परियोजनाएं.

● अग्निवीर योजना से युवाओं के बीच रक्षा बलों में करियर का आकर्षण घटा.

● मराठा और धनगर कोटा की मांग.

● कम बारिश वाले इलाकों में सिंचाई योजनाओं और पीने योग्य पानी की कमी.

उत्तर महाराष्ट्र (47)

● 'ओला दुश्काल
 (अत्यधिक बारिश) से प्रभावित लोगों के लिए मुआवजा नहीं.

● धनगर कोटे की मांग, पेसा क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों की भर्ती को लेकर आदिवासियों में नाराजगी.

● नंदुरबार जैसे आदिवासी इलाकों में सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर खराब.

● प्याज उत्पादक नीतियों से नाराज.

विदर्भ (62)

● कपास/सोयाबीन किसान लाभकारी मूल्य निर्धारण न होने से नाराज.

● बाघ-तेंदुआ प्रभावित क्षेत्रों में आपसी संघर्ष.

● औद्योगिक विकास का फायदा नागपुर जैसे शहरी केंद्रों तक सीमित.

● युवाओं के लिए नौकरी के अवसर नहीं.

मराठवाड़ा (46)

● मराठा कोटे की मांग और मराठा बनाम ओबीसी विभाजन.

● भाजपा और फडणवीस से नाराजगी.

● कृषि संकट, उपज का बाजार मूल्य कम होने से सोयाबीन किसानों में आक्रोश.

● विकास, उद्योगीकरण और नौकरियों का अभाव.

कौन कितने पानी में 

महायुति ताकत

● अभियान में संसाधनों के व्यापक इस्तेमाल और सूक्ष्म प्रबंधन की क्षमता.

● उप-क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत आधार वाले नेता.

● लाडकी बहिन जैसी कल्याणकारी नगद हस्तांतरण वाली योजनाएं.

कमजोरी

● सत्ता-विरोधी भावना.

● लोकसभा के नतीजों से मनोबल में गिरावट.

● मराठों, दलितों, आदिवासियों, धनगरों और किसानों में नाराजगी.

अवसर

● कल्याणकारी योजनाओं के सहारे जाति के बजाए महिलाओं और बुजुर्गों का एक मतदाता वर्ग तैयार करना.

● महानगरीय राजनीति के बढ़ते प्रभाव ने भाजपा जैसी पार्टियों के आधार को मजबूती दी.

● शिवसेना का मूल नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न सीएम एकनाथ शिंदे गुट के पास.

चुनौतियां

● यह धारणा बढ़ रही है कि घटती नौकरियों के बीच बड़ी परियोजनाएं गुजरात चली गईं.

● पवार सीनियर और उद्धव ठाकरे की पार्टियों के दो-फाड़ होने से उनके प्रति सहानुभूति.

● भाजपा-एनसीपी गठबंधन से मूल वोटरों में नाराजगी
महा विकास अघाड़ी.

ताकत

● मराठों के साथ-साथ दलित, आदिवासी, ओबीसी, मुस्लिम वर्ग भी महायुति से असंतुष्ट.

● मिला-जुला इंद्रधनुषी गठबंधन बनाया.

● लोकसभा चुनाव में एमवीए ने 48 सीटों में से 31 पर कब्जा जमाया.

कमजोरी

● लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद अति-आत्मविश्वास.

● कांग्रेस में गुटबाजी; शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस का एक-दूसरे पर निशाना साधना.

अवसर

● महायुति की 'रेवड़ी’ परंपरा से मध्य वर्ग खफा.

● दो-फाड़ होने के बाद शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) में नए नेतृत्व का उदय.

चुनौतियां

● शिवसेना का मूल आधार रहे मतदाताओं के एक हिस्से का भाजपा और शिंदे की सेना की ओर आकृष्ट होना.

● एमवीए के इंद्रधनुषी गठबंधन के अलग-अलग घटकों के हितों को लेकर संतुलन साधना.

● टिकटार्थियों की बड़ी संख्या के कारण स्थानीय स्तर पर बगावत के आसार; दूसरी ओर बहुकोणीय मुकाबले में मुस्लिम, मराठा वोट में सेंध लगा सकती हैं छोटी पार्टियां.

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