scorecardresearch

मनु भाकर : बेजोड़ पिस्तौलबाज बिंदास लड़की

पेरिस ओलपिंक-2024 मनु भाकर के लिए ओलंपिक पदक के मायने में ही अहम नहीं, टोक्यो 2020 की हार का भूत भगाने के लिए भी खास. एक चैंपियन के नए सिरे से जाग उठने की प्रेरणादायक सच्ची कहानी

मनु भाकर, भारतीय महिला निशानेबाज
मनु भाकर, भारतीय महिला निशानेबाज
अपडेटेड 28 अक्टूबर , 2024

मध्य 2023 की गर्मियों की एक शाम. नई दिल्ली में खान मार्केट के स्टारबक्स में मनु भाकर अपने पूर्व कोच और मेंटोर जसपाल राणा के साथ दिल से दिल की बात करने के लिए बैठी थीं. तकरीबन दो साल में यह उनकी पहली मुलाकात थी. देरी से हुए 2020 के टोक्यो ओलंपिक से ठीक पहले उनके बीच काफी कटुता भर गई, जिसकी खेल हलकों में खासी चर्चा थी. उस वक्त वे 10मी एयर पिस्टल में दुनिया में दूसरे नंबर की निशानेबाज थीं और उन्होंने आरोप लगाया कि राणा उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं.

राणा तब राष्ट्रीय पिस्टल टीम के कोच थे और उन्होंने कहा कि वे उनकी अकेली प्राथमिकता नहीं थीं. उनका यह भी कहना था कि मनु ने टोक्यो खेलों में तीन के बजाए केवल दो मुकाबलों में हिस्सा लिया. उस ओलंपिक में मनु ऊंची उम्मीदों का बोझ नहीं सह पाईं और अबूझ ढंग से डगमगा गईं. खेलों से तीन महीने पहले रुखाई से हटा दिए गए राणा ने टोक्यो में भारतीय टीम के फीके प्रदर्शन का काफी दोष और गुस्सा अपने सिर पर ले लिया. भारतीय निशानेबाजी जत्था टोक्यो से एक भी पदक लिए बिना जो लौटा था. 

मनु से पूछिए कि स्टारबक्स में उस शाम उन्होंने राणा से ऐसा क्या कहा जो भारतीय खेलों में सुलह का यादगार और परदे के पीछे बदलाव का अहम लम्हा बन गया, तो वे कहती हैं, "मैंने उनसे कहा कि मैं शूट करना चाहती हूं तो केवल आपके साथ शूट करना चाहती हूं. यह भी कि मैं शूटिंग पूरी तरह छोड़ने के बारे में सोच रही हूं, क्योंकि मैं वाकई बहुत कोशिश करती रही हूं और यह मुश्किल होता गया है. हौसला नहीं बचा है."

सख्ती से काम लेने के लिए जाने जाने वाले राणा पिघल गए. वे कहते हैं, "इस तरह की स्थिति में मुझसे बात करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता. इस उम्र में अगर उसमें मुझसे बात करने की हिम्मत हो सकती है, तो मैं इसके लिए तैयार हूं. खोने के लिए कुछ नहीं था. हम सब कुछ खो ही चुके थे." राणा की बस एक पूर्वशर्त थी, "अगर हम अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे, तो ढेरों चीजें सामने आएंगी, जो मेरे, उसके या देश के लिए अच्छा नहीं होगा."

वह भेंट मनु की जिंदगी में निर्णायक मोड़ साबित हुई. इस जुलाई-अगस्त में पेरिस ओलंपिक में वे न केवल दो कांस्य जीतकर पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला निशानेबाज बनीं, बल्कि एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली एथलीट भी बन गईं. यह ऐसा मील का पत्थर है, जिसे दोहराना शायद मुश्किल हो. तो, यही वह अंतर्कथा है कि कैसे मनु ने अपनी नाकामी और आत्मसंदेह के प्रेतों को दफनाया और भारत को अत्यंत गौरवान्वित करने वाली पिस्तौलधारी चैंपियन के रूप में नया अवतार लिया.

आगे बढ़ना, लक्ष्य तय करना

उस रात मनु की मां सुमेधा भाकर राणा के साथ उसकी भेंट को लेकर घंटे भर से ज्यादा इंतजार करती रहीं. वे याद करती हैं कि वह लौटी तो उसके चेहरे पर पूरी खिली मुस्कान और राहत का भाव था. कहते हैं, एक स्कूल की प्रिंसिपल रह चुकीं सुमेधा अपनी बेटी के पीछे मजबूती से खड़ी रहीं और हमेशा साथ देती रही हैं. नई दिल्ली के कर्णी सिंह शूटिंग रेंज स्टेडियम में वे लगातार मौजूद रहती हैं, जहां मनु 10मी और 25मी दोनों रेंज में प्रैक्टिस करती हैं.

जोश और जज्बे से भरी सुमेधा याद करती हैं कि नई दिल्ली में हुए आईएसएसएफ विश्व कप में जब राणा उनकी बेटी को आंसुओं में डूबा छोड़कर चले गए, तो उसके बाद मार्च, 2021 में उन्होंने राणा को एक के बाद एक दनादन कई संदेश दागे. उनमें से एक संदेश—"मिल गई खुशी न. बधाई हो आपको...आपको अपना ईगो मुबारक"—को राणा ने अपनी टी-शर्ट पर पहनना चुना, जिससे सुमेधा और गुस्से से भर उठीं. वे याद करती हैं, "मैंने उनसे कहा कि उन्होंने उसके साथ अच्छा नहीं किया, उन्होंने उसका दिल तोड़ दिया, और उन्हें उसके जैसी अच्छी स्टुडेंट कभी नहीं मिलेगी."

उस रात, लिहाजा, केवल मनु ही नहीं थीं जो राणा के साथ नई शुरुआत कर रही थीं. सुमेधा भी अपनी बेटी की भलाई के लिए मुश्किल वक्त से उबरकर नए दौर में दाखिल हो रही थीं. पेरिस में एयर पिस्टल मुकाबले के एक दिन पहले 26 जुलाई, 2024 को उन्होंने राणा से कहा कि वे मनु-राणा की "जोड़ी" को "हिट" होते देखना चाहती हैं.

उस बातचीत को याद करते हुए वे इंडिया टुडे को बताती हैं, "(मैंने कहा) अर्जुन और द्रोणाचार्य के रूप में देखना चाहती हूं. शायद जिस गुरु जी ने इतनी मेहनत करवाई, वो गुरु जी वहां (टोक्यो में) थे ही नहीं, भगवान (टोक्यो में) वो खुशी देना ही नहीं चाहते थे."

टोक्यो में अवांछित और दोषी करार दिए जा चुके राणा की अब पेरिस में मनु की कामयाबी के मुख्य वास्तुशिल्पी के रूप में जय-जयकार की जा रही है. राणा कहते हैं, "उसकी मदद से अपने सिर पर अब मैं वह दोष नहीं ढो रहा हूं जो दो साल से मुझे परेशान कर रहा था. यह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी राहत है."

राख से उठ खड़े होना

हरेक एथलीट जानता है कि कामयाबी से कहीं बेहतर शिक्षक नाकामी है. टोक्यो मनु के लिए कठोर सबक साबित हुआ. 10मी एयर पिस्टल के क्वालिफिकेशन मुकाबले के वक्त पिस्टल में खराबी आ जाने के बाद वे सो नहीं पाईं. इसकी कीमत उन्हें समय, एकाग्रता और फाइनल में शूट करने में चुकानी पड़ी. अगली रात भी कोई बेहतर नहीं रही, बावजदू इसके कि उन्होंने संगीत से लेकर योग और ध्यान तक सब कुछ आजमाया.

सोने की बेतहाशा कोशिश में नाकाम रहने के बाद उन्होंने अपने फिजियोथिरेपिस्ट को बुलाकर सिरदर्द की शिकायत की और दवाई देने को कहा. मनु याद करती हैं, "मैं बहुत थक गई थी, मेरा दिमाग सोचना बंद ही नहीं कर रहा था. मैं अपने विचारों को बिल्कुल नियंत्रित या चैनलाइज नहीं कर पा रही थी." मिश्रित टीम क्वालिफिकेशन के दूसरे चरण में पहुंचने तक मनु को कुछ भी सूझ नहीं रहा था.

वे कहती हैं, "मुझे लगा कि मैं बिल्कुल भूल चुकी हूं कि कैसे शूट करना है, मेरी टेक्नीक क्या है, अच्छा निशाना लगाने के लिए मैं क्या करती हूं. मैं तरीका ही भूल गई थी, मुझे कुछ अता-पता नहीं था, मैंने वाकई खुद से निराश महसूस किया, मैंने कहा तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, ऐसा कैसे हो सकता है?"

मनु ने साथी सौरभ चौधरी के 96 और 98 के मुकाबले 92 और 94 निशाने लगाए. नतीजा यह हुआ कि तब तक जीत का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा भारत सातवें पायदान पर आया. अपने अंतिम मुकाबले 25मी पिस्टल में क्वालिफिकेशन के पहले चरण में दमदार शुरुआत के बाद दूसरे चरण के आखिरी 10 शॉट में मनु घबराने लगी थीं. वे बताती हैं, "ज्यों ही यह (ओलंपिक खेल) खत्म हुआ, जो सब हुआ था...मुझे लगा कि मानो हर कोई मेरा मजाक उड़ा रहा था."

उन्हें लगा कि कुछ दिनों की छुट्टी लेने से शायद टोक्यो का बुरा सपना भूलने में मदद मिलेगी. वे अपने माता-पिता के साथ छुट्टियां मनाने दक्षिण भारत चली गईं. लेकिन खेल के बारे में सोचना वे अब भी बंद नहीं कर पा रही थी. वे कहती हैं, "मुझे याद है, मैं होटल में अपने हाथों में पानी से पूरी भरी केतली थामे (निशाना लगाने की) अपनी मुद्रा की प्रैक्टिस कर रही थी."

मनु उस झटके से उबर नहीं पा रही थीं, लेकिन टोक्यो खेलों के बाद ओलंपिक चैनल से एक बातचीत में उन्होंने साहसी घोषणा की. तकरीबन रुंधे गले से उन्होंने बातचीत खत्म की, "अगली बार मैं जीतूंगी और आप देखेंगे." मनु हार बर्दाश्त नहीं कर पातीं. उनकी सबसे अच्छी दोस्त और साथी पिस्टल शूटर अंशिका सतेंद्र भी यह बखूबी जानती हैं. वे कहती हैं, "वह बहुत निडर और जिद्दी है. उसने तय कर लिया कि उसे यह चाहिए, तो बस चाहिए."

2023 में सीनियर बनना मनु के लिए सच्चाई का सामना करने का लम्हा था. मन में संदेह घर करने लगे थे, क्योंकि 2022-23 में वे ईशा सिंह, रिदम सांगवान, पलक और सिमरनप्रीत कौर बराड़ सरीखी प्रतिभाशाली युवाओं के खिलाफ जगह हासिल करने की जद्दोजहद कर रही थीं. इसके लिए उन्हें अपनी निरंतरता वापस पाने की जरूरत थी.

2023 में 25मी पिस्टल में एशियाई खेलों के एक स्वर्ण पदक को छोड़कर व्यक्तिगत गौरव उनके हाथ से फिसलता रहा. इतना ही नहीं, टोक्यो का वह बयान भी उन्हें सता रहा था. वे बताती हैं, "मुझे महसूस हुआ कि कुछ करना ही होगा. मैं आगे बढ़ती रही क्योंकि मुझे लगा कि कहकर नहीं करना, शर्म-सी आने लग गई."

शूटिंग के लिए ही जन्म

मर्चेंट नेवी में चीफ इंजीनियर रामकिशन और शिक्षिका सुमेधा भाकर के घर जन्मीं मनु ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं, जहां उन्हें और उनके बड़े भाई अखिल को अपनी मां के 'सैनिक स्कूल जैसे नियम-कायदों' का पालन करना होता था. टीवी देखने के लिए सिर्फ 30 मिनट तक समय निर्धारित था और होमवर्क पूरा करने के बाद ही खेलने जाने दिया जाता था. वैसे, खेलने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया जाता था.

मनु ने कबड्डी, टेनिस और स्केटिंग के साथ जोर आजमाइश वाले कराटे और बॉक्सिंग जैसे खेल के अलावा थांग-ता जैसे मार्शल आर्ट में भी हाथ आजमाया और थांग-ता में तो राष्ट्रीय पदक भी जीते. वे कहती हैं, "मैं सेल्फ डिफेंस सीखना चाहती थी" और "मजबूत और ताकतवर महसूस करना चाहती थी. मैं नहीं चाहती थी कि कोई भी मुझ पर किसी भी तरह से हावी हो पाए."

शूटिंग के क्षेत्र में आना उनकी सोची-समझी योजना के बजाए एक सजा का नतीजा था. दूसरे शब्दों में कहें तो यह संयोग ही था. दरअसल, मनु जब 14 वर्ष की थीं और गोरिया स्थित यूनिवर्सल सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ाई कर रही थीं, तभी एक बार इतिहास की कक्षा में "सोने या खाने" (ठीक से याद नहीं कि किस वजह से सजा मिली थी) के लिए उन्हें डांट पड़ी और कक्षा से बाहर चले जाने को कहा गया. मनु वहां खेल के मैदान में घूम रही थीं, तभी एक दोस्त ने सुझाया कि समय बिताने के लिए शूटिंग रेंज में चली जाओ.

वहां मिले कोच अनिल जाखड़ ने मनु की शारीरिक क्षमता, जो उन्होंने मुक्केबाजी से हासिल की थी, को देखकर उन्हें शूटिंग में हाथ आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया. फिर क्या था, मनु ने एक साल के भीतर राष्ट्रीय टीम में जगह बना ली. 15 वर्षीया खिलाड़ी ने राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप के दौरान 10 मीटर एयर पिस्टल फाइनल में सीनियर खिलाड़ी और उस समय में दुनिया में नंबर-3 रैंकिंग रखने वाली हिना सिद्धू को पीछे छोड़ दिया, जो उनके करियर का बेहद महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ.

उसके बाद 2017 में एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में मनु ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता. मनु हर तरफ छा चुकी थीं. वे 16 वर्ष की होने तक राष्ट्रीय टीम के तत्कालीन जूनियर कोच जसपाल राणा के संरक्षण में आ गईं. बतौर कोच उन्हें यह देखना पसंद था कि उनसे सीखने वाले खिलाड़ी बाकायदा एक डायरी बनाकर प्रशिक्षण कार्यक्रम और स्कोर का ब्योरा दर्ज रखें. मनु के अनुशासन से राणा प्रभावित थे. राणा के शब्दों में, "मनु ऐसी बच्ची है जो कड़ी ट्रेनिंग से नहीं घबराती. मुझे कई बार बताना पड़ता है कि किस सीमा तक जाना है." 2018-19 में भी मनु ने अपने खेल से कमाल कर दिया था.

मेक्सिको में अपने पहले आईएसएसएफ विश्व कप के दौरान उन्होंने ओलंपिक चैंपियन ऐना कोराकाकी को हराकर स्वर्ण पदक जीता; 2018 में 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीतने के लिए राष्ट्रमंडल खेलों का रिकॉर्ड तोड़ा और समर यूथ ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल में फिर से स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय निशानेबाज बनीं.

2019 में जूनियर टीम के साथी सौरभ चौधरी के साथ मिलकर 10 मीटर मिश्रित टीम पिस्टल स्पर्धा में दबदबा बनाया और आईएसएसएफ विश्व कप के सभी चार संस्करणों में जीत हासिल की. लेकिन 2020 में कोविड-19 महामारी ने ब्रेक लगा दिया. पदक के प्रबल दावेदार माने जा रहे चौधरी और भाकर दोनों को ही अगले साल टोक्यो से खाली हाथ लौटना पड़ा.

टोक्यो का भूत भगाना

मनु को जूनियर से सीनियर टीम का हिस्सा बनते देखने और उसके रास्ते के हर उतार-चढ़ाव से वाकिफ राइफल शूटर अंजुम मुदगिल का कहना है, "मनु जानती है कि वह केवल खुद के प्रति जवाबदेह है. कभी भी कोच, प्रशिक्षक या अन्य से मतलब नहीं होता. कुछ करना जरूरी है तो वह करेगी, चाहे कितनी ही थकी क्यों न हो."

राणा के फिर गाइड बनने के बाद मनु ने भी डायरी उठा ली और निर्धारित शेड्यूल का पालन शुरू कर दिया. इसका मतलब था सुबह 5 बजे उठना, योग और ध्यान करना, अभ्यास के लिए रेंज पर जाना, फिजियोथिरेपी के लिए जाना, फिर अपने कंधे की हड्डियों और कोहनी के लिए रिहैब सेशन में हिस्सा लेना, जिम जाना और फिर दिन खत्म होने से पहले ध्यान के लिए समय निकालना.

पेरिस की तैयारी के लिए मनु ने देहरादून, भोपाल, नई दिल्ली के साथ ही ओलंपिक स्थल के करीब लग्जमबर्ग और फ्रांस में भी प्रशिक्षण लिया. देश में शूटिंग की संचालन संस्था नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने अपवाद के तौर पर मनु को मई में म्यूनिख में विश्व कप छोड़ने की अनुमति दी और अभ्यास के लिए रेंज की सुविधा दी.

टोक्यो में परफॉर्मेंस के बोझ से मुक्त होकर मनु ने पेरिस में अच्छे खेल का प्रदर्शन किया. शैटरौक्स के नेशनल शूटिंग सेंटर में देखने वालों को मनु कहीं अधिक एकाग्र चित्त और भरोसे से लबरेज एथलीट नजर आईं. 2008 के ओलंपिक चैंपियन अभिनव बिंद्रा ने इस बात को रेखांकित किया कि कैसे 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल के लिए क्वालीफाई करने पर मनु मुस्कराईं नहीं, और यह रुख किसी भी कीमत पर जीतने के उनके संकल्प को दर्शाने वाला था.

एक हाथ जेब में और एक आंख ब्लाइंडर शील्ड से ढकी होने के साथ मनु एकदम शांत शूटर नजर आईं, जो सिर्फ अपने लक्ष्य को साधने में तल्लीन थीं. उन्होंने क्वालीफिकेशन में आसानी से आगे बढ़कर तीनों स्पर्धाओं के फाइनल में जगह बनाई. पेरिस में भारत को पहला पदक दिलाने के बाद मनु ने इंडिया टुडे टीवी से कहा, "अब किसी भी हार का कोई अफसोस नहीं है. मेरा दिल साफ है. मुझे अभी और भी बहुत कुछ हासिल करना है."

सभी लोगों का ध्यान उसकी तरफ था. तभी मनु ने 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम में सरबजोत सिंह के साथ एक और पदक जीता. उसके बाद ही उन्होंने हंसी-मजाक के लिए कुछ वक्त निकाला. सरबजोत बताते हैं, "(ओलंपिक) मैच के बाद एक-दूसरे की लात (टांग) खींच रहे थे."

आखिर क्या बदला? मनु बाद में कहेंगी, भरोसा और अनुभव. वे भरोसे का श्रेय राणा को देती हैं, जो, बकौल उनके, ट्रेनिंग के दौरान चीजें इतनी मुश्किल कर देते कि उन्हें वह सब कुछ आजमाना पड़ता, जो सीखा है. अनुभव, बकौल उनके, खासकर टोक्यो बहुत कुछ सिखा गया और वह पेरिस में काम आया. वे टोक्यो में इस बात से बेचैन थीं कि कहीं उम्मीद पर खरा न उतर पाऊं. पेरिस में वे बिंदास थीं.

जिम की दीवानी

शूटिंग रेंज के बाहर मनु जेनरेशन जेड वाली दूसरी लड़कियों की तरह ही नजर आती हैं, जिसे नए-नए कपड़े और एक्सेसरीज खरीदना और संगीत (पॉप, पंजाबी और हरियाणवी पॉप, बॉलीवुड के गाने) सुनना पसंद हैं. हालांकि, निशाना साधने के लिए आंखों का काफी ध्यान रखते हुए उनका स्क्रीन टाइम अभी भी सीमित है. मनु को खाली समय में ड्राइव करना और फिल्म देखना पसंद है.

उनकी 25 वर्षीया दोस्त अंशिका के मुताबिक, "कभी-कभी हम रील बनाने की सोचते हैं लेकिन नाकाम रहते हैं." किसी पर कोई क्रश नहीं, लेकिन दोनों का मानना है कि आदित्य रॉय कपूर देखने में अच्छा है. मनु को "घर का खाना" ही पसंद है.

मनु जिम की दीवानी हैं. फरीदाबाद में अपनी बिल्डिंग के जिम में उन्हें काफी मजा आता है. उनके वर्कआउट साथी और सुबह तीन बजे उठने वाले दोस्त सुप्रतीक छपेरिया उर्फ सुपर बताते हैं कि कैसे मनु हंसते-हंसते हरा देती हैं. 30 वर्षीय छपेरिया कहते हैं, "बहुत ज्यादा जान है इसमें." और शूटिंग? छपेरिया के मुताबिक, "मूवी देखते वक्त भी ऐसे रहती है जैसे पिस्तौल लेकर बैठी हो." छपेरिया के मुताबिक, "ट्रेनिंग हो या मैच, अच्छा नहीं रहा तो परेशान हो जाती है. लेकिन जल्द ही सुधार के बारे में सोचती है. वह किसी बात पर अटकी नहीं रहती. यह कुछ ऐसा है जो मैंने उससे सीखा है." साथ ही कहा कि इसे मनु को न बताएं.

नई नेशनल क्रश

ओलंपिक में मिली सफलता की चमक फीकी भी नहीं पड़ी है कि मनु एक और वजह से सुर्खियों में है. दरअसल, वे देश की नई नेशनल क्रश या पोस्टर गर्ल बन चुकी हैं. पेरिस में सफलता ने इंस्टाग्राम पर उनके फॉलोअर की संख्या 1,50,000 से बढ़कर 17 लाख पर पहुंचा दी है. वे एक ब्रांड की जगह अब सात के लिए विज्ञापन कर रही हैं. पिछले कुछ महीनों में मनु को एक दिन दुबई में स्काईडाइविंग करते, दूसरे दिन एक फैशन शो के रैंप पर चलते और हरियाणा चुनाव में मतदान करते देखा गया.

आप उनके इंस्टाग्राम एकाउंट पर झांककर जान सकते हैं कि कपड़ों को लेकर ताजा ट्रेंड के साथ कितना तालमेल बना रखा है. वे कहती भी हैं, "मैं अपने कपड़ों को लेकर काफी क्रिएटिव हूं." पी.वी. सिंधु का करियर डगमगाने के साथ देश को क्रिकेट से इतर स्पोर्ट आइकन की कमी अखरने लगी थी, और मनु में भारत को अपनी पोस्टर गर्ल मिल गई. 

फिलहाल, जो मनु फीवर छाया है, उसका एक पहलू यह भी है कि वे लंबे समय तक खेल से दूर रही हैं. ज्यादा ख्याति और सफलता भी ध्यान भटका सकती है. राणा कहते हैं, "कुछ लोग पैसे या सेलेब्रिटी स्टेटस को पचा नहीं पाते. उसकी मदद करना हमारी जिम्मेदारी है." लेकिन यह भी जोड़ते हैं कि माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.

फरीदाबाद के विवांता सूरजकुंड में उस दिन का शूट और दूसरा इंटरव्यू खत्म करने के बाद जब नई दिल्ली में जारी आईएसएसएफ वर्ल्ड कप की तैयारी कर रहे शॉटगन शूटर अनंतजीत सिंह नरुका ने पूछा कि वे कैसी हैं तो मनु बोलीं, "नींद पूरी नहीं हो पा रही." और यह भी कि वे रेंज में आने को बेताब हैं. कुछ ही दिन बाद मनु ने इंस्टाग्राम पर शूटिंग रेंज से तस्वीर शेयर की. उनके मुताबिक, "मुझे अपने खेल से बेहद प्यार है और मुझे मजा आता है. उसी दौरान मैं सबसे जीवंत महसूस करती हूं." उम्मीद है कि लॉस एंजेलिस 2028 तक ऐसा ही चलेगा या फिर शायद इंडिया 2036 तक.

लाजवाब निशाना

- ओलंपिक पदक विजेता इकलौती महिला निशानेबाज

- एक ही ओलंपिक में पुरुष या महिला वर्ग में दो पदक विजेता इकलौती भारतीय एथलीट

- उनके पहले यह रिकॉर्ड अंग्रेजी राज में एक ब्रितानी मूल के भारतीय एथलीट के नाम

पेरिस में लाजवाब प्रदर्शन

- हिस्सा लिए तीनों स्पर्धाओं में उन्होंने फाइनल के लिए क्वालिफाई किया

- सिर्फ चार शूटरों में एक

- टोक्यो में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पेरिस में अपनी जगह बनाई

खूब ऊंची उड़ान

मनु भाकर बस पिस्तौलबाजी में मसरूफ नहीं रहतीं, उनकी जिंदगी के कुछ अतिरिक्त नजारों की झांकी

दो कांस्य पदकों और कोच जसपाल राणा के साथ

साझा उपलब्धि

पेरिस ओलंपिक में पाए दो कांस्य पदकों और कोच जसपाल राणा के साथ एफिल टावर के सामने

दुबई में स्काइडाइविंग

आकाश की तमन्ना

परिवार के साथ छुट्टियां बिताने के दौरान दुबई में स्काईडाइविंग

वरदान की चाह

वरदान की चाह

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में

प्रधानमंत्री आवास पर

ऐसे पकड़िए

प्रधानमंत्री आवास पर प्रधानमंत्री मोदी को पिस्तौल की बारीकियां समझातीं

मॉडलिंग में कुछ कदम

कुछ जलवे

लक्मे इंडिया फैशन वीक देखने गईं मनु के मार्क्स ऐंड स्पेंसर के लिए मॉडलिंग में कुछ कदम

10 मीटर पिस्टल शूटिंग स्पर्धा

खोजो मछली की आंख

लक्ष्य: 10 मीटर पिस्टल शूटिंग स्पर्धा एकदम सटीक निशाने की अग्निपरीक्षा जैसी है. लक्ष्य की मछली की आंख को 10 पॉइंट रिंग कहा जाता है और महज 4.5 मिमी का होता है, यानी बेहद छोटी बिंदी जैसा

स्कोर: ओलंपिक में बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक संचालित होता है और लक्ष्य छोटी-सी बिंदी के बीचोबीच मारने का होता है. स्कोर सटीक निशाने के लिए अधिकतम 10.9 होता है और 11.5 मिमी के घेरे में निशाने के मुताबिक दशमलव के गुणक में मिलता है 

शुरुआती चक्र: ओलंपिक फाइनल में सिर्फ आठ शूटर क्वालिफाइ करते हैं और स्पर्धा दो चरणों में होती है. पहले चरण में हर शूटर को पांच शॉट की दो सीरीज मिलती है और हर सीरीज का वक्त 250 सेकंड होता है 
शूटआउट: दूसरे चरण में 14 सिंगल शॉट मिलते हैं. हर शॉट एक कमांड पर 50 सेकंड के भीतर मारना होता है. इस चक्र में दूसरे शॉट के साथ ही एलिमिनेशन शुरू हो जाता है. सबसे कम साझा अंक (चरण 1 को मिलाकर) पाने वाला बाहर हो जाता है

रैंकिंग: हर दो शॉट के बाद एलिमिनेशन होता जाता है और 24वें शॉट पर स्पर्धा खत्म होती है, जिससे स्वर्ण और रजत पदक विजेता का निर्धारण होता है. अंतिम कुल स्कोर से फाइनल रैंकिंग तय होती है. पेरिस में मनु 22वें शॉट के बाद तीसरे नंबर पर आईं और कांस्य पदक हासिल किया, बस 0.1 पॉइंट से रजत पदक से चूक गई

शूटिंग स्टार का सफरनामा

18 फरवरी 2002

18 फरवरी 2002
हरियाणा के गोरिया में मर्चेंट नेवी में चीफ इंजीनियर रामकिशन और संस्कृत शिक्षिका सुमेधा भाकर के घर जन्म. झांसी की रानी के रूप में प्रसिद्ध मणिकर्णिका के नाम पर नामकरण

2016

गोरिया के यूनिवर्सल हायर सीनियर सेकंडरी स्कूल में इतिहास की कक्षा के दौरान 14 वर्षीया मनु से 'सोने या खाने’ (ठीक-ठीक याद नहीं कर पातीं)  की वजह से क्लास से जाने के लिए कह दिया गया. एक दोस्त उन्हें स्कूल की शूटिंग रेंज में ले जाता है. वहीं उन्हें पता चलता है कि वे तो निशाना लगाने के लिए पैदा हुई हैं.

2017

2017

साल की शुरुआत में हथियार लाइसेंस हासिल करने की जद्दोजहद के बाद 15 वर्षीया नवोदित निशानेबाज ने राष्ट्रीय शूटिंग चैंपिंयनशिप में तब विश्व की नंबर 3 हीना सिद्धू को हराकर कामयाबी का परचम लहराया
एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय हलकों में तहलका मचा दिया.

 

2018 

2018 

● मेक्सिको के ग्वाडलजारा में अपने पहले आइएसएसएफ विश्व कप फाइनल में जगह बनाई, तब जब ओलंपिक चैंपियन ऐना कोराकाकी भी मैदान में थीं. स्वर्ण पदक जीतकर विश्व कप में ऐसा करने वाली सबसे कमउम्र की भारतीय बनीं. प्रकाश मिथरवाल के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा भी जीतीं.

● ब्रिसबेन में 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण जीतकर कॉमनवेल्थ खेलों का रिकॉर्ड तोड़ा.

● ब्यूनस आयर्स में समर यूथ ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल में सोना जीतने वाली पहली भारतीय निशानेबाज बनीं.

2019

2019

सौरभ चौधरी के साथ 10 मीटर एयर पिस्टल में दबदबा कायम किया और आइएसएसएफ विश्व कप के सभी चार संस्करण जीते. जोड़ी टोक्यो ओलंपिक के लिए पसंदीदा बनकर उभरी.

 

2021 

2021

● 10 मीटर एयर पिस्टल, मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल और 25 मीटर एयर पिस्टल में 2020 की ओलंपिक टीम में जगह बनाई. फिर उतार का सिलसिला शुरू हुआ: 10 मीटर एयर पिस्टल के क्वालिफिकेशन चरण में उनकी पिस्टल खराब हो गई, मिश्रित 10 मी एयर पिस्टल के चरण 2 क्वालिफिकेशन में भाकर-चौधरी सातवें नंबर पर आए, और मनु 25 मीटर पिस्टल के फाइनल के लिए क्वालिफाइ करने में नाकाम रहीं.

2021

 

2021

● टोक्यो ओलंपिक की पराजय को पीछे छोड़कर लीमा में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 10 मीटर एयर पिस्टल में सोना, महिला टीम की 10 मीटर में सोना, और मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में सोना जीता

2023

● भोपाल में आइएसएसएफ विश्व कप शृंखला में महज 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में कांस्य पदक के साथ ठंडा प्रदर्शन किया.

● गैर-ओलंपिक 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में महिला टीम का स्वर्ण पदक जीतकर एशियाई खेलों का अपना पहला पदक जीता.

2024

2024

● 2024 के ओलंपिक खेलों की एकाधिक स्पर्धाओं में हिस्सा लेने वाली 21 सदस्यीय भारतीय शूटिंग टीम की अकेली एथलीट. 2020 के ओलंपिक जत्थे के उन चार निशानेबाजों में एक, जिन्होंने दोबारा ओलंपिक टिकट हासिल किया.

●  पेरिस में तीनों स्पर्धाओं में फाइनल के लिए क्वालिफाइ किया. 10 मीटर एयर पिस्टल और 10 मीटर मिश्रित टीम पिस्टल में दो कांस्य पदक जीते, 25 मीटर में बहुत बारीक फर्क से पोडियम पर जगह बनाने में चूकीं
●  समापन समारोह में पी.आर. श्रीजेश के साथ ध्वजवाहक रहीं.

चैंपियन की तैयारी

समृद्ध थाती फरीदाबाद के अपने घर में पदकों का प्रदर्शन करतीं मनु

मनु को उनके खेल के विभिन्न पहलुओं की ट्रेनिंग कैसे मिली

इसके लिए उन्हें घंटों रेंज में बिताने पड़े. एक ही मुद्रा में खड़े रहकर एक रफ्तार से बार-बार पिस्टल उठाना तथा लक्ष्य पर निशाना साधना

हाथ और आंख का तालमेल

यह खेल का अनिवार्य अंग है. इससे दिमाग, मांसपेशियों, आंख और तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण कायम होता है. मनु फोकस और नजर को एकाग्र रखने के लिए स्क्रीन समय सीमित रखती हैं. शॉट के बीच वे दिमाग को स्थिर रखने, सांस और विचारों को नियंत्रित रखने की कोशिश करती हैं

स्थिरता

इसके लिए पेट, रीढ़ और बाजुओं की मांसपेशियों की मजबूती के अलावा उंगलियों में लचीलेपन की दरकार होती है. मनु को जिम में मजा आता है. वहां स्ट्रेच, वेट और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के अलावा सामान्य वर्कआउट के साथ घुटनों और कोहनी का व्यायाम करती हैं

दिमागी संतुलन

इस खेल में स्कोर और एलिमिनेशन का योग है इसलिए शूटर हमेशा तनाव में रहता है. आपको अपने तंत्रिका तंत्र और हृदय गति दोनों को काबू में रखना पड़ता है. योग और ध्यान मनु की रोजाना ट्रेनिंग का हिस्सा है, वे सोने के पहले भी ध्यान करती हैं

प्रेरणा

इस मामले में कोच की भूमिका अहम होती है. मनु याद करती हैं कि राणा हमेशा ''गिल्टी कार्ड’’ खेलते और कहते कि ट्रेनिंग में न आना या छुट्टी लेना स्पर्धा के वक्त भारी पड़ सकता है और अपने खेल को अहमियत देना जरूरी है, वरना दूसरे भी दौड़ में हैं.

Advertisement
Advertisement