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विशेषज्ञों ने बताया, इन सुधारों से भारत बन सकता है इकोनॉमिक्स में विश्व चैंपियन

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर भारत को अगले दो दशक में उच्च वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होना है तो उसे अगले दो दशकों तक 7-8 फीसद की वृद्धि दर को बरकरार रखने के लिए अपनी नजर लक्ष्य पर गड़ाए रखनी होगी

अनहद आकाश में/सांकेतिक तस्वीर
अनहद आकाश में/सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 26 अगस्त , 2024

2047 में हम किस मुकाम पर खड़े दिखें? हम अपनी आजादी के सौवें साल की ओर बढ़ रहे हैं तो हमारी नजर ऊंचे से ऊंचे शिखर पर लगी होनी चाहिए, अब तो वह पूर्ण विकसित देश कहलाने की चोटी, जहां हर तरह की चाहत और सम्मान से आजादी हमारा कदम चूमे.

जहां दुनिया हमें आर्थिक और टेक्नोलॉजी अगुआ, खांटी वैश्विक महाशक्ति और अच्छाई की ताकत के नाते सम्मान से देखे. हम आज जहां खड़े हैं, वहां से एक गहरी दूरदृष्टि, जो नैतिक भी हो, दरकार है. अगले पन्नों पर देखें अग्रणी विचारकों के10 प्रमुख क्षेत्रों के लिए एक ब्लूप्रिंट:

1. अर्थव्यवस्था  2. इन्फ्रास्ट्रक्चर  3. उद्योग  4. शिक्षा  5. टेक्नोलॉजी 6. प्रतिरक्षा  7. स्वास्थ्य  8. कृषि  9. ऊर्जा  10. सॉफ्ट पावर

1. अर्थव्यवस्था

आम चुनाव से पहले चुनावी रैलियों के अपने कई भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अहम आर्थिक संभावना की ओर इशारा किया कि भारत उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. इसके पहले दो बार मजबूत अर्थव्यवस्था और व्यापार अनुकूल नीतियों के वादे पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए चुनाव जीत चुके मोदी का मानना था कि देश की अर्थव्यवस्था के बारे में चमकदार आंकड़ों की अभी भी लोग चर्चा करते हैं.

हालांकि इस चुनाव ने साबित किया कि देश के मतदाता के सामने कई मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, खास तौर पर रोजगार का संकट और ऊंची कीमतें. इसी वजह से भाजपा ने उम्मीद से कम लोकसभा सीटें जीतीं, सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा. लेकिन इससे मोदी आर्थिक मोर्चे पर देश की प्रगति दिखाने से नहीं रुके या यहां तक कहा कि देश विकसित राष्ट्र बनने की राह पर है.

उन्होंने बजट के बाद 30 जुलाई को उद्योग के शीर्ष लोगों के बीच कहा, "जब भारत स्वाधीनता के 100 साल (2047 में) मनाएगा, तब हम एक विकसित देश होंगे. आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा."

निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था ने अच्छा प्रदर्शन किया है और दुनिया में अपनी बराबरी के ज्यादातर देशों के मुकाबले बेहतर किया है. अर्थव्यवस्था में महामारी के बाद तेजी से बहाली हुई और वित्त वर्ष 24 में 8.2 फीसद की दर से बढ़ी है. महंगाई हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक के 6 फीसद के अधिकतम दायरे के ऊपरी हिस्से के करीब है लेकिन वह उतनी नहीं भागी है जितनी कुछ अन्य उभरते देशों में बढ़ी है.

न केवल भारत की अर्थव्यवस्था अपने पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित और मजबूत दिखती है, उसका लचीलापन और वृद्धि विकसित दुनिया से एकदम उलट है, खास तौर पर अमेरिका और जापान जो आसन्न मंदी की की आशंका से घिरे हुए हैं. आंकड़े खुद बोलते हैं.

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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, जो वित्तीय सहारे का काम करता है और रुपए की मजबूती में मदद करता है, 9 अगस्त को 674.9 अरब डॉलर के उच्च स्तर पर पहुंच चुका है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कई वैश्विक क्षमता केंद्र खोले हैं जो इसके सेवा निर्यात की मजबूती बताते हैं. सेवाओं का निर्यात सामान के निर्यात से ज्यादा तेज गति से बढ़ा है.

भारतीय विमानन कंपनियों ने वित्त वर्ष 24 में 15.40 करोड़ यात्रियों को सफर कराया जो कोविड पूर्व वित्त वर्ष 20 के 1.20 करोड़ यात्रियों की तुलना में अधिक हैं. साथ ही यात्री वाहनों की बिक्री भी 42 लाख पर पहुंच गई. 

ऊंची वृद्धि का लक्ष्य

लेकिन अर्थव्यवस्था के आकार और भारत की बेहिसाब समस्याओं को देखते हुए 8 फीसद की वृद्धि दर भी पर्याप्त नहीं हो सकती. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वृद्धि के आंकड़े बढ़े हुए लगते हैं क्योंकि ये महामारी के दौरान इसके नकारात्मक दायरे में गिरने के बाद आए हैं और इस साल तथा अगले साल वृद्धि करीब 7 फीसद रहेगी. आखिरकार महामारी ने अर्थव्यवस्थाओं को चौपट कर दिया था. 2019-24 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने महज 34 लाख करोड़ रुपए जोड़े, जो 2014-2019 की तुलना में कम है क्योंकि तब जीडीपी में 42 लाख करोड़ रुपए जोड़े गए थे.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग जैसे कुछ लोगों का मानना है कि देश 6 फीसद से अधिक की दर से नहीं बढ़ेगा. रेटिंग्स फर्म क्रिसिल को उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक भारत 6.7 फीसद की दर से बढ़ेगा लेकिन भू-राजनैतिक परिदृश्य की अनिश्चितताओं के कारण वह इससे आगे के अनुमान नहीं लगाना चाहती.

उसके मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, "6.7 फीसद की वृद्धि दर भी हमें इस दशक के अंत तक 70 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था (फिलहाल 39 खरब डॉलर) बना देगी." इससे जीडीपी रैंकिंग में भारत की स्थिति मजबूत होनी चाहिए और अमेरिका और चीन के बाद, जर्मनी और जापान से पहले तीसरे नंबर पर भारत होना चाहिए, बशर्ते ये अर्थव्यवस्थाएं हमसे धीमी गति से बढ़ें.

जहां 7-8 फीसद की वृद्धि हमें अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से बड़ों की पांत में ले जा सकती है लेकिन यह समृद्धि में, जिसे प्रति व्यक्ति आय में मापा जाता है, बहुत ज्यादा योगदान नहीं भी दे सकती है. उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में 13,800 डॉलर से (11.6 लाख रुपए) अधिक की प्रति व्यक्ति आय की तुलना में भारत की यह आय करीब 2,700 डॉलर (2.3 लाख रुपए) होने से उसे निम्न मध्य आय वाले देशों में गिना जाता है.

विश्व बैंक की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वृद्धि दर के हिसाब से भारत को अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के चौथाई तक पहुंचने में 75 साल की जरूरत होगी. जोशी कहते हैं, "जो कुछ पूर्व एशियाई देशों या चीन ने किया है, अगर भारत उसे दोहराना चाहता है तो उसे ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ना होगा."

ऐसे में सवाल है कि क्या भारत मौजूदा वृद्धि को बरकरार रख सकता है और समृद्धि बढ़ाने के लिए मौजूदा से ज्यादा दर से बढ़ सकता है और उन करोड़ों युवाओं को रोजगार दे सकता है जो हर साल कार्यबल में शामिल होते हैं.

बैंक ऑफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, "यहां तक कि 8 फीसद की दर से भी हम उस नुक्सान की भरपाई नहीं कर पाएंगे जो हमने पहले किया है. सामान्य मॉनसून के साथ भारत इस साल 7 फीसद से अधिक की दर से बढ़ेगा. इसे बरकरार रखना और 8.5 या 9 फीसद की दर हासिल करना अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है." इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को तेज रफ्तार से बढ़ने के लिए कुछ क्षेत्रों पर फोकस करना होगा.

वृद्धि को टिकाऊ बनाना

अपनी वृद्धि को टिकाऊ बनाए रखने के लिए देश को कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा.

- खपत को बढ़ावा - चिंता का एक क्षेत्र निश्चित रूप से खपत है. सामान और सेवाओं की मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी तेजी से जीडीपी बढ़ रही है. निजी अंतिम उपभोग खर्च, वैयक्तिक मांग दर्शाने वाला एक आधिकारिक पद है, जो वित्त वर्ष 24 में महज 3 फीसद बढ़ा जबकि जीडीपी में 8.2 फीसद की बढ़ोतरी हुई.

उत्पादों और सेवाओं पर कम खर्च करना अपर्याप्त आमदनी और रोजगार असुरक्षा या बेरोजगारी का सूचक है. सबनवीस कहते हैं, "यह सिर्फ आम उत्पाद ही नहीं हैं जो मांग में मंदी से प्रभावित होते हैं, यहां तक कि महंगे उत्पादों पर भी असर हुआ है. मार्च तिमाही में तेजी से खपत वाले उपभोक्ता सामान कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर का मुनाफा 6 फीसद गिरा क्योंकि उपभोक्ताओं ने कम सामान खरीदे जबकि प्रतिस्पर्धी आईटीसी का मुनाफा स्थिर रहा." 

- निजी निवेश को लुभाना - उपभोग में कमी का असर निजी निवेश पर दिख रहा है. प्रोजेक्ट्स टुडे के आंकड़े कहते हैं कि निजी क्षेत्र की नई निजी निवेश योजनाएं 2023-24 में 15.3 फीसद गिर गईं. कंपनियों को बड़ी कर राहत के बावजूद निजी निवेश का पिछड़ना सरकार के लिए चिंता की बात रही है. लेकिन निजी निवेशक घाटे वाली परियोजनाओं में पैसा नहीं लगाएंगे.

केंद्र बुनियादी क्षेत्र में निवेश करता जा रहा है, इस उम्मीद में कि किसी न किसी बिंदु पर तो निजी निवेश आएगा लेकिन इसकी गति कहीं ज्यादा धीमी है. जोशी कहते हैं, "वृद्धि की सबसे बड़ी वाहक पूंजी है. जीडीपी से भारत का निवेश अनुपात बढ़ने की गुंजाइश है और वृद्धि की रफ्तार पर जोर देने की जरूरत है." नया निवेश भारत में रोजगार के इच्छुक करोड़ों युवाओं के लिए संभावनाएं सुधारता है. 

- महंगाई पर लगाम -  सामान की ऊंची कीमतें एक और अड़चन है. एक तरफ खर्च करने योग्य कम आमदनी और दूसरी तरफ ऊंची महंगाई, ऐसे में उपभोक्ता खरीद निर्णय टालने को प्रवृत्त होता है. सब्जियों, अनाज और फलों की ऊंची कीमतों ने भारत की खाद्य महंगाई जून में 6 महीने के उच्च स्तर 9.4 फीसद पर पहुंचा दी.

केंद्र ने ऊंची खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कतिपय खाद्य उत्पादों के अधिक आयात और बासमती चावल जैसी निर्यात जिंसों पर प्रतिबंध के कदम उठाए लेकिन मौसम की अनियमितता के कारण इन सबसे कम ही सफलता मिली है. इतना ही नहीं, मुख्य महंगाई (जिसमें ईंधन और खाद्य वस्तुएं शामिल नहीं हैं) भी इनपुट की ऊंची लागत के कारण 5 फीसद के आसपास है. 

- हरित ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और पर्यावरण पर फोकस - क्या भारत पारंपरिक उद्योगों को विकसित करने का राग अभी भी अलाप रहा है जो वैश्विक पैमाने पर कम ही वैल्यू जोड़ते हैं. गर्ग का ऐसा ही मानना है. वे कहते हैं, "हम ज्यादा से ज्यादा कपड़ा या इस्पात या सीमेंट मिलें लगाकर अब और नहीं बढ़ सकते. उससे कुछ घरेलू मांग तो पूरी होगी लेकिन हमें ऐसी वृद्धि नहीं मिलेगी जो दूसरों से आगे ले जा सके." उनके अनुसार, जिन तीन क्षेत्रों पर भारत को फोकस करने की जरूरत है, वे हरित ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबिलिटी है.

दुनिया भर में बड़े निवेश वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में हो रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की वर्ल्ड एनर्जी इन्वेस्टमेंट 2024 रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न देश कुल 30 खरब डॉलर के निवेश में से जो ऊर्जा में करेंगे, उसमें से 20 खरब डॉलर स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलॉजी और इन्फ्रास्ट्रक्चर में जाएगा. भारत ने बड़ी योजनाओं की घोषणा की है और कहा है कि देश में 2030 तक 500 गीगावॉट की अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य हासिल करने के लिए 30 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा. इस पर दृढ़ता से अमल करने की जरूरत है. 

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की तलाश में भारत काफी आगे बढ़ गया है. इसकी वजह मोबाइल फोन और इंटरनेट का तेजी से प्रसार होना है, लेकिन भारत भर में बेहतर कनेक्टिविटी करने के लिए काफी कुछ करने की जरूरत है, जिससे टेक्नोलॉजी के लाभ सबसे ज्यादा जरूरत वाले लोगों तक पहुंच सकें. गर्ग कहते हैं कि भारत जहां पिछड़ा है, वह है टेक्नोलॉजी इनोवेशन. इस कारण हमें टेक्नोलॉजी आयात करने की जरूरत पड़ती है.

वे कहते हैं, "हालांकि हमारे पास कुछ नीतिगत मकड़जाल हैं. मसलन, हम चीन के साथ सहयोग नहीं करेंगे या चीन का निवेश नहीं आने देंगे." वे यह भी कहते हैं कि इससे हम कई साल पीछे चले जाते हैं. दूसरी तरफ चीन अपने उत्पादों के साथ विश्व बाजार हथिया रहा है. मसलन, इलेक्ट्रिक वाहनों में उसका 85 फीसद बाजार हिस्सा है जबकि भारत का महज 2 फीसद. खेल, यात्रा, मनोरंजन और निजी सेवाएं (लघु नाम स्टेप्स) भविष्य की वृद्धि के वाहक होंगे. 

- दक्षता में सुधार -  जोशी का मानना है कि लंबी अवधि में जिससे वृद्धि संचालित होती है, वह है पूंजी (निवेश), श्रम की गुणवत्ता और मात्रा और दक्षता. अतीत की तुलना में दक्षता ज्यादा अहम भूमिका निभाएगी क्योंकि जब भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जाता है, कनेक्टिविटी सुधरती है और काम का समय घट जाता है. वह भूमि और श्रम सुधारों पर जोर देने की भी पैरवी करते हैं जिससे कारोबारी सहूलत में सुधार हो.

वे कहते हैं, "ग्रोथ मैराथन दौड़ के नजरिए से सुधार महत्वपूर्ण हैं. देश कितना जल्दी आगे बढ़ता है, उसी से तय होगा कि आप कितना तेजी से बढ़ते हैं."

भारत की आजादी के 100 साल तक के अगले दो दशक तक यह दौड़ होगी, जो यह बताएगी कि बहुत ही चुनौतीपूर्ण समय में देश की मजबूती कैसी है. अगर वह वृद्धि की छलांग लगाने में मानव पूंजी का फायदा उठा सकता है तो भारत अपने करोड़ों लोगों को बेहतर अवसर और अधिक समृद्धि प्रदान कर सकता है.

अहम बातें

- अगर खपत या उपभोग खर्च बढ़ानी है तो रोजगार के अवसरों और आमदनी में बढ़ोतरी नितांत अनिवार्य है.

- भारत को कपड़ा और सीमेंट उद्योग से आगे देखना चाहिए और उसे हरित ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, टिकाऊ उद्योगों पर जोरदार फोकस करना चाहिए.

अगर हमारी अर्थव्यवस्था को तेज रफ्तार से सरपट दौड़ना है तो भूमि और श्रम सुधारों से अब और जी नहीं चुराया जा सकता.

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