
दक्षिण एशिया में सत्ता लगातार बंदूक की नली या तानाशाह के जैकबूट से नहीं, बल्कि उसके जनसमूहों के विशाल जत्थों से निकलती रही है. जरा आसपास देखिए. म्यांमार में मिन आंग लाइंग की अगुआई वाला सत्ताधारी सैन्यगुट, जिसने आंग सान सू की की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार को 2021 में बर्खास्त कर दिया था, आज खूनी गृह युद्ध का सामना कर रहा है, जिसमें विद्रोहियों ने उसके आधे भूभाग पर कब्जा कर लिया है.
श्रीलंका में ताकतवर राजपक्षे भाई, गोटाबाया और महिंदा जिन्होंने क्रमश: राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रहते इस द्वीप राष्ट्र को अपनी पारिवारिक जागीर की तरह चलाया, 2022 में अत्यधिक महंगाई और कम आमदनी की वजह से जनविद्रोह के बाद सुरक्षित जगह पर भागने को मजबूर हुए. फिर 2023 में पाकिस्तानी फौज ने अकल्पनीय घटता देखा, जब अपदस्थ प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी का विरोध कर रही भीड़ दनदनाते हुए लाहौर कोर कमांडर के घर में घुस गई और रावलपिंडी में फौजी मुख्यालय तक पर हमला बोल दिया.
अभी पिछले ही हफ्ते यह शेख हसीना थीं, जिन्होंने हाल ही में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के पद पर रिकॉर्ड 20 साल पूरे किए थे (हालांकि लगातार नहीं) और सोचती थीं कि वे अपराजेय हैं, उन्हें जनाक्रोश का दंश झेलना पड़ा जब छात्रों के छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ आंदोलन देखते ही देखते इस कदर विराट जनविद्रोह में फट पड़ा कि सेना के हेलिकॉप्टर में सवार होकर भारत भागने के लिए हसीना को महज 45 मिनट मिले.
हसीना की हुकूमत का रातोरात पतन भारत के लिए जबरदस्त कूटनीतिक और रणनीतिक झटके की तरह आया. डेढ़ से भी ज्यादा दशकों से भारत ने हसीना की बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्ति को नजरअंदाज करके अपना सारा दांव उन्हीं पर लगा दिया था. अब विशेषज्ञ नई दिल्ली को दोषी ठहरा रहे हैं कि न तो उसने लोकतंत्र की सुरक्षा बाड़ें लगाईं और न ही उन्हें पार करने के खिलाफ हसीना को चेताया. जनवरी में हुए चुनाव में, जिसका विपक्ष ने बहिष्कार कर दिया था, हसीना ने लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए पूर्ण बहुमत जीता.
मगर उसे अत्यंत दोषपूर्ण कवायद माना गया, जिसने न सिर्फ लोकतंत्र के नियम-कायदों बल्कि हसीना की वैधता और आर्थिक वृद्धि की विरासत की धज्जियां उड़ा दीं. उनके कुकृत्यों पर भारत की चुप्पी सिर चढ़कर बोली और उसकी प्रतिष्ठा को मटियामेट कर दिया. हसीना को बेदखल किए जाने के बाद भारत के खिलाफ गुस्सा ढाका की सड़कों पर फूट पड़ा, जब अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के घरों को निशाना बनाने और कुछ मंदिरों को अपवित्र किए जाने की खबरें आईं.
ढाका में रहने वाले डेली स्टार के संपादक महफूज अनम को स्वतंत्र प्रेस के प्रति हसीना की हिकारत का खमियाजा भुगतना पड़ा. वे उनकी सरकार की तरफ से अपने खिलाफ दाखिल 70 से ज्यादा मामलों से जूझ रहे थे. अनम कहते हैं, "कई लोगों को लगता था कि शेख हसीना पर भारत का जिस तरह का प्रभाव था, उसे देखते हुए दिल्ली को उन पर लगाम लगानी चाहिए थी. अब उसे जुर्म में शामिल होने के लिए आलोचना झेलनी पड़ रही है. हिंसा की छिटपुट घटनाओं के बावजूद भारत आश्वस्त रह सकता है कि बांग्लादेशियों की विशाल बहुसंख्या उदारवादी मुसलमान हैं जिनकी मजबूत बंगाली संस्कृति है."

लोकतंत्र का मखौल बना रहीं हसीना से जो नाराज थे, उनमें अमेरिका भी था, लेकिन उसने भारत का यह फैसला मान लिया कि हसीना ने कट्टर इस्लामी ताकतों को दूर रख रखा है और उन्हें कमजोर करने से न केवल ऐसी ताकतें खुलकर सामने आ जाएंगी बल्कि चीन भी बंगाल की खाड़ी में दुस्साहसी कदम उठाने को प्रोत्साहित होगा. वाशिंगटन स्थित कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में सीनियर फेलो एश्ले टेलिस का मानना है कि ऐसी चीजें थीं जो भारत को दूर का सोचकर करनी चाहिए थीं.
वे कहते हैं, "दिल्ली ने हसीना को हर हाल में समर्थन देने की नीति अपनाई. भारत उन्हें प्रचंड होते जाते अधिनायकवाद के बारे में आगाह कर सकता था, जो पिछले कई साल से उनकी सरकार को परिभाषित करने लगा था. मगर भारत को डर था कि उनकी मजबूरी के बढ़ने से या तो इस्लामपरस्त विपक्ष के लिए, जो वैसे भी भारत का भला नहीं चाहता, या चीन के हाथों शोषण के लिए दरवाजा खुल जाएगा. यह नीति तब तो कारगर रही जब सत्ता की बागडोर हसीना के हाथ में थी. मगर ज्यों ही घरेलू उथल-पुथल का हश्र उनके सत्ता से बेदखल होने में हुआ, दिल्ली की पूरी बांग्लादेश नीति तितर-बितर हो गई और उसकी दिशा को लेकर आलोचना होने लगी."
भारत का पड़ोसी परिवेश: जैसे एक अभिशाप
अलबत्ता दिल्ली की इस हालत के प्रति टेलिस सहानुभूति जताते हैं और कहते हैं कि "भारत का अभिशाप" यह है कि वह गहरी घरेलू राजनैतिक दरारों से तार-तार देशों से घिरा है. नतीजा है इन देशों के साथ लगातार भारी उतार-चढ़ाव वाले रिश्ते. इसलिए जब भारत समर्थक पार्टियां सत्ता में आती हैं, तो रिश्तों में नाटकीय सुधार आता है, लेकिन जब वैकल्पिक ताकतें मजबूत होती हैं, तो चीजें तेजी से रसातल में चली जाती हैं. मसला इसलिए और पेचीदा हो जाता है क्योंकि भारत के ज्यादातर पड़ोसी अपेक्षया नए राष्ट्र-राज्य हैं—बांग्लादेश खुद महज 53 साल पहले 1971 में वजूद में आया.
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन बताते हैं कि न सिर्फ इस क्षेत्र में भारत की विशाल मौजूदगी है, बल्कि आर्थिक रूप से और समाज तथा परंपरा के लिहाज से उसका जबरदस्त प्रभाव भी है. पाकिस्तान शायद अकेला अपवाद हो, क्योंकि उसकी पहचान और अस्तित्व भारत के साथ उसकी भिन्नता से परिभाषित होते हैं.
मेनन याद करते हैं कि 1980 के दशक में पाकिस्तान पर हुकूमत करने वाले जनरल जिया-उल-हक से जब पूछा गया कि वे मुल्क के ज्यादा इस्लामीकरण पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं, बताते हैं कि उन्होंने कहा, "अगर कोई इजिप्शियन (मिस्री) मुसलमान होना बंद कर दे तब भी वह इजिप्शियन ही रहेगा. लेकिन अगर पाकिस्तानी मुसलमान होना छोड़ दे तो वह भारतीय हो जाता है."
मेनन कह यह रहे हैं कि हर नए राष्ट्र-राज्य को एक कथित दुश्मन की जरूरत होती है, जिसके खिलाफ वह लोगों को एकजुट कर सके. राष्ट्र-राज्य के निर्माण का आधार जितना कम होगा, उसे उतना ही विरोधी दिखना होगा. भारत ऐसे ही नवजात राष्ट्रों से घिरा है.
बांग्लादेश को ही लीजिए. यह भारत के साथ 4,000 किमी लंबी सीमा साझा करता है, जो उसके पड़ोसियों में सबसे लंबी है. यह वहां स्थित है जहां पश्चिम बंगाल संकरे लेकिन बेहद अहम सिलीगुड़ी गलियारे के जरिए पूर्वोत्तर से मिलता है, जो इसे सामरिक तौर पर भारत के लिए बहुत अहम बना देता है. मगर 1975 में उसके संस्थापक और हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद सत्ता में आई हुकूमतें भारत के प्रति शत्रुता से ग्रस्त रहीं, बावजूद इसके कि उसकी आजादी की लड़ाई में भारत ने अच्छी-खासी भूमिका निभाई थी.
खालिदा जिया ने 1991-96 और 2001-06 में प्रधानमंत्री के तौर पर अपने दो कार्यकालों में पूर्वोत्तर के विद्रोहियों सहित भारत-विरोधी तत्वों को पनाह दी. मगर 2009 से जब हसीना सत्ता में रहीं, भारत के लिए शानदार दौर रहा. पिछले दशक भर के वक्त में हम भूमि विवाद को सौहार्द्रपूर्ण ढंग से सुलझा पाए, जिससे दोनों देशों के बीच सीमा पार कनेक्टिविटी सहित बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाओं का निर्माण हो सका.
2016-2019 तक बांग्लादेश में उच्चायुक्त रहे पूर्व विदेश सचिव हर्ष शृंगला बताते हैं, "पिछले 15 साल में बांग्लादेश के साथ हमने बहुत प्रगति की, जो उससे पहले के 35 साल से कहीं ज्यादा थी. वहां नई सरकार के साथ मेलजोल बढ़ाना अहम है, ताकि खुद हमारे लिए और बांग्लादेश के लोगों के लिए भी प्रगति के उस स्तर को बनाए रखा जा सके. यथास्थिति को चोट पहुंचाने वाले तरीके से बदलने वाली कोई भी स्थिति हमारे लिए नुक्सानदेह होगी. बांग्लादेश में अस्थिरता या नई सरकार में हमारे लिए खटास के भाव का पूर्वोत्तर और ट्रांजिट तथा कनेक्टिविटी सरीखे बेहद जरूरी मुद्दों पर असर पड़ सकता है. फिर, भारत का बांग्लादेश पर काफी असर है. साझा फायदों के लिए सहयोग दोनों पड़ोसी देशों के लिए बेहतर होगा."

खाई दिखने लगी
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि पड़ोसियों के साथ रिश्तों के मामले में बांग्लादेश अपवाद नहीं, बल्कि नियम बनता जा रहा है. मोदी सरकार की नेबरहुड फर्स्ट या 'पड़ोसी प्रथम' नीति का असर कम होने लगा है और ऐसे संकटों से निबटने के लिए भारत की तरफ से अपनाई गई रणनीति पुरानी लगने लगी है.
पूर्व डिप्टी एनएसए और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के डायरेक्टर अरविंद गुप्ता कहते हैं, "हमारा पड़ोस भीतर ही भीतर दरक रहा है और अगले कुछ साल में ऐसी ही कई और घटनाओं की हमें आशंका है. इसलिए यह हमारी विदेश नीति की पहली प्राथमिकता होने जा रहा है. अगले 10 साल के बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि अगले पांच साल में हमें क्या करना चाहिए. एकदम नए सिरे से सोचने की जरूरत है कि किस हद तक मेलजोल रखें और किस किस्म के लोगों से रिश्ते बढ़ाएं."
वे एक और दिलचस्प पहलू की तरफ इशारा करते हैं. वे कहते हैं, ''इनमें से ज्यादातर देशों में जिस बात से हम चूक रहे हैं, वह है युवाओं के साथ हमारा जुड़ाव. हमारा वास्ता अब भी पुराने जमाने के सियासतदानों के साथ है, जबकि इनमें से ज्यादातर देशों में पूरी तरह युवा हावी हैं और सोशल मीडिया की मदद लेने से काफी फर्क पड़ सकता है."
मेनन इस बात से सहमत हैं और इतना और जोड़ते हैं, "हमें मानना होगा कि ज्यादातर भारतीय, सत्ता-प्रतिष्ठान भी, खासकर पिछले कुछ साल में इस तरह बर्ताव कर रहे हैं मानो हम अपने आस-पड़ोस से बहुत आगे निकल गए हैं. हमारी दिलचस्पी जी20, अमेरिका और रूस में ज्यादा जान पड़ती है. आस-पड़ोस में हमारा रिकॉर्ड गड्डमड्ड रहा है और सहायता के लिहाज से उनके प्रति हमारी प्रतिबद्धता समय के साथ कम होती गई है. जब आपके दो सबसे बड़े पड़ोसी मुस्लिम हैं, आप घरेलू राजनीति को सांप्रदायिक बना देते हैं. ऐसे में आप उनसे कैसे निबटेंगे?"
पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन एक ढांचागत मुद्दे पर रोशनी डालते हैं, जिसे सुलझाने की जरूरत है. वे कहते हैं, "हम पिछले काफी समय से पड़ोस प्रथम की नीति की बात कर रहे हैं, लेकिन उसे मूर्त रूप देने के लिए जिस तरह के साधन और संसाधन लगाने होंगे, क्या वे हमारे पास हैं? मानव संसाधन की तैनाती को ही लीजिए, आप ऐसा विदेश मंत्रालय तो नहीं रख सकते, जिसमें पड़ोसी देशों से निबटने के लिए महज इने-गिने लोग ही हों."
आस-पड़ोस पर भारतीयों की पकड़ छूटने के निशान चौतरफा दिखते हैं. मालदीव में हालिया सत्ता परिवर्तन के साथ हिंद महासागर की बेहद अहम सीमा चौकी के इस देश के साथ हमारे रिश्ते खराब हो गए. 2018 से 2023 के बीच, जब राष्ट्रपति इब्राहीम सालेह की हुकूमत थी, भारत ने आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था के मामलों में काफी प्रगति की. वह पिछली चीन समर्थक सरकार की तरफ से लागू ज्यादातर भारत विरोधी नीतियों को उलटने में कामयाब रहा, जिनमें 2010 में जीएमआर समूह के साथ 50 करोड़ डॉलर की हवाई अड्डा परियोजना को रद्द करना भी शामिल था.
लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में सालेह जब 'इंडिया आउट' अभियान चलाने वाले मोहम्मद मुइज्जू से हार गए, तो रिश्तों ने फिर गोता लगाया. सारे भारतीय सैन्यकर्मियों को देश छोड़ने का फरमान देते हुए मुइज्जू ने पहले के कई रक्षा समझौते रद्द कर दिए. यहां तक कि खाद्य आयात, स्वास्थ्य सुविधाओं और व्यापार के मामले में भारत पर मालदीव की निर्भरता कम करने के लिए उन्होंने चीन के साथ 20 समझौतों पर दस्तखत किए. बदतर यह कि चीन अब मालदीव में नौसैन्य अड्डा विकसित करने का मंसूबा बना रहा है जो हिंद महासागर में भारत की सुरक्षा और उसकी सामरिक पहलों के लिए खतरा बन सकता है.
इसी तरह प्रधानमंत्रियों के बार-बार बदलने से पड़ोसी हिमालयी देश नेपाल में भारत की तकदीर में उतार-चढ़ाव आते देखे गए. प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को चीन समर्थक माना जाता है. 2018 और 2020 के बीच अपने पिछले कार्यकाल में उन्होंने चल रही बातचीत को नजरअंदाज करके नेपाल से सटे सरहदी इलाकों में भारत के तीन विवादित इलाकों को अपना बताते हुए एक विवादास्पद नक्शा छापकर राष्ट्रवादी जोश भड़काया. फिर जबरन संवैधानिक संशोधन करके उसे औपचारिक रूप दिया. ओली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी—एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) के मुखिया भी हैं.
उन्होंने बढ़-चढ़कर चीन के साथ बेहतर रिश्ते विकसित किए और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के निर्माण के लिए उसके साथ कई समझौतों पर दस्तखत किए जिन पर भारत दांत पीसता रह गया. महीने भर पहले नेपाली कांग्रेस के साथ अप्रत्याशित गठबंधन बनाने के बाद अब वे फिर सत्ता में हैं. नेपाल में पूर्व राजदूत रंजीत रे गठबंधन को वैसा ही मानते हैं मानो भाजपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना लें.
हालांकि शेर बहादुर देउबा की अगुआई वाली नेपाली कांग्रेस को भारत समर्थक माना जाता है, पर रे किसी भी तरह से गाफिल न रहने की चेतावनी देते हैं. वे कहते हैं, "नेपाल में अमेरिकी और चीनी काफी सक्रिय हैं और भारत को देश के सभी किरदारों के साथ ज्यादा बातचीत करनी चाहिए. हमें सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखना चाहिए, जैसा हमने बांग्लादेश में किया."

चीन फैक्टर
कई विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के साथ लंबी सरहद साझा करने वाले म्यांमार में मोदी सरकार के बांग्लादेश में की गई गलती को दोहराने का अंदेशा है. भारत ने जनरल लाइंग के नेतृत्व वाली स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन काउंसिल (एसएसी) का समर्थन करना जारी रखा है. सैन्य सरकार या जुंटा को अलोकप्रिय माना जा रहा है, फिर भी भारत उसे कथित तौर पर हथियार और गोला-बारूद बेच रहा है. सेना उन हथियारों का इस्तेमाल देश में बगावत को दबाने के लिए कर रही है.
वहां भी युवा ही देश की जर्जर आर्थिक स्थिति—म्यांमार की जीडीपी वृद्धि नकारात्मक है—के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. म्यांमार में भारत के पूर्व राजदूत गौतम मुखोपाध्याय कहते हैं, "भारत को एसएसी के साथ माना जाता है, जिसका मतलब है कि म्यांमार की करीब 80 फीसद आबादी की हमारे बारे में नकारात्मक राय है. म्यांमार अब संघीय और लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रेरित हो रहा है और भारत के पास चीन की नकल करने के बजाए (लोकतांत्रिक देश के रूप में) अपनी सबसे बड़ी पहचान का इस्तेमाल करके अपने जैसी संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने का अवसर है. लेकिन ऐसा लगता है कि हम अनिष्ट के इशारे को नहीं समझ पा रहे हैं और यथास्थिति के पक्ष में हैं."
अलबत्ता सभी विशेषज्ञ इस नजरिए से सहमत नहीं हैं. कई लोगों का मानना है कि भारत सत्तारूढ़ शासन का समर्थन करके सही नीति का पालन कर रहा है क्योंकि म्यांमार की सेना वैसे भी किसी भी लोकतांत्रिक शासन में सत्ता के चाबी को नियंत्रित करना जारी रखेगी. 2008 के संविधान में यह प्रावधान है कि संसद का 25 फीसद हिस्सा सैन्य अधिकारियों के लिए आरक्षित है. सरन का मानना है कि भारत को "विवेकपूर्ण ऐसेट लायबिलिटी का विश्लेषण करके और यह सोच-समझकर कि हम किन समूहों के साथ काम कर सकते हैं और कौन हमारी सुरक्षा चिंताओं का ख्ययाल रख सकते हैं" सेना का विरोध करने वालों के साथ जुड़ना चाहिए.
पाकिस्तान के फौजी हुक्मरानों को भी हाल के दिनों में झटका लगा है. उन्होंने अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान को वजीर-ए-आजम के ओहदे से हटाने के कदम का समर्थन किया था. इमरान को पिछली मई में कई तरह के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया था, जिसकी वजह से उनके समर्थकों ने लाहौर कोर कमांडर के घर पर धावा बोल दिया था और फौज के प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को नकेल कसने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को फरवरी के आम चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किए जाने के बाद फौजी निजाम को दूसरा झटका उस वक्त लगा जब खान समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों ने सबसे अधिक सीटें जीतीं. इमरान ने फिर उन्हें सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल (एसआईसी) में शामिल कर लिया, जो इस्लामी सियासी और मजहबी पार्टियों का गठबंधन है.
यह काउंसिल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. इस तरह इमरान अब फौज और वजीर-ए-आजम शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ राजनैतिक व्यवस्था दोनों के लिए खतरा बन गए हैं. और इन घटनाओं का खामियाजा भारत भुगत रहा है क्योंकि पाकिस्तानी फौज भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारत में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए प्रॉक्सी का इस्तेमाल करने की अपनी पुरानी योजना पर लौट रही है. इस बार उसने जम्मू को निशाना बनाया है, जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव को बाधित कर कश्मीर को फिर से केंद्र में लाना है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा फिर से पाकिस्तान में प्रमुख मुद्दा बन जाए.
इस बीच, चीन ने भी पिछले पांच वर्षों में अपनी हरकतें तेज कर दी हैं. पहले मई 2020 में लद्दाख की गलवन घाटी में एलएसी पर अभूतपूर्व घुसपैठ की, जिसमें 50 वर्षों में पहली बार झड़पों में सशस्त्र बलों के जवानों की जान चली गई. इसके बाद उसने लद्दाख और पूर्वोत्तर के सभी प्रमुख क्षेत्रों में सैनिकों को इकट्ठा कर लिया. सरहद पर तनातनी की वजह से दोनों देशों के बीच संबंध निम्नतम स्तर पर पहुंच गए और 21 दौर की सैन्य वार्ता के बावजूद चीन ने अपने कब्जे वाले कुछ सुविधाजनक जगहों से पीछे हटने से इनकार कर दिया है.
भारत ने अब कहा है कि जब तक चीन न केवल मई 2020 में हथियाए गए इलाकों में यथास्थिति बहाल नहीं करता, बल्कि डेमचोक और देपसांग क्षेत्रों में अपने पहले की स्थिति में नहीं लौटता, तब तक संबंध सामान्य नहीं होंगे.

ऐसे में चीन अपने पुराने फॉर्मूले पर लौट गया है कि दोनों देशों को सीमा विवाद को व्यापार और अन्य मोर्चों पर संबंध सामान्य बनाने के आड़े नहीं आने देना चाहिए. चीन ने बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के जरिए भारत के पड़ोसियों को लुभाने का काम तेज कर दिया है, उन प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को उदारतापूर्वक वित्त पोषित किया है जो चीन के साथ संपर्क बनाने और व्यापार बढ़ाने में मदद करते हैं.
पड़ोसी देशों ने चीन के साथ संबंधों में भारत की कमजोरियों को भांपते हुए अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ खेला है, जिससे अक्सर नई दिल्ली को पीछे हटकर बराबरी के लिए जूझना पड़ा. वैसे, सरन आगाह करते है, "हमारे पड़ोस की सभी परेशानियों की जड़ में केवल चीन पर ज्यादा ध्यान देना गलत है. हमें यह देखना चाहिए कि हम गलती तो नहीं कर रहे."
और भी तो हैं रास्ते
तो फिर भारत अपनी पड़ोसी प्रथम की नीति को कैसे नए सिरे से गढ़े और उसमें जान फूंके. ज्यादातर विशेषज्ञ अपने पड़ोसियों के साथ आर्थिक एकीकरण की दिशा में जोर दिए जाने और बीआरआई पर चीन जैसे भारी भरकम खर्च की पैरवी करते हैं. इन लोगों में एक मेनन हैं जिनका मानना है कि भारत को अपनी पड़ोस की नीति को सुरक्षा के विचार से परे जाकर बढ़ाना चाहिए और उसे आर्थिक सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए. वे एक और अहम बात जोड़ते हैं: भारत को अपने पड़ोसियों के साथ बदले में उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
लेकिन जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री आइ.के. गुजराल ने सिद्धांत प्रतिपादित किया, जितना हम उनसे लेते हैं, उससे ज्यादा उनको दीजिए. मेनन पूछते हैं, "अगर अमेरिका भारत के साथ अपने संबंधों में इसी तरह बदले की उम्मीद पर जोर देता तो क्या आप समझते हैं कि हमारे रिश्ते तेजी से आगे बढ़ पाते." टेलिस का मानना है कि भारत को चीन की नीतियों से कुछ सीखना चाहिए और "अपने दुश्मनों को खुद पर निर्भर बनाने" पर काम करना चाहिए. और अर्थशास्त्र ऐसा क्षेत्र है जहां आपको अधिकतम फायदा मिल सकता है.
इसका मतलब है भारत को क्षेत्रीय एकीकरण बढ़ाने के लिए आक्रामक व्यापार नीति को बढ़ावा देना चाहिए. सरन इससे सहमत हैं और कहते हैं कि महत्वपूर्ण यह है कि संबंधों में ऐसी विविधता हो जिनसे "लंबी अवधि में ऐसी अंतरनिर्भरता" तय हो जो आने वाले विरोधी राजनीतिकों के 'आत्मघाती दबाव' को रोक सके. गुप्ता का मानना है कि भारत की पड़ोसी नीति में एक नया आयाम जोड़ा जाना चाहिए जिसमें भारत आर्थिक और वित्तीय मोर्चे पर भी अपनी लड़ाई लड़े.
श्रीलंका एक अच्छी मिसाल है कि कैसे मोदी सरकार ने 2022 के आर्थिक संकट के बाद अनिश्चितता के भंवर में डूबे द्वीप देश के साथ अपने सधे हुए कदम बढ़ाए. इससे पहले, चीन ने 13 अरब डॉलर से अधिक के निवेश के साथ श्रीलंका को लुभाया था. ये मुख्य रूप से बंदरगाह और शहरी विकास से संबंधित थीं. लेकिन इनमें से कई सफेद हाथी साबित हुईं और श्रीलंका के जीडीपी और ऋण का अनुपात बहुत ज्यादा बढ़कर 110% को पार कर गया. कोविड के बाद जब विदेशी मुद्रा की आवक रुक गई तो पर्यटन उद्योग चौपट हो गया था और खाद्य, उर्वरक और पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही थीं. ऐसे समय में भारत ने चार अरब डॉलर की वित्तीय सहायता मुहैया कराई.
पिछले 4 साल में जब चीन का एफडीआई भी खत्म हो गया तो भारत ने 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया. भारत के निजी क्षेत्र के दिग्गजों ने भी वहां कदम बढ़ाए और आईटीसी ने इस साल अप्रैल में कोलंबो में पहला लग्जरी हॉलीडे रिसॉर्ट खोला. रत्नदीप नाम के इस रिसॉर्ट के बारे में आईटीसी के अध्यक्ष संजीव पुरी कहते हैं कि उन्होंने इसमें 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया है. अदाणी समूह ने वेस्ट कोलंबो बंदरगाह पर वेस्ट कोस्ट टर्मिनल बनाने के लिए 70 करोड़ डॉलर और उत्तरी लंका में पवन ऊर्जा संयंत्र पर 44.2 करोड़ डॉलर का निवेश किया.
इस वित्तीय मदद और बड़े निवेशों के कारण भारत के प्रति कोलंबो के लोगों के नजरिए में बदलाव आया है, भले ही वहां सत्ता बदल जाए.भारत ने मालदीव की शत्रुता को काबू करने में भी सफलता हासिल की है. मालदीव के पर्यटन स्थलों के बॉयकॉट की अपील के बाद वहां भारतीय पर्यटकों की संख्या में 42% गिरावट आ गई. मालदीव ने अपील की क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था उस पर निर्भर है. इससे सत्तारूढ़ दल का भारत विरोधी रवैया भी नरम हुआ है.
सबके साथ एक-सा रवैया लागू करने से बचें
कुछ विशेषज्ञ दलील देते हैं कि भारत को ऐसी विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की दिशा में काम करना चाहिए जो दक्षिण एशिया क्षेत्र को बेहतर तरीके से जोड़ सके और चीन को अग्रणी भूमिका निभाने देने के बजाय अधिक आर्थिक संपर्क शुरू किया जाए. मसलन, नेपाल में नया राजनैतिक प्रतिष्ठान अपनी पनबिजली की संभावनाओं के दोहन के लिए विद्युत परियोजनाओं के अलावा भारत से ज्यादा सड़क और जलमार्ग खोलने की संभावनाएं टटोल रहा है. भारत का नेपाल में चीन की मदद से बनी परियोजनाओं से बिजली खरीदने के प्रति ठंडा रुख रहा है.
रे का तर्क है कि इन परियोजनाओं को रोकने के बजाय भारत को जापान और दक्षिण कोरिया जैसे मित्र देशों को नेपाल में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे अंतरनिर्भरता में इजाफा हो. रे का सोचना है कि भारतीय सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना अदूरदर्शी थी क्योंकि उससे उसमें नेपालियों की भर्ती रुक गई जिससे 200 साल पुरानी परंपरा टूट गई. ये सैनिक भारत विरोध के खिलाफ देश में एक ताकत बन गए थे. लेकिन अब यह योजना दोनों देशों के संबंधों के बीच खटास का बिंदु बन गई है. मुखोपाध्याय कहते हैं कि सब पर एक ही तरह की आर्थिक नीति लागू करने के बजाय भारत को म्यांमार जैसे देशों में कृषि और बागवानी निर्यात की संभावनाएं बढ़ानी चाहिए, जिससे उनके बड़े बहुमत का दिल जीता जा सकता है.
इसी के साथ जरूरी है, मजबूत क्षेत्रीय व्यापार संगठन का विकास करना और अंतरक्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के जरिए आगे बढ़ना. भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी के कारण दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के पटरी से उतर जाने के बाद भारत ने 2004 में बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी की पहल (बिम्सटेक) की शुरुआत की थी. इसमें सात देश बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, थाइलैंड और भारत शामिल हैं जबकि चीन और पाकिस्तान इससे बाहर हैं.
हालांकि पिछले दो दशक में इस समूह की सिर्फ पांच ही शिखर बैठकें हुई हैं और उसने एफटीए पर सहमति जताने से कदम पीछे खींच लिए हैं. पिछले सप्ताह कॉन्फेडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) की ओर से दिल्ली में आयोजित सदस्य देशों की बैठक में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत की धीमी गति पर गंभीर चिंता जताई और कहा, "नए रास्ते और वैकल्पिक समाधान खोजे जाने की जरूरत है. इनमें प्राथमिकता व्यापार समझौते (पीटीए) शुरू करने की बात भी शामिल है जो आगे चलकर एफटीए में बदल सकता है."
बिम्सटेक व्यापार पर सीआईआई के अध्ययन से एक चौंकाने वाली बात पता चलती है. वह यह कि सदस्य देशों के साथ उनका व्यापार रिश्ता उनके कुल कारोबार का मात्र 6 फीसदी है जो संभावनाओं से काफी कम है. बिम्सटेक देशों के साथ भारत का कुल व्यापार 2023-24 में 44.32 अरब डॉलर था जो देश के कुल निर्यात 776 अरब डॉलर का मात्र 5.7% है.
इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनीतिक और सुरक्षा मजबूरी से कहीं ज्यादा व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक और व्यापार एकीकरण पर जोर देना आगे की राह हो सकती है. जैसा कि एक विशेषज्ञ कहते हैं, "अगर हमारे पड़ोसी हमें डुबोने की कोशिश करते हैं तो वे अपने आप को ही डुबोएंगे." पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था, "आप अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते, लेकिन दोस्त बदल सकते हैं." भारत का प्रयास अब अपने पड़ोसियों को दोस्त बनाने का होना चाहिए, न कि निकटता और आकार के कारण उनके असंतोष का स्वाभाविक चुंबक.

