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बेरोजगारी का मसला कितना हल कर पाएगा इस बार का बजट?

इस बार के केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर रोजगार के मौके पैदा करने के लिए जो कदम उठाए हैं, वे कितने कारगर हो सकते हैं?

निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री
निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी योजनाओं और पहलकदमियों के लिए अपने नेता प्रधानमंत्री मोदी नरेंद्र मोदी से एक्रोनिम (शब्दों का संक्षिप्तीकरण) की कला सीख ली है. जब उन्होंने मोदी 3.0 का पहला केंद्रीय बजट (वित्त मंत्री के रूप में उनका सातवां) पेश किया तो देश की नौ प्राथमिकताओं की सूची में पहले नंबर पर कृषि में उत्पादकता का जिक्र करके राजनैतिक रूप से उचित प्राथमिकता दी.

लेकिन अपने आधिकारिक 'एक्स' हैंडल पर बजट की मुख्य थीम को प्रमुखता से बताने के लिए उन्होंने इन नौ फोकस क्षेत्रों के अंग्रेजी में पहले अक्षर को नए क्रम में जमाते हुए नया शब्द एम्प्लॉयमेंट गढ़ दिया. इसमें एम्प्लॉयमेंट, एमएसएमई, कृषि में उत्पादकता, भूमि, अवसर, युवा, मध्य वर्ग, ऊर्जा, अगली पीढ़ी के सुधार और टेक्नोलॉजी का शुरू का पहला अक्षर लिया गया है. फिर उन्होंने मोदी की तस्वीर के साथ 'बजट फॉर विकसित भारत' के हैश टैग के साथ इस सूची को डाला.

कई लोगों ने इस पोस्ट की व्याख्या की कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) यह मान रही है कि रोजगार का संकट एक बड़ा कारण था जिससे मई में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी अपने बूते पूर्ण बहुमत पाने में विफल रही. और यह कि राजनैतिक पूंजी को और नुक्सान से बचाने के लिए समस्या से निबटने की सख्त जरूरत है. 

बजट 2024 इस समस्या से सीधे निबटने की मोदी सरकार की योजना बताता है. सीतारमण ने रोजगार से जुड़ी पांच बड़ी योजनाओं के प्रधानमंत्री के पैकेज की घोषणा की है. इसके तहत पांच साल में 4.1 करोड़ युवाओं को हुनरमंद बनाने और रोजगार दिलाने के लिए दो लाख करोड़ रुपए का महत्वाकांक्षी परिव्यय रखा गया है.

यह शायद सबसे भारी भरकम रोजगार सृजन मिशन है जो मोदी ने 10 साल पहले सत्ता में आने के बाद पहली बार शुरू किया है. इसमें बड़ा परिवर्तन यह है कि उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन उपलब्ध कराने और वृद्धि बढ़ाने के लिए पूंजी लागत घटाने के बजाय मोदी सरकार ने रोजगार और रोजगार की पात्रता दोनों को सहायता देने के लिए बड़ा दांव लगाने का फैसला किया है.

इंडिया टुडे के साथ बातचीत में केंद्रीय वित्त सचिव डॉक्टर टी.वी. सोमनाथन ने कहा, ''भारत की वृद्धि में अधिक रोजगार पैदा हों, यह सुनिश्चित करने के लिए यह एक बड़ा और इनोवेटिव जोर है. यह बड़ा इसलिए क्योंकि इसका लक्ष्य 4 करोड़ युवाओं को रोजगार और कौशल बढ़ाने के दायरे में लेना है और यहां हम किसी छोटे-मोटे परिवर्तन की बात नहीं कर रहे, हम 2 लाख करोड़ रुपए रख रहे हैं. यह इनोवेटिव इसलिए है कि महज निवेश या उत्पादन के बजाय खासतौर पर निजी क्षेत्र को शामिल करने और सभी तरह की सब्सिडी को रोजगार से जोड़ने के लिहाज से इन योजनाओं की कोई सानी नहीं है.''

बढ़ती युवा आबादी पर दांव

इन योजनाओं का जिक्र करते हुए सोमनाथन कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती युवाओं की तेजी से बढ़ती आबादी है. भारत में अभी 65 करोड़ लोग मुख्य कामकाजी आयु वर्ग 18 से 35 के बीच हैं जो अकेले ही अमेरिका की कुल आबादी का दोगुना हैं. इसका मतलब है कि अगर भारत इस युवा आबादी से फायदा उठा सकता है तो इससे देश की वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा और 2047 तक विकसित भारत बनने की राह पर मजबूती से बढ़ेगा. लेकिन अगर हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो देश में गरीबी से जूझ रही बड़ी आबादी संपन्न बनने से पहले ही बहुत बूढ़ी हो जाएगी. 

बजट निर्माताओं ने एक और अहम मसले का सामना किया. आर्थिक समीक्षा 2023-24 में आकलन किया गया है कि भारत का मौजूदा 56.5 करोड़ के कार्यबल का करीब 45 फीसद या 25.4 करोड़ लोग कृषि से रोजगार पा रहे हैं जिसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महज 18.2 फीसद योगदान है.

दूसरी तरफ सेवा, मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण क्षेत्र में 55 फीसद श्रमिक जुड़े हुए हैं जो जीडीपी का 82 फीसद उत्पादन करते हैं. इसलिए कृषि से श्रम को अधिक उत्पादक क्षेत्र में ले जाने की सख्त जरूरत है. एक प्रमुख ह्यूमन कैपिटल फर्म टीमलीज के उपाध्यक्ष मनीष सभरवाल इसे कुछ इस तरह बयान करते हैं, ''भारत की चुनौती बेरोजगारी नहीं है जो 4.9 फीसद के निचले स्तर पर बताई जाती है बल्कि रोजगार में गरीबी है—गरीब बेरोजगार रहना बर्दाश्त नहीं कर सकता. कल्याणवाद से रोजगार वाली गरीबी में मदद नहीं मिलती. हमने रोजगार को हमेशा से अर्थशास्त्रियों की आंख से देखा है न कि कर्मचारियों की रोजमर्रा की जिंदगी की नजर से. इसे बदलना होगा.''

इस बीच भारत में एक और समस्या धीरे-धीरे विकराल बनती जा रही है. आर्थिक सर्वे में संकेत दिया गया है कि भारत को गैर कृषि क्षेत्र में 2030 तक हर वर्ष 80 लाख अतिरिक्त रोजगार पैदा करने होंगे जिससे कि आबादी का लाभ उठाया जा सके और लोगों के बीच असंतोष और संघर्ष को टाला जा सके. जहां कुशल श्रमिकों की मांग बढ़ रही है, वहीं आर्थिक सर्वे संकेत देता है कि भारतीय कॉलेजों से पास होकर निकलने वाले 50 फीसद ग्रेजुएट बेरोजगार हैं क्योंकि उनमें उद्योग की मौजूदा जरूरत के लायक कौशल का अभाव है.

अपने मीडिया इंटरव्यू में सीतारमण ने जिक्र किया कि इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिग्गज कंपनी एलऐंडटी कैसे 45,000 खाली पदों को इसलिए नहीं भर पाई कि उसे उचित कौशल वाले लोग नहीं मिले. कौशल विकास के प्रमुख विशेषज्ञ सुब्रत बागची भी इशारा करते हैं कि भारत में एक ऐसी मजबूत जातीय व्यवस्था बन गई है जिसमें सबसे ऊपर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के ग्रेजुएट रखे जाते हैं और इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आईटीआई) से वोकेशनल कोर्स करने वाले सबसे नीचे रहते हैं.

संयोग से, वे बताते हैं, ''आईआईटी और आईटीआई दोनों को 1950 के दशक में शुरू किया गया था. लेकिन जहां आईआईटी बहुत आगे बढ़ गए, आईटीआई पीछे चले गए. आईटीआई के माथे पर नाकामी का बारकोड छपा हुआ है. नियोक्ताओं ने ऐसी मानसिकता बना ली है कि आईटीआई से निकलने वालों को वे झुग्गी बस्तियों जैसी मजदूरी देंगे. दूसरी तरफ, सिंगापुर में आईटीआई के समकक्षों का शुरुआती वेतन 20 लाख रुपए सालाना से अधिक है. यह नहीं चल सकता.''

इसके समाधान के लिए सोमनाथन और वित्त मंत्रालय में उनके सहयोगियों ने उद्योग संगठनों सहित सभी हिस्सेदारों से बात की. हर कोई इस पर सहमत था कि भारत के लिए सबसे अच्छा तरीका ऊंची के बजाय औसत आर्थिक वृद्धि के जरिए रोजगार हासिल करना हो सकता है. बजट 2024 में एक बात निवेशकों के विश्वास के लिए व्यापक अर्थव्यवस्था में स्थिरता और राजकोषीय विवेक सुनिश्चित करने की भी थी.

इसलिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 4.9 फीसद पर तय किया गया जो मौजूदा 5.6 फीसद से काफी कम है. अभी जबकि निजी पूंजी खर्च पिछड़ा हुआ है, तो मोदी सरकार ने इन्फ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक आवास के लिए धन का बड़ा हिस्सा देना जारी रखा है. ये दोनों क्षेत्र निश्चित ही रोजगार बढ़ाने वाले हैं. 

छोटों को बड़ी राहत

ग्रोथ और रोजगार दोनों में तेजी लाने के प्रयासों के तौर पर बजट में एमएसएमई सेक्टर के लिए रियायतें दी गई हैं जो बड़ी संख्या में रोजगार देते हैं. वित्त मंत्री ने मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की उन एमएसएमई के लिए क्रेडिट गारंटी योजना शुरू की जिससे कि उनको जमानत या तीसरी पार्टी की गारंटी के बगैर मशीनरी और उपकरण खरीदने के लिए सावधि ऋण (टर्म लोन) की सुविधा मिल सके.

उन्होंने एमएसएमई के लिए मुश्किल वक्त के दौरान बैंक ऋण जारी रखने की सुविधा की खातिर नई व्यवस्था भी शुरू की. इसके तहत, प्रावधानों का विवरण अभी आना बाकी है. इसमें बैंक या तो एमएसएमई को सरकार की गारंटी वाले ऋण देंगे या फिर सरकार सीधे एक कोष बनाएगी जिससे बैंक एमएसएमई को धन देने के लिए पैसा ले सकेंगे. इस बीच, मुद्रा लोन की (छोटे उद्यमियों के लिए) 10 लाख रु. की मौजूदा सीमा बढ़ाकर 20 लाख रु. की गई है.

यह उनके लिए होगी जिनका पुनर्भुगतान का रिकॉर्ड साफ सुथरा है. इस तरह नए उद्यमियों को अपने सपनों को उड़ान देने और रोजगार पैदा करने के लिए अधिक धनराशि मिल सकेगी. केंद्र ने सभी तरह के निवेशकों पर से एंजल टैक्स खत्म कर दिया है. स्टार्टअप सेक्टर की यह मांग लंबी अवधि से चली आ रही थी. बजट में कई योजनाएं और पहल हैं जो तेज रफ्तार आर्थिक वृद्धि में मददगार होंगी. 

हालांकि ये प्रावधान करते समय नीति निर्माताओं को इस बात का एहसास रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में आर्थिक वृद्धि उचित अनुपात में और पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं भी कर सकती है. लिहाजा आर्थिक वृद्धि की रोजगार तीव्रता बढ़ाने की जरूरत है. इसलिए जोर इस बात पर था कि महंगे ऑटोमेटेड सॉल्यूशंस अपनाने के बजाय नियोक्ताओं को अधिक श्रमिक काम पर रखने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए.

अधिकारी बताते हैं कि प्रधानमंत्री इस बारे में स्पष्ट थे कि उद्योग को कौशल प्रशिक्षण में गहराई से जोड़ना होगा और 'सरकारी' संस्थानों पर ज्यादा निर्भर नहीं रहना होगा. साथ ही साथ उनका यह भी साफ कहना था कि निजी क्षेत्र को 'स्वेच्छा और इच्छा से साथ लिया जाना' चाहिए.

अजय सेठ, सचिव, केंद्रीय आर्थिक कार्य विभाग

आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ ने बताया, ''एक बात स्पष्ट थी कि अगर कौशल प्रशिक्षण कारगर बने तो यह उद्योग और राज्यों की सक्रिय भागीदारी से होना चाहिए. मसला यह था कि हम अपनी ग्रोथ की कहानी को कैसे अधिक व्यापक बना सकते हैं और अर्थव्यवस्था को उस मुकाम पर ले जा सकते हैं जहां न सिर्फ रोजगार पैदा किए जाएं बल्कि उनमें बेहतर वेतन भी मिले.'' 

एक और दिक्कत श्रम कानून और राज्यों के औद्योगिक नियमन थे जिनको सरल बनाने की जरूरत है. इनके बारे में सोमनाथन मानते हैं कि यह 'इतना जल्दी और आसान काम' नहीं है. इसलिए ऐसी योजनाओं की जरूरत थी जो नियामकीय अवरोधों से बच सकें. टीम को पता है कि कारोबारी इसलिए लोगों को रोजगार नहीं देंगे कि उन्हें सब्सिडी मिल रही है, इस बात के पर्याप्त उदाहरण हैं कि वित्तीय प्रोत्साहन ज्यादा लोगों को रोजगार देने के कंपनियों के विकल्पों को प्रभावित करते हैं.

इसलिए एकल रोजगार सृजन योजना के बजाय मोदी सरकार ने कई लाने का फैसला किया. कई लोग इसे अपने आप में बड़े संकेत के रूप में देखते हैं. प्रोसेस इंडस्ट्री कंसल्टेंसी, फोर्ब्स मार्शल के सह अध्यक्ष नौशाद फोर्ब्स कहते हैं, ''यह पक्की बात है कि हम अच्छी क्वालिटी के पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर रहे हैं, सबसे उपयोगी बात यह है कि बजट ने यह साफ कह दिया है कि रोजगार ऐसा क्षेत्र है जिसे प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है. यह अच्छा संदेश दिया गया है.''  

नई और अनोखी योजनाएं

तीन नई योजनाएं रोजगार-संबंधी प्रोत्साहन या ईएलआई के सिद्धांत पर आधारित हैं. पहली योजना पहली बार नौकरी में लगे कर्मचारियों को तीन किस्तों में 15,000 रुपए महीने की तनख्वाह मुहैया कराने की है. इस योजना से 2.1 करोड़ से अधिक युवाओं को लाभ होगा. इस पर 23,000 करोड़ रुपए खर्च आएगा और यह तीन साल तक चलेगी.

अधिकारियों के मुताबिक, विचार यह है कि पहली बार काम में लगे युवाओं के शुरुआती खर्च का भुगतान किया जाए, जिसमें उनके काम पर आने-जाने का भत्ता भी शामिल है. लेकिन धोखाधड़ी करके सब्सिडी उठाने वालों के खिलाफ रोकथाम के लिए योजना में यह अनिवार्य शर्त जोड़ी गई है कि कामगार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में पंजीकृत होना चाहिए. इससे अर्थव्यवस्था में औपचारिक या संगठित क्षेत्र का दायरा बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

दूसरी योजना का मकसद उत्पादन क्षेत्र में थोक भर्तियों के लिए प्रोत्साहन देना है, जो जीडीपी में उसके योगदान के मुकाबले औसत से कम बनी हुई हैं. इस योजना के तहत नए कर्मचारी के वेतन का 24 फीसद सब्सिडी के रूप में दिया जाएगा, जो नियोक्ता और कर्मचारी में बराबर-बराबर बंटेगा. यह उन्हीं को दिया जाएगा, जो 50 या फिर अपने मौजूदा आधार से 25 फीसद अधिक नए लोगों नौकरी देंगे. यह नियोक्ता और कर्मचारी के 12 फीसद के ईपीएफओ अंशदान के लिए होगा, जिससे कर्मचारी के हाथ में तनख्वाह की मद में अधिक पैसे आएंगे.

इस योजना से 30 लाख लोगों को लाभ होगा. इस पर लागत 52,000 करोड़ रुपए आएगी और यह दो साल के लिए होगी. तीसरी योजना किसी भी नियोक्ता के लिए सब्सिडी सहायता है, जो पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम दो अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करता है, और सरकार नियोक्ता के 3,000 रुपए प्रति माह तक के ईपीएफओ अंशदान की भरपाई करेगी. इससे 50 लाख लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है और इस पर 32,000 करोड़ रुपए खर्च आएगा.

इस योजना के पीछे विचार यह है कि अगर कोई अपना कारोबार देश में वापस ला रहा है, जिसे सभरवाल 'चीन के फैक्ट्री शरणार्थी' कहते हैं, तो वह 1,000 से अधिक कर्मचारियों को रोजगार दे सकता है. इस मायने में यह बड़ा प्रोत्साहन है. इसके साथ ही, आयकर के ढांचे में बदलाव भी पहली टैक्स कर देने वालों के लिए प्रोत्साहन होना चाहिए, क्योंकि मौजूदा बजट में 5 फीसद के न्यूनतम कर स्लैब की सीमा 5 लाख रुपए प्रति वर्ष से बढ़ाकर 7 लाख रुपए कर दी गई है.

अन्य दो बड़ी योजनाएं कौशल विकास पर केंद्रित हैं. सबसे अहम 63,000 करोड़ रुपए की योजना है, जो पांच साल की अवधि में आला 500 कंपनियों में 1 करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप के मौके मुहैया करा सकती है. कोई काम न कर रहे या पूर्णकालिक पढ़ाई न कर रहे 21 वर्ष से 24 वर्ष की आयु के युवा इसके तहत आवेदन कर सकते हैं. इस योजना में 5,000 रुपए का मासिक इंटर्नशिप भत्ता और 6,000 रुपए की एकमुश्त सहायता राशि शामिल है.

हालांकि योजना में कंपनियों की भागीदारी स्वैच्छिक है, लेकिन उनसे उम्मीद की जाती है कि वे प्रशिक्षण और इंटर्नशिप खर्च का 10 फीसद अपने सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड से करें. यह पहल देश में कौशल विकास और प्रशिक्षण की संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशश है.

सेठ कहते हैं, ''इसका मकसद वंचित तबके के युवाओं को 12 महीनों के लिए कामयाब उद्योग-धंधों से परिचित कराना और उनके दिमाग को खोलना है, ताकि वे बड़े काम करने की उम्मीद रख सकें.'' सोमनाथन साफ करते हैं, ''हमें लगा कि उद्योग पर अनिवार्य प्रशिक्षण प्रणाली का बोझ डालना उचित नहीं है, क्योंकि इससे उसकी प्रतिस्पर्धा की क्षमता पर असर पड़ सकता है. इस योजना में फर्क यह है कि इसके लिए कोई कानूनी मजबूरी या प्रावधान या कानूनी अनिवार्यता नहीं हैं. यह पूरी तरह स्वैच्छिक है.''

हालांकि, विपक्ष ने ईएलआई योजना की आलोचना की है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर दावा किया कि इसे कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र न्याय पत्र से ''हड़बड़ी में कट, कॉपी, पेस्ट'' किया गया है जिससे योजना बिगड़ गई है. सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है.

लीकेज दुरुस्त करें

 

इंडिया ब्लॉक के नेता 24 जुलाई को बजट के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए

इस बारे में राय मिलाजुली है कि कॉर्पोरेट इंटर्नशिप कार्यक्रम कैसे आगे बढ़ेगा. बागची को इसकी कामयाबी पर संशय है. वे कहते हैं, ''दरअसल हुनर या कौशल प्रशिक्षण के मामले में कॉर्पोरेट का रवैया अग्रणी और फिसड्डी दोनों होता है. कुछ को छोड़कर, ज्यादातर फिसड्डी हैं, जहां निचले पायदान पर मौजूद मानव संसाधन विकास में कोई रुचि नहीं है. वे तय कर देते हैं कि ऐसे कर्मचारी सीधे उनकी वेतन-सूची में न हों, बल्कि वे ऐसी नौकरियों को ठेकेदारों के ठेकेदारों या उनके भी ठेकेदारों को सौंप देते हैं या तीन स्तर नीचे धकेल देते हैं. अगर नई योजना को कामयाब करना है तो यह रवैया बदलना होगा.''

सभरवाल थोड़े अधिक आशावादी हैं और मानते हैं कि लंबे समय में यह योजना अपना ली जाएगी. उनकी दलील है, ''इस नीति में वित्तीय खर्च और क्वालिफिकेशन के बीच पुल बनाने की गुंजाइश है जो नई जमीन तैयार करेगी. इंटर्न रखने वाले नियोक्ता जल्द ही महसूस करेंगे कि यह योजना तेजी से काम पर रखने, कम छंटनी और अधिक उत्पादकता के साथ उनके अपने फायदे के लिए है.''

लेकिन वे चेताते भी हैं, ''योजना के लीकेज दुरुस्त करने की जरूरत है. यह आश्वस्त करना होगा कि नियोक्ता इससे परेशान न हों, बच्चों का चयन निष्पक्ष हो. डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से उनके डिजिटल फुटप्रिंट और डिजिटल एग्जॉस्ट प्राप्त करके इन सब पर नजर रखी जा सकती है. इसमें कई दिक्कतें और आशंकाएं हैं, लेकिन यह आजमाने लायक है.''

लोगों का ध्यान खींचने वाली एक और बड़ी पहल हब और स्पोक मॉडल के जरिए 1,000 आईटीआई को अपग्रेड करने की योजना है, जिसमें युवाओं के हुनर में फर्क को दूर करने के लिए उद्योग की जरूरतों के हिसाब से पाठ्यक्रम की सामग्री तैयार की जाएगी. इस योजना में 200 हब और 800 स्पोक आईटीआई विकसित करना शामिल है, जिसमें पांच वर्षों में कुल 60,000 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा.

इसमें केंद्र सरकार 30,000 करोड़ रुपए, राज्य सरकारें 20,000 करोड़ रुपए और उद्योग जगत (सीएसआर फंड सहित) 10,000 करोड़ रुपए का योगदान देगा. ये दोनों योजनाएं केंद्र की इस बात की मौन स्वीकृति की तरह हैं कि हुनर या कौशल विकास के इसके पहले के प्रयासों को बहुत सफलता नहीं मिली और अब अपस्किलिंग अभियान को बढ़ावा देने के लिए निजी क्षेत्र को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है. सेठ मानते हैं, ''केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के प्रयास उतने सफल नहीं रहे हैं, इसलिए सहयोग आवश्यक है.''

सरकार के एजेंडे में खासकर सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए के तबकों के लिए उच्च शिक्षा की उपलब्धता में सुधार करना भी शामिल है. इसके लिए सरकार देसी संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए 10 लाख रुपए तक का ऋण मुहैया करा रही है. यह ऋण सहायता ई-वाउचर के माध्यम से सालाना 1,00,000 छात्रों को सीधे दी जाएगी और ऋण राशि पर 3 फीसद की ब्याज सब्सिडी भी दी जाएगी.

इसके अलावा, छात्रवृत्ति के लिए सब्सिडी योजना में संशोधन किया गया है, जिससे अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति समुदायों के छात्रों को मिलने वाले शिक्षा ऋण के लिए सब्सिडी दोगुनी हो गई है. इस बीच, छात्रों को कौशल पाठ्यक्रमों में आगे बढ़ने के लिए वित्तीय बाधाओं को दूर करने में सक्षम बनाने के लिए मॉडल कौशल ऋण योजना में भी बदलाव किया गया है ताकि 7.5 लाख रुपए तक के गारंटीकृत ऋण मुहैया कराए जा सकें, जिससे लगभग 25,000 लोगों को फायदा होगा.

क्या योजनाएं कारगर होंगी?

इनसे जुड़े पक्षकारों की इन सभी योजनाओं पर राय क्या है? आईटीसी के चेयरमैन तथा भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के अध्यक्ष संजीव पुरी इन प्रस्तावों के पैकेज के नतीजे को 4 ई—रोजगार, रोजगार योग्यता, सशक्तीकरण और उद्यमिता का नाम देते हैं. वे कहते हैं, ''बड़ी तस्वीर में देखें तो इनसे निवेश, रोजगार और उपभोग के चक्र को बढ़ावा मिलेगा और नतीजतन, आर्थिक परिवर्तन को गति मिलेगी. इससे नौकरियों और आमदनी की गुणवत्ता में भी सुधार होगा.''

पुरी अर्थव्यवस्था में मांगों के पूर्वानुमानों और उनके अनुरूप कौशल की एक आम डिजिटल लाइब्रेरी बनाने की भी वकालत करते हैं, जो सभी पक्षों को बेहतर ढंग से जानकार बनाने में मददगार हो. उनकी दलील है, ''आखिरकार, यह समूची व्यवस्था है जिसे साकार करने के लिए मिलकर काम करना होगा. अगर आप दूर से देखते हैं, तो और अधिक सवाल खड़े हो सकते हैं. लेकिन अगर इस पर एक साथ समग्र दृष्टि डालते हैं, तो अच्छे फायदे के रास्ते खुल सकते हैं. इससे कर्मचारियों की बेहतर सोच होगी, जिसका अर्थ है बेहतर प्रशिक्षित कर्मचारी और बेहतर और अधिक उत्पादक कार्यबल.''

बागची का मानना है कि सरकार मोटे तौर पर अब सही अफसाने के साथ पेश हुई है, लेकिन वे यह भी कहते हैं, ''हमें जमीनी स्तर पर मजबूती से आगे बढ़ने की जरूरत है, क्योंकि हुनर प्रशिक्षण या कौशल कार्यक्रम एक कठिन काम है. यह आसान नहीं, बल्कि लंबा मामला है. औद्योगिक प्रशिक्षण के कायाकल्प में तीन साल लगते हैं. यानी अभी से शुरुआत करें तो सरकार अगले आम चुनाव तक फायदे की फसल काट पाने के काबिल हो पाएगी!''

उनकी दलील है कि देश में 'नैनो यूनिकॉर्न' या ऐसे कुशल व्यक्तियों की जरूरत है जो छोटे शहरों में पांच नौकरियां पैदा करें, जिससे पूरे देश में लाखों नौकरियां पैदा की जा सकती हैं. वे कहते हैं, ''नौकरियों के मामले में न तो फॉर्च्यून 500 कंपनियां और न ही सरकार इतने बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा कर सकती हैं.'' उनके हिसाब से, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां और सेना कौशल विकास में सबसे अच्छे प्रशिक्षक हैं. वे यहां तक चाहते हैं कि रक्षा मंत्रालय राष्ट्रीय कौशल विकास निगम स्थापित करे और उसे चलाए.

सबसे बढ़कर, उनका मानना है कि कार्यबल में महिलाओं की संख्या को प्राथमिकता के आधार पर बढ़ाया जाना चाहिए. वे कहते हैं, ''यह शर्म की बात है कि पिछले एक दशक में देश में संगठित क्षेत्र में महिलाओं का अनुपात 25 फीसद से घटकर 20 फीसद हो गया है. हमें महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित शहर, सुरक्षित नौकरियां और कामगारों के लिए आवास की जरूरत है. आने वाले बजट में मैं महिला कामगारों पर ज्यादा जोर देखना चाहूंगा.''

नौशाद फोर्ब्स चाहते हैं कि सरकार मांग पक्ष पर अधिक ध्यान दे. वे कहते हैं, ''हमें रोजगार-प्रधान क्षेत्रों जैसे परिधान, जूते, खाद्य प्रसंस्करण और पर्यटन में उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां मुहैया कराने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.'' वे इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली क्षेत्र का उदाहरण देते हैं.

मसलन, आईफोन के विक्रेताओं जैसी व्यवस्था अन्य क्षेत्रों में भी बनाई जा सकती है. बताया गया कि एपल ने वित्त वर्ष 24 के दौरान भारत में 14 अरब डॉलर (11,718 करोड़ रुपए) मूल्य के आइफोन असेंबल किए. यह इसके वैश्विक आइफोन उत्पादन का 14 फीसद है, जिसका अर्थ है कि उसका सात में से एक उत्पाद अब भारत में बनता है. इस प्रक्रिया में, उसने सप्लायर नेटवर्क के जरिए 1,50,000 प्रत्यक्ष रोजगार और 3,00,000 परोक्ष रोजगार पैदा किए हैं.

सभरवाल की राय में और भी बहुत कुछ किया जा सकता है. वे जर्मनी की मिसाल देते हैं, जहां 2.7 फीसद श्रम शक्ति अप्रेंटिसशिप में है. उस पैमाने के अनुसार, भारत में 1.5 करोड़ प्रशिक्षु और अप्रेंटिस होने चाहिए, जो फिलहाल पांच लाख से भी कम हैं. इससे अंदाजा मिलता है कि चुनौती का आकार कितना बड़ा है.

सभरवाल कहते हैं, ''बजट इन दो चुनौतियों से निबटने के लिए जोखिम उठाने की हिम्मत दिखाता है. नए लोगों को काम पर रखने की पहली चुनौती नियोक्ताओं के लिए उनके लागत खर्च में कमी करके दूर की जा सकती है. धोखाधड़ी का जोखिम कम करने के लिए सब्सिडी का रिइंबर्समेंट करना, भविष्य निधि खातों से जोड़कर और एक वर्ष की नौकरी की अनिवार्य शर्त लगाकर किया गया है. नए लोगों को कौशल प्रदान करने की दूसरी चुनौती इंटर्नशिप कार्यक्रम की है जो कौशल विकास को वित्तपोषित करने में बाजार की नाकामी से निबटती है. नियोक्ता अपने स्वयं के कर्मचारियों को प्रशिक्षण नहीं दे सकते हैं.''

लेकिन सबसे बढ़कर, वे कहते हैं, ''यह बजट मानता है कि सामूहिक समृद्धि की एकमात्र अक्षय ऊर्जा युवाओं के लिए रोजगार-नौकरियां और कौशल हैं. यह शानदार शुरुआत है.''

5 बड़े पैकेज रोजगार के लिए

बढ़ती बेरोजगारी दर, नौकरी खत्म होने और आय घटने के बीच केंद्र सरकार युवाओं की भारी-भरकम फौज को रोजगार उपलब्ध कराने तथा कौशल प्रशिक्षण की खातिर पांच लंबे समय की रणनीतियां लेकर आई है

रोजगार से जुड़े प्रोत्साहन

स्कीम ए

फर्स्ट टाइमर

> इस योजना के तहत सभी औपचारिक सेक्टरों में पहली बार कार्यबल में शामिल होने वाले लोगों को एक महीने का वेतन उपलब्ध कराया जाएगा

> ईपीएफओ में रजिस्टर्ड पहली बार काम करने वाले कर्मचारियों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिये 15,000 हजार रु. तक का एक महीने का वेतन तीन किस्तों में देना 

> वेतन पात्रता सीमा 1 लाख रु. प्रति माह

> योजना से 2.1 करोड़ युवाओं को फायदा होगा

स्कीम बी

मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार का सृजन

इस योजना के तहत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अतिरिक्त रोजगार को प्रोत्साहित किया जाएगा. यह फर्स्ट टाइम या पहली बार के कामगारों से संबद्ध है

> कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को सीधे तौर पर ईपीएफओ में रोजगार के पहले चार साल के योगदान के आधार पर एक तय पैमाने के आधार पर प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाएगा

> योजना से नौकरी के लिए जा रहे 30 लाख युवाओं और उनके नियोक्ताओं को लाभ होने की उम्मीद है

स्कीम सी

नियोक्ताओं की सहायता

> नियोक्ता केंद्रित इस योजना के अधीन सभी क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार आएंगे

> इसमें 1 लाख रु. प्रतिमाह के वेतन दायरे में आने वाले वाले अतिरिक्त रोजगारों की गणना होगी. सरकार नियोक्ताओं को 3,000 रु. प्रतिमाह की दर से दो साल तक उनके ईपीएफओ अंशदान में प्रत्येक अतिरिक्त कर्मचारी के हिसाब से प्रतिपूर्ति करेगी

> योजना से 50 लाख अतिरिक्त लोगों के रोजगार को प्रोत्साहन मिलेगा

कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम

> राज्य सरकारों और उद्योग के समन्वय से कौशल प्रशिक्षण

> पांच साल में 20 लाख युवाओं को कुशल बनाया जाएगा

> देश के 1,000 इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आइटीआइ) को हब ऐंड स्पोक मॉडल के तहत परिणाम और गुणवत्ता पर जोर देते हुए अपग्रेड किया जाएगा

> कोर्स की सामग्री और इसका स्वरूप उद्योगों की कौशल जरूरतों के अनुसार होगा, साथ ही उभरती आवश्यकताओं के मुताबिक नए कोर्स लाए जाएंगे

इंटर्नशिप

> 21 से 24 साल के उन युवाओं पर यह योजना लागू होगी जिनके पास रोजगार नहीं है और न ही वे कोई पूर्णकालिक शैक्षिक कोर्स कर रहे हैं 

> आवेदक अयोग्य हो जाएगा अगर उसके परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी करता है अथवा आयकर भुगतान करता है

> इंटर्न को विभिन्न व्यवसायों में 12 महीने तक वास्तविक कारोबारी  माहौल का तजुर्बा मिलेगा

> 5,000 रु. प्रति माह की दर से इंटर्नशिप भत्ता दिया जाएगा. यह 60,000 रु. सालाना होगा जिसमें 54,000 रु. सरकार देगी और बाकी बचा 6,000 कंपनी देगी

> सरकार आकस्मिक व्यय के तौर पर एकमुश्त 6,000 रु. का भी भुगतान करेगी

> कंपनियां प्रशिक्षण का खर्च और इंटर्नशिप अलाउंस का अपना हिस्सा सीएएसआर फंड से दे सकेंगी. कंपनियों की हिस्सेदारी स्वैच्छिक होगी

रोजगार बढ़ाने के और उपाय

केंद्रीय बजट में एमएसएमई और स्टार्ट-अप्स के लिए कुछ प्रोत्साहनों की घोषणा की गई है जिससे रोजगार सृजन की रफ्तार तेज होने की उम्मीद है

> पीएम आवास योजना शहरी 2.0 के लिए केंद्र सरकार के 2.2 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन से एमएसएई को बहुत फायदा होगा क्योंकि हाउसिंग सेक्टर के 60 फीसद उत्पाद लघु उद्योगों से ही आते हैं

> मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के एमएसएमई के लिए एक क्रेडिट गारंटी योजना प्रस्तावित की गई है जिसमें मशीनरी और उपकरणों की खरीद के लिए बगैर जमानत या कोलेटरल अथवा थर्ड पार्टी गारंटी के कर्ज की व्यवस्था की जाएगी. इससे एमएसएमई को नया लोन शीघ्र मिल सकेगा

> मुश्किल समय में एमएसएमई के लिए बैंक कर्ज उपलब्धता जारी रखने के लिए नया तंत्र लाया जा रहा है. इसके तहत विस्तृत ब्योरे की प्रतीक्षा है, इसमें बैंक या तो सरकारी गारंटी पर एमएसएमई को लोन देंगे या सरकार एक कोष स्थापित करेगी जिसके पैसे से बैंक एमएसएमई को कर्ज देगें

> मुद्रा लोन (छोटे उद्यमियों की मदद के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत) की सीमा उन लोगों के लिए 10 लाख रु. से बढ़ाकर 20 लाख रु. की गई जिनका कर्ज भुगतान का रिकॉर्ड साफ-सुथरा है. इससे उभरते उद्यमियों के लिए और धन उपलब्ध हो सकेगा जो उनके सपने पूरे करने और रोजगार सृजन में सहायक होगा 

> केंद्र सरकार ने सभी श्रेणियों के निवेशकों के लिए एंजेल टैक्स खत्म कर दिया है इससे उन सेक्टरों के लिए फंडिंग बढ़ सकेगी जो कोविड-19 महामारी के बाद से मुश्किल दौर का सामना कर रहा है.

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