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NTA के कामकाज में कहां हैं गड़बड़ियां और ये दूर कैसे होंगी?

पर्चा लीक और कई खामियों से चार राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं और करोड़ों युवाओं का भविष्य अधर में. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) विवादों के भंवर में. ऐसे में एक मौजूं सवाल कि तमाशा बनीं इन परीक्षाओं का क्या है समाधान

दिल्ली के जंतर मंतर पर 26 जून को एनटीए विवाद के खिलाफ विभिन्न छात्र संगठनों का प्रदर्शन
दिल्ली के जंतर मंतर पर 26 जून को एनटीए विवाद के खिलाफ विभिन्न छात्र संगठनों का प्रदर्शन
अपडेटेड 8 जुलाई , 2024

साधारण किसान की 19 वर्षीय बेटी सुमेधा (बदला हुआ नाम) ने राष्ट्रीय पात्रता और प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) की तैयारी करते हुए वर्षों बिताए, इसलिए कि अपने जैसे 20 लाख अन्य युवाओं की तरह उसने भी सपना देखा था कि वह मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेगी और अपनी और अपने परिवार की किस्मत बदल देगी.

उसके पिता ने बेटी के सपनों की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया—अपनी मिल्कियत की इकलौती 1.5 बीघा जमीन उन्होंने गिरवी रख दी. वह उम्मीद परवान चढ़ती दिखाई दी, जब सुमेधा ने कुल 720 में से 620 अंक हासिल कर लिए. दिक्कत यह थी कि दूसरे कहीं बेहतर करते मालूम दिए, जिससे टॉपर की संख्या, जो पहले महज 2-3 हुआ करती थी, छलांग लगाकर 67 पर पहुंच गई.

फिर प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप लगने लगे, उसके गृहराज्य में भी, और पूरी प्रक्रिया केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के हवाले कर दी गई.

मगर सिर्फ नीट (एनईईटी) रद्द नहीं हुई. बदकिस्मती ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी-एनईटी) को भी नहीं छोड़ा, जो कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर की असिस्टेंट प्रोफेसरशिप की पात्रता तय करती है और अभ्यर्थियों को जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) प्रदान करती है.

इस परीक्षा में करीब 10 लाख अभ्यर्थी बैठे थे. 18 जून को इसके संपन्न होने के 24 घंटे बाद ही इसे रद्द कर दिया गया क्योंकि शक था कि उसका प्रश्नपत्र शायद डार्क वेब पर लीक हो गया था और एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर बेचा गया था.

इस बीमारी ने एक और परीक्षा पर फिलहाल ताले डलवा दिए—वह थी वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (सीएसआईआर-एनईटी). विज्ञान और टेक्नोलॉजी में लेक्चररशिप और जेआरएफ के लिए होने वाली यह परीक्षा 25 और 27 जून के बीच होनी थी और इसमें कोई 1,75,355 अभ्यर्थी बैठने वाले थे. अब वे बेताबी से परीक्षा की अगली तारीखों का इंतजार कर रहे हैं.

इस बवंडर के केंद्र में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) है. इस स्वायत्तशासी निकाय की स्थापना 2017 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने कई और भी ऊंचे दांव वाली साझा प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन के लिए की थी. मसलन, अंडरग्रेजुएट मेडिकल (एमबीबीएस), डेंटल (बीडीएस) और एवाईयूएसएच या आयुष (बीएएमएस, बीयूएमएस, बीएचएमएस) पाठ्यक्रमों के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी; संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई)-मुख्य; साझा विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी); सामान्य प्रबंधन प्रवेश परीक्षा (सीएमएटी).

एनटीए साल में 15 प्रवेश और फैलोशिप परीक्षाएं आयोजित करती है, जो इसे चीन के गाओकाओ के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा परीक्षा आयोजक निकाय बना देता है. 2023 में एनटीए के तहत आयोजित तमाम परीक्षाओं के लिए 1.23 करोड़ से ज्यादा आवेदक थे, जो बताता है कि उसके अधिकार और कार्यभार का पैमाना कितना विशाल है.

हाल के विवादों से यह अत्यंत विशाल अधिकार और कार्यभार सवालों के घेरे में आ गया और उसे असरदार ढंग से पूरा करने की एजेंसी की काबिलियत को लेकर शक पैदा हो गए. इसका व्यापक और दूरगामी असर भी हुआ हो सकता है, क्योंकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में पोस्टग्रेजुएट चिकित्सा शिक्षा और परीक्षा को मानकीकृत करने के लिए 1975 में गठित राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के तहत आयोजित नीट-यूजी की प्रवेश परीक्षा भी स्थगित कर दी.

परीक्षाओं के संचालन में एनटीए का कामकाज कभी एकदम सुथरा नहीं रहा है. बिल्कुल पहले ही साल प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों को लेकर कर्नाटक में कुछ अभ्यर्थियों के लिए नीट-यूजी का कार्यक्रम बदलना पड़ा था. तभी से तकरीबन हर साल मेडिकल और इंजीनियरिंग दोनों की प्रवेश परीक्षाओं में कोई न कोई गड़बड़ी होती रही है.

केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली नई सरकार के लिए यह खराब शुरुआत थी, छात्र नीट के आयोजन और एनटीए के कामकाज को लेकर असंतोष व्यक्त करने के लिए सड़कों और सोशल मीडिया पर उतर आए. नीट रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं और आलोचकों ने एनटीए में आमूलचूल बदलाव की मांग की.

विपक्षी दलों ने भी इस विवाद को झपट लिया और आम चुनाव के बाद जब संसद का पहला सत्र अभी शुरू ही हो रहा था, उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और बदइंतजामी का आरोप लगाते हुए जवाबदेही की मांग की.

सरकार हालांकि शुरुआत में नीट में प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, लेकिन जब बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की रिपोर्ट में प्रश्नपत्र लीक होने के शक की तरफ इशारा किया गया, केंद्र ने कथित भ्रष्टाचार की तहकीकात के लिए सीबीआई जांच का आदेश दे दिया.

बिहार के नवादा में सीबीआई टीम

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस गड़बड़झाले की नैतिक जिम्मेदारी तो ली, पर नीट को रद्द करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि वे ''भ्रष्टाचार की छिटपुट घटनाओं'' की वजह से सही तरीके से परीक्षा पास करने वाले लाखों छात्रों के करियर को खतरे में नहीं डाल सकते.

उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''प्रवेश परीक्षाओं की बात करें, तो कोई शॉर्टकट नहीं है. हमें चीजों को सौ फीसद फूलप्रूफ बनाने की जरूरत है. इस पर विचार करते हुए हमने उच्चस्तरीय सुधार समिति बना दी है. हमारे इरादे एकदम साफ हैं. हमारी सरकार शून्य त्रुटि के लिए प्रतिबद्ध है.''

''एनटीए की सांस्थानिक नाकामी'' स्वीकार करते हुए प्रधान ने एजेंसी के कामकाज का अध्ययन करके दो महीनों में सुधार की सिफारिशें करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति की घोषणा की. सरकार ने आईएएस सुबोध कुमार सिंह को एनटीए के डायरेक्टर जनरल के पद से हटा दिया और उनकी जगह दूसरे आईएएस अफसर प्रदीप सिंह खरोला की नियुक्ति कर दी.

नीट और यूजीसी-एनईटी के कामकाज में तमाम आरोपों की जांच सीबीआई को सौंप दी गई और प्रधान ने जोर देकर कहा कि ''किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा.'' सरकार ने उस नए कानून के नियम भी अधिसूचित कर दिए, जिसमें प्रश्नपत्र लीक होने और धोखाधड़ी सहित परीक्षाओं में छल-कपट से भरे साधन अपनाने के दोषी पाए जाने वाले लोगों को कड़ी सजाएं दी जाएंगी.

नीट में अनियमितताएं

नीट-2024 को लेकर कई ऐसे पहलू सामने आए, जिन्होंने लोगों में खासा आक्रोश पैदा कर दिया. सबसे पहले तो रजिस्ट्रेशन विंडो को बढ़ाया गया. एक महीने तक चली पंजीकरण प्रक्रिया बंद होने के बाद इसे दो बार विस्तारित किया गया. इससे कुछ छात्रों को अनुचित लाभ मिलने की आशंका जताई गई.

दरअसल, यह समयावधि बढ़ने के दौरान ही कुछ 'टॉपर्स' ने पंजीकरण कराया था. फिर एकदम अप्रत्याशित ढंग से 14 जून के बजाय 4 जून को ही नतीजे घोषित कर दिए गए, जिस दिन आम चुनाव के नतीजे भी आए थे. इस पर कई लोगों ने संदेह जताया कि यह तारीख प्रवेश परीक्षा की अनियमितताओं से ध्यान भटकाने के लिए चुनी गई.

टॉपर्स की संख्या असामान्य ढंग से काफी ज्यादा हो गई, जिनमें से छह की सीट संख्या एक ही क्रम में थी और उन्होंने हरियाणा के बहादुरगढ़ स्थित एक विशेष परीक्षा केंद्र पर परीक्षा दी थी. इसे एक बड़ी विसंगति माना गया. सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्थानीय भाजपा युवा इकाई प्रमुख की पत्नी की तरफ से संचालित इस केंद्र में परीक्षा के दिन ही काफी गफलत हुई थी, और गलत प्रश्नपत्र की वजह से परीक्षा शुरू होने में काफी देरी हुई. इसके अलावा, परीक्षा में टॉप करने वाले कुछ अभ्यर्थियों ने बोर्ड परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, जिससे उनके नीट में इतने अच्छे नंबर आने को लेकर संदेह गहरा गया.

एनटीए की तरफ से छात्रों को मनमाने ढंग से ग्रेस मार्क देने से स्थिति और जटिल हो गई. कुल 1,563 छात्रों को इस आधार पर अतिरिक्त नंबर दिए गए कि कथित तौर पर विभिन्न कारणों से परीक्षा के दौरान उनका समय बर्बाद हुआ था या फिर पाठ्यपुस्तक के पुराने संस्करण में मुद्रण संबंधी त्रुटि के कारण उन्होंने गलत उत्तर लिखे.

उत्तर प्रदेश के मेरठ में 5 मई को एक नीट-यूजी परीक्षा केंद्र से बाहर आते छात्र

इस बाबत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई तो एनटीए ने ग्रेस मार्क रद्द कर दिए और 1,563 छात्रों के लिए दोबारा परीक्षा आयोजित की. लेकिन दोबारा परीक्षा के लिए इनमें से सिर्फ 52 फीसद छात्र ही पहुंचे.

गुजरात, राजस्थान और बिहार सहित कई राज्यों में धांधली की जानकारी मिली है. गुजरात, बिहार और महाराष्ट्र में पर्चा लीक या अन्य कदाचारों के आरोप में करीब दो दर्जन लोगों को पकड़ा गया है.

इस पूरे प्रकरण ने परीक्षाओं में धांधली कराने में देशभर के 58,000 करोड़ रुपए के कोचिंग उद्योग की संदिग्ध भूमिका को भी उजागर कर दिया है. कथित घोटाले को लेकर संदेह गहरा गया, जब यह बात सामने आई कि हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक के कई छात्र नीट परीक्षा देने के लिए गोधरा के एक अनजाने से केंद्र में पहुंचे थे.

इसके केंद्र में तीन पक्ष सक्रिय थे: वडोदरा में परशुराम रॉय की तरफ से संचालित कोचिंग संस्थान रॉय ओवरसीज; गोधरा स्थित जय जलाराम स्कूल के प्रिंसिपल पुरुषोत्तम शर्मा, जिनका स्कूल परीक्षा केंद्र बना था; और स्कूल के एक शिक्षक तुषार भट्ट जो परीक्षा केंद्र के लिए नामित उपाधीक्षक भी थे.

धांधली को कुछ इस तर्ज पर अंजाम दिया गया कि पहले तो संबंधित छात्र उन सवालों के उत्तर लिखेंगे, जो उन्हें आते हैं, फिर आंसर की जारी होने के बाद बाकी उत्तरों को शिक्षक भरेंगे. गुजरात पुलिस ने पाया कि देशभर के कम से कम 26 छात्रों ने नीट पास करने के लिए 10 लाख रुपए से लेकर 66 लाख रुपए तक का भुगतान किया.

नीट बनाम जेईई-मेन

देश में मेडिकल डिग्री को आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित भविष्य की कुंजी माना जाता है क्योंकि नौकरी न मिले तो भी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस के जरिए कमाई कर सकते हैं. यही वजह है कि इंजीनियरिंग डिग्री की तुलना में एमबीबीएस सीट अधिक आकर्षित करती है और इसी से कड़ी प्रतिस्पर्धा के साथ अधिक भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में मेडिकल सीटों की संख्या बेहद सीमित है. इस साल ही 1,00,000 के करीब मेडिकल सीटों—जिनमें सिर्फ आधी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं—के लिए 23 लाख छात्रों ने परीक्षा दी. दूसरी ओर, देश में उपलब्ध इंजीनियरिंग सीटों की संख्या दस लाख से ज्यादा यानी मेडिकल सीटों की तुलना में करीब 10 गुना है. हाल यह है कि इंजीनियरिंग सीटें जरूरत से ज्यादा हैं और इस कारण कई कॉलेज बंद भी हो रहे हैं.

नीट में उच्च स्कोर की बदौलत ही छात्र सरकारी संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं, जो निजी कॉलेजों से बेहद कम फीस लेते हैं. इंडिया टुडे टॉप कॉलेज सर्वे के मुताबिक, सरकारी मेडिकल कॉलेज में सबसे कम वार्षिक फीस 1,628 रुपए है, जबकि निजी कॉलेज में यह 1.9 लाख रुपए है. इसमें अन्य अनौपचारिक शुल्क शामिल नहीं हैं.

नीट में धांधली की संभावना शायद इसलिए भी ज्यादा रहती है क्योंकि यह परीक्षा कागज-कलम मोड में होती है जबकि जेईई-मेन कंप्यूटर-आधारित परीक्षा (सीबीटी) है इसलिए इसमें गड़बड़ियों की गुंजाइश कम रहती है. हालांकि, इसमें भी कई बार तकनीकी गड़बड़ियों और कभी-कभार नकल की समस्या उठती है. लेकिन पूरी प्रक्रिया आम तौर पर नीट की तुलना में काफी सुरक्षित है.

वैसे, एनटीए ने 2018 में ही नीट को सीबीटी मोड में आयोजित करने की योजना बनाई थी लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने आपत्ति जताई कि यह व्यावहारिक नहीं होगा. मंत्रालय की मुख्य चिंता यह थी कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए परीक्षा देना मुश्किल हो जाएगा, जिनके पास कंप्यूटर और इंटरनेट तक पर्याप्त पहुंच नहीं है. ताजा विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है.

हालांकि, प्रधान सीबीटी मोड में नीट आयोजित करने के लिए देश की 3,00,000 की क्षमता को अपर्याप्त मानते हैं क्योंकि इसके लिए परीक्षा के छह सत्र जरूरी होंगे. जेईई में 14 लाख छात्र बैठते हैं, और इसका आयोजन साल में दो बार होता है. एक बार में पांच-छह दिन तक परीक्षा चलती है. प्रधान कहते हैं कि यहां तक सीबीएसई ने भी बोर्ड परीक्षाओं की तरह ही कागज-कलम मोड में मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित की.

सीबीटी मोड में पेपर और आंसरशीट एन्क्रिप्टेड होती है और अलग-अलग सेव होती है. प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया स्वचालित होती है, और इसमें एक लंबे समय में बेहद सावधानी के साथ विकसित और वर्गीकृत विशाल क्वेश्चन बैंक का इस्तेमाल होता है. एन्क्रिप्टेड पेपर हर परीक्षा केंद्र तक पहुंचता है और तभी खुलता है जब अभ्यर्थी उस पर क्लिक करता है.

नीट के विपरीत जेईई-मेन के लिए प्रश्नपत्र सेट करने में आईआईटी संकाय शामिल होता है. जेईई-मेन के संचालन के लिए नियम-कायदे और नीतियां निर्धारित करने में अंतिम प्राधिकार जेईई एपेक्स बोर्ड (जेएबी) के पास होता है, जिसमें आईआईटी और अन्य शीर्ष संस्थानों के सदस्य शामिल होते हैं. एनटीए परीक्षा से पहले और बाद के कार्यों के लिए सूचना प्रौद्योगिकी संबंधित सारे सहयोग और बैक-एंड गतिविधियों का प्रबंधन करता है.

वहीं, आईआईटी बेहद कड़ी और गोपनीय प्रक्रिया अपनाते हैं, जिसमें केवल कुछ लोगों शामिल हैं और इससे न केवल उच्च मानक स्थापित होते हैं, बल्कि लीक या त्रुटियों की संभावना भी ना के बराबर रहना सुनिश्चित होता है.

उधर, नीट के पेपर सेट करने में प्रमुख मेडिकल कॉलेजों की कोई सीधी भागीदारी नहीं होती. एनटीए कार्यकारी निकाय के एक सदस्य—जिन्हें अक्सर अपने दफ्तर से कोचिंग सेंटर मालिकों को भगाना पड़ता था—का कहना है, ''आईआईटी प्रोफेसर अपने क्षेत्र के अनुभवी विशेषज्ञ होते हैं और अपने संस्थानों के उच्च मानक बनाए रखने को प्रतिबद्ध हैं. पेपर सेट करने में शामिल लोग खुद को बंद कर लेते हैं और हर किसी की पहुंच से बाहर हो जाते हैं. लेकिन नीट की तैयारी के दौरान ऐसा कुछ नहीं होता. मैं तो पेपर सेट करने की प्रक्रिया में शामिल भी नहीं हूं. फिर भी जब मुझसे मिलने के लिए लोग इतने आतुर रहते हैं तो कल्पना कीजिए कि कोचिंग सेंटर मालिक और संगठित पेपर लीक गिरोह आदि उन लोगों का किस कदर पीछा करते होंगे.''

हालांकि, एनटीए का दावा है कि धोखाधड़ी या गलत सवाल आने जैसी घटनाओं का पता लगाने के लिए सांख्यिकीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का सहारा लिया जाता है. लेकिन नीट-2024 में स्पष्ट तौर पर ऐसा दिखाई तो नहीं दिया. जब सवाल पाठ्यपुस्तक की किसी तथ्यात्मक त्रुटि पर आधारित हो तो प्रश्नपत्र की गुणवत्ता के बारे में क्या ही कहा जा सकता है? अगर कोई मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कराया गया होता तो ऐसी गड़बड़ी सामने नहीं आती है, जिसके कारण ग्रेस मार्क देने की स्थिति आई.

एनटीए की दिक्कत

एनटीए का गठन अमेरिका की एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विस (ईटीएस) की तर्ज पर किया गया था, जिसके तहत स्कोलास्टिक असेसमेंट टेस्ट (एसएटी), अमेरिकन कॉलेज टेस्ट (एसीटी) और ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जामिनेशन (जीआरई) जैसी परीक्षाएं आयोजित होती हैं.

अलबत्ता, ईटीएस में 200 से अधिक स्थायी कर्मचारी हैं, लेकिन उसके विपरीत एनटीए दिल्ली कार्यालय में करीब दो दर्जन स्थायी कर्मचारियों पर ही निर्भर है. इसमें ज्यादातर अन्य सरकारी विभागों से प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों और तय अवधि के करार पर अस्थायी कर्मचारी हैं. कर्मचारियों की गंभीर कमी के कारण एजेंसी को पर्चा बनाने, वितरण और डेटा सुरक्षा जैसे बेहद अहम काम निजी तकनीकी सेवा प्रदाताओं और अन्य बाहरी विशेषज्ञों को सौंपना पड़ता है.

मसलन, 2023 में एनटीए ने आउटसोर्स मैनपावर के लिए निविदा मंगाई. हालांकि ज्यादातर स्वतंत्र पर्यवेक्षकों का कहना है कि पर्चा बनाने वालों से पर्चा लीक होने की आशंका नहीं है. महाराष्ट्र के पूर्व डीएमईआर (चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान निदेशक) डॉ. प्रवीण शिंगारे कहते हैं, ''अमूमन पर्चा बनाने वाले उसे लीक नहीं करते, वह यहां से वहां ले जाने के रास्ते में लीक होता है. आखिर पर्चा बनाने वाले प्रश्नपत्रों के कई सेट तैयार करते हैं और अंत में सिर्फ एक पर्चा चुना जाता है.''

उच्च शिक्षा विभाग का कार्यभार संभाल चुके पूर्व सचिव आर. सुब्रह्मण्यम कहते हैं कि एनटीए का उद्देश्य एक छोटी इकाई बनना था, जो कुशल तकनीकी पार्टनरों की मदद से ऑनलाइन परीक्षाएं कराए. लेकिन, नीट जैसे कागज और कलम से होनी वाली परीक्षाओं की जिम्मेदारी से उस पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया. यूजीसी-नेट जैसे कुछ पिछले सीबीटी प्रारूपों को भी कागज-कलम वाली परीक्षा में बदला गया. दलील यह है कि इससे परीक्षा केंद्रों में विशेष कंप्यूटर इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं रह जाएगी, नेटवर्क की समस्याओं से बचा जा सकेगा, लागत कम होगी और दूरदराज के क्षेत्रों में परीक्षा केंद्रों की संख्या बढ़ जाएगी.

कागज-कलम वाली परीक्षा के कारण नीट में प्रश्न-पत्रों और उत्तर-पत्रों को एक से दूसरी जगह ले जाने और जमा करने की जरूरत पड़ती है, जिससे कई तरह की आशंकाओं की गुंजाइश बनती है. प्रश्न-पत्रों को प्रिंटिंग प्रेस से परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाया जाना चाहिए, और उत्तर-पत्रों को मूल्यांकन के लिए एनटीए को सौंपा जाना चाहिए. हर स्तर पर यह कई हाथों से गुजरता है, जिससे अनधिकृत हाथों की पहुंच और छेड़छाड़ का जोखिम बढ़ जाता है. यही बात भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की कई घटनाओं से उजागर हुई है.

नीट की 5 मई को परीक्षा से कुछेक दिन पहले एक वीडियो में एक नकाबपोश व्यक्ति ने दावा किया था कि प्रश्नपत्र प्रिंटिंग प्रेस से लीक हो सकते हैं. हालांकि, अधिकांश अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि एनटीए में सूचीबद्ध निजी एजेंसियां सीधे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होतीं. एनटीए उन्हें एक विस्तृत फिल्टरिंग प्रक्रिया के बाद अपने साथ जोड़ती है, और ये एजेंसियां हमेशा वही होती हैं, जो पहले से दूसरी सरकारी विभागों की सूची में होती हैं.

मसलन, परीक्षा पेपर के लिए प्रिंटर आरबीआई की सूची में होते हैं. हालांकि, ये एजेंसियां आगे जिन सर्विस प्रोवाइडरों को नियुक्त करती हैं, वहां गड़बड़ी की गुंजाइश है. पर्चा ले जाने वाले वाहन के ड्राइवर की तो जांच-परख की जाती है, लेकिन उसके सहायक या लोडर का क्या भरोसा है. 2024 में पर्चा 4,750 केंद्रों तक पहुंचाया जाना था.

पर्चा लीक होने की दूसरी जगह परीक्षा केंद्र हो सकते हैं. इस साल नीट की परीक्षा के दिन एक तीसरे पक्ष की जांच-परख में कई केंद्रों पर कई तरह की खामियां पाई गईं. ऑडिट किए गए 399 परीक्षा केंद्रों में से 186 में हर परीक्षा कक्षा दो सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, जो अनिवार्य है. इन कैमरों से लाइव फीड नई दिल्ली में एनटीए मुख्यालय के केंद्रीय नियंत्रण सेल में पहुंचनी चाहिए, जिसकी निगरानी विशेषज्ञों की एक टीम करती है. 68 परीक्षा केंद्रों पर स्ट्रांग रूम बिना 'किसी गार्ड' के था. 83 केंद्रों पर स्टाफ का बॉयोमेट्रिक डेटा संबंधित केंद्रों के लिए तय कर्मचारियों से मेल नहीं खाता था.

इन पहुंचाने-लाने जैसी खामियों के अलावा एनटीए के अंदरूनी सूत्रों का अब दावा है कि कई परीक्षाएं इस आशंका से स्थगित की गईं कि एजेंसी के सुरक्षा प्रोटोकॉल में गंभीर छेड़छाड़ की गई है और हैकर्स घुस गए हैं. संगठित साइबर हमले का संदेह है और उनकी पहुंच 'ब्लैक बॉक्स' तक हो सकती है, जहां केंद्रीय रूप से प्रश्नपत्र रखे जाते हैं. इसलिए, जब तक मौजूदा सिस्टम सुरक्षित नहीं किए जाते, तब तक और भी लीक हो सकते हैं.

'नीट' की ओर रुख क्यों

एनटीए से पहले देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाएं केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड या सीबीएसई आयोजित करता था. पहले उसे अखिल भारतीय प्री-मेडिकल/प्री-डेंटल प्रवेश परीक्षा कहा जाता था. राष्ट्रीय स्तर की सामान्य मेडिकल प्रवेश परीक्षा के साथ-साथ राज्यों की कई अन्य मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं हुआ करती थीं. एआईपीएमटी पास करने वाला छात्र केंद्र सरकार के तहत मेडिकल कॉलेजों में सीधे प्रवेश ले सकता था और हर राज्य के मेडिकल कॉलेज में गैर-निवासी छात्रों के लिए 15 फीसद का कोटा हुआ करता था.

समय के साथ इस प्रणाली में कई विसंगतियां सामने आईं, जिन्हें दूर करने के लिए नीट के बारे में सोचा गया. इसका तीन-आयामी एजेंडा था. एक, प्रवेश स्तर पर छात्रों की शैक्षिक योग्यता का मानक तय करना क्योंकि विभिन्न शैक्षिक बोर्डों के छात्रों के बीच रसायन, भौतिक और जीव विज्ञान के मूलभूत ज्ञान में काफी असमानता थी. दूसरे, प्रवेश परीक्षाओं की संख्या को अनुमानित 46 से घटाकर एक करना. तीसरे, निजी मेडिकल कॉलेजों के विवेकाधीन अधिकार पर अंकुश लगाकर तथा अंकों के आधार पर प्रवेश तय करके कैपिटेशन शुल्क को समाप्त करना. एक प्रवेश परीक्षा होने से सरकार को उम्मीद थी कि उससे सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा, और सभी के लिए कारगर और कम पेचीदा होगा.

हालांकि, कई हलकों में इसे देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने वाला माना गया. तमिलनाडु ने नीट का लगातार विरोध किया और राज्य की हाई स्कूल के अंकों के आधार पर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की अपनी नीति की हिमायत की. न्यायमूर्ति ए.के. राजन की अगुआई वाली एक विशेषज्ञ समिति ने पाया कि ग्रामीण छात्रों और तमिल-माध्यम स्कूलों के छात्रों को नीट के तहत भारी नुकसान उठाना पड़ा.

2017 से 2021 तक, मेडिकल कॉलेजों में तमिल-माध्यम के छात्रों की प्रवेश दर 15 फीसद से घटकर मात्र 1.6 फीसद रह गई, जबकि ग्रामीण छात्रों का प्रवेश 62 फीसद से घटकर 50 फीसद हो गया. तमिलनाडु ने पाया कि इससे उसकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के कर्मचारियों के लिए ग्रामीण छात्रों पर निर्भर है. हालांकि, प्रधान इसे खारिज करते हैं और कहते हैं कि 2023 में नीट की टॉपर तमिलनाडु के एक गांव की लड़की थी जिसकी पढ़ाई तमिलनाडु बोर्ड के तहत हुई थी.

परीक्षा केंद्र पर अपना रोल नंबर जांचती छात्राएं

इसका समाधान राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षाओं की ओर वापसी या एनटीए का खात्मा नहीं है, जैसा कि कई हलकों से मांग उठ रही है. पहले की प्रवेश परीक्षाओं जेईई और एआइपीएमटी, सीएलएटी और नेशनल लॉ एप्टीट्यूड टेस्ट (एनएलएटी) वगैरह में भी अनियमितताएं थीं. देश भर में लगभग हर साल राज्य बोर्ड परीक्षाओं में पेपर लीक होते रहे हैं.

कई राज्य सरकारों ने पर्चा लीक और नकल करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाए हैं, लेकिन खास फायदा नहीं हुआ. केंद्र सरकार ने हाल में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 पारित किया है, जिसमें प्रश्नपत्र या उत्तर लीक करने सहित 15 कार्यों को गैर-कानूनी बताया गया है. अपराधियों को 10 साल तक की जेल और 1 करोड़ रुपए का जुर्माना हो सकता है.

संगठित पर्चा लीक के मामले में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है. अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य हैं. उसे किसी सुलहनामे के तहत नहीं सुलझाया जा सकता और पुलिस बिना वारंट के कार्रवाई कर सकती है. यह कानून केंद्र और उसकी परीक्षा एजेंसियों के आयोजन में अधिकांश परीक्षाओं पर लागू होगा. हालांकि, ये कानून पर्चा लीक को रोकने की गारंटी नहीं देते हैं क्योंकि कार्रवाई लीक होने के बाद ही होगी.

कैसे थमे गोरखधंधा

अधिकांश विशेषज्ञों का सुझाव है कि फौरी उपाय के रूप में सुरक्षा बढ़ाने और 'नीट' की खामियों को दूर करने के लिए सीबीटी प्रारूप ही अपनाया जाए. हालांकि सीबीटी को भी गड़बड़ी से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता. एनटीए ने इस साल 12 जून को होने वाली नेशनल कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (एनसीईटी) को 'तकनीकी समस्याओं' के चलते टाल दिया. हैकरों ने सीबीटी को भेदने की कोशिश की है. जैसा कि 2021 में जेईई-मेन्स के दौरान हुआ था.

डिजिटल फुटप्रिंट की ट्रैकिंग से आखिरकार अपराधियों को पकड़ा गया. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित प्रॉक्टरिंग जैसी नई तकनीकें इस खतरे को कम कर सकती हैं, जिनमें लगातार सुधार हो रहा है. इंडियन स्कूल ऑफ एथिकल हैकिंग के एक एथिकल हैकर, साम्यनजित मुखर्जी का कहना है कि सर्वर सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोगों को डिजिटल सुरक्षा और उसके लगातार विकसित होने वाले पैटर्न में नियमित प्रशिक्षण की दरकार है. हर सिस्टम की साइबर सुरक्षा मजबूती के लिए हर तीन महीने में उसकी समीक्षा की जानी चाहिए.

नीट की आलोचना प्रश्नों के पैटर्न और पेचीदगी के लिए भी हो रही है. कुछ लोगों का कहना है कि यह असंगत है और छात्रों की अलग-अलग शैक्षिक पृष्ठभूमि को ध्यान में नहीं रखा जाता. प्रश्न मुख्य रूप से एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से ही बनाए जाते हैं, लेकिन सीबीएसई के एआइपीएमटी में अधिक वैचारिक और छवि-आधारित प्रश्न हुआ करते थे, जबकि मौजूदा प्रश्न अधिक इस तरह के होते हैं कि ''निम्नलिखित से क्या.'' इससे छात्रों को अधिक अंक मिलते हैं, जिससे कट-ऑफ में वृद्धि हुई है.

कुछ विशेषज्ञ अमेरिका जैसे दूसरे देशों से सीखने की सलाह देते हैं, जहां कॉलेज और विश्वविद्यालय जाने वाले छात्रों के लिए मानक परीक्षाएं एसएटी, एसीटी और जीआरई वगैरह होती हैं, जिनमें लगभग चालीस लाख छात्र हर साल बैठते हैं. ये परीक्षाएं रटने की आदत के बजाय आलोचनात्मक सोच का मूल्यांकन करती हैं, जिससे कोचिंग सेंटरों की अहमियत घट जाती है. सरकार भी इसी तरह की सोच रही है, क्योंकि प्रधान ''एसीटी जैसी लचीली और कम तनावपूर्ण परीक्षा प्रणाली'' के हक में हैं.

हालांकि, 'नीट' के उलट ये परीक्षाएं सीबीटी आधारित हैं और साल में कई बार होती हैं. मसलन, एसीटी साल में सात बार दी जा सकती है. विशेषज्ञ अमेरिकी मॉडल की सलाह देते हैं क्योंकि यह पूरे साल में कई टेस्ट तिथियों वाली लचीली व्यवस्था है. इसमें साल में कई बार परीक्षा में बैठने की गुंजाइश तनाव कम कर देती है. असल में, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 2018 में साल में दो बार नीट आयोजित करने का फैसला किया था, लेकिन बाद में इस विचार को टाल दिया गया.

दरअसल समस्या नीट भर की नहीं है और इसके लिए पूरे देश में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है. रटंतू पढ़ाई से हटकर समझ और आलोचनात्मक सोच पर केंद्रित शिक्षा प्रणाली की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, जो नई शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्यों के अनुरूप हो. सरकार को संचालन, पाठ्यक्रम और बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार करने होंगे. वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त मानक शिक्षा के लिए जीडीपी का 6 फीसद खर्च करना होगा.

बहरहाल, इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि एनटीए में ही बड़े ढांचागत बदलाव की दरकार है. अधिक डोमेन विशेषज्ञों को जोड़कर और आउटसोर्सिंग पर निर्भरता को कम करके संगठन में कर्मियों की संख्या को बढ़ाना आवश्यक है. इसके अलावा, विभिन्न परीक्षाओं की अवधारणा और संचालन में शीर्ष संस्थानों के संकाय को शामिल किया जाना चाहिए.

विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि एनटीए को संघ लोक सेवा आयोग या चुनाव आयोग की तरह संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए. एनटीए परीक्षा केंद्रों के लिए तो विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न बोर्डों के स्वायत्त निकायों के साथ संपर्क करता है. लेकिन भारी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का प्रबंधन करने के बावजूद, ये संस्थान एनटीए के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. उसे संवैधानिक दर्जा देने से एनटीए को परीक्षा आयोजित करने वाले संबद्ध स्कूलों को सीधे दंडित करने का अधिकार मिल जाएगा. फिलहाल एनटीए सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत है.

'नीट' और 'नेट' पर जारी विवाद से देश में सार्वजनिक परीक्षाओं की शुद्धता और विश्वसनीयता बहाल करने की मांग तेज हो उठी है. इसे हासिल करना ऐसे समाज और अर्थव्यवस्था में चुनौतीपूर्ण है, जो अपने युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त और समान अवसर प्रदान करने में नाकाम रहा है. यही वह चीज है जो अनैतिक और आपराधिक प्रथाओं के माहौल को बढ़ावा देती है, और इस गड़बड़झाले से निबटना पूरे समाज की जिम्मेदारी है.

—साथ में सोनाली आचार्जी, शैली आनंद, धवल एस. कुलकर्णी, अमरनाथ के. मेनन और अर्कमय दत्ता मजूमदार 

क्या है नेशनल टेस्टिंग एजेंसी 

शिक्षा मंत्रालय के तहत 2017 में स्थापित नेशनल टेस्टिंग एजेंसी करीब 15 प्रवेश और फैलोशिप परीक्षाओं का आयोजन करती है. 2023 में एनटीए की ओर से आयोजित विभिन्न परीक्षाओं के लिए 1.23 करोड़ छात्रों ने पंजीकरण कराया. चीन की गाओकाओ के बाद यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी परीक्षा आयोजन एजेंसी है. चीन की एजेंसी ने पिछले साल 1.29 करोड़ पंजीकरण दर्ज किए थे.

एनटीए का ढांचा

एनटीए का प्रबंधन एक कार्यकारी निकाय करता है जिसमें एक अध्यक्ष, सदस्य सचिव (महानिदेशक) और आठ सदस्य होते हैं. मौजूदा अध्यक्ष प्रोफेसर प्रदीप कुमार जोशी हैं जो संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं. महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह एक आईएएस अधिकारी हैं, जो मौजूदा नीट-यूजी विवाद के केंद्र में थे. उन्हें हटाकर उनकी जगह एक दूसरे आईएएस अधिकारी प्रदीप सिंह खरोला को लाया गया है.

कार्यकारी निकाय के अन्य सदस्य 

>आईआईटी के तीन निदेशक

एनआईटी के दो निदेशक

आईआईएम के दो निदेशक

> निदेशक, भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुणे 

कुलपति, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 

>कुलपति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय 

> अध्यक्ष, राष्ट्रीय असेसमेंट और एक्रेडिएशन काउंसिल 

> डॉक्टर हरीश शेट्टी,  डॉ.एलएच हीरानंदानी हॉस्पिटल, मुंबई 

एनटीए की ऊंच-नीच

शुरुआत से ही एनटीए अपनी ओर से कराई जाने वाली विभिन्न परीक्षाओं को लेकर लगातार कई विवादों में रहा है.

2020

> मध्य प्रदेश की एक लड़की ने प्रारंभ में नीट यूजी में महज 6 अंक प्राप्त किए. हालांकि खुदकुशी से उसकी मृत्यु के बाद यह खुलासा हुआ कि उसके वास्तव में 590 अंक आए थे.

> एक और छात्र के शुरू में बहुत कम अंक बताए गए. लेकिन पुनर्मूल्यांकन के बाद वह अपनी अनुसूचित जनजाति श्रेणी में ऑल इंडिया टॉपर रहा.

2021

> एक रूसी नागरिक ने जेईई मेन परीक्षा के सॉफ्टवेयर में सेंध लगाई और छद्म रूप से मदद की. और सीबीआई ने उसे गिरफ्तार किया. 20 छात्रों पर तीन साल तक किसी भी तरह की परीक्षा में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया गया.

2022

> सीबीआई ने नीट-यूजी परीक्षा के दौरान एक ऐसे रैकेट का खुलासा किया जो फर्जी नाम से परीक्षा देता था. फिर केरल के केंद्र में महिला अभ्यर्थियों को सुरक्षा जांच के दौरान ब्रा उतारने को मजबूर किया गया, जिससे एनटीए के खिलाफ गुस्सा भड़का.

> कई छात्रों को जेईई मेन परीक्षा के दौरान तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जिससे छात्रों के महज 20 तक अंक आए.

2024

> नीट-यूजी परीक्षा ग्रेस मार्क देने और पेपर लीक होने समेत कई सारी अनियमितताओं के आरोपों के विवादों में फंसी हुई है. मामला सीबीआई के पास.

> नेट यूजीसी परीक्षा डार्क नेट पर प्रश्नपत्र लीक होने के बाद रद्द कर दी गई.

> सीएसआईआर-यूजीसी परीक्षा एहतियात के तौर पर स्थगित की गई.

एनटीए की ओर से आयोजित परीक्षाएं

> कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी)-अंडर ग्रेजुएट: और पोस्ट ग्रेजुएट

अंडर ग्रेजुएट: 13.5 लाख

पोस्ट ग्रेजुएट: 99,717

> यूजीसी- राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) 10 लाख (करीब)

> संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) मेन 14 लाख

> राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) अंडर ग्रेजुएट 23 लाख 

> पोस्ट ग्रेजुएट कॉमन मैनेजमेंट एडमिशन टेस्ट (सीमैट) 
2,88,000

> आइसीएआर-दाखिले के लिए ऑल इंडिया प्रवेश परीक्षा 
27,538

> होटल प्रबंधन संयुक्त प्रवेश परीक्षा 
8,862

> ग्रेजुएट फार्मेसी एप्टीट्यूड टेस्ट (जीपैट) 
39,341

> आइआइएफटी प्रवेश परीक्षा 
30,622

> संयुक्त सीएसआइआर-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) 
1,75,355

> पीएचडी प्रवेश परीक्षा 
35,896

> एनुअल रिफ्रेशर प्रोग्राम इन टीचिंग (अर्पित) 
10,000

> स्टडी वेब ऑफ ऐक्टिव लर्निंग बाय यंग ऐंड एस्पायरिंग माइंड्स (स्वयं) एग्जाम 
64,846

नीट परीक्षा की पहेली

नीट-यूजी देश भर में कागज-कलम से होने वाली साझा प्रवेश परीक्षा है. इस साल 706 मेडिकल कॉलेजों की 1,09,170 सीटों में दाखिले के लिए 23,33,297 छात्र परीक्षा में बैठे. इनमें से 55,905 सीटें ही 386 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं. यहां हम बता रहे हैं इसकी प्रक्रिया और कहां कमियां रहीं और क्या उल्लंघन हुए जिससे यह पूरी परीक्षा सवालों के घेरे में आ गई:

1. प्रश्न पत्र तैयार करना

विशेषज्ञों से सवालों का एक पूल तैयार करने को कहा जाता है जिनकी समीक्षा अनुभवी शिक्षाविद करते हैं और उन्हें वर्गीकृत करते हैं. यह ध्यान रखा जाता है कि सवाल कठिन और प्रासंगिक हों और सिलेबस के भीतर से ही हों. 

समस्या

प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता को लेकर बहस हुई क्योंकि जो सही उत्तर था, उसमें टेक्स्टबुक संस्करण में तथ्यात्मक गलती थी. इस गलती के कारण ग्रेस मार्क्स दिए गए.

2. प्रश्न पत्रों की छपाई, सीलबंद करना और ढुलाई

> फाइनल होने के बाद प्रश्न पत्रों को सुरक्षा उपायों के बीच मुद्रित किया जाता है ताकि उनके लीक होने का कम से कम जोखिम हो.

> इन पर्चों को लिफाफों या कंटेनरों में सीलबंद किया जाता है, जिनकी बारकोड सहित कई सुरक्षा परत होती है. फिर उन्हें सीसीटीवी की निगरानी में सुरक्षित जगह रखा जाता है और सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं.

> सील प्रश्नपत्रों को ट्रंकों में भरकर सशस्त्र सुरक्षा के साथ परीक्षा केंद्रों तक ले जाया जाता है. रास्ते में निगरानी के लिए जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम इस्तेमाल किया जाता है.

समस्या 

परीक्षा से एक दिन पहले बिहार में पिछले पर्चा लीक घोटाले के एक आरोपी ने दावा किया कि प्रश्नपत्र एनटीए की आउटसोर्स प्रिंटिंग प्रेस से लीक किया जाएगा. बिहार पुलिस की जांच से संकेत मिलता है कि पर्चा लीक में भीतर के लोग शामिल हैं. अभी तक बिहार, गुजरात, और महाराष्ट्र में करीब दो दर्जन लोग गिरफ्तार किए गए हैं. अब सीबीआइ मामले की जांच कर रही है.

3. परीक्षा केंद्र

> परीक्षा के दिन सीलबंद प्रश्नपत्र जिम्मेदार अधिकारियों और छात्रों की मौजूदगी में खोले जाते हैं. इसका ब्यौरा रखा जाता है.

> सभी परीक्षा केंद्र सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होते हैं. इसकी लाइव फीड दिल्ली में एनटीए के नियंत्रण कक्ष को भेजी जाती है.

> आंसर-शीट को स्थानीय पोस्ट ऑफिस के जरिए सील बंद बक्सों में एनटीए के मुख्यालय भेजा जाता है.

समस्या 

> 186 केद्रों के हरेक परीक्षा कक्ष में अनिवार्य रुप से दो कार्यरत सीसीटीवी नहीं लगे थे.

> 68 परीक्षा केंद्रों में स्ट्रांगरूम की कोई सुरक्षा नहीं थी, जहां प्रश्न पत्र रखा जाता है.

> 83 केंद्रों में उन केंद्रों के लिए तैनात कर्मचारियों के बॉयोमैट्रिक मेल नहीं खा रहे थे.

4. आंसर शीट का मूल्यांकन

> ओएमआर (ऑप्टिकल मार्क रिकॉग्निशन) शीटों को हाइ स्पीड मशीनों का इस्तेमाल करके स्कैन किया जाता है. स्कैन किए हुए डाटा को प्रोसेस किया जाता है और आंसर की के आधार पर स्कोर की गणना की जाती है. रिजल्ट कंपाइल, वेरीफाइ किया जाता है और फिर एनटीए की वेबसाइट पर पब्लिश किया जाता है

समस्या

मूल्यांकन एक बाहरी एजेंसी करती है. मनमाने तरीके से 1,500 से ज्यादा छात्रों को ग्रेस अंक दिए गए. बाद में सवाल उठने पर उन्हें रद्द कर दिया गया. यह अप्रत्याशित था कि 67 छात्रों को एकदम पूरे 720 अंक मिले.

यूजीसी-नेट परीक्षा क्यों स्थगित हुई

यूजीसी नेट परीक्षा राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है जिसमें कॉलेज और विश्वविद्यालय के स्तर पर सहायक प्रोफेसरों और जूनियर रिसर्च फैलोशिप के लिए उम्मीदवारों की पात्रता का निर्धारण किया जाता है. डार्कनेट पर पर्चा लीक होने के बाद रद्द कर दिया गया.
पंजीकृत उम्मीदवार: 10 लाख से ज्यादा

क्यों सीएसआईआर परीक्षा टल गई

सीएसआईआर यूजीसी नेट परीक्षा विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लेक्चरर और जूनियर रिसर्च फैलोशिप के लिए उम्मीदवारों के पात्रता निर्धारण के लिए होती है. उसे एहतियातन टाल दिया गया.

पंजीकृत उम्मीदवार: 1,75,355

कैसे दूर हों गड़बड़ियां 

कंप्यूटर से परीक्षा

नीट से जुड़ी चुनौतियां कम करने और सुरक्षा बढ़ाने के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) का प्रारूप अपनाया जाए. वैसे सीबीटी भी दिक्कतों से परे नहीं है और उसमें हैकिंग के प्रयासों के कई मामले सामने आए हैं लेकिन परीक्षार्थियों की एआइ आधारित जांच जैसी नई तकनीकें लागू कर इन मसलों से निबटा जा सकता है.

परीक्षाओं का मानकीकरण 

अमेरिका के सैट, एसीटी और जीआरई जैसी मानकीकृत परीक्षाओं का अनुसरण. इसमें रटे-रटाए जवाब की बजाय सोच-समझ पर जोर दिया जाता है, जिससे कोचिंग सेंटरों में व्यापक अभ्यास का फायदा घट जाता है. नीट के प्रश्नों के पैटर्न में भी कोई तारतम्य नहीं है.

परीक्षा की अलग-अलग तारीखें 

पूरे साल भर विभिन्न परीक्षा तारीखें पेश करने की जरूरत. इस नजरिए से जोखिम एक लंबी अवधि में बंट जाता है. 2018 में शिक्षा मंत्रालय ने साल में दो बार नीट कराने की योजना बनाई थी लेकिन बाद में इस विचार को झटक दिया गया.

स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना 

स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरत. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप रटंत पढ़ाई के बजाय सोच-समझ आधारित प्रणाली की तरफ जाना जरूरी है. सरकार को संचालन, पाठ्यक्रम और बुनियादी ढांचे में सुधार लागू करना चाहिए.
कागज-कलम से होने वाली परीक्षा में एक से दूसरी जगह लाने-ले जाने में लीक होने की अधिक गुंजाइश बनी रहती है, चाहे रास्ते में या परीक्षा केंद्र में.

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