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लोकसभा चुनाव 2024: क्या आरक्षण का मुद्दा तय करेगा चुनावी नतीजा?

आम चुनाव 2024 में जाति आरक्षण सबसे विवादास्पद और ध्रुवीकरण का मुद्दा बना, जिससे नतीजे तय होने की बड़ी संभावना

मुंबई में चैत्य भूमि पर भीमराव आंबेडकर की मूर्ति के सामने फूल चढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
मुंबई में चैत्य भूमि पर भीमराव आंबेडकर की मूर्ति के सामने फूल चढ़ाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
अपडेटेड 3 जून , 2024

राहुल गांधी इन दिनों जनसभाओं के मंच पर एक छोटी-सी, पतली-सी लाल किताब लहराते हैं. यह भारत का संविधान है, ईस्टर्न बुक कंपनी का कोट पॉकेट संस्करण, जो युवा वकीलों में खासा लोकप्रिय है. कांग्रेस नेता किताब हाथ में उठाकर संविधान की रक्षा की कसम खाते हैं.

वे लोकसभा चुनाव के 4 जून को नतीजों के ठीक 15 दिन बाद 54 साल के होंगे. उनके अंदाज में दिवंगत कांशीराम और ऑक्युपाई मूवमेंट (सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आंदोलन, जिसकी धाक अमेरिका सहित कई यूरोपीय तथा अन्य देशों में सुनी गई थी) के तेवर का गजब मिश्रण है.

इन दो धाराओं का मेल सिर्फ पहली नजर में ही असंभव-सा लगता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आजकल आवाज में गंभीरता और नाटकीयता के अपने अनोखे पुट के साथ अपनी दलील पेश कर रहे हैं. जैसे, उन्होंने 17 मई को इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, "मैं अपनी जान देकर भी संविधान की रक्षा करूंगा."

तो, कांटे के मुकाबले वाले चुनाव के दौरान वजूद की लड़ाई में उलझे दो विरोधी पक्ष एक ही बात का वादा क्यों कर रहे हैं? दरअसल, इसका संबंध उस किताब में निहित खास बात से है और उसके रचयिता बी.आर. आंबेडकर के जीवन की विचार-यात्रा से भी है, जो सकारात्मक कार्रवाई या आरक्षण के जरिए जाति का नया राजनीतिकरण करने से जुड़ा है.

'जाति' और उसका लंबा साया आरक्षण अमूमन कुछ असहज से सार्वजनिक मंच पर प्रकट होते हैं. 2024 का आम चुनाव इस मायने में तीसरा बड़ा अपवाद साबित होने जा रहा है. आंबेडकर के बाद मंडल आयोग के दौर ने दूसरी बार पुरानी व्यवस्था में उथल-पुथल मचा दिया था.

शायद मौजूदा दौर भी उसी पैमाने के बड़े बदलाव का प्रतीक है. देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज देशव्यापी जाति जनगणना के वादे के अपने मुख्य एजेंडे के साथ है, ताकि जरूरतमंदों को आबादी के आधार पर आरक्षण मुहैया कराया जा सके. वह दो मंडल समर्थक दलों—समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ खड़ी है, जो नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण पर 50 फीसद की अदालती सीमा को खत्म करने का वादा कर रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मोदी के लिए लगातार तीसरी बार बहुमत हासिल करने की कोशिश में यह लोकसभा चुनाव 'राम' का चुनाव होना था. अयोध्या में मंदिर निर्माण के जरिए हिंदुत्व की नए सिरे से समस्यारहित स्थापना का मंच जो तैयार किया गया था. इसके बदले भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन (इंडिया) ने उसे रोजगार-नौकरियों और आर्थिक तंगहाली की कांटों भरी राह पर धकेल दिया.

देश में हर मामले में पसर आने वाला धर्म शायद कुछ राहत लेकर आया. और यह लगभग दैवीय वरदान जैसा लगा होगा, जब कलकत्ता हाइकोर्ट ने 22 मई को दो पुराने कार्यपालिका आदेशों को रद्द कर दिया, जिसमें 114 समूहों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया गया था, जिनमें से 106 मुस्लिम समुदाय हैं. अदालत ने कुछ तल्ख अंदाज में कहा कि 2010 और 2012 में उन्हें थोक भाव में शामिल करने के तरीके से अंदाजा लगता है कि उस समुदाय को राजनैतिक मकसद के लिए कोई चीज मान लिया गया है.

मोदी ने फौरन इसे लपक लिया और कहा, "वोट बैंक की राजनीति...हर सीमा पार कर रही है." चाहे मामला धर्म से जुड़ा हो या नहीं, जातिगत आरक्षण इस चुनाव का जोरदार निर्देशक-सिद्धांत इस कदर बनता दिख रहा है कि यह बदस्तूर 4 जून के बाद भी कायम रहेगा. देश के चुनावी मैदान से यह साया दूर होने का नाम नहीं लेता.

पहले वार विपक्ष का

विडंबना देखिए कि पलड़ा तभी झुक गया, जब मोदी के अपने कक्ष में शीर्ष की उड़ान पर थे, जो उनके इस दावे से रफ्तार पकड़ चुकी थी कि भाजपा की अगुआई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) लोकसभा में 400 सीटें पार कर जाएगा. ऐसा बहुमत जो कामकाज की लगभग संप्रभु ताकत दे देगा. ऊंची आवाज में बार-बार दोहराए जाने से वह किसी असरदार मुहावरे की तरह लगने लगा था.

उम्मीद की यह उड़ान कई सिलसिलेवार घटनाओं से तेज हुई. मसलन, हिंदी पट्टी के तीन विधानसभा चुनावों में जीत, अयोध्या में हिंदुत्व के बड़े सपने को साकार करने वाला अनुष्ठान, और प्रमुख विपक्षी हस्तियों पर फंदा डालने वाली रणनीतिक कार्रवाइयां. उनमें एक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे, जो मंडल 2.0 की मूल इंजीनियरिंग का मजूमन तैयार कर चुके थे. 2022 में सभी की निगाहें राजनैतिक कलाबाजी के उनके लाजवाब हुनर के लाइव डेमो पर थीं, जब उन्होंने एक बार फिर गजब का करतब दिखाया और भाजपा से छलांग लगाकर अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी राजद की ओर जा बैठे.

फिर धीरे-धीरे, उन्होंने अपनी राजनैतिक पटकथा तैयार की और अपने प्रोडक्शन, 'इंडिया ब्लॉक' की अगुआई की भूमिका में पहुंच गए. कुछ ही लोग उनके उस मौलिक विचार को भांप पाए, जिसके बीज वे बो रहे थे, यानी खासकर ओबीसी के लिए आरक्षण के दायरे बढ़ाना. बेहद चतुराई से चुनी गई तारीख 2 अक्टूबर, 2023 को नीतीश ने बिहार जाति सर्वेक्षण के नतीजे जारी किए. 1931 के बाद पहली बार देश में कहीं भी कोई सरकारी जाति गणना सार्वजनिक की गई.

उससे बड़े पैमाने पर प्रचलित अनुमान की पुष्टि हुई कि बिहार की आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 63.14 फीसद है. मौजूदा आरक्षण की 50 फीसद की अदालती सीमा की वजह से 27 फीसद आरक्षण संख्या के लिहाज से खुद-ब-खुद नाइंसाफी की कहानी कहने लगा.

जल्द ही, 'इंडिया ब्लॉक' ने भी आरक्षण का दायरा बढ़ाने को अपने अहम एजेंडे का हिस्सा बना लिया और यह प्रतिद्वंद्वी नैरेटिव भाजपा के लिए खतरनाक बन गया. लेकिन नीतीश ने फिर पाला बदला और भाजपा के साथ आ खड़े हुए तो खतरा टलता हुआ दिखा. या ऐसा लग रहा था.

यह तूफान फिर एक मायने में अनजाने में घुमड़ने लगा. आम चुनाव 2024 की तारीखों के ऐलान से एक हफ्ते पहले, भाजपा सांसद और कर्नाटक के बड़बोले नेता अनंत कुमार हेगड़े कह बैठे कि भाजपा की अगुआई वाले एनडीए के लिए 400 पार सीटें इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि संविधान में संशोधन करना होगा, जो दो-तिहाई बहुमत के बिना नहीं हो सकता है. फिर क्या था, गेंद उछलकर दूसरे पाले में पहुंची तो विपक्ष ने उसे लपक लिया और पूरे दमखम से ऐसे उछाला कि सबकी नजरें उसी ओर लग गईं.

अभी शुरू ही हुए चुनाव प्रचार अभियान का रंग-रूप और तेवर बदल गया. विपक्ष ने फरवरी में मोदी की उस कहे को भी जोड़ लिया कि तीसरे कार्यकाल में और भी बड़े निर्णय होने वाले हैं. उसकी व्याख्या नीयत से जोड़कर की जाने लगी. उसे खूब तूल दी गई.

कांग्रेस की अगुआई वाले 'इंडिया’ ब्लॉक ने इसका यह मायने निकाला और उसे बड़े प्रचार का हिस्सा बनाया कि मोदी सरकार जाति के आधार पर आरक्षण को खत्म करने जा रही है क्योंकि आरक्षण अखंड हिंदुत्व और एकमुश्त हिंदू वोट बैंक तैयार करने की पुरानी भगवा धारणा से कतई मेल नहीं खाता. इसके सबूत के रूप में प्रधानमंत्री के पहले के भाषण भी मौजूद हैं, जब उन्होंने कहा था कि उनके लिए सिर्फ चार जातियां हैं—युवा, महिला, गरीब और किसान.

विपक्षी नेताओं और उनके भोंपुओं ने खतरे के संदेश का धुआंधार प्रचार शुरू कर दिया और बेशक, उसमें उनकी अतिशयोक्ति की छौंक भी थी ही. उन्होंने कहना शुरू किया, आंबेडकर का संविधान खतरे में है और उसमें दी गई अधिकारों और सुरक्षा की व्यवस्था भी खतरे में है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित अन्य नेताओं ने चेताया कि यह आखिरी चुनाव हो सकता है और यह लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है.

यही नहीं, इस ऊपरी आवरण से बाहर निकल वह बीज-मंत्र भी हवा में गूंजने लगा कि भाजपा का इरादा आरक्षण समाप्त करने का है. विपक्ष का अभियान लक्षित समूहों के बीच जोर पकड़ने लगा. यानी देश में 2011 की जनगणना के मुताबिक 16.6 फीसद अनुसूचित जातियों, 8.6 फीसद अनुसूचित जनजातियों, और ओबीसी समुदाय के बीच, जो शायद अहम बहुमत है.

दलित बेचैनी

इस मुद्दे ने ऐतिहासिक घावों को हरा कर दिया और हर तरफ वोट-ब्लॉक में विरोधाभास पैदा करने लगा. इसने जिन्हें सबसे पहले काट खाया, वे दलित हैं, जिनमें बहुत-से दशकों से खुद को अपमानजनक सामाजिक भेद-भाव और आर्थिक अभावों से इसलिए मुक्त कर पाए थे क्योंकि आरक्षण ने उन्हें चारदिवारी तोड़ने की चाबियां थमा दी थी.

राजनीति विज्ञानी तथा राजनैतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव कहते हैं, "दलितों के लिए आरक्षण की अहमियत उसी तरह है जैसे किसान के लिए जमीन है. वे उससे छेड़छाड़ की जरा भी छूट नहीं देंगे या बर्दाश्त नहीं करेंगे."

सीएसडीएस-लोकनीति के सह-निदेशक सुहास पलशिकर की राय में, चुनावी मुद्दे के नाते बाबा साहेब और संविधान के साथ भावनात्मक जुड़ाव की वजह से यह कथित खतरा दलितों के लिए बेहद खास है.

दलित आरक्षण असल में व्यावहारिक तौर पर एक बंद, अभेद्य घेरा है और उस पर 'खतरा' बस मोटी या हवाई बात है. कोई भी पार्टी उसके करीब जाने तक का जोखिम नहीं मोल ले सकती, लेकिन ऐसा कोई सोच सकता है, इसी से तूफान खड़ा हो गया. तल्ख लड़ाई कुछ खुले मुंह वाले ओबीसी इंद्रधनुषी घेरे के आखिरी रंग-जमातों को लेकर है. दलितों की आबादी तो जनगणना से पता चलती है, लेकिन उसके उलट ओबीसी की गणना 1931 के बाद से नहीं हुई है.

इस मामले में अब बिहार अपवाद है. इसलिए जाति जनगणना का संबंध उनसे ज्यादा है. मंडल आयोग ने 1931 के आंकड़ों के आधार 52 फीसद ओबीसी आबादी माना था, अब जनगणना से यह आंकड़ा बढ़ सकता है और इसलिए मौजूदा आरक्षण को 27 फीसद तक सीमित न रखने की मांग ऊंची जाति के मतदाताओं को डरा सकती है, जैसा कि 1990 के दशक में हुआ था. उससे भाजपा की एकीकृत हिंदू वोट की तलाश भी मुश्किल में पड़ गई.

दरअसल, यह हिंदुत्व के नीचे बहने वाली अंतर्धारा या बड़ी गोलबंदी की तरह था. जाति एक बड़ा और व्यापक फैक्टर है. विपक्ष ने उस धीमी सुलगती आग को हवा देकर धधकती ज्वाला में तब्दील कर दिया और उससे नए बने 'इंडिया ब्लॉक' को भारी ऊर्जा मिल गई. कुछ अनुमानों के अनुसार, कांटे के चुनावी मुकाबले वाले बड़े मैदानों में कट्टर टोलियां भी इससे अछूती नहीं रह गईं. सत्ताधारी पार्टी के लिए इस चक्रवाती तूफान का असर नकारात्मक रूप में ही मापा जाना चाहिए.

पहले दो चरणों में फीके मतदान के कारण औसतन चार फीसद की गिरावट देखी गई, जो उसके लिए खतरे की घंटी की तरह था. भाजपा को यह तो एहसास था कि जाति जनगणना का मुद्दा कांग्रेस के बंजर चुनावी खेतों में खाद का काम करेगा, लेकिन उसे यह उम्मीद नहीं थी कि यह सबसे बड़ा और अनोखे ढंग का मुद्दा बन जाएगा. आरक्षण खोने का भ्रम या वास्तविक डर दरअसल मतदान में लोगों को अपने फैसले तय करने को मजबूर कर सकता है.

भाजपा का डैमेज कंट्रोल

अचानक, भाजपा की स्टार टीम फौरन साज-संभाल में जुट गई. मोदी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक सभी ने जोरदार खंडन किया कि संविधान में संशोधन करने या आरक्षण समाप्त करने का कोई सवाल ही नहीं है. 2015 में, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आरक्षण की सामाजिक समीक्षा की अपील की, तो उस वर्ष के बिहार विधानसभा चुनाव का रुख पूरी तरह बदल गया था. हालांकि उन्होंने तब से अक्सर अपने बयान को वापस लेने की कोशिश की है.

अब 28 अप्रैल को भागवत को भी कहना पड़ा, "जब तक भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण बना रहना चाहिए." भाजपा को यह भी महसूस हुआ कि अब मामला 'सोशल इंजीनियरिंग' के खेल के मैदान से बाहर चला गया है जिसमें उसने अब तक विशेष हुनर विकसित कर लिया है. उस मैदान में शुद्ध चतुराई से जातियों के कुछ हिस्सों पर काबिज हुआ जा सकता है. जैसे, कुछ भारत रत्न देकर सम्मान नवाजने का भाव पैदा करना, या गठबंधन करके और थोड़ा-बहुत आरक्षण में विशेष व्यवस्था के जरिए गरीब पिछड़ी जातियों के एक समूह को लुभाने की कोशिश करना. लेकिन अब एक नया महाभारत अध्याय खुल रहा है. इसे भीम पर्व कहिए या भीम का दौर.

भाजपा को इस समय आत्मविश्लेषण करना पड़ रहा है, तो वजह जाति जनगणना और आरक्षण को लेकर उसकी दुविधा है. उस आंतरिक संघर्ष का एक तात्कालिक लक्षण गुजरात, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में राजपूतों की नाराजगी की खबरों से बेचैनी का आलम है. राजपूत उसके सबसे पुराने वोट जमात का हिस्सा हैं. 1990 के दशक के बाद से भाजपा की प्रगति में बड़ी संख्या में ओबीसी को शामिल करना और अपना आधार बढ़ाना शामिल हैं.

मोदी के दौर में इसमें काफी तेजी आई. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के विश्लेषण से पता चला है कि ओबीसी के बीच भाजपा का वोट शेयर 2009 में 22 फीसद से बढ़कर 2014 में 34 फीसद और 2019 में 44 फीसद हो गया. लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के. रविकांत कहते हैं कि भाजपा ने इसे हिंदुत्व से नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व देकर हासिल किया. उपेक्षित अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) को स्थानीय स्तर से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल तक में जगह दी गई.

जो लोग 'मंडल' और 'मंदिर' को विपरीत ध्रुवों के रूप में देखते हैं, वे भूल जाते हैं कि मंडल भगवा के लिए कितना परिवर्तनकारी और रचनात्मक साबित हुआ है. इसी से भाजपा का वोट आधार बढ़ा और उसे 25-27 फीसद वोट वाले अपने पुराने सवर्ण-वर्चस्व वाले घेरे को तोड़कर आगे बढ़ने में मदद मिली है. उसे एहसास था कि इससे उसके मूल जनाधार को थोड़ी तकलीफ होगी, मगर वह फिर भी वफादार बना रहेगा. लेकिन इस महत्वपूर्ण बफर को हर कीमत पर सुरक्षित रखना था. शायद आरक्षण पर एक और खतरे की आशंका से काम बन जाए.

यही सोचकर भाजपा नेताओं और प्रधानमंत्री मोदी ने जबरदस्त जवाबी हमला बोल दिया. उसमें धर्म की छौंक लगाकर मुस्लिम भय जगाने की कोशिश करके भ्रम फैलाने वाले बयान दिए. मोदी ने कहा कि कांग्रेस के 'भारत के एक्स-रे' के वादे का उद्देश्य हिंदू महिलाओं के 'मंगलसूत्र' से लेकर मौजूदा जाति आरक्षण तक सभी संपत्तियों और अधिकारों को छीनना और मुसलमानों में बांटना है.

ओबीसी कोटे के भीतर मुस्लिम आरक्षण सबसे पुरानी गुत्थियों में से एक रही है. मोदी और भाजपा ने इसे केंद्र में ला दिया और कांग्रेस के खिलाफ तुष्टीकरण की राजनीति के अपने पुराने आरोप को पुनर्जीवित कर दिया. उन्होंने दोहरी रणनीति पर काम किया. एक, कांग्रेस का घोषणापत्र और राहुल गांधी का संपत्ति पुनर्वितरण का मामला मुस्लिम-प्रथम नीति से जुड़ा है. फिर कुछ कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों के पिछले फैसलों को बताकर उसे पुष्ट करने की कोशिश की, जिसमें मुस्लिम आरक्षण पर जोर दिया गया था.

फिर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 2006 का एक बयान निकाला, जिसमें दावा किया गया था कि उन्होंने कहा था कि मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहला हक है. फिर, कांग्रेस की पुरानी दुविधाएं भी थीं. भाजपा के ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. के. लक्ष्मण ने जवाहरलाल नेहरू के 1961 के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र को खोज निकाला, जिसमें उन्होंने लिखा था कि जाति-आधारित आरक्षण अक्षमता और दोयम दर्जे के मानकों को जन्म देता है.

सांप्रदायिक मोड़

आरक्षण की बहस को मुस्लिम तुष्टीकरण पर मोड़ने की भाजपा की रणनीति से कांग्रेस बैक फुट पर आ गई. पार्टी ने साफ किया कि मनमोहन सिंह की टिप्पणी सामूहिक अभिव्यक्ति का हिस्सा थी, जिसमें ओबीसी, दलित और आदिवासियों के साथ अल्पसंख्यकों का जिक्र था. पार्टी ने कहा कि बाकी को छोड़कर सिर्फ अल्पसंख्यकों का जिक्र करना सुविधानुसार तोड़मरोड़ कर पेश करने की मिसाल है.

उसने देशव्यापी जाति जनगणना पर कुछ नरमी बरती. उसके घोषणा-पत्र में उसके साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक सर्वे और उन आंकड़ों के आधार पर सकारात्मक कार्रवाई को मजबूत करेंगे जैसे वादे हैं. उसके साथ आरक्षण से 50 फीसद की सीमा हटाने के लिए संविधान संशोधन लाने का भी संकल्प है, जो मंडल रिपोर्ट पर अमल के बाद 1992 में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी फैसले के रूप में मशहूर है.

पार्टी घोषणा-पत्र के सह-लेखक पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम इन वादों पर किसी तरह की असहमति से इनकार करते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, "कांग्रेस में कोई भी दुविधा में नहीं है. विभिन्न वजहों से तत्कालीन सरकारों ने 1951 से 2011 तक जनगणना में जाति के सवाल को शामिल नहीं किया. फिर मांग तेजी से उठी. अगर हम सत्ता में होते तो 2021 की जनगणना में इस सवाल को शामिल करते."

कांग्रेस के घोषणा-पत्र में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे लगे कि सकारात्मक कार्रवाई, या मंगलसूत्र लेकर मुसलमानों को सौंपने की कोई बात हो, जैसा कि प्रधानमंत्री ने दावा किया. दरअसल, उस दस्तावेज में बड़ी सावधानी से मुस्लिम शब्द से ही परहेज किया गया है. एक भ्रम जरूर कोई पाल सकता है, जहां घोषणा-पत्र में 10 फीसद ईडब्ल्यूएस कोटा को लागू करने का वादा किया गया है, जिसे भाजपा 2019 में ले आई थी.

यानी बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों और समुदायों के कमजोर वर्गों को नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण. इसमें कोई ब्यौरे नहीं है, लेकिन समुदायों से यह मौखिक संकेत निकाला जा सकता है कि उसमें मुसलमान भी शामिल होंगे.

प्रधानमंत्री और भाजपा के नेताओं ने दूसरी लाल झंडी यह दिखाई कि सरकारी ठेकों में एक मुस्लिम-विशेष प्रावधान हो सकता है. कांग्रेस ने जवाबी हमले में कहा कि उसके सभी वादों में किसी के प्रति नाइंसाफी के खिलाफ शर्तें जुड़ी हैं, जिसका वह भाजपा सरकार पर आरोप लगाती है. कांग्रेस के घोषणा-पत्र में लिखा है, "हम आश्वस्त करेंगे कि अल्पसंख्यकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी नौकरी, सरकारी ठेकों, हुनर विकास, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में बिना किसी भेदभाव के उनकी वाजिब हिस्सेदारी मिले."
 
मुस्लिम आरक्षण

ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम कोटा उतना ही पुराना है जितना भारत में आरक्षण. 1874 में मैसूर में पहले औपचारिक आरक्षण की शुरुआत हुई. उसके बाद, मुसलमान समाज के पिछड़ों को पिछड़े वर्ग का हिस्सा मानना देश में कानून के कई स्थापित पहलुओं में मान्य तर्क रहा है. यह संविधान के अनुच्छेद 16(4) में निहित है, सुप्रीम कोर्ट के मशहूर इंद्रा साहनी फैसले में इसे वैध बताया गया.

और केंद्रीय सूची में विभिन्न राज्यों के लिए बहुत सारे मुस्लिम ओबीसी समुदाय हैं. कम-से-कम एक दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस पर अमल होता है. राज्यों की अपनी सूचियां भी हैं, जिनमें कुछ अधिक समुदायों की फेहरिस्त है. संविधान इस मामले में स्पष्ट है—हर ओबीसी आरक्षण सूची में सामाजिक-आर्थिक आधार पर शामिल किया जाए, पिछड़ेपन के आधार पर समूह/जातियां इसके लिए योग्य होती हैं. यह मुस्लिम समूहों पर समान रूप से लागू होता है, और इसलिए यह पसमांदा के अजलाफ (पिछड़े) तबके पर लागू होता है. कानून स्पष्ट रूप से धर्म के आधार पर आरक्षण की मनाही करता है.

दिलचस्प यह है कि यह मनाही पसमांदा मुसलमानों के अरजाल (दलित) तबके के साथ ईसाई दलितों के लिए अनुसूचित जाति आरक्षण के मामले में रुकावट बन जाती है, जबकि उनके मामले में सामाजिक-आर्थिक तर्क समान रूप से या कुछ और जोरदार ढंग से लागू होता है.

अलबत्ता, भारतीय मूल के धर्मों के गैर-हिंदू दलितों को ये लाभ दिए जाते हैं. मुस्लिम ओबीसी के विपरीत, इस मामले में हिंदू जाति व्यवस्था की दलीलें चलती हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई दलित धर्मांतरण के बाद दलित नहीं रह जाता है और यह सिर्फ इस्लाम और ईसाई धर्म के मामले में ही उठता है.

लेकिन ओबीसी के मामले में परिभाषा तय करने में धर्म आड़े नहीं आता है. कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने 1992 में बतौर मुख्यमंत्री कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण की नींव रखी थी (हालांकि बाद में देवेगौड़ा सरकार ने इसे अधिसूचित किया था).

वे कहते हैं, "भाजपा इसे 'धार्मिक' आरक्षण कहती है... हमारा मतलब कभी भी ऐसा नहीं था. चिन्नप्पा रेड्डी आयोग की रिपोर्ट पर, मैंने कहा कि मुस्लिम और हिंदू पिछड़ों के लिए कोटा मिलाने से किसी के साथ न्याय नहीं होगा. मुसलमानों को पिछड़ा स्वीकार करना कोई नई बात नहीं है. यहां तक कि 1918 में मैसूर के महाराजा के अधीन मिलर समिति ने उन्हें इस प्रकार वर्गीकृत किया था."

एक कानूनी उलझन आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मुस्लिम कोटा में रुकावट है. आंध्र के मामले में, विवाद इसलिए पैदा हुआ क्योंकि पूरे मुस्लिम समुदाय को 5 फीसद कोटा देने के लिए 'पिछड़े' वर्ग में माना गया था, जिसमें सैयद, पठान जैसी कुलीन जातियां भी शामिल थीं. तेलंगाना में मामला अलग से 12 फीसद कोटा से जुड़ा है जिसके लिए 50 फीसद की सीमा से आगे जाना होगा. दूसरा विवादास्पद मुद्दा यह है कि क्या मुस्लिम ओबीसी के लिए कोटा आरक्षण में हिस्सा बंटा लेगा.

इसे भाजपा उठा रही है. ओबीसी आरक्षण कानून में ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया है कि 'पिछड़ेपन' को केवल हिंदुओं के बीच ही दर्शाया जाए. साथ ही, राजनैतिक रूप से, अगर पूर्वाग्रह को देखा जाए तो यह ध्रुवीकरण का मुद्दा हो सकता है, मसलन, पश्चिम बंगाल की ओबीसी सूची में शामिल 180 जातियों में से 118 मुस्लिम हैं, जो एक संभावित मुद्दा हो सकता है. कई राज्यों में मुसलमानों के लिए विशिष्ट उप-कोटा है. 1956 में राज्य गठन के दौरान केरल ने इसे 10 फीसद पर रखा था.

1970 के दशक से पेचीदा कानूनी सफर के बाद, कर्नाटक ने 1994 में 4 फीसद कोटा आवंटित किया. तमिलनाडु में 2007 से 3.5 फीसद है. हरियाणा के 'मुल्ला जाट' उनमें थे, जिन छह समूहों को 2016 में हिंदू और सिख जाटों के साथ 10 फीसद कोटा आवंटित किया गया. 1970 के दशक के कर्पूरी ठाकुर सरकार के बाद से बिहार में मुसलमानों को ओबीसी/ईबीसी के तहत शामिल किया गया है, समग्र कोटा 75 फीसद तक बढ़ाने के नीतीश के नए प्रस्ताव से उन्हें आनुपातिक रूप से लाभ होगा. यहां तक कि गुजरात में मुस्लिम ओबीसी की 32 बिरादरियां हैं, जैसा कि मोदी ने 2022 के एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था, जब वे मुख्यमंत्री थे तो उन्हें लाभ मिलता था.

जाति का सवाल

कई आकस्मिक घटनाओं के सिलसिले से कांग्रेस जाति-आधारित अभियान के शीर्ष पर पहुंच गई. नीतीश के जाति सर्वेक्षण ने पुष्टि की कि गैर-सवर्ण जातियां बिहार की जनसंख्या में 84.5 फीसद की भारी हिस्सेदारी रखती हैं, तो दूसरे राज्यों ने भी इसी तरह का सर्वेक्षण शुरू किया, वादा किया या उस पर जोर दिया जैसे ओडिशा, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र. देशव्यापी जाति जनगणना की आवश्यकता का शोर उठने लगा लेकिन जब नीतीश दोबारा पलटी मार गए तो, तो कांग्रेस ने उस शून्य को भरा.

हालांकि, मोइली कहते हैं, "राहुल जिस भाषा में बोल रहे हैं वह गलत है. इसे धन पुनर्वितरण जैसे विचारों के साथ मिलाना सही नहीं है, यह कांग्रेस का तरीका नहीं है." ऐसे समय में जब क्रांतिकारी भावना अधिक व्याप्त है, वे अधिक विकासवादी दृष्टिकोण की वकालत करते हैं.

तीखी और दो-टूक राय रखने वाले मुद्दों के विपरीत यह मसला भाजपा के लिए फिसलन भरा था. हां कहने से 'एकजुट हिंदू धर्म' के आरएसएस का विचार नष्ट होता है, और न कहना चुनावी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. इस घटना में, इसने जोर देने के बजाए दिखावा चुना.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के 2018 के एक बयान के बाद कि जाति 2021 की जनगणना का हिस्सा होगी, पार्टी पीछे हट गई; फिर कोविड ने व्यवधान डाला, और हर दशक में होने वाली जनगणना ही छूट गई. 2017 में, केंद्र ने ओबीसी जातियों के भीतर लाभों के असमान वितरण का अध्ययन करने और कोटा में कोटा का सुझाव देने के लिए रोहिणी आयोग की स्थापना की थी. 13 विस्तारों के बाद, उसने जुलाई 2023 में रिपोर्ट पेश की—लेकिन इस मुद्दे पर बाहर का माहौल गर्म हुआ तो यह सीधे ठंडे बस्ते में चला गया.

जाति जनगणना पर विपक्ष में हर कोई पूरी तरह सहमत नहीं है. इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुप्पी भारी है. हालांकि तृणमूल नेता इससे इनकार करते हैं, लेकिन बताया जाता है कि वे सितंबर में इंडिया की एक बैठक से बाहर चली गई थीं जिसके कारण जाति जनगणना को राजनैतिक प्रस्ताव से हटा दिया गया था. जाति दरअसल ममता की मूलनिवासी, अल्पसंख्यक-समर्थक राजनीति के लिए जटिल सवाल है. लेकिन बंगाल बदल रहा है. राज्य का ओबीसी अनुपात अब 60 फीसद होने का अनुमान है. ममता जाति और समुदाय विशेष कार्यक्रम बनाने लगी हैं.

इस बीच महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग और ओबीसी की जवाबी लामबंदी के इर्द-गिर्द एक और तूफान घुमड़ रहा है. हालांकि इसके नायक चुनाव आते ही रहस्यमय तरीके से पीछे हट गए, लेकिन यह मुद्दा कुछ हद तक जीवित है. पलशिकर कहते हैं, "हकीकत में, प्रतिस्पर्धी राजनीति के कारण पिछले दशक में महाराष्ट्र में जातिगत गुट आम तौर पर बंट गए थे; यह दलितों, मराठों और ओबीसी पर लागू होता है."

उत्तर की पुरानी मंडल पार्टियां, विरोधाभासी रूप से, उस एक-से-एक पत्राचार को खत्म करने की कोशिश कर रही हैं. अखिलेश यादव अब एक पीडीए सामाजिक गठबंधन तैयार कर रहे हैं—पिछड़ा वर्ग और आदिवासियों के बीच 'डी' (दलित के लिए) केंद्र में है. तेजस्वी यादव ने अपनी रैली की भीड़ से दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए कहा; उनका राजद एक आत्मसात करने वाली 'ए टु जेड' भाषा बोलता है.

दोनों पुराने 'यादव पार्टी' टैग को हटाने की कोशिश कर रहे हैं. अपने अतीत के बोझ के साथ, ईबीसी पर जीत हासिल करना, उनके वर्तमान चुनावी संघर्ष का मूल है. अपने परिवार के अलावा, अखिलेश ने बड़े पैमाने पर यादवों को अपनी उम्मीदवार सूची से बाहर रखा है और ईबीसी और दलितों को प्राथमिकता दी है. मंडल प्लस शब्दावली के साथ नई आकर्षक कांग्रेस के साथ उनकी साझेदारी भी मदद कर सकती है.

'राष्ट्रीय' पार्टियों के लिए, जाति को अब चीजों के सामान्य क्रम में रुकावट के रूप में नहीं लिया जा सकता है. अब यह राजनीति की बारीकियां नहीं रह गई हैं. अंधेरे में, या इसके मुख्य पाठ के हाशिये पर निबटाया जाना चाहिए. आरक्षण का प्रश्न इसे केंद्र में ला खड़ा करता है. क्या यह चुनावी तौर पर काम करेगा? भले ही 4 जून को कोई जीते, यह लगभग तय लगता है कि यह मुद्दा नीति और राजनीति पर छाप छोड़ेगा.

—सुनील मेनन साथ में, अर्कमय दत्ता मजूमदार और विपुल ग्रोवर के इनपुट

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