वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की भतीजी तथा समाजवादी पार्टी की नेता मारिया आलम ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में 30 अप्रैल को एक सभा में अहम बयान दिया.
उन्होंने देश में मुसलमान मतदाताओं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के खिलाफ 'वोट जिहाद' छेड़ने की अपील की. उनके इस बयान ने पहले से ही हिंदू-मुस्लिम विभाजन से जूझ रहे चुनावी मौसम में एक और विवाद खड़ा कर दिया. इससे मुस्लिम मतदाता फिर सुर्खियों में आ गए.
मोदी ने फौरन 'वोट जिहाद' को पहले से मौजूद 'लव जिहाद' और 'भूमि जिहाद' के नैरेटिव के साथ जोड़कर हमला बोल दिया. इसके साथ उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 2006 के एक कथित बयान का हवाला दिया कि अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहला हक है.
फिर उसे राहुल गांधी के संपत्ति बंटवारे के विचार के साथ जोड़ा और उसे हिंदुओं की धन- संपत्ति छीन कर मुसलमानों में बांटने के शोशे की तरह पेश किया, जिसमें विवाहित महिलाओं के मंगलसूत्र भी शामिल हैं. इसी सुर में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति के तहत अन्य पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की कीमत पर मुसलमानों को आरक्षण देने का आरोप लगाया.
राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के संरक्षक लालू प्रसाद ने 7 मई को बयान दिया कि मुसलमानों को पूरा आरक्षण मिलना चाहिए. उनके इस बयान ने मानो आग में घी का काम किया. मोदी ने झट से उसे विपक्ष के मुस्लिम पूर्वाग्रह के सबूत के तौर पर पेश कर दिया, जिसके बाद लालू को यह सफाई देनी पड़ी कि आरक्षण का आधार सामाजिक पिछड़ापन है. नरेंद्र मोदी आरक्षण खत्म करना चाहते हैं. यह दीगर बात है कि भाजपा की अपनी सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने आंध्र प्रदेश में मुसलमानों के लिए आरक्षण का वादा किया है.
इस बीच महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता कांग्रेस के विजय वडेट्टीवार ने 5 मई को यह आरोप लगाया कि 2008 के मुंबई आतंकी हमले में राज्य के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे की हत्या पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब ने नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े एक पुलिस अधिकारी ने की थी. इससे मोदी ने भारत के इस्लामपंथी पड़ोसी के खिलाफ अपने बयान के दायरे को बढ़ा दिया. उन्होंने कांग्रेस को पाकिस्तान का मुरीद करार दिया और दोनों के बीच पोशीदा सांठगांठ का संकेत दिया.
चुनाव विशेषज्ञ इसे मुस्लिम फैक्टर कहते हैं और 2024 के चुनाव में यह फैक्टर पूरी तरह सक्रिय है. कई विशेषज्ञों की दलील थी कि पिछले दो आम चुनावों में भाजपा के प्रचंड बहुमत ने उनके सामूहिक मतदान की ताकत को अप्रासंगिक बना दिया था.
यह निष्कर्ष इस बार थोड़ा अपरिपक्व साबित हो सकता है क्योंकि अपनी आबादी में मुसलमानों की सबसे अधिक हिस्सेदारी वाले शीर्ष चार राज्य, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होंगे कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटेगी या नहीं.
इसी वजह से भाजपा भी खुलेआम मुस्लिम विरोधी बयानबाजी के बावजूद मुस्लिम मतदाताओं से सीधा संपर्क साधने की कोशिश कर रही है. दिल्ली में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं, "अहमियत सही मायनों में बढ़ गई है. मुसलमान भाजपा के लिए एक रेफरेंस प्वाइंट हैं. अगर कोई मुसलमान होगा ही नहीं तो हिंदुत्व की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी."
मुसलमान क्यों मायने रखते हैं?
दुनिया में मुसलमानों की तीसरी सबसे ज्यादा आबादी भारत में ही है, जहां यह 14 फीसद आबादी के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है. चुनावी नजरिए से भारत के 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से 86 में मुसलमानों की आबादी कम से कम 20 फीसद है. ऐसी 16 सीटों पर आबादी में उनकी हिस्सेदारी 50 फीसद से ज्यादा है. अलबत्ता, मुस्लिम वोटरों का असर व्यापक पैमाने पर सीमित है क्योंकि ये 86 सीटें 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं. इनमें से 71 सीटें पांच राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार, असम और जम्मू-कश्मीर में हैं.
राजनैतिक दल अक्सर मुस्लिम मतदाताओं को इस धारणा के तहत निशाना बनाते हैं कि वे देश भर में किसी विशेष एजेंडे या किसी पार्टी के लिए सामूहिक रूप से मतदान करते हैं. लेकिन चुनावी आंकड़े एकमुश्त मुस्लिम वोट बैंक के मिथक की पुष्टि नहीं करते. 2006 की सच्चर कमेटी और एक साल बाद रंगनाथ मिश्र आयोग ने खुलासा किया कि मुसलमान अब भी लगभग सभी सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक संकेतकों में राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर मुस्लिम मतदाता अपने जीवन की निराशाजनक स्थितियों के मद्देनजर निर्वाचन क्षेत्र विशेष के स्तर वाली राजनीति से प्रेरित होते हैं.
इसके अलावा, हिंदुओं की तरह मुस्लिम पहचान भी बहुत खंडित है. यह धार्मिक संप्रदाय, भाषा, जाति और वर्ग के साथ बदलती रहती है. 34 फीसद मुसलमान आबादी वाले राज्य असम में मुस्लिम बहुल पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल कहते हैं, "मुसलमान अब समझ गए हैं कि असली सशक्तीकरण तालीम, रोजगार और विकास के जरिए होता है. लिहाजा, ये ही कारक मुसलमानों के मतदान पैटर्न तय करेंगे." भाजपा नेता शाजिया इल्मी इस बात से इत्तेफाक रखती हैं कि यह समुदाय चुनाव नतीजे तय करने के एकमात्र एजेंडे से आगे निकल चुका है.
चुनावी आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ चुनावों में हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में गोलबंद हुए, लेकिन मुस्लिम वोट कांग्रेस और मजबूत क्षेत्रीय दलों के बीच बंट गए. मुसलमानों के खंडित मतदान की सबसे अच्छी मिसाल उत्तर प्रदेश की 23 सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी कम से कम 20 फीसद है और उनमें से सात में 40 फीसद से ज्यादा है. 2009 में इनमें से सात सीटें सपा के पास, सात अन्य कांग्रेस के, चार बसपा के, तीन भाजपा के पास और दो सीटें राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के पास थीं.
2014 में जब हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में एकजुट हो गए, तो बिखरे हुए मुस्लिम वोटों ने इनमें से 22 सीटों पर भाजपा की जीत पक्की कर दी. इन सीटों में रामपुर और संभल भी हैं, जहां कुल आबादी में मुसलमान 50 फीसद से ज्यादा हैं.
जब 2019 में सपा और बसपा ने गठबंधन साझेदार के रूप में चुनाव लड़ा तब भी मुसलमानों ने कुछ खास एकजुट होकर वोट नहीं दिया. भाजपा को इन 23 सीटों में से केवल सात गंवानी पड़ी. लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 2017 के विधानसभा चुनाव में 65 फीसद मुसलमानों ने कांग्रेस-सपा गठबंधन का समर्थन किया, लेकिन 19 फीसद ने तब भी बसपा को वोट दिया और छह फीसद ने भी भाजपा को वोट दिया.
असम में, जहां पिछले दो चुनावों में 60 फीसद से ज्यादा असमिया भाषी मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया, जबकि 35 फीसद बांग्ला भाषी मुसलमानों की निष्ठा कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच समान रूप से विभाजित रही है. दरअसल, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे ज्यादातर मुस्लिम बहुल राज्यों में मुस्लिम वोट कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच बंटे हुए हैं. ऐसे में ताज्जुब नहीं कि भाजपा ने 2019 में इस समुदाय से कम समर्थन के बावजूद मुस्लिम बहुल 86 सीटों में से 36 पर जीत हासिल की, जो 2014 के मुकाबले महज दो कम है.
अगर राष्ट्रीय वोट शेयर को देखें तो कांग्रेस और भाजपा ने पिछले तीन चुनावों 2009, 2014 और 2019 में लगभग 400 उम्मीदवार उतारे हैं, फिर भी दोनों पार्टियों का मिलाजुला मुस्लिम वोट शेयर 42 फीसद और 47 फीसद के बीच रहा है. इसमें भाजपा के पक्ष में चार से नौ फीसद के बीच वोट किया गया. यह इस बात का संकेत है कि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय पार्टियों में बंटा हुआ है.
2024 इस मामले में अहम हो सकता है. हिंदू पहचान के बड़े दावे के रूप में पेश किए जा रहे राम मंदिर के बाद के युग में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून, 2019 (सीएए) लागू किए जाने समेत विभिन्न मुद्दों की वजह से मुसलमान खुद को घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं.
सीएए के नियम चुनाव की घोषणा से ठीक पहले अधिसूचित किए गए. इसके तहत इस्लाम को छोड़कर बाकी सभी धर्मों के शरणार्थी आसान मानदंडों के साथ भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं. गाय की तस्करी के संदेह में पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटनाओं, गोमांस के निर्यात पर प्रतिबंध, मदरसे बंद करने और सरकारी अमले की ओर से मुख्यत: मुसलमानों के मामले में बुलडोजर इंसाफ के इस्तेमाल ने समुदाय के प्रति भेदभाव की भावना को और बढ़ा दिया है. ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के पूर्व अध्यक्ष और राष्ट्रीय एकता परिषद के पूर्व सदस्य नावेद हामिद कहते हैं, "मुस्लिम मतदाताओं के बीच बेचैनी है. अलग-थलग पड़ने की भावना एक नई ऊंचाई पर पहुंच गई है."
यही भावना कुछ हद तक उनके वोट को गोलबंद कर सकती है. अलीगढ़ के निवासी और अब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्कॉलर फहद जुबेरी का कहना है, "रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि मुसलमान रणनीतिक मतदान करने की कोशिश कर रहे हैं और उनके वजूद का खतरा उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहा है." यह पैटर्न 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद लगभग सभी राज्यों के चुनावों में पहले ही नुमायां हो चुका है. वहां मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर भाजपा के खिलाफ और उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टी के पक्ष में मतदान किया.
सीएसडीएस के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 2020 के बिहार चुनाव में 77 फीसद मुसलमानों ने महागठबंधन (भाजपा विरोधी पार्टियों का गठबंधन) को, 2021 के बंगाल चुनाव में 75 फीसद मुसलमानों ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को और 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में 79 फीसद मुसलमानों ने सपा को वोट दिया. मुसलमान भाजपा को हराने के लिए एकजुट होकर वोट करने लगे हैं, इसका इन चुनावों में दिखा. उत्तर प्रदेश में सपा को मिलने वाले मुस्लिम वोटों में 33 फीसद और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के वोटों में 24 फीसद इजाफा देखा गया.
मुंबई में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी ऐंड सेक्युलरिज्म के सचिव इरफान इंजीनियर कहते हैं, "यह समुदाय घिरा हुआ महसूस कर रहा है और भाजपा को सत्ता से बाहर रखना उनके लिए गंभीर राजनैतिक लक्ष्य है. भाजपा को हराने के इरादे से उनके गोलबंद होकर मतदान करने की संभावना है." ऑल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारी सदस्य प्रोफेसर मुनेसा बुशरा आब्दी उनसे सहमति जताते हुए कहती हैं, "भाजपा का मुस्लिम विरोधी एजेंडा ही गोलबंद होने की वजह है."
विपक्ष की रणनीति
इस चुनाव में विपक्षी खेमा मुस्लिम वोटों को गठबंधन या उनसे जुड़े प्रमुख मुद्दों पर गोलबंद करने पर ध्यान दे रहा है. मसलन, उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के बीच अच्छा-खासा जनाधार रखने वाली दो पार्टियां कांग्रेस और सपा एक साथ आ गई हैं. जहां राहुल गांधी की 'मोहब्बत की दुकान' के नैरेटिव को मुसलमानों के खिलाफ भाजपा के कथित सांप्रदायिक एजेंडे की काट के रूप में पेश किया गया है, वहीं सपा पीडीए या पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को आजमा रही है.
इसकी वजह से 2022 के विधानसभा चुनाव में उसके विधायकों की संख्या 2017 में 47 से बढ़कर 111 हो गई थी. बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी सीधे तौर पर मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने से परहेज नहीं कर रही है. मार्च में सीएए नियमों की अधिसूचना के फौरन बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सीएए लागू करने को एनआरसी से जोड़ने में कोई वक्त नहीं गंवाया. उन्होंने दावा किया कि यह मुसलमानों को हिरासत केंद्रों में भेजने की एक चाल है.
पार्टी के घोषणापत्र में वादा किया गया है कि अगर वह केंद्र में सत्ता में आई तो सीएए और एनआरसी को खत्म कर देगी और समान नागरिक संहिता लागू होने से रोक देगी. ये तीन मुद्दे मुसलमानों के लिए लगातार चिंता का विषय रहे हैं. ऐसा कहा जाता है कि इसकी वजह से पूरा मुस्लिम वोट टीएमसी के पीछे गोलबंद हो गया है.
केरल में माकपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ने राज्य के 26 फीसद मुसलमानों को लुभाने के लिए भाजपा विरोधी कार्ड का इस्तेमाल किया है. विपक्षी दलों को कश्मीर में मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का भरोसा है, जिसे अब तीन लोकसभा सीटों के साथ केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया है.
बिहार में राजद, कांग्रेस और वाम दलों का महागठबंधन भी मुस्लिम वोटों के एकजुट होने पर भरोसा कर रहा है, जो परंपरागत रूप से राजद, कांग्रेस और जद (यू) के बीच विभाजित रहे हैं. मुसलमानों के लिए आरक्षण की लालू की मांग कोई जबान फिसलने की घटना नहीं थी.
लालू की पार्टी एक मजबूत एम-वाई या मुस्लिम-यादव वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रही है. महागठबंधन को उम्मीद है कि मुसलमानों के एकजुट मतदान से उन्हें बिहार की वे सभी आठ सीटें छीनने में मदद मिलेगी, जहां मुस्लिम आबादी कम से कम 20 फीसद है. इनमें से सात सीटों पर फिलहाल एनडीए का कब्जा है.
राजनैतिक उथल-पुथल की वजह से महाराष्ट्र में मुस्लिम वोटों के लिए एक आश्चर्यजनक चैंपियन का उदय हुआ है. यह समुदाय अब हिंदू वर्चस्व के मूल ध्वजवाहक की उत्तराधिकारी शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को इस बार अपने सर्वोत्तम दांव के रूप में देख रहा है. यह एक रणनीतिक विकल्प है, क्योंकि एमवीए के सभी घटकों में से शिवसेना (यूबीटी) गुट के पास भाजपा के साथ सीधे मुकाबले में सबसे अधिक हिंदू वोटों को आकर्षित करने की संभावना है.
इसके अलावा, मुसलमानों का योगदान कुल वोट शेयर को शिवसेना (यूबीटी) के पक्ष में झुका सकता है, जो राज्य की 48 सीटों में से 21 पर चुनाव लड़ रही है. एमवीए के तीन भागीदारों में सबसे अधिक शिवसेना (यूबीटी) के ही उम्मीदवार हैं. इसके अलावा, दो सीटों मुंबई दक्षिण और औरंगाबाद पर जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसद से ज्यादा है, शिवसेना (यूबीटी) एमवीए का प्रतिनिधित्व कर रही है.
अलबत्ता, भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोटों की गोलबंदी का एक दूसरा पक्ष भी है, भले ही इससे विपक्षी दलों को फायदा हो. कांग्रेस डेटा सेल के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती के एक अध्ययन से पता चलता है कि भाजपा का वोट शेयर वास्तव में उन जिलों में बढ़ा है, जहां उस राज्य के औसत से काफी अधिक (1.5 गुना या अधिक) मुस्लिम हैं.
राष्ट्रवादी मुस्लिम पसमांदा महाज के अध्यक्ष और भाजपा नेता आतिफ रशीद का कहना है कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच गैर-भाजपा दलों की ओर से फैलाया गया डर उनकी खराब छवि पेश करता है और हिंदुओं को उनके खिलाफ गोलबंद करता है. वे कहते हैं, "मुसलमानों को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वे सरकारें बना और बिगाड़ सकते हैं. इसके बजाय उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किस सरकार ने उन्हें गवर्नेंस दी है."
यहां तक कि कांग्रेस न्याय पत्र में एक बार भी मुस्लिम शब्द का जिक्र नहीं किया गया है, जिसे भाजपा 'मुस्लिम लीग का घोषणापत्र' बता रही है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ राज्यसभा सदस्य कहते हैं, "पिछले 10 साल में जो हुआ है, उसके बाद मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे. उनके विकल्प गैर-भाजपा दलों तक ही सीमित हैं. उनसे कोई भी सीधी अपील कर हम भाजपा के जाल में फंस सकते हैं और इससे हिंदू मतदाताओं के बीच बेजा गलत धारणा पैदा कर सकते हैं." दरअसल, कांग्रेस ने अपने मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या 2019 में 35 से घटाकर इस बार 19 कर दी है.
इसकी एक वजह यह भी है कि वह 421 सीटों के मुकाबले केवल 330 सीटों पर लड़ रही है. अगर आप मुस्लिम समर्थक राजनीति का ढिंढोरा पीटने वाली अन्य पार्टियों की जांच करें तो साफ दिख जाएगा कि वैचारिक समर्थन को वास्तविक प्रतिनिधित्व तक ले जाने के मामले में किस तरह सावधानी बरती जाती है.
टीएमसी ने छह, सपा ने चार और राजद ने दो मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन यानी इंडिया के अन्य बड़े तीन घटक दलों, द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम), एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरदचंद्र पवार) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में सिर्फ राकांपा (शरद पवार) ने एक मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है.
राजनैतिक नेता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारना चुनावी लिहाज से घाटे का सौदा है. हालांकि हिंदू-बहुल क्षेत्र में हिंदुओं की ओर से मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने की संभावना नहीं होती लेकिन मुस्लिम-बहुल सीटों पर इस तरह के प्रयोग से अक्सर उनके वोट बंट जाते हैं. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो फयाद अली बताते हैं कि किसी मुस्लिम प्रतिनिधि की मौजूदगी से मुसलमानों के बीच मतभेद बढ़ने और उसका असर उनके मतदान पर पड़ने की संभावना रहती है. ऐसे में अंतत: वे किसी बड़े सामूहिक लक्ष्य के लिए नहीं, बल्कि आम तौर पर अपनी इलाकाई पहचान के पक्ष में मतदान करते हैं.
भाजपा की दोहरी चाल
भाजपा भले ही अधिकांश मुसलमानों की पसंद की पार्टी नहीं है, फिर भी उसने कुल मुस्लिम वोटों का सात फीसद हिस्सा हासिल कर लिया. यह आंकड़ा 2014 में नौ फीसद से कम है लेकिन 2009 में चार फीसद से ज्यादा है. जैसा कि हिलाल अहमद बताते हैं, इस पार्टी ने अब दोहरी रणनीति अपनाई है, अपने मूल वोट आधार को बनाए रखने के लिए मुसलमानों को बदनाम करना और सामाजिक कल्याण योजनाओं और विकास के साथ मुस्लिम आबादी के कुछ वर्गों को लुभाना.
अहमद का कहना है, "खासकर उत्तरी राज्यों में तीन योजनाओं—प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और पीएम आवास योजना के जरिए मुसलमानों के बीच खासी पैठ बनाई गई है. यह मुस्लिम मतदाताओं के बीच भाजपा विरोधी मतदान को बेअसर करने की प्रक्रिया का हिस्सा है." भाजपा नेता इस रणनीति के जरिए मुसलमानों के बीच अपना वोट शेयर 15 फीसद से ज्यादा बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसे अधिकांश विशेषज्ञ लगभग असंभव लक्ष्य मान रहे हैं.
भगवा पार्टी इस समुदाय के भीतर शिया, सुन्नी, सूफी, देवबंदी जैसे सांप्रदायिक विभाजनों का भी फायदा उठाना चाहती है. वैसे, सबसे बड़ी पहुंच सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के बीच बनाने की कोशिश की जा रही है, जिन्हें सामूहिक रूप से पसमांदा के रूप में जाना जाता है और जो कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 57 फीसद हैं. प्रधानमंत्री ने 2022 में हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान कार्यकर्ताओं से पसमांदा मुसलमानों तक पहुंच बनाने का आग्रह किया था.
तब से पार्टी ने पसमांदा लोगों के साथ जुड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं. मिसाल के तौर पर, उसने केरल के मलप्पुरम लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से एम. अब्दुल सलाम को मैदान में उतारा है, जो 2024 में पार्टी के एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार हैं और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर तारिक मंसूर को चुनाव घोषणापत्र समिति में नामित किया और दिल्ली तथा यूपी के नगर निगम चुनावों में कई पसमांदा मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा.
इसके अलावा, पार्टी ने मुसलमानों से जुड़ने और सीएए तथा एनआरसी जैसे विवादास्पद मुद्दों के बारे में उनके डर को कम करने के लिए 'संवाद', 'स्नेह यात्रा', 'कौमी चौपाल', 'शुक्रिया मोदी भाईजान' जैसे कई आउटरीच कार्यक्रम शुरू किए हैं. शिक्षकों, उद्यमियों, मौलवियों और सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों सहित 25,000 से अधिक मुसलमानों को 'मोदी मित्र' के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, जिनका काम यह प्रचार करना है कि भाजपा सरकार के सामाजिक-आर्थिक उपायों से मुसलमानों को भी कैसे फायदा हो रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि 2024 में पसमांदा मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न तथाकथित मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द भविष्य का नैरेटिव तय करेगा. अली इसी साल प्रकाशित शोधपत्र में लिखते हैं, "अगर भाजपा पसमांदा मुसलमानों के बीच अपनी पहुंच बनाने में थोड़ी भी कामयाब हुई तो शोधकर्ताओं को मुस्लिम वोटिंग ब्लॉक के विचार को छोड़कर उप-पहचान कैसे और कब मुस्लिम वोटिंग व्यवहार को आकार देती है, इसकी व्यापक, सूक्ष्म समझ को आगे बढ़ाने की जरूरत हो सकती है."
वैसे, हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए भाजपा के तीखे सांप्रदायिक अभियान जिसमें मुस्लिम खलनायक है के मद्देनजर इस समुदाय में अंदेशा मौजूद है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि पसमांदा लोगों के भी भाजपा के झांसे में आने की संभावना नहीं है. इंजीनियर कहते हैं, "पसमांदा आरक्षण चाहते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ने आरक्षण में पसमांदा या किसी भी मुस्लिम को शामिल करने की संभावना से साफ इनकार कर दिया है."
मुस्लिम नेताओं की कमी
आजादी के बाद से भारतीय मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर कांग्रेस, सपा, बसपा (बहुजन समाज पार्टी), टीएमसी और राजद जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का समर्थन किया है. हालांकि इन दलों ने मुस्लिम हितों की रक्षा की बात की है, लेकिन वे उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने से हिचकते रहे हैं. आबादी में मुसलमानों के हिस्से के आधार पर लोकसभा में उनके सांसदों की आदर्श संख्या 76 होनी चाहिए. 1952-1977 के कांग्रेस-प्रभुत्व वाले वर्षों में संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व 2-7 फीसद था. 1980 में यह उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. तब 49 मुस्लिम निर्वाचित सांसदों के साथ यह 10 फीसद तक पहुंच गया. लेकिन उसके बाद से यह संख्या घटती जा रही है.
भाजपा 2014 में एक भी मुस्लिम सांसद के बिना साधारण बहुमत वाली पहली पार्टी बन गई. 2019 में 30 राज्यों और छह केंद्रशासित प्रदेशों में से 21 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया. 17वीं लोकसभा में 28 मुस्लिम लोकसभा सांसदों में से 24 सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले सात राज्यों (जम्मू-कश्मीर सहित, जो उस समय एक राज्य था) से आए. असल में यह रुझान आजादी के बाद से ही जारी है, अब तक चुने गए सभी मुस्लिम सांसदों में से आधे से ज्यादा 29 मुस्लिम बहुल सीटों से जीतते हैं.
वैसे, हाल के वर्षों में मुसलमानों के बीच केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व की स्थिति को बदलने की मांग बढ़ रही है. कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद कहती हैं, "राजनैतिक दलों को मुस्लिम वोटों को सिर्फ इसलिए हल्के में नहीं लेना चाहिए कि वे मोदी के खिलाफ वोट कर सकते हैं. मुसलमानों को प्रभावित करने वाले सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ध्यान देने के अलावा, संगठनात्मक सेट-अप और टिकट वितरण में उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ना चाहिए. राजनैतिक दलों को शिक्षित, प्रगतिशील मुसलमानों को बढ़ावा देना चाहिए जो बदलाव ला सकते हैं, न कि कट्टरपंथी तत्वों को."
इसके लिए कांग्रेस पहले अपने यहां सुधार ला सकती है. कांग्रेस कार्य समिति के 77 सदस्यों (स्थायी और विशेष आमंत्रित सदस्यों सहित) में से केवल पांच मुस्लिम हैं और सिर्फ एक किसी विधायी निकाय का सदस्य है.
कांग्रेस पर भरोसे की कमी और उसके बाद क्षेत्रीय धर्मनिरपेक्ष दलों की नाकामी की वजह से एआईएमआईएम (ऑल-इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) और एआईयूडीएफ जैसी कई मुस्लिम-केंद्रित पार्टियों का उदय और विकास हुआ है.
अलबत्ता, ये पार्टियां अक्सर खास इलाके तक सीमित रही हैं. गौरतलब है कि कैसे 1948 में स्थापित इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) काफी हद तक केरल की पार्टी बनी हुई है. लेकिन दूसरी पार्टियों के उलट उनके वजूद ने मुस्लिम वोटों को और अधिक खंडित कर दिया है; अधिकांश गैर-भाजपा दलों का आरोप है कि उन्होंने भाजपा की मदद ही की है.
मिसाल के तौर पर, एआईएमआईएम ने यूपी में बसपा के साथ साझेदारी की है और कई मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. उनके उम्मीदवारों के इंडिया ब्लॉक के वोटों में सेंध लगाने की सबसे अधिक संभावना है, जिससे परोक्ष रूप से भाजपा को बढ़त मिलेगी. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती ने 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. इनमें से केवल पांच जीते और मुस्लिम वोट बसपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच विभाजित हो गए और भाजपा 403 में से 313 सीटें जीत गई. इस बार यूपी में मायावती ने 23 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि सपा ने चार और कांग्रेस ने दो उम्मीदवार उतारे हैं.
समुदाय के नेताओं को उम्मीद है कि आम मुस्लिम मतदाता खंडित राजनैतिक संबद्धता से ऊपर उठेंगे और एकजुट होकर मतदान करेंगे. असम में यही अपेक्षित है, जहां चुनाव पर्यवेक्षकों का कहना है कि 34 फीसद मुसलमानों ने इस बार रणनीतिक रूप से कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट दिया है ताकि ग्रैंड ओल्ड पार्टी और एआईयूडीएफ के बीच वोटों के विभाजन से भाजपा को फायदा न हो, इस रुझान से नागांव और करीमगंज निर्वाचन क्षेत्रों में नतीजे तय होंगे.
मुसलमान खुद को न केवल महत्वपूर्ण चुनावी ताकत वाले एक धार्मिक समूह के रूप में बल्कि सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक उत्थान की फौरी जरूरत वाले जनसंख्या समूह के रूप में देखा जाना चाहते हैं. इस चुनाव में सांप्रदायिक नैरेटिव ने वजूद के खतरे की उनकी आशंका को खारिज या कम करने के लिए कुछ नहीं किया है, लेकिन किसी को भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी सार्थक भागीदारी के लिए इस आम चुनाव से परे देखना होगा.
—साथ में प्रशांत श्रीवास्तव, अर्कमय दत्ता मजूमदार और मोअज्जम मोहम्मद.

