scorecardresearch

लोकसभा चुनाव 2024: क्या है महिला मतदाताओं की मांग?

राजनैतिक दल महिलाओं के लिए उनकी लैंगिक भूमिकाओं पर आधारित योजनाएं लाते हैं और वादे करते हैं. मगर देशभर की महिलाओं ने इंडिया टुडे को बताया कि असल में वे किन चीजों की उम्मीद करती हैं

मानसी चौधरी,अदिति चौधरी और मोहिनी देवी
मानसी चौधरी,अदिति चौधरी और मोहिनी देवी
अपडेटेड 21 मई , 2024

तीन पीढ़ियों का नजरिया

— रोहित परिहार

अप्रैल की 19 तारीख को 18 वर्षीया मानसी ने पहली बार मतदान किया. उनका परिवार भाजपा और कांग्रेस के समर्थन को लेकर बंटा हुआ है. ऐसे में प्रथम वर्ष की छात्रा मानसी ने अपनी पसंद खुद तय करने का फैसला किया. मगर जिस पार्टी को मानसी वोट देना चाहती थी, उसका उम्मीदवार उसे सही नहीं लगा और एक पल के लिए तो उसने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर नोटा दबाने पर विचार किया. आखिरकार उसने क्या किया, उसका खुलासा उसने नहीं किया. 

मानसी की मां अदिति महज 15 साल की थीं और 10वीं कक्षा में पढ़ती थीं, जब उनकी शादी सीकर के त्रिलोकपुरा गांव में कर दी गई. 12वीं कक्षा पूरी करने के बाद वे अपने पति के पास जयपुर आ गईं और अपना ग्रेजुएशन पूरा किया, राजनीतिशास्त्र में स्नातकोत्तर, पत्रकारिता में डिग्री तथा वित्त और बैंकिंग में पीजी डिप्लोमा पूरा किया. अदिति अब ट्रेडमार्क और सोसाइटी पंजीकरण के लिए परामर्श एवं सेवाएं प्रदान करने वाली एक फर्म चलाती हैं. वे सांप्रदायिक विभाजन के सख्त खिलाफ हैं और उनका मानना है कि किसी भी पार्टी ने महिलाओं के लिए कोई भी प्रभावी काम नहीं किया है. उनका कहना है कि उनका वोट उस पार्टी को जाएगा जो सभी को विकास और सद्भाव के साथ रहने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करेगी.

मानसी की दादी मोहिनी अभी भी त्रिलोकपुरा में आठ परिवारों की ढाणी में रहती हैं. अधिकतर परिवार जिसे वोट देता है, मोहिनी का वोट भी उसे ही जाता है. मगर वे कुछ चीजों की मांग करती हैं: उनके घर तक जाने वाली सड़क को ठीक करना और पानी की कमी को दूर करना. वे कहती हैं, "जब हम उन्हें वोट देते हैं तो उन्हें ये बुनियादी सुविधाएं प्रदान करनी होगी. वैसे, अंतत: यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरपंच क्या चाहता है."

मेरा वोट स्त्री सशक्तीकरण को

— जीमॉन जैकब

अनुश्री विष्णु, 30 वर्ष, सीए छात्रा, पार्ट टाइम अकाउंटेंट

रिहाइश और संसदीय क्षेत्र: तिरुवनंतपुरम, केरल

मुद्दे जिन पर उनके वोट का फैसला होगा: राजनैतिक दलों का महिलाओं के साथ व्यवहार; और उम्मीदवार का पिछला रिकॉर्ड

सरकार से मांग: महिलाओं के लिए अधिक रोजगार, महिला सुरक्षा पक्की की जाए, लैंगिक भेदभाव में कमी आए

अनुश्री उस राज्य की हैं जहां महिला साक्षरता की दर सबसे ज्यादा है, इसलिए स्वाभाविक है कि वह भारत भर में लड़कियों की शिक्षा पर जोर दे. वे कहती हैं, "सभी सरकारों को कम से कम 12वीं कक्षा तक तो लड़कियों की पढ़ाई पक्की करने को प्राथमिकता देनी चाहिए. जो गरीब परिवारों की हैं, उनको उच्च शिक्षा के लिए विशेष छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए." 

उनका सुझाव है कि सरकार को इसके लिए जेंडर बजटिंग करनी चाहिए. यानी महिलाओं और पुरुषों के बीच बराबरी के लिए एक रणनीति बने जिसमें इस पर फोकस किया जाए कि संसाधन कैसे जुटाएं और खर्च किए जाएं. और महिलाओं के लिए आवंटन दोगुना किया जाना चाहिए.

अनुश्री कहती हैं, "सिर्फ तालीम के जरिए महिला सशक्तीकरण वास्तविकता बन सकता है. हमें घर, कामकाज की जगहों और सार्वजनिक स्थानों पर ज्यादा स्वतंत्रता की जरूरत है." अनुश्री के लिए अहम चिंता महिला सुरक्षा है. वे मानती हैं कि अकेले सफर करना या कहीं आना-जाना, खास तौर पर देर शाम के समय, लगातार मुश्किल होता जा रहा है. 

महंगाई की डायन

— अमिताभ श्रीवास्तव

रीना कुमारी, 45 वर्ष, पूर्व ग्राम मुखिया

रिहाइश: लोहागीर गांव, समस्तीपुर

संसदीय क्षेत्र: उजियारपुर, बिहार

मुद्दे जिन पर उनके वोट का फैसला होगा: महंगाई, बेरोजगारी, खेती की बढ़ती लागत और घटती बचत

सरकार से मांग: रोजगार पैदा किए जाएं, महंगाई कम की जाए, धार्मिक सद्भाव पक्का किया जाए

रीना कुमारी आठवीं पास हैं. वे 10 साल तक (2006-16) अपने गांव की मुखिया रहीं. उनका परिवार वित्तीय रूप से बेहतर स्थिति में है. पति उमेश राय एक किसान हैं और सफल डेरी कारोबार चलाते हैं. फिर भी रीना इससे सहमत हैं कि बढ़ती महंगाई ने उनके समेत हरेक परिवार के लिए नई चुनौतियां पैदा की हैं. महिला के रूप में उन्हें सीमित बजट में खर्च का प्रबंध करने और जरूरत के लिए पैसा बचाने में खासतौर पर काफी मुश्किल होती है.

तीन बच्चों की मां रीना की सबसे बड़ी लड़की विवाहित है. वे खासतौर पर अपने दो बेटों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. 23 साल का बड़ा बेटा अपने पिता के डेरी कारोबार में मदद करता है जबकि 19 वर्षीय छोटा बेटा पढ़ाई कर रहा है. वे चाहती हैं कि दोनों बेटे सरकारी नौकरी करें. रीना के ही शब्दों में, "आप देख सकते हैं कि शिक्षित युवा भटक रहे हैं क्योंकि उनके पास रोजगार के अवसरों की कमी है."

जब मतदान की बात आती है तो रीना जोर देकर कहती हैं कि उनका पूरा परिवार मिल-बैठकर उपलब्ध विकल्पों पर विचार करता है और सब मिलकर उम्मीदवार का फैसला करते हैं. जिस राज्य में वोट के फैसले में जाति अहम भूमिका निभाती हो, वहां वे अपनी यादव जाति पर जोर देकर कहती हैं कि उनके मामले में "जाति निर्णायक तत्व नहीं है."

एक विधवा की पीड़ा 

—धवल एस. कुलकर्णी

लता गणेश सूर्यवंशी, 58 वर्ष, पुणे, घर से सिलाई का काम

संसदीय क्षेत्र: पुणे

मुद्दा जो उनके वोट का फैसला करेगा: महंगाई 

सरकार से मांग: महंगाई घटाई जाए, रसोई गैस की कीमतें और बिजली सस्ती हो, विधवा जैसे समाज के कमजोर तबकों को मदद मिले

लता गणेश सूर्यवंशी, 58 साल, पुणे
लता गणेश सूर्यवंशी, 58 साल, पुणे

सूर्यवंशी के पति का निधन हुए करीब 18 साल हो गए हैं और सिर्फ दसवीं तक पढ़ी संतानहीन यह महिला गुजारे के लिए घर से ही सिलाई का काम करती हैं. वे कहती हैं, "रसोई गैस सिलिंडर बहुत महंगा हो गया है, मैं उसका इस्तेमाल नहीं कर सकती, हालांकि मैं उसका बोझ भी नहीं उठा सकती. रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ रहे हैं और महंगी बिजली तथा जीएसटी आम आदमी को चुभ रहे हैं. दुर्भाग्य से, मेरे पास किसी की मदद नहीं है जिस पर मैं भरोसा कर सकूं." 

सूर्यवंशी कहती हैं कि उनका वोट कांग्रेस को जाएगा क्योंकि उनको लगता है कि वह इन मुद्दों को ठीक कर सकती है. वे कहती हैं, "मैं अयोध्या में राम मंदिर जाना चाहती हूं और काशी भी जाना चाहती हूं. लेकिन राम मंदिर और अनुच्छेद 370 हटाने (जिससे जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ था) जैसे मुद्दे मेरे लिए कारण नहीं कि मैं भाजपा को वोट दूं. मैंने 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी को वोट दिया था पर इस बार बढ़ती महंगाई के कारण इस बार ऐसा नहीं करूंगी."

रोजी-रोटी की फिक्र

—धवल एस. कुलकर्णी

उल्का खरात, 58 वर्ष, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता

रिहाइश: लासुर्णे, जिला पुणे, महाराष्ट्र

निर्वाचन क्षेत्र: बारामती

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: महंगाई, एलपीजी की ऊंची कीमत

सरकार से मांग: महंगाई कम करे, युवाओं के लिए रोजगार सुनिश्चित करे

उल्का खरात विधवा हैं और अपने भाई के साथ पुणे के इंदापुर तालुका के लासुर्णे में रहती हैं. उनके लिए राम मंदिर सरीखे भावनात्मक मुद्दों के मुकाबले महंगाई ज्यादा मायने रखती है. वे शिकायत करती हैं, "एलपीजी सिलेंडर बहुत महंगे हो गए हैं. जब गरीब अपना गुजारा नहीं कर पाएंगे तो वे क्या करेंगे? श्रमिक वर्ग और दिहाड़ी मजदूरों की हालत बहुत खराब है."

खरात ने पहले केवल कक्षा आठ तक की पढ़ाई की थी, मगर फिर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और 50 साल की उम्र में बीए की डिग्री हासिल की. मगर उन्हें अफसोस है कि युवाओं के लिए नौकरी का परिदृश्य बहुत खराब है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता खरात का कहना है कि शिशु देखभाल योजना के कर्मचारियों को बेहतर पारिश्रमिक मिलना चाहिए. उनका कहना है कि उनका पूरा परिवार एक साथ बातचीत करेगा और फिर फैसला लेगा कि वे किसको वोट देंगे.

मुद्दों की बात हो

—आनंद चौधरी

मीठी व चंपा 23 वर्ष 

रिहाइश: खरुआड़ा, सिरोही, राजस्थान 

संसदीय क्षेत्र: जालोर-सिरोही, राजस्थान 

मुद्दे जिन पर उन्होंने वोट दिया: आदिवासियों पर अत्याचार, आरक्षण, महंगाई व बेरोजगारी 

सरकार से मांग: आदिवासियों को वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) और पेसा अधिनियम के तहत वन संसाधनों का हक मिले. गांव में सड़क, पानी व स्थानीय स्तर पर रोजगार मिले

मीठी कुमारी और चंपा देवी माउंट आबू की तलहटी में बसे सिरोही जिले की रेवदर तहसील के खरुआड़ा गांव की गरासिया आदिवासी युवतियां है. गांव में सबसे पहले 12वीं पास करने वाली मीठी और एक भी दिन स्कूल नहीं जाने वाली चंपा पक्की सहेली हैं. इनके गांव में न स्कूल है न अस्पताल. वोट देने के लिए भी दोनों को चार किमी दूर पैदल चलकर अनादरा गांव जाना पड़ा. 

मीठी पढ़ना चाहती थी, लेकिन कॉलेज गांव से दूर था. मीठी चाहती हैं कि उनकी पंचायत में ही कॉलेज खुल जाए. मीठी की सहेली चंपा की शादी कम उम्र में ही हो गई थी जिसके दुष्परिणाम वह देख चुकी है. मीठी सवाल करती है, "राजनैतिक दल हिंदू-मुसलमान और जात-पांत के नाम पर इतना शोर करते हैं, वे कभी बाल विवाह, शिक्षा, अस्पताल जैसे मुद्दों की बात क्यों नहीं करते."

अपने दिमाग से

—अजय सुकुमारन 

एस. चंद्रकला, 47 वर्ष, दुकान मालिक

रिहाइश: मैसूरू, कर्नाटक

निर्वाचन क्षेत्र: मैसूरू-कोडगु

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: महिलाओं के लिए ऋण की उपलब्धता सरीखी नीतियां, अच्छा कामकाज करने वाला उम्मीदवार

सरकार से मांग: स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के लिए योजनाएं

एस. चंद्रकला, 47 साल, दुकान मालिक
एस. चंद्रकला, 47 साल, दुकान मालिक

छह साल पहले खुद की छोटी-सी दुकान खोलने से पहले एस. चंद्रकला ने 25 साल तक बैग बनाने की फैक्ट्री में काम किया था. अपने भविष्य निधि के पैसे और बचत से चंद्रकला ने दो सिलाई मशीनें खरीदीं. वे स्कूल बैग, रेनकोट, गाड़ियों के कवर बनाती हैं और उनकी मरम्मत भी करती हैं. आत्मनिर्भरता उनका मूल मंत्र है. वे कहती हैं, "आजीविका के लिए हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए." वे उसी स्वतंत्र भाव से वोट भी डालती हैं.

चंद्रकला ने पति को जल्दी खो दिया था और मां के साथ रहती हैं. उनकी मां राज्य की कांग्रेस सरकार की परिवार की महिला मुखियाओं के लिए 2,000 रुपए मासिक भत्ता और मुफ्त खाद्यान्न योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं की लाभार्थी हैं. सिद्धारमैया की अगुआई वाली सरकार की ओर से महिलाओं के लिए बस यात्रा मुफ्त करने से चंद्रकला को यात्रा पर हर माह तकरीबन 600 रुपए की बचत होती है. हालांकि, उन्हें लगता है कि स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सरीखी आवश्यक मामलों पर केंद्रित योजनाएं ज्यादा उपयोगी हो सकती हैं.

नौकरियां कहां हैं?

—मनीषा सरूप

सुनीता कुमारी, 27 वर्ष, एमए (हिंदी)

रिहाइश: आगरा

निर्वाचन क्षेत्र: आगरा

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: सुरक्षा, विकास

सरकार से मांग: दलितों के लिए नौकरियां, आर्थिक स्थिरता

सुनीता शहर के मंटोला इलाके में दो कमरों वाले घर में संयुक्त परिवार में रहती है. घर के आसपास जूते बनाने वाली कई इकाइयां हैं. उन्होंने 2017 में यूपी पुलिस एसआई (सब-इंस्पेक्टर) परीक्षा के लिए आवेदन किया था लेकिन पेपर लीक होने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई. अभी तक नौकरी का इंतजार कर रहीं सुनीता चाहती हैं कि सरकार कुछ करे ताकि दलितों को अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिल सके. वे कहती हैं कि शिक्षा हासिल करना बहुत खर्चीला है और इसकी गुणवत्ता निम्न-मानक वाली ही है.

सुनीता ने जब कहा कि जरूरी चीजों पर महंगाई की मार ने त्रस्त कर रखा है तो साथ मौजूद परिवार ने भी सहमति में सिर हिलाया. वे कहती हैं, "मुफ्त राशन ठीक है लेकिन जब परिवार इतना बड़ा तो उसके गुजारे का जिम्मा आप अकेले नहीं उठा सकते." यह पूछने पर क्या अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करेंगी या कोई उनके वोट को प्रभावित करेगा? सुनीता ईमानदारी से कहती हैं, "परिवार में दूसरे लोग क्या करेंगे, उसी के हिसाब से फैसला लेंगी."

सहानुभूति के स्वर

—सोनाली आचार्जी

सौमिली सेन, 30 वर्ष, ब्रान्ड मार्केटिंग

रिहाइश: सीआर पार्क, दिल्ली

निर्वाचन क्षेत्र: दक्षिण दिल्ली

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: शिक्षा और स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर; स्थानीय समुदायों के लिए क्या वादे किए गए हैं, खासकर कमजोर तबकों के लिए

सरकार से मांग: रोजगार सृजन को बढ़ावा दें, उभरते क्षेत्रों में निवेश, बाजार की मांग के अनुसार वोकेशनल ट्रेनिंग को बढ़ाएं

वर्तमान चुनाव के लिए इस युवा पेशेवर का नजरिया इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने और मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए क्या काम किए हैं. वे इस बात को भी अहमियत देती हैं कि राजनैतिक दल स्थानीय समुदायों, खासकर कमजोर तबकों के लिए क्या पेश करते हैं.

सौमिली कहती हैं, "मैं टिकाऊ पर्यावरण के प्रति उम्मीदवारों की प्रतिबद्धता, आर्थिक विकास को लेकर उनकी नीतियों और जन सुरक्षा में सुधार के लिए उनकी योजना के आधार पर भी उनका मूल्यांकन करती हूं." जहां तक सुधारों की बात है, नई कर व्यवस्था उन्हें रास नहीं आई है. 

सौमिली का तर्क है, "हालांकि इसका मकसद प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना और करदाताओं की स्वायत्तता को बढ़ाना था. मगर वह बदलाव कई चुनौतियों और अनिश्चतताओं से भरा हुआ है." कई अन्य लोगों की तरह, वे भी बेरोजगारी की उच्च दर से निराश हैं. उनका मानना है कि इस चुनौती से निबटना भारत के आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम है.

मत देने में दुविधा

—जुमाना शाह

विलासबेन वाघेला,  50 वर्ष, गृहिणी

रिहाइश: रानदेसन गांव, गांधीनगर, गुजरात

निर्वाचन क्षेत्र: अहमदाबाद पूर्व

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: महिला सुरक्षा, विकास, गुजरात में चल रहा क्षत्रिय विरोध-प्रदर्शन

विलासबेन वाघेला, 50 साल, गृहिणी
विलासबेन वाघेला, 50 साल, गृहिणी

एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली विलासबेन एक पूर्व सरपंच की पत्नी हैं, जो तालुका स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पदाधिकारी भी हैं. हालांकि, उनकी निष्ठा साफ तौर पर भगवा पार्टी के साथ है, मगर इस बार वे भाजपा को वोट देने को लेकर दुविधा में हैं. इसका कारण केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला के पूर्व रियासतों के खिलाफ विवादास्पद बयान के बाद गुजरात में चल रहा क्षत्रिय आंदोलन है. 

उनके घर के बाहर भगवा राम की तस्वीर वाला भगवा झंडा लहरा रहा है, फिर भी विलासबेन इस बात पर जोर देती हैं कि राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने सरीखे हिंदुत्व के प्रमुख मुद्दों ने कभी भी उनके वोट को प्रभावित नहीं किया है. वे कहती हैं, "गुजरात में महिलाएं सुरक्षित हैं. हम अकेले बाहर जा सकते हैं, काम कर सकते हैं. यह मेरे लिए अहम बात है."

वे कहती हैं कि हाल के वर्षों में उनके गांव में अभूतपूर्व विकास हुआ है. दो बेटों की मां विलासबेन का कहना है कि पक्की सड़कों के निर्माण और शहरी केंद्रों तक संपर्क से उन्हें अच्छी शिक्षा और काम के अवसर हासिल करने में मदद मिली है. वे बताती हैं कि इन्हीं कारणों से उनका परिवार इतने वर्षों से भाजपा का समर्थन कर रहा है.

अपनी-अपनी अलग आवाज

—अर्कमय दत्ता मजूमदार

मेहरुन्निसा खातून, 32 वर्ष, सुपरवाइजर, स्वयं सहायता समूह

रिहाइश: दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल

निर्वाचन क्षेत्र: जादवपुर

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: रोजगार के अवसर, इसको लेकर उनके परिवार में आम सहमति है

सरकार से मांग: मतदान के लिए सुरक्षित माहौल, महंगाई पर नियंत्रण

--------

मफूजा बीबी, 26 वर्ष, सदस्य, स्वयं सहायता समूह

रिहाइश: दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल

निर्वाचन क्षेत्र: जादवपुर

किन मुद्दों पर अपना वोट देंगी: महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं, मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा, वोट अंतत: उनके पति की राय पर निर्भर करेगा

सरकार से मांग: महंगाई को रोके, नौकरी के बेहतर अवसर प्रदान करे

मेहरुन्निसा 250 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की सुपरवाइजर के तौर पर काम करती हैं जो भांगर-II ब्लॉक के पोलेरहाट ग्राम पंचायत में संचालित होते हैं. मफूजा ऐसी ही एक स्वयं सहायता समूह की सदस्य है. आर्थिक आजादी हासिल करने की उनकी कोशिशों के बावजूद, अन्य चीजों के अलावा, मतदान के लिए उनके विकल्प भी उनके शौहरों की ओर से तय होते हैं. 

हालांकि ये दोनों मुस्लिम महिलाएं एक-दूसरे से काफी विपरीत नजरिया रखती हैं. सियासी हिंसा की घटनाओं की ओर इशारा करते हुए, मेहरुन्निसा का मानना है कि भांगर के लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने को लेकर बहुत कम स्वतंत्रता है. उन्होंने मौजूदा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार पर कुशासन का आरोप लगाया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है. 

मगर मफूजा के मुताबिक, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई वाली टीएमसी सरकार की लक्ष्मी भंडार के तहत सहायता राशि के प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण सरीखी महिला केंद्रित योजनाओं ने उनकी जिंदगी को सुधारा है. वहीं, जहां तक नई सरकार से उनकी मांग की बात है, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि उसे महंगाई पर अंकुश लगाना चाहिए.

Advertisement
Advertisement