
यह बेहद छोटा-सा आंकड़ा, महज 0.16 फीसद, देखने में बहुत मामूली लग सकता है लेकिन 2019 के आम चुनाव की इसने एक नई इबारत लिख डाली थी. उस वर्ष देश के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब मतदान में हिस्सेदारी के मामले में महिलाओं (67.18 फीसद) ने पुरुषों (67.02 फीसद) को पीछे छोड़ दिया. स्त्री-पुरुष अंतर में उलटफेर की इस मौन क्रांति के साथ भारतीय महिलाओं ने देश के सियासी परिदृश्य में एक खास दर्जा हासिल कर लिया.
तबसे उन्हें मिल रही अहमियत का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, पंजीकृत महिला मतदाताओं की संख्या 7.5 फीसद बढ़कर 2019 में 43.8 करोड़ के मुकाबले अब 47.1 करोड़ हो गई है, जो पुरुषों के मुकाबले पांच फीसद अधिक है. वहीं, 85 लाख महिलाएं ऐसी हैं जो 2024 के चुनाव में पहली बार वोट डाल सकेंगी. मतदाताओं का अनुपात भी 2019 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 926 महिलाओं से बढ़कर इस बार 948 हो गया है.
12 राज्य ऐसे हैं, जहां महिला मतदाताओं का अनुपात या तो पुरुष से ज्यादा है या फिर बराबर है, जबकि 2019 में यह आंकड़ा आठ था. देशभर में शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां महिलाओं ने अपने वोट की ताकत का एहसास न कराया हो. न केवल विधानसभा चुनावों में महिला मतदाताओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है, बल्कि प्रतिष्ठित सर्वेक्षण एजेंसी एक्सिस-माई इंडिया का विश्लेषण तो बताता है कि 2014 और 2019 के चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सियासी दबदबा बढ़ाने में उनकी अहम भूमिका रही. दरअसल, महिला मतदाता सत्ताधारी दल के लिए रीढ़ की तरह बन गई हैं. एजेंसी ने पाया कि 2019 में 44 फीसद पुरुषों की तुलना में 46 फीसद महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया.
राजनैतिक दल चाहे राष्ट्रीय हों या क्षेत्रीय सभी महिलाओं की स्थिति सुधारने के कार्यक्रमों पर खास फोकस कर रहे हैं, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उनके वोटों की कितनी अहमियत है. दिसंबर 2023 में मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कानून की राह बनाते हुए संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित किया, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए भी सीटें सुरक्षित करने का प्रावधान है.
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, मोदी सरकार की विभिन्न योजनाओं में महिलाओं को पहले से अहम हिस्सेदारी हासिल है—प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई) में 27 फीसद, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) में 37 फीसद, अटल पेंशन योजना (एपीवाई) में 44 फीसद, मुद्रा ऋण में 68 फीसद और स्टैंड-अप इंडिया में 81 फीसद.
मौजूदा आम चुनाव में दोनों राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस के बीच महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए गारंटी पर गारंटी की होड़ लगी है. कांग्रेस अधिकार-आधारित अभियान के बलबूते पिछले साल कर्नाटक और तेलंगाना में मिली चुनावी सफलता के मद्देनजर इस मामले में कुछ ज्यादा गंभीरता से ध्यान दे रही है. अपने 2024 के चुनाव घोषणा-पत्र में पार्टी ने महिला न्याय पर खास जोर दिया है, जिसमें महिलाओं को नकद प्रोत्साहन देने और भर्ती के समान अवसर मुहैया कराने का वादा किया गया है.
इसमें गरीब महिलाओं के बैंक खातों में एक लाख रुपए वार्षिक नकद हस्तांतरण और सरकारी नौकरियों में 50 फीसद आरक्षण शामिल है. भाजपा भी कहां पीछे रहने वाली थी, उसने अपने संकल्प-पत्र में 'मोदी की गारंटी' का एक खंड शामिल किया है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए तीन करोड़ लखपति दीदी बनाने की बड़ी योजना शामिल है.
महिला क्रांति
आखिर, इस नई क्रांति के पीछे कारण क्या है और देश के चुनाव नतीजों पर इसका कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा? भारत में महिलाओं को मताधिकार आजादी के बाद ही मिल गया था, जब देश ने सार्वभौमिक मताधिकार का विकल्प चुना (पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था). लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि उन्होंने सही मायने में अपने वोट की ताकत को पिछले एक दशक के दौरान ही पहचाना. कोलकाता में आइटी सलाहकार 31 वर्षीया सुकन्या गांगुली मानो पूरे महिला समुदाय की आवाज मुखर करती हैं और कहती हैं, "अगर मैं चाहती हूं कि देश महिलाओं के रहने के लिहाज से एक बेहतर, अधिक समानतापूर्ण और न्यायपरक स्थान हो तो मुझे वोट देना चाहिए."
लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की शोधकर्ता विभा अत्री का मानना है कि महिलाओं ने अब इस बात पर पुख्ता भरोसा करना शुरू कर दिया है कि उनका वोट बहुत ताकतवर है. 69 फीसद का मानना है कि देश में चीजें कैसे चलेंगी, इसमें उनके वोट से काफी फर्क पड़ता है. आयरलैंड में बसी पॉलिटिकल साइंटिस्ट वसुंधरा श्रीनेत कहती हैं, ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए "आधार कार्ड की तरह मतदाता पहचान-पत्र शासन तक पहुंच का एक और साधन बन गया है. इसका एक उद्देश्य भी है—जाकर वोट देना."

जागरूकता कई वजहों से आई है. पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में स्थानीय स्वशासी संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी ने महिला समूहों के लिए चुनावी भागीदारी की संभावनाओं की एक खिड़की खोली. फिर, आत्म-सशक्तीकरण की थीसिस को भी काफी अहम माना जाता है, जिसके मुताबिक बढ़ती साक्षरता, वित्तीय सशक्तीकरण के उपायों और सूचना उपलब्धता ने महिलाओं में जागरूकता के साथ ही उनकी भागीदारी को भी बढ़ावा दिया.
विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, महिला साक्षरता का स्तर 1981 में 26 फीसद से बढ़कर 2022 में 69 फीसद हो गया है, भले ही यह आंकड़ा सभी राज्यों में समान नहीं है. सावधि श्रम बल सर्वेक्षण की सालाना रिपोर्ट 2022-23 के मुताबिक, श्रमबल में महिला हिस्सेदारी (15-66 वर्ष आयु वर्ग की कामकाजी या काम तलाश रही महिलाएं) फिलहाल 37 फीसद ही है, लेकिन स्व-सहायता समूह क्रांति से देश भर में उनकी आर्थिक ताकत बढ़ी है. भले ही तादाद थोड़ी हो, मगर मोबाइल और इंटरनेट की पहुंच महिलाओं में बढ़ी है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण या एनएफएचएस-5 के मुताबिक, देश की 54 फीसद स्त्रियों के पास मोबाइल है और 33 फीसद इंटरनेट का इस्तेमाल करती हैं.
अमेरिका स्थित नोट्रे डेम यूनिवर्सिटी में पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो रितिका कुमार का तर्क है कि साक्षरता की कमी सामाजिक-आर्थिक या राजनैतिक मुद्दों पर महिलाओं की जागरूकता को प्रभावित नहीं करती और न ही उन्हें वोट देने से रोकती है. इसके बजाए, वे चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने का श्रेय काफी हद तक भारतीय निर्वाचन आयोग के (ईसीआइ) के प्रयासों को देती हैं, जिसने महिला मतदान बढ़ाने और स्त्री-पुरुष अंतर घटाने के लिए स्वीप यानी व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और चुनावी भागीदारी कार्यक्रम को बढ़ावा दिया.
महिलाओं को बेझिझक और बिना किसी डर के वोट डालने के लिए पिंकबूथ जैसा सुरक्षित माहौल भी मिला, जिसमें चुनाव अधिकारी से लेकर सुरक्षाकर्मी तक महिलाएं ही होती हैं. नतीजा, 2014 के आम चुनाव में ही साफ दिखा, जब पंजीकृत महिला मतदाताओं की संख्या 16 फीसद बढ़ गई और पुरुष और महिला मतदान में अंतर सिर्फ 1.5 फीसद का रह गया. यही स्थिति 2019 में भी नजर आई जब महिलाएं न केवल पुरुषों से आगे निकल गईं, बल्कि स्त्री-पुरुष चुनावी अनुपात—प्रति 1,000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या—भी बढ़कर 926 पर पहुंच गया जो 1989 में 940 के बाद सबसे बेहतर स्थिति थी.
जैसा एसबीआई रिसर्च का अनुमान है, अभी भी 13 करोड़ (और 2019 के ईसीआई आंकड़ों के मुताबिक 14.7 करोड़) महिला मतदाता मतदान से दूर हैं. उन्हें अपना वोट डालने को प्रेरित किया जाए तो नतीजों में बहुत बड़ा बदलाव दिखाई दे सकता है. यह अप्रयुक्त महिला मतदाता आधार यूपी (2.75 करोड़), महाराष्ट्र (1.66 करोड़) और बिहार (1.44 करोड़) में सबसे अधिक है, और ये ऐसे राज्य हैं जो इस चुनाव में भाजपा की जीत के लिहाज से बेहद खास मायने रखते हैं. बिहार और महाराष्ट्र में भले महिला मतदाताओं की राय बंटी हुई हो लेकिन अधिक महिलाएं चुनाव में भाग लेने निकलें तो यूपी में भगवा पार्टी 2019 की अपनी 62 सीटों को बनाए रखने या उससे भी बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में आ सकती है.
सोच-समझकर मतदान
महिलाएं न केवल अपने पैरों पर चलकर वोट देने जा रही हैं, बल्कि यह सोचने में भी अपना दिमाग खपा रही हैं कि उन्हें किसे वोट देना चाहिए और किसे नहीं. लोकनीति-सीएसडीएस की तरफ से 2019 में महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन की मानें तो 33 फीसद महिलाओं के वोट देने के निर्णय को पुरुषों ने प्रभावित किया, लेकिन 59 फीसद ने फैसला अपने विवेक से लिया. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की फेलो फ्रांजिस्का रोशर के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि राशन कार्ड और मकान अपने नाम पर होने से महिलाओं ने स्वामित्व की भावना को महसूस करना शुरू कर दिया है.
और, जैसा सीएसडीएस के पूर्व निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "पुरुषों से प्रभावित हुए बिना अपनी सोच-समझ के आधार पर वोट डालना महिलाओं को एक अलग ही तरह की खुशी देता है, और उन्हें एहसास होता है कि वे परिवार पर बोझ नहीं हैं." मतदान गोपनीय होना भी आजादी की यह भावना बढ़ाने में मददगार है. रोशर के मुताबिक, और अगर वे एक परिवार के तौर पर वोट करती हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि यह "उन्हें एक ताकत का एहसास कराता है और राजनैतिक दलों से अपनी बातें मनवाने का हथियार साबित होता है."
वे यह भी कहती हैं कि महिलाएं, खास तौर पर युवा वर्ग अधिक तर्कसंगत ढंग से अपनी भागीदारी निभा रही हैं. उन्हें 20 वर्ष की होने से पहले ही मतदान का मौका मिल रहा है, जबकि उनकी मांओं ने पहली बार तब मतदान किया होगा जब वे उम्र के 40वें पड़ाव के आसपास रही होंगी.
महिला वोटों की बढ़ती अहमियत का अंदाजा होने के कारण ही विभिन्न राजनैतिक दलों ने देश की महिलाओं को अपनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभार्थी बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में अहम पहल भी की. बिहार में नीतीश कुमार और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने ही शायद सबसे पहले महिला वोट बैंक की असल ताकत को समझा और उन्हें अपनी राजनैतिक पूंजी बनाने पर ध्यान केंद्रित किया.
नीतीश ने जहां आठवीं कक्षा पास करने वाली छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए आर्थिक मदद दी और महिला मतदाताओं का दिल जीतने के लिए शराबबंदी लागू की, वहीं चौहान ने लाडली बहना को अपने अभियान का मुख्य आधार बनाया. और, इसकी वजह से भाजपा ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में शानदार सफलता हासिल की.
देश के पूर्वी हिस्से की बात करें तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकारों ने क्रमश: अपनी-अपनी प्रमुख योजनाओं कन्याश्री और मिशन शक्ति को सफलता के साथ लागू किया. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बीजू जनता दल (बीजद) ने इस चुनाव में सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवारों को भी मैदान में उतारा है.
टीएमसी ने 42 सीटों में 11 पर महिलाओं पर दांव लगाया है. बीजद ने कुल 21 सीटों में से सात पर महिलाओं को टिकट दिया है. महिला-केंद्रित चुनावी वादों का लाभ कांग्रेस को भी मिला है, जिसने गृह लक्ष्मी और महालक्ष्मी योजनाओं, महिलाओं को नकद प्रोत्साहन, मुफ्त यात्रा और भर्ती की गारंटी की बदौलत पिछले साल पहले कर्नाटक और फिर तेलंगाना में सत्ता हासिल की.
मोदी असर
लेकिन नरेंद्र मोदी और भाजपा से बेहतर किसी ने महिलाओं को ध्यान में रखकर कल्याणकारी योजनाएं नहीं बनाईं. महिला मतदाताओं के बीच अपनी अपील के एहसास से मोदी ने 2014 में केंद्र में सत्ता में आते ही उन्हें लुभाने के लिए करीने से काम शुरू किया. उन्होंने अपनी हर योजना के केंद्र में महिलाओं को रखा. इसलिए, जन धन खातों (जिनमें महिलाओं की हिस्सेदारी 55.9 प्रतिशत है) में सीधे नकदी हस्तांतरण के जरिए उनकी मदद की गई, मुद्रा ऋण से उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत किया गया. पीएम आवास योजना के तहत उनके नाम पर घर दिए गए, और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से पढ़ाई-लिखाई में मदद मिली. इस तरह नारी सशक्तीकरण की हवा बही और महिला आरक्षण विधेयक को भी यही नाम दिया गया.
बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के हर पैमाने के तहत मोदी की कोई न कोई योजना है. मसलन, महिलाओं की माली हालत में बैंक खातों के जरिए सुधार की जेएएम (जन धन, आधार, मोबाइल) तिकड़ी का इस्तेमाल, खाना पकाने के ईंधन के लिए उज्ज्वला, स्वच्छता के लिए स्वच्छ भारत, पीने का पानी के लिए जल जीवन मिशन, पोषण के लिए पोषण अभियान, मातृ स्वास्थ्य के लिए मातृ वंदना, वगैरह. सो, आश्चर्य नहीं कि नीति आयोग के एक अध्ययन पत्र के मुताबिक, देश में बहुआयामी गरीबी 2013-14 में 29.17 फीसद से घटकर 2022-23 में 11.28 फीसद हो गई. श्रीनेत कहती हैं, "बहुत सारी महिलाओं ने 2014 और 2019 में मोदी को वोट दिया, क्योंकि उनकी छवि आकर्षक मर्दाना की तरह पेश की गई."
एक दूसरे अध्ययन में भी महिला मतदाताओं पर मोदी के असर का अंदाजा लगता है. नोट्रे डेम यूनिवर्सिटी की रितिका कुमार ने ग्रामीण बिहार में अपने फील्डवर्क के दौरान पाया कि जो महिलाएं अपने मुखिया या मुख्यमंत्री (नीतीश कुमार) का नाम नहीं जानती थीं, वे मोदी का नाम ले रही थीं. उनके सर्वेक्षण में महिलाएं कहती हैं, "मोदी सरकार है" या मोदी भारत के मालिक हैं.
फरवरी 2024 में इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में, महिलाओं ने महामारी से निबटने में एनडीए सरकार के कामकाज को उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया, जिनमें 21.3 फीसद ने इसी के लिए वोट देने की बात बताई. यह आंकड़ा सरकार की कल्याणकारी योजनाओं या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को अहमियत देने वालों से अधिक है. इस बार 30 करोड़ से अधिक महिलाओं के मतदान करने की संभावना है और मोदी को इसी से उम्मीद है कि महिला लाभार्थी उन्हें केंद्र में लगातार तीसरा कार्यकाल सौंपने में मदद करेंगी.
लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में भाजपा की रणनीति और प्रबंधन कौशल भी अहम है. मोदी अफसाने गढ़ते हैं और भाजपा का काडर बाकी काम करता है. यह काडर अपने बूथ प्रबंधन कौशल से महिलाओं को बूथों तक पहुंचाता है. भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष वनथि श्रीनिवासन उस रणनीति की के बारे में बताती हैं कि बूथ स्तर पर आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की पहचान की जाती है और उनको जोड़ा जाता है. जिला स्तर पर, एनजीओ या भजन मंडलियों में शामिल प्रभावी महिला मतदाताओं, अस्पतालों की डॉक्टर या तीर्थ यात्राओं का आयोजन करने वाली महिलाओं को जोड़ा जाता है और उन्हें अपने लोगों को घर पर बुलाने को कहा जाता है. फिर घरों में जुटी महिलाओं को महिला मोर्चा कार्यकर्ता विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताती हैं.
विपक्षी दल महिला मतदाताओं के साथ संवाद के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के कार्यक्रमों का उनके पास कोई तोड़ नहीं है. मसलन, टीएमसी कार्यकर्ता घर-घर जाकर कोरे कपड़े में लिपटा लिफाफा बांट रहे हैं, जिसमें लक्ष्मी भंडार योजना में बढ़ोतरी का संदेश है. कांग्रेस भी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्राओं और 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' के दौरान अर्जित सहानुभूति को वोट में बदलने की कोशिश कर रही है.
महिलाएं किसे वोट देंगी?
राजनैतिक रणनीतिकार अमिताभ तिवारी कहते हैं, महिला और बाकी मतदाता दो कारणों से वोट करते हैं—आशा और आक्रोश. पार्टियों के लोकलुभावन वादों से लाडली बहना और गृह लक्ष्मी को बेशक कोई शिकायत नहीं है. लेकिन क्या उनके वोट देने की वजह में महज मुफ्त पाने का विचार ही हावी रहेगा? आगरा की एक हाउसिंग सोसाइटी में गृहिणियों के एक वर्ग का कहना है, "जिसका नमक खाया है उसे वोट देंगे." हां, वे बदलाव चाहती हैं; उन्हें बेरोजगारी, अच्छी शिक्षा का अभाव, महंगाई परेशान करती है. इसी तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भी उन्हें सोचने पर मजबूर करती है. लेकिन, फिर उनमें कोई यह भी कहता है, "और है ही कौन?"
रोजी-रोटी का मुद्दा काफी प्रभावी होने लगा हैं. देश भर में ग्रामीण या शहरी, पढ़ी-लिखी या निरक्षर, जवान या बुजुर्ग, हिंदू या मुस्लिम या विभिन्न जातियों, अमीर या गरीब सभी तबकों की महिलाओं से बातचीत में इंडिया टुडे के संवाददाताओं ने यही पाया. वे शिक्षा और रोजगार की भारी कमी और बेहिसाब महंगाई की बातें कर रही हैं. महिला-सुरक्षा ऐसा दूसरा क्षेत्र है, जिस पर हर पार्टी अपने और अपने कार्यक्रमों को बेहतर बताने की होड़ में जुटी है. इसलिए, भाजपा ने बंगाल में ममता को घेरने के लिए संदेशखाली की घटना को उछाला, तो कांग्रेस ने हासन के सांसद प्रज्ज्वल रेवन्ना के खिलाफ बलात्कार के आरोपों पर भाजपा को आड़े हाथों लिया.
भारतीय महिला अध्ययन संघ की पूर्व अध्यक्ष रितु दीवान ग्रामीण महिलाओं के बीच अपने अध्ययन में इसी नतीजे पर पहुंचीं. वे कहती हैं, "दो मुख्य मुद्दे उभर कर सामने आए. किसी को अपने बेटों के लिए रोजगार के अवसरों की फिक्र थी, तो किसी को पति के कामकाज में आगे बढ़ने की संभावनाओं की कमी और छोटे बच्चों के जवान होने पर रोजगार न मिल पाने की फिक्र थी. इसके अलावा, देश के दूरदराज के क्षेत्रों में प्राथमिक स्कूल बंद हो रहे हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और भविष्य में नौकरी की संभावनाओं को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं." तो, क्या इस बार वोट डालते वक्त महिलाओं के लिए आर्थिक मुद्दे बड़ी वजह हैं? या क्या वे मोदी और भाजपा में अपना विश्वास बनाए रखेंगी, ताकि उन्हें केंद्र में लगातार तीसरी बार सत्ता मिले?
आखिर में, 2024 का चुनाव देश की महिलाओं के लिए क्या मायने रखेगा? क्या इसका मतलब यह होगा कि उन्हें और भी अधिक सहायता दी जाएगी, जो उनकी भूमिकाओं को मजबूत करेगी, या उन्हें शिक्षा और रोजगार दिया जाएगा, और वास्तविक सशक्तीकरण मिलेगा? फिलहाल आम चुनाव के पहले दो चरणों में सिर्फ 258 महिला उम्मीदवार थीं, जो कुल 4,175 उम्मीदवारों में से महज 8.6 फीसद बैठती हैं.
महिलाओं को दरअसल क्या चाहिए, यह जाहिर करने वाला महिलाओं का कोई खास समूह नहीं है. मसलन, श्रीनेत पूछती हैं, "हमारे यहां पूरी तरह महिलाओं वाली पार्टी क्यों नहीं है? इतने बड़े इलाके के बावजूद भारत में यह प्रयोग कभी क्यों नहीं किया गया?" भारत में महिला सशक्तीकरण को जुमले से अधिक बनना है तो पुरुष-प्रधान राजनैतिक तंत्र को इस पर विचार करना होगा.
— साथ में मनीषा सरूप, अर्कमय दत्ता मजूमदार और सिराज कुरेशी, आगरा में

