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इन्फ्लुएंसर्स के साथ जुड़ने की राजनीति नरेंद्र मोदी के बारे में क्या बताती है?

विकसित भारत पीढ़ी वाले 21 करोड़ युवा मतदाता आखिर किस पर अपनी मुहर लगाएंगे? अतीत की तरह युवा इस बार भी चुनावी नतीजों को तय करने में निर्णायक साबित हो सकते हैं

हरियाणा में सोनीपत जिले के शेखपुरा गांव में चुनाव के लिए उत्साहित युवा
हरियाणा में सोनीपत जिले के शेखपुरा गांव में चुनाव के लिए उत्साहित युवा

आम चुनाव 2024 के पहले चरण के लिए वोट पड़ने से ठीक आठ दिन पहले 11 अप्रैल को देश के सात गेमिंग इन्फ्लुएंसर से बातचीत करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वीडियो ने सोशल मीडिया पर धूम मचा दी. मार्च में उनके आवास पर रिकॉर्ड हुए उस वीडियो में प्रधानमंत्री को उन युवा गेमर्स से बातचीत करते दिखाया गया, जिनकी औसत उम्र 25 साल थी. मोदी उन्हें यह तक बता रहे थे कि वे उनकी 'गेमिंग लिंगो’ यानी गेमिंग की भाषा का इस्तेमाल अपने भाषणों में कैसे कर सकते हैं.

एक अन्य मौके पर 7 मार्च को ऑनलाइन कंटेंट बनाने वालों के लिए नए शुरू हुए राष्ट्रीय नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड प्रदान करते वक्त मोदी ने देश के कुछ सबसे बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर - रणवीर इलाहाबादिया, श्रद्धा जैन और कामिया जानी - के साथ दोस्ताना बातचीत और हंसी-दिल्लगी की. दरअसल, इलाहाबादिया और जानी ने बीते एक महीने में अपने-अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अन्य लोगों के अलावा केंद्रीय मंत्रियों एस. जयशंकर, नितिन गडकरी और स्मृति ईरानी से बातचीत को भी स्ट्रीम किए. 

क्यों युवाओं के वोट अहम

इन युवा और लोकप्रिय इन्फ्लुएंसरों के साथ नेताओं की दोस्ताना बातचीत के पीछे एक अहम आंकड़ा है. इस चुनाव में 18 से 29 के बीच की उम्र के 21 करोड़ युवा अपना वोट डालेंगे. वे देश में करीब 97 करोड़ मतदाताओं के 22 फीसद हैं, जो आबादी के लिहाज से दुनिया का आठवां सबसे बड़ा देश होने के लिए काफी हैं, यहां तक कि रूस से भी बड़ा. फिर, राजनैतिक बिरादरी और चुनाव आयोग के लगातार फोकस की वजह से 18-25 वर्श आयु वर्ग के वोटरों के मतदान करने का रुझान 2014 के बाद तेजी से बढ़ा है, जो पहले काफी कम हुआ करता था.

इस आयु वर्ग के मतदाताओं का मतदान 2009 में 54 फीसद से बढ़कर अगले चुनाव में 68 फीसद पहुंच गया, जो सभी आयु वर्ग के वोटरों के औसत 67 फीसद मतदान से ज्यादा है. 2019 में यह एक फीसद अंक घटा, मगर तब भी 67 फीसद जितना ऊंचा था, यानी 22.9 करोड़ योग्य युवाओं में 15.3 करोड़ ने वोट डाले. और लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के चुनाव-बाद विश्लेषण के मुताबिक, उनमें 41 फीसद या 6.3 करोड़ युवाओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट दिया.

उस साल दो राष्ट्रीय पार्टियों - भाजपा और कांग्रेस को मिले वोटों में फासला 11 करोड़ का था, तो युवाओं के 6.3 करोड़ या 57 फीसद वोट भाजपा को अपने प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त दिलाने में अहम थे. इस बार करीब 97 लोकसभा क्षेत्रों में युवा वोट रुझान तय करने में अहम हो सकते हैं, जहां 2019 में जीत का अंतर महज 5 फीसद था. इनमें भाजपा ने 41, कांग्रेस ने 19 और दूसरी पार्टियों ने 37 सीटें जीती थीं. इसी वजह से युवा, खासकर पहली दफा वोट करने वालों को लुभाने के लिए पार्टियों में होड़ मची हुई है. 

दिल्ली में 11 अप्रैल को भारत के टॉप गेमर्स के साथ पीएम मोदी


आम चुनाव 2024 में 18 और 19 साल की उम्र 1.84 करोड़ युवा पहली बार मतदान करेंगे. लंदन में रहने वाले राजनीतिशास्त्री ओलिवर हीथ के 2015 के विश्लेषण से पता चला कि पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं को गोलबंद करने की भाजपा की क्षमता ने 2014 में उसकी भारी जीत में मदद की, तो लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन से पता चला कि उसके बाद हुए 2019 के आम चुनाव में यह चार फीसद अंक बढ़कर 40 फीसद पर पहुंच गया. इस साल भी पहली बार के वोटरों से खुद प्रधानमंत्री 18-19 साल वालों से वोट देने की अपील कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल के एक टेलीविजन इंटरव्यू में इस आयु समूह से खास तौर पर अपील करते हुए कहा, "कृपया अगले 25 वर्षों का अपना भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए वोट दीजिए." इसके आखिर में मोदी जिस इंद्रधनुष का वादा कर रहे हैं, वह 'विकसित भारत’ है. प्रधानमंत्री उन्हें 'अमृत पीढ़ी’ कहते हैं. यह 'जेन वी’ या जनरेशन विकसित भारत यानी विकसित भारत पीढ़ी है, जो 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लाभार्थी होंगे. यही संदेश भाजपा जोर-शोर से फैलाने में जुटी है, चाहे वह 25 जनवरी को राष्ट्रीय निर्वाचन दिवस के समारोहों में देश भर की 5,000 जगहों पर जुटे पहली बार के वोटरों से वर्चुअली जुड़ना हो या प्रधानमंत्री का अपने मन की बात कार्यक्रम के जरिए उनसे देश के लिए मतदान करने की सीधी अपील करना हो.

कैसे युवाओं को लुभाया जा रहा  

प्रधानमंत्री के बहुप्रचारित कार्यक्रमों के अलावा भाजपा जमीन पर अपने विस्तारकों (पूर्णकालिक) और कार्यकर्ताओं के जरिए युवा वोटरों से करीने से संपर्क किया जा रहा है. युवाओं के जुटने की जगहों जैसे जिम, खेल के मौदान, क्लब वगैरह में क्यूआर कोड लगाए गए हैं, जिनसे प्रधानमंत्री के 10 साल के विकास कार्यक्रमों के 40 स्लाइड खुलते हैं. युवा और पहली दफा के वोटरों के लिए मोदी सरकार की शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और स्टार्ट-अप के क्षेत्र में पहल को लेकर छोटे-छोटे वीडियो बनाए गए हैं. इसके अलावा पार्टी को अपने जी-20 यूनिवर्सिटी कनेक्ट कार्यक्रम से भी उम्मीद है.

जी-20 की अध्यक्षता के दौरान कार्यक्रम से 5 करोड़ स्कूली बच्चों तथा कौशल केंद्रों के छात्रों के अलावा 101 भारतीय विश्वविद्यालयों के 1,00,000 छात्रों से जुड़ने में मदद मिली थी. अब पार्टी एक वेबसाइट (pehlavotemodiko.bjp.org) भी लॉन्च किया है. भाजपा की युवा शाखा को हर चुनाव क्षेत्र में 5,000-20,000 युवा वोटरों के नाम दर्ज करने का काम सौंपा गया है. भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी सूर्या की अगुआई में देश भर में युवा केंद्रित कार्यक्रम चलाने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाई गई है. युवा वोटरों के साथ कई टाउनहॉल कार्यक्रम कर रहे सूर्या कहते हैं, "युवा वोटर न्यू इंडिया का फैसला करने वाले हैं. उनकी आकांक्षाओं से प्रधानमंत्री मोदी को विकसित भारत के विजन को ऊर्जा मिलती है."

इसी वोट बैंक पर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की भी नजर है. 53 साल की उम्र राहुल गांधी को अपेक्षाकृत 'युवा’ नेता साबित करती है, जिससे युवाओं से जुड़ना उनके लिए शायद आसान है. इसकी मिसाल राहुल की पिछले साल भारत जोड़ो यात्रा से बेहतर मिलती है. उस दौरान हर पड़ाव पर वे न सिर्फ लोगों, खासकर युवाओं से खुद मिले, बल्कि उसके बारे में युवाओं में लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी करीने से प्रसारित किया गया. चुनाव के करीब राहुल गांधी को लेकर पार्टी विभिन्न सोशल मीडिया रणनीतियों पर काम कर रही है.

कांग्रेस की चुनाव वार-रूम टीम बारीकी से यह देख रही है कि युवाओं को क्या पसंद आ रहा है, क्या नहीं. इसके लिए इंस्टाग्राम पसंदीदा प्लेटफॉर्म है, जिस पर युवाओं का जमावड़ा ज्यादा रहता है. योजना कई जगह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में टाउनहॉल कार्यक्रम आयोजित करने की है. भाजपा को विकसित भारत के भावी नजरिए से युवाओं को लुभाने की उम्मीद है, तो कांग्रेस बेरोजगारी पर निशाना साध रही है, जो भाजपा की दुखती रग है.

तमिलनाडु के नीलगिरि में कॉलेज स्टूडेंट्स के साथ राहुल गांधी

नौकरियों का मुद्दा काम करेगा?

देश में 15-29 वर्ष की उम्र के युवा बेरोजगारों की दर 2000 में 89 फीसद से घटकर भले 2022 में 83 फीसद पर आ गई, पर नौकरियों की गुणवत्ता और प्रच्छन्न बेरोजगारी का मसला अब भी है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और मानव विकास संस्थान (आईएचडी) से संयुक्त रूप से प्रकाशित इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के अनुसार, इसी अवधि में शिक्षित युवा बेरोजगारों की दर 54 फीसद से बढ़कर 66 फीसद हो गई.

भाजपा का घोषणापत्र मोटे तौर पर रोजगार, स्वरोजगार और आजीविका के अवसरों में बढ़ोतरी और भर्ती परीक्षाओं में कदाचार रोकने का सख्त कानून बनाने के अस्पष्ट वादे ही करता है. इसके विपरीत कांग्रेस इन मुद्दों पर ठोस बातें करती है. उसके युवा न्याय में युवाओं को प्रति वर्ष 1 लाख रुपए स्टाइपेंड के साथ एप्रेंटिसशिप का अधिकार देने, 30 लाख खाली पड़े सरकारी पदों को भरने और शिक्षा ऋणों की एकमुश्त माफी का वादा किया गया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को समान रूप से निर्देश दिया है कि वे इन गारंटियों के बारे में पहली बार वोट डालने जा रहे मतदाताओं को बताएं. 

इसलिए युवा कांग्रेस को इन वादों के साथ पार्टी के गारंटी कार्ड को हर विधानसभा क्षेत्र में 10,000 घरों में बांटने की जिम्मेदारी दी गई है. भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बी.वी. श्रीनिवास कहते हैं, "देश का युवा मोदी सरकार से नाराज है. वह वादों पर बुरी तरह नाकाम रही है. हमारे नेता राहुल गांधी स्वाभाविक रूप से युवाओं से मिलते हैं. हमने अपने घोषणापत्र के प्रति युवाओं में भारी उत्साह देखा है."

युवाओं के बीच इसकी गूंज को भांपकर अन्य पार्टियों ने भी युवा वोटरों को लुभाने की गरज से बेरोजगारी के मुद्दे को लपक लिया है. बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के नेता तथा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, दोनों 17 माह की महागठबंधन सरकार (जिसमें तेजस्वी उप-मुख्यमंत्री थे) में 5,00,000 सरकारी पदों के सृजन का दावा कर रहे और उसका श्रेय ले रहे हैं. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना से टूटे तथा भाजपा के सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल धड़े भी युवाओं को नौकरियां और तरह-तरह की खैरात देने का वादा कर रहे हैं. 

अलबत्ता विशेषज्ञों की राय मानें तो बेरोजगारी के मुद्दे से चुनाव के नतीजे तय होने की संभावना कम है. हालांकि फरवरी में छपे इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज सर्वे में 18 से 24 वर्ष उम्र के करीब 60 फीसद लोगों ने देश में बेरोजगारी की स्थिति को अत्यंत गंभीर बताया. लोकनीति-सीएसडीएस में 'द यूथ वोट इन लोकसभा इलेक्शंस 2019’ शीर्षक से शोधपत्र लिखने वाली विभा अत्री और ज्योति मिश्रा का कहना है कि रोजगार के मुद्दे का चुनाव नतीजों पर खास फर्क न पड़ने की वजह विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक न्याय सरीखे दूसरे ज्वलंत मुद्दों को तवज्जो मिलना हो सकती है. संभवत: इन मुद्दों की वजह से बेरोजगारी की बात दब-सी गई है.

दूसरी ओर, बेरोजगारी को हल करने के मामले में सियासी पार्टियों पर सामूहिक अविश्वास भी है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की छात्रा और आने वाली किताब ऐंबिशन इन राइजिंग इंडिया की लेखिका वर्या श्रीवास्तव का कहना है कि अधिकतर मतदाता उम्मीद तक नहीं करते कि कोई सरकार सक्रियता से इस मुद्दे को हल करेगी. वे कहती हैं, "इस बेरुखी की एक वजह यह हो सकती है कि युवा विपक्ष को ठीक से इससे निबटते नहीं देखते. इसके अलावा, उन्हें मोदी का नेतृत्व बेजोड़ नजर आता है." सीएसडीएस के सर्वे में नौकरी खोजना मुश्किल पाने वाले 10 में छह लोग राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि 10 में सिर्फ दो केंद्र सरकार को दोषी ठहराते हैं.

कांग्रेस के कम्युनिकेशन वॉर रूम के चेयरमैन वैभव वालिया इस आकलन से कुछ हद तक सहमत हैं. वालिया कहते हैं, "बेरोजगारी के मामले में लोग किसी भी पार्टी पर तब तक भरोसा नहीं करेंगे जब तक वे भरोसेमंद योजना नहीं देख लेते. कोई भी सियासी पार्टी बेरोजगारी का मुद्दा हल नहीं कर पाई है, जो वैसे भी वैश्विक परिघटना है. कांग्रेस भारी मुश्किलों के बाद एक शॉर्ट टर्म समाधान लेकर आई है." 

जाति का जाल

विपक्षी खेमा देशव्यापी जाति जनगणना और आरक्षण से 50 फीसद की सीमा हटाने के अपने वादे से भी युवा मतदाताओं को लुभाने की उम्मीद कर रहा है. इसका लक्ष्य मुख्य रूप से ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) वोटर हैं, जिन्हें आरक्षण का 27 फीसद हिस्सा हासिल है, जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी 50 फीसद से ज्यादा मानी जाती है. सीएसडीएस के सर्वेक्षणों के मुताबिक, पिछले लगातार दो चुनावों में 50 फीसद से ज्यादा ओबीसी युवाओं ने भगवा पार्टी को वोट दिया. आरक्षण का सीधा असर युवाओं के लिए अहम दो मुद्दों शिक्षा और रोजगार पर पड़ता है, इसलिए कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि आरक्षण की ऊपरी सीमा को हटाने का उसका वादा ओबीसी युवाओं पर भाजपा की पकड़ को तोड़ देगा.

इस वादे की अपील को लेकर भी विशेषज्ञ आशावादी नहीं हैं. देश का मिज़ाज सर्वे में 18 से 24 वर्ष की उम्र के 57 फीसद ने कहा कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होने चाहिए, न कि जातिगत. सियासी रणनीतिकार तथा चुनाव विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं, "युवा मतदाताओं में जाति जनगणना की कोई गूंज नहीं होगी. हिंदी पट्टी के राज्यों में भी यह काम नहीं आया." हाल ही में सीएसडीएस के एक सर्वे में 36 फीसद युवाओं (18-25 वर्ष) ने कहा कि कांग्रेस या 'इंडिया’ (इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूसिव एलायंस) ब्लॉक की दूसरी पार्टियां जाति जनगणना का इस्तेमाल ओबीसी को लामबंद करने के लिए सियासी औजार के तौर पर कर रही हैं. केवल एक-चौथाई को लगा कि पार्टियां इस मुद्दे को लेकर गंभीर हैं.

अगर रोजगार और जाति का मुद्दा नहीं, तो युवाओं को आखिर क्या लुभा सकता है? भाजपा उन्हें लुभाने के लिए बार-बार आजमाए हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर भरोसा कर रही है. देश का मिज़ाज सर्वे में 18-24 वर्ष आयु वर्ग के 23 फीसद लोगों ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना, जो राष्ट्रीय औसत से 6 फीसद अंक ज्यादा है. इसका असर पश्चिम बंगाल के बहरामपुर में भी अनुभव किया जा सकता है. वहां मूर्तिशिल्पी तथा पेंटर 25 वर्षीय शीर्ष आचार्य कहते हैं, "राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का महत्व धार्मिक मसले से अधिक है. इससे उस इलाके की अर्थव्यवस्था में जान आई है और पूरे समुदाय को ताकत मिली है, जो अपनी पहचान खोता जा रहा था."

भाजपा युवाओं में यह धारणा पैदा करने की कोशिश कर रही है कि खासकर जी20 की अध्यक्षता के सफल आयोजन से दुनिया में देश का कद बढ़ा है. यह युवाओं की बातों में सुनाई पड़ रहा है. 21 वर्षीय अंतरराष्ट्रीय तीरअंदाज ओजस प्रवीण देवताले कहते हैं, "भारत सदैव दुनियाभर में चर्चा का विषय रहा है." 2036 में भारत में ओलंपिक? उसको लेकर भी देवताले का वोट मिलेगा. चंद्रयान-3 की कामयाबी और भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना को इतनी चतुराई से उस अफसाने में पिरोया गया है जो राष्ट्रीय गौरव और विकसित भारत की भावना को और पुख्ता करता है.

मोदी और भाजपा के दूसरे नेता इस बारे में खूब बातें कर रहे हैं कि देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बोट्स, सेमीकंडन्न्टर, अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और स्टार्ट-अप इको सिस्टम को बढ़ावा देने काफी काम किया गया है. इन सभी मदों को रोजगार सृजन के तरीके की तरह भी पेश किया जा रहा है, ताकि विपक्ष के रोजगारहीनता के आरोप का खंडन किया जा सके. इसी वजह से प्रधानमंत्री ने खुद कई मौकों पर नियुक्ति-पत्र बांटे!

युवा का वोट किसलिए 

क्या युवा इन चुनावी वादों से प्रभावित होगा? राजनैतिक पार्टियां युवा वोटरों के लिए उम्मीदों को टोकरा तो पेश करती हैं, मगर वे खुद हमेशा वोट की आशा और असल में उसके पड़ने को लेकर अनिश्चय में झूलती रहती हैं. युवा कोई एक जैसी पांत नहीं है, न ही वे एक जैसे वोट करते हैं. रोजगार और महंगाई जैसे उनके मुद्दे साझा हो सकते हैं और भौगोलिक इलाकों के हिसाब से बदल भी सकते हैं. या फिर ये सब बिल्कुल ही मायने नहीं रख सकते हैं. इसके बदले जाति, समुदाय, परिवार, उम्मीदवार और धारणाओं से उनके वोट देने का फैसला तय हो सकता है.

बढ़ती चिंता की बात तो यह है कि पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं के उत्साह में इस बार गिरावट देखी गई है. सिर्फ 38 फीसद योग्य मतदाताओं ने पंजीकरण कराया है. चुनावी लिहाज से बेहद अहम तीन राज्यों - उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र (जहां कुल 168 लोकसभा सीटें हैं) - में औसत पंजीकरण दर 22 फीसद से कम है. वह भी तब जब चुनाव आयोग नए मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 'टर्निंग 18’ और 'यू आर द वन’ जैसे कई अभियान चला रहा है. व्यक्तिगत स्तर पर भी कम प्रयास नहीं किए जा रहे.

मसलन, केरल के कन्नूर जिले में एक सहायक कलेक्टर ने जिले के सभी कॉलेज छात्रों को मतदाता के रूप में नामांकित कराने का प्रयास किया. इसके बावजूद युवा मतदाताओं के पंजीकरण पर खास फर्क नहीं पड़ा. विशेषज्ञों का मानना है कि इस उदासीनता के पीछे कई कारण हैं. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत कहते हैं कि यह उदासीनता बेफिक्री या चुनाव नतीजों को लेकर कोई किंतु-परंतु न होने की भावना से उपजी. वे कहते हैं, "मैंने जिन कई युवाओं से बात की, वे नतीजे को तय मान चुके हैं. उन्हें लगता है कि उनके वोटों से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है." 

सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने और सामाजिक परिवर्तन लाने के उद्देश्य के साथ शिक्षा, नीति और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की दिशा में काम करने वाले समता केंद्र के संस्थापक प्रवीण निकम भी रावत की राय से सहमत हैं. निकम ने अपनी यात्रा के दौरान पाया कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में चुनावी मुकाबला सियासी ध्रुवीकरण से प्रभावित है, वहां पर युवाओं को लगता है कि उनके वोट डालने या न डालने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

भाजपा 2014 में बदलाव की बयार पर चढ़कर सत्ता में पहुंची तो 2019 में पुलवामा हमले के कारण राष्ट्रवाद की भावना हावी थी, अब उसे उम्मीद है कि 2024 का चुनाव राम मंदिर मुद्दे से प्रेरित होगा. लेकिन 10 साल बाद सत्ता विरोधी लहर भी नजर आ रही है. इस चुनाव में पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं ने किसी अन्य सरकार के कामकाज को नहीं देखा है, इसलिए उनके पास तुलना करने के लिए कोई तरीका नहीं है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री अपनी सार्वजनिक रैलियों में युवा मतदाताओं को अपने माता-पिता से अतीत के 'कुशासन’ के बारे में पूछने की सलाह देते हैं. या, वे स्कूली छात्रों के साथ 'परीक्षा पे चर्चा’ के माध्यम से भावी मतदाताओं को तैयार करने की कोशिश भी करते हैं.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के प्रमुख मेजर जनरल अनिल वर्मा (सेवानिवृत्त) कहते हैं, "2014 में प्रधानमंत्री मोदी के अभियान ने युवाओं में एक बदलाव की उम्मीद जगाई थी. बहुत संभव है कि दो कार्यकालों के बाद कोविड महामारी सहित विभिन्न कारणों से युवाओं को वे सभी बदलाव नजर न आए हों. ऐसे में उनका उत्साह ठंडा पड़ जाना स्वाभाविक ही है." 

बूथ तक कैसे लाएं

तिवारी के मुताबिक, युवाओं की मौजूदा उदासीनता की एक वजह उनकी सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी मानसिकता भी हो सकती है. फिर भी, तिवारी सहित अधिकतर विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं के बीच भाजपा विरोधी कोई लहर नहीं है. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में फेलो राहुल वर्मा कहते हैं, "भाजपा के प्रति युवाओं के उत्साह में आई कमी ने सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के प्रति उनके समर्थन के अंतर को जरूर कम कर दिया है. हालांकि, अभी भी भाजपा को उनका व्यापक समर्थन हासिल है."

ड्रीमर्स हाउ यंग इंडियंस आर चेंजिंग द वर्ल्ड की लेखिका स्निग्धा पूनम की राय भी इससे मिलती-जुलती है. वे कहती हैं, "पहली बार मतदाता बने युवाओं से बातचीत में मैंने पाया कि उनमें से अधिकतर पढ़ाई, परीक्षा, कोचिंग और करियर संबंधी दुविधाओं में उलझे हैं. चुनाव अभी तक उनके जीवन में अहम घटना जैसा कोई स्थान हासिल नहीं कर पाया है."

हाल में असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स और क्लाइमेट एजुकेशन नेटवर्क की तरफ से चार राज्यों - तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल - में किए गए एक सर्वे में पहली बार के मतदाताओं में से अधिकतर की राय थी कि किसी पार्टी या प्रत्याशी का क्लाइमेट ऐक्शन के प्रति प्रतिबद्धता जताना, उनकी वोटिंग पसंद निर्धारित करने वाले शीर्ष तीन फैक्टर में शामिल है. दुर्भाग्य से, जलवायु परिवर्तन अब तक किसी चुनावी नैरेटिव का हिस्सा नहीं बन पाया है. यह राष्ट्रीय राजधानी के चुनावी मुद्दों से भी नदारद है, जो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है. ऐसे में हैरानी नहीं कि दिल्ली में पहली बार के मतदाताओं की पंजीकरण दर 27 फीसद के साथ बेहद कम रही है.

ये सभी बातें यह अनिवार्य बनाती हैं कि सभी संबंधित पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया में युवाओं की भागीदारी आश्वस्त करने के लिए प्रणालीगत बाधाएं दूर करें. कुछ का कहना है कि चुनाव आयोग को ऑनलाइन तरीके से मतदाता पंजीकरण की प्रकिया को और आसान बनाना चाहिए. तेज संचार सुविधाओं और डिजिटल लेनदेन के दौर में बड़ी हुई पीढ़ी के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की लंबी प्रक्रिया उबाऊ लगती है.

युवा केंद्रित नॉन-प्रॉफिट संस्था युवा के सह-संस्थापक तथा मुखिया निखिल तनेजा कहते हैं, "अगर इसे नया बैंक खाता या यूपीआई आईडी खोलने जैसा आसान बना दिया जाता है, तो युवाओं को मतदाता पंजीकरण में मदद मिलेगी." वोट करने के योग्य युवाओं की भारी आबादी और मतदान के रुझान को प्रभावित करने की उनकी क्षमता के मद्देनजर यह जरूरी है कि उन्हें मतदान के दिन बूथ पर लाया जाए.

- साथ में धवल एस. कुलकर्णी

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