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लोकसभा चुनाव 2024 : बीजेपी के सामने 'इंडिया' गठबंधन कहां, कितना मजबूत?

विपक्ष के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं, लेकिन सुनियोजित रणनीति और नैरेटिव के जरिए वह भाजपा की बेहिसाब आकांक्षाओं को रोकने में सक्षम हो सकता है

दिल्ली के रामलीला मैदान में 31 मार्च को 'लोकतंत्र बचाओ' रैली में  'इंडिया' ब्लॉक  के नेता
दिल्ली के रामलीला मैदान में 31 मार्च को 'लोकतंत्र बचाओ' रैली में 'इंडिया' ब्लॉक के नेता
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2024

विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं को एक मंच पर खड़ा होने में नौ महीने और आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी लगी.

दिल्ली के रामलीला मैदान में 31 मार्च को भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन ('इंडिया') के 27 पार्टियों के नेता, केजरीवाल की कथित दिल्ली शराब नीति मामले में संलिप्तता के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के उन्हें गिरफ्तार करने के खिलाफ महा रैली में जुटे.

वे हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के भी विरोध में खड़े थे, जिन्होंने कथित भूमि घोटाले में ईडी की गिरफ्तारी के बाद 31 जनवरी को झारखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

यही नहीं, रैली के ऐन पहले विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को कथित कर उल्लंघनों पर आयकर (आईटी) विभाग से कई नोटिस मिल चुके थे, जिसमें 3,500 करोड़ रुपए के जुर्माने की मांग थी. आखिर कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आईटी विभाग पर बेहद अहम चुनाव के मौके पर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया.

अदालत के सख्त रुख की वजह से आईटी अधिकारी पीछे हटने को मजबूर हुए और आश्वासन देना पड़ा कि वे चुनाव खत्म होने तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं करेंगे. लेकिन 'चार सौ पार' का भारी बहुमत हासिल करने का दावा करने वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मंशा पर कोई संदेह नहीं रह गया है.

विरोधियों को बर्बाद करने की उसकी कुटिल योजना को उसके प्रतिद्वंद्वी भांप पा रहे हैं. सत्तारूढ़ दल उन्हें निबटाने के लिए अपने हाथ के हर तरीके का इस्तेमाल करने को तैयार है, चाहे पार्टियों को तोड़ने, नेताओं को गिरफ्तार करने और उनका पाला बदल करवाने, उनके पैसे के प्रवाह को रोकना हो. 

इस तरह यह लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, उनके कथित कामकाज के रिकॉर्ड, पार्टी के हिंदू राष्ट्रवादी वैचारिक एजेंडे और उसके विकास के मुद्दे के इर्दगिर्द बुनी गई भाजपा की ताकतवर चुनाव मशीनरी के खिलाफ विपक्षी खेमे की राजनैतिक प्रासंगिकता की परीक्षा बन गया है.

भाजपा उन्हें दो बार धूल चटा चुकी है. उसने लगातार अपने दम पर 543 सदस्यीय सदन में 2014 में 282 सीटें और 2019 में 303 सीटों का बहुमत हासिल किया है. पिछले लोकसभा चुनाव में अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में सहयोगियों के साथ उसका आंकड़ा 352 का था. इस बार भाजपा ने अपने लिए 370 और एनडीए के लिए 400 से अधिक सीटें हासिल करने का लक्ष्य रखा है. 

ऐसे में विपक्ष के लिए अगर कोई सांत्वना है, तो यह कि 2019 में भाजपा का वोट शेयर 38 फीसद और एनडीए का 45 फीसद था. मतलब यह कि 55 फीसद मतदाताओं ने भाजपा विरोधी पार्टियों को वोट दिया था. यह आंकड़ा तो यही बतलाता है कि भाजपा के दनदनाते रथ को रोकने के लिए विपक्षी दलों को अपनी ताकत एकजुट करनी होंगी. अलबत्ता, इसी मकसद से पिछले साल जून में 'इंडिया' ब्लॉक का गठन हुआ.

लेकिन, एकजुटता के उस वादे को जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) प्रमुख तथा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुछ ही महीनों में झुठला दिया और पाला बदल कर भगवा पांत में जा खड़े हुए. इस तरह गठबंधन अपने एक मुख्य सूत्रधार से ही हाथ धो बैठा.

पश्चिम बंगाल में जहां भाजपा 2019 में 40 फीसद वोट हासिल करके मुख्य विपक्ष बन गई थी, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 'इंडिया' में तो बनी हुई है, मगर उसने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. तो, कमजोर हुआ विपक्षी गठबंधन क्या अब भी मोदी और भाजपा को पछाड़ सकता है?

भारत जोड़ो पार्ट 2: यात्रा के दौरान प्रयागराज में 18 फरवरी को समर्थकों का अभिवादन करते राहुल गांधी

कांग्रेस अब भी खास

बिखरी और लस्तपस्त दिखने के बावजूद, देश की सबसे पुरानी पार्टी सत्तारूढ़ भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिसकी चुनाव में कामयाबी या नाकामी पर ही एनडीए को सत्ता से बाहर करने की 'इंडिया' की संभावनाएं टिकी हुई हैं.

दरअसल, देशभर में कम से कम 200 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस सत्तारूढ़ दल से सीधी टक्कर में है. पिछली बार भाजपा ने जो 303 सीटें जीती थीं, उनमें से 190 पर कांग्रेस उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी थी. हालांकि, कांग्रेस उनमें सिर्फ 15 सीटें ही जीत पाई. बाकी 175 सीटें भाजपा के खाते में गईं, यानी उसका स्ट्राइक रेट 92 फीसद था.

वोट शेयर में कुल अंतर 20 फीसद अंक था इसलिए उसे पाटने के लिए कांग्रेस को अपने पक्ष में बड़ी लहर की दरकार होगी. राजनैतिक रणनीतिकार तथा चुनाव विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं, "इस अंतर को पाटना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है."

कांग्रेस ने जिन 421 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें 125 पर पार्टी 15 फीसद से अधिक के अंतर से हारी थी. 309 सीटें कांग्रेस पिछले तीन आम चुनावों से नहीं जीती है. दूसरी 183 सीटें वह बस एक बार जीत पाई है. कभी कांग्रेस का गढ़ रहे पूर्वोत्तर की 25 सीटों में दो राज्यों में चार सीटें ही हैं.

लेकिन कांग्रेस अगर भाजपा से सीधे मुकाबले वाली सीटों पर ही कड़ी टक्कर दे पाती है तो वह सत्तारूढ़ पार्टी को 272 के बहुमत के आंकड़े से नीचे ला सकती है और मोदी के दबदबे को रोक सकती है.

इस दिशा में कांग्रेस तीन रणनीतियों पर धार दे रही है. एक, 'इंडिया' में तकरीबन सभी राज्यों में संगठनात्माक मौजूदगी वाली इकलौती पार्टी होने के नाते कांग्रेस भाजपा के खिलाफ एक ठोस देशव्यापी नैरेटिव तैयार करने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी 2022 से दो यात्राएं पूरी कर चुके हैं, एक पैदल, दक्षिण से उत्तर तक, दूसरी बस से, पूरब से पश्चिम तक. दोनों यात्राओं का नैरेटिव लगभग एक समान था, भाजपा की कथित सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला करना, हाशिए पर मौजूद सामाजिक-आर्थिक वर्गों पर केंद्रित समान विकास की दिशा में काम करना, सभी के लिए सामाजिक न्याय आश्वस्त करना और देश के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना. पार्टी ने बेरोजगारी, महंगाई और बड़े कॉर्पोरेट समूहों के साथ कथित साठगांठ को लेकर मोदी सरकार पर लगातार हमला जारी रखा है.

यह दीगर बात है कि लोकतंत्र पर खतरा या केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग जैसे मुद्दे शायद वोटर की भावना को उतना न छुएं, क्योंकि हर पार्टी पर ऐसा करने के आरोप हैं.

लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर वरुण छाछर कहते हैं, "राम मंदिर और सीधे नकदी हस्तांतरण वोटर को छूते हैं, लोकतंत्र पर खतरा नहीं." लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष तथा 'इंडिया' के संयोजक मल्लिकार्जुन खड़गे का मानना कुछ और है. वे इंडिया टुडे से कहते हैं, "पहले ही अघोषित इमरजेंसी लागू है. मोदी तानाशाह हैं." 

फिर, विपक्ष के पास देशव्यापी जाति जनगणना का भी मुद्दा है. नीतीश भले दूर चले गए, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री राज्य में जाति सर्वेक्षण के जरिए यह मुद्दा कांग्रेस या विपक्ष को मुहैया करा गए हैं, जो ओबीसी जातियों को लुभाने की कोशिश में महत्वपूर्ण होगा, जो भाजपा की चुनावी जीत का मुख्य आधार रहे हैं.

दूसरे, पिछले साल कर्नाटक विधानसभा चुनावों में पांच गारंटियों के बल पर चुनाव जीतने वाली कांग्रेस इन लोकसभा चुनावों में भी 2047 तक विकसित भारत की 'मोदी गारंटी' का मुकाबला करने के लिए उसी थीम का विस्तार कर रही है. उसने सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, किसानों, महिलाओं, मजदूरों और युवाओं के लिए 25 गारंटियों का ऐलान किया है.

इनमें देशव्यापी जाति जनगणना, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को हटाना, 30 लाख सरकारी पदों पर नियुक्तियां, हर स्नातक और डिप्लोमाधारी को 1 लाख रुपए सालाना वजीफे के साथ अप्रेंटिसशिप की गारंटी, पेपर लीक रोकने के लिए नया कानून, हर गरीब परिवार की एक महिला को 1 लाख रुपए प्रति वर्ष, केंद्र सरकार की भर्ती में महिलाओं के लिए 50 फीसद आरक्षण, एमएसपी को कानूनी दर्जा और 400 रुपए प्रति दिन राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की गारंटी शामिल है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 3 अप्रैल को देश भर में 8 करोड़ परिवारों तक पहुंचने के लिए 'घर-घर गारंटी' पहल शुरू की.

कांग्रेस की तीसरी रणनीति पूरे देश में नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारना है, न कि सिर्फ भाजपा से सीधा मुकाबला वाली सीटों पर. पार्टी ने 2 अप्रैल तक घोषित 228 उम्मीदवारों में से 150 सीटों (66 फीसद) पर 2019 के उम्मीदवारों को बदल दिया है.

लेकिन सब कुछ योग्यता के आधार पर नहीं होता. वह अभी भी वंशवादी राजनीति पर काफी हद तक निर्भर है. उसके 30 से अधिक उम्मीदवार वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के परिजन हैं. इसके अलावा, कई पार्टी नेता चुनाव लड़ने से कन्नी काटते दिखे. इनमें अशोक गहलोत, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, जितेंद्र सिंह या खड़गे और सोनिया गांधी ने भी उम्र का हवाला देकर लड़ने से इनकार कर दिया.

इस बीच, नेताओं के बड़ी संख्या में पाला बदलने से कांग्रेस के बिखराव की फिजा बनी हुई है. चुनावों से ठीक पहले, महाराष्ट्र में अशोक चह्वाण और मिलिंद देवड़ा, मध्य प्रदेश में सुरेश पचौरी, गुजरात में अर्जुन मोढवाडिया, पंजाब में रवनीत सिंह बिट्टू और हरियाणा में नवीन जिंदल जैसे कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए.

ये पाला बदल चाहे केंद्रीय एजेंसियों की जांच के डर से हुए हों या भाजपा में जाकर इनाम पाने के लालच में कांग्रेस के प्रति 'इंडिया' ब्लॉक के सहयोगी दलों में अविश्वास पैदा करते हैं. हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों में पार्टी की हालिया हार ने मनोबल को और गिरा दिया है.

कोलकाता में 10 मार्च को  रैली में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनजी

बड़े क्षेत्रीय युद्धक्षेत्र

विपक्षी गठबंधन की असली अग्निपरीक्षा तो चार प्रमुख राज्यों, उत्तर प्रदेश (80 सीटें), महाराष्ट्र (48), पश्चिम बंगाल (42) और बिहार (40) में ही होनी है, जहां कुल मिलाकर 210 सीटें हैं. हालांकि, इन राज्यों में 'इंडिया' ब्लॉक ने भाजपा को अपने मजबूत गढ़ों में भी सेंध लगाने का पूरा मौका दे दिया है.

साल 2019 में विपक्षी दलों ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से केवल 16 पर जीत हासिल की थी और अब तो भाजपा ने पूरी रणनीतिक चतुराई के साथ अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया है, जिसने 2022 के विधानसभा चुनाव में कई दलों का गठबंधन बनाया था.

सपा के दो प्रमुख सहयोगियों को भाजपा अपने पाले में ला चुकी है, जिसमें से जयंत चौधरी की आरएलडी (राष्ट्रीय लोक दल) को पश्चिमी क्षेत्र में जाटों का समर्थन हासिल है, और ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) पूरब में पिछड़ों और दलितों के बीच खासा प्रभाव रखती है. मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने (2019 की तरह सपा के साथ जाने के बजाए) अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जिससे 'इंडिया' ब्लॉक के वोट शेयर में सेंध लगने का खतरा है.

गैर-यादव ओबीसी और दलितों के वोटों को भाजपा के पक्ष में लामबंद होने से रोकने के लिए सपा पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों का एक सामाजिक समीकरण गढ़ने की कोशिश कर रही है. राहुल गांधी भी देशव्यापी जातीय गणना की वकालत करके ओबीसी वोट साधने की कोशिश कर रहे हैं. जातिगत समीकरणों पर माथापच्ची करने के बावजूद इससे 'इंडिया' ब्लॉक को चुनावी लाभ मिलने की कोई गारंटी नहीं है.

मसलन, 2019 में जब सपा ने दलित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखने वाली बसपा और आरएलडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, तब भी उनका साझा वोट शेयर 40 फीसद से पार नहीं पहुंच सका था और भाजपा को मात देने में नाकाफी साबित हुआ. इस बार, सपा और कांग्रेस ने साथ आकर 20 फीसद मुस्लिम वोट मजबूत कर लिया जो एक दर्जन सीटों पर निर्णायक है. इसका दुष्परिणाम? हिंदू वोटों का भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण.

सबसे रोचक मुकाबला महाराष्ट्र के सियासी मैदान में देखने को मिलने वाला है, क्योंकि वहां ऐसे सियासी समीकरण बन चुके हैं जिन्हें पहले कभी चुनावी कसौटी पर परखा ही नहीं गया है. 2019 में भाजपा ने अविभाजित शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और गठबंधन ने राज्य की 48 सीटों में से 41 सीटें हासिल की थीं. लेकिन कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव के समय यह दोस्ती टूट गई और उद्धव ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र विकास अघाड़ी गठबंधन सरकार का हिस्सा बन गई.

भाजपा के एमवीए को छिन्न-भिन्न करने में सफल होने से पहले गठबंधन ने 20 महीने सरकार चलाई. भाजपा ने सबसे पहले तो एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी की पेशकश कर शिवसेना को दो-फाड़ कर दिया. फिर, एमवीए के दूसरे घटक यानी शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ भी यही रणनीति अपनाई, और उप-मुख्यमंत्री पद के बदले उनके भतीजे अजित पवार को अपने खेमे में शामिल कर लिया.

अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार-नीत राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन का सीधा मुकाबला भाजपा, शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजित पवार नीत राकांपा गुट के साथ है. हालांकि, वैचारिकता की बात करें तो दोनों ही गठबंधन अस्वाभाविक हैं. अधिकांश चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि इस बेमेल प्रकृति का अनुपात ही नतीजों को निर्धारित करेगा. एनडीए की तुलना (करीब पांच सीट) में एमवीए पर इसका असर (करीब 20 सीट) पड़ने के आसार ज्यादा हैं.

अधिकांश विशेषज्ञ इस पर एक राय हैं कि उद्धव ठाकरे और शरद पवार को सहानुभूति का फायदा मिल सकता है लेकिन सहानुभूति लहर के व्यापक क्षेत्र में कारगर रहने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. मुंबई यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रह चुकीं उत्तरा सहस्रबुद्धे कहती हैं, "मुंबई और उसके आसपास उद्धव ठाकरे के लिए खास सहानुभूति लहर नजर आती है लेकिन राज्य के अन्य हिस्सों में इसका फायदा मिलने की कोई गारंटी नहीं है."

वहीं, प्रकाश आंबेडकर-नीत वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) जैसे छोटे दल चुनावी खेल और खराब कर सकते हैं. वीबीए से एमवीए की सीटों की तालमेल की बातचीत टूटते-बनते जारी है. वीबीए ने 2019 में एक भी सीट नहीं जीती लेकिन सात फीसद वोट शेयर के साथ पूर्व मुख्यमंत्रियों अशोक चह्वाण और सुशील कुमार शिंदे सहित कांग्रेस-राकांपा के कई उम्मीदवारों की हार का कारण जरूर बना.

बिहार में भी मुकाबला खासा चुनौतीपूर्ण रहने वाला है. पाला बदलने में माहिर नीतीश को अपने खेमे में लाकर भाजपा ने विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' ब्लॉक की हवा निकाल दी है. इससे न केवल राष्ट्रीय स्तर पर 'इंडिया' की संभावनाओं को गहरा झटका लगा, बल्कि राज्य में भी उसकी सियासी मुश्किलें बढ़ गईं.

नीतीश अगर विपक्षी गठबंधन में बने रहते तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ 'इंडिया' ब्लॉक का साझा वोट शेयर 2019 में भाजपा के 24 फीसद की तुलना में 47 फीसद होता. लेकिन अब स्थिति उलट गई है.

बदले समीकरणों को ध्यान में रखकर तेजस्वी यादव अब राजद के मूल जनाधार एम-वाई गठजोड़ (यहां की आबादी में 18 फीसद मुस्लिम और 14 फीसद यादव हैं) से इतर अत्यंत पिछड़े वर्ग (ईसीबी) को साधने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, जिस वोट बैंक को नीतीश ने जद (यू) के लिए तराशा था. मसलन, नवादा और पूर्णिया जैसी सीटों पर पार्टी ने प्रभावशाली और दबंग यादव नेताओं पप्पू यादव और विनोद यादव की दावेदारी खारिज कर उनके बजाए ईबीसी तबके के उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का फैसला किया.

पिछले वर्ष बिहार में जाति गणना से पता चला था कि राज्य की आबादी में ईबीसी की हिस्सेदारी 36 फीसद है. हालांकि, 'इंडिया' के खाते में कुल कितनी सीटें आती हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य में कांग्रेस का प्रदर्शन कितना अच्छा रहता है. 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 70 सीटों में सिर्फ 19 पर जीत हासिल कर सकी थी. राजद ने 144 सीटों पर भाग्य आजमाया और इनमें से 75 पर जीत दर्ज की थी.

'इंडिया' बनाम 'इंडिया'

इस पूरे सियासी माहौल के बीच पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों के लिए कांग्रेस और माकपा के साथ गठबंधन न करने का ममता बनर्जी का फैसला 'इंडिया' के लिए सबसे अधिक चौंकाने वाला रहा.

ममता ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन को समर्थन जारी रखने की प्रतिबद्धता जाहिर करने के साथ दो अन्य साझेदारों कांग्रेस और लेफ्ट के साथ हाथ मिलाने में असमर्थता जता दी. टीएमसी के कथित भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और संदेशखाली में महिला उत्पीड़न के आरोपों में घिरने और करीबी नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद ममता राज्य के तमाम कद्दावर नेताओं पर भारी हैं.

चुनाव में ममता का चेहरा अहम फैक्टर बना हुआ है और टीएमसी इसके इर्द-गिर्द ही रणनीति तैयार कर रही है. पार्टी का अभियान कल्याण योजनाओं के अलावा बंगाली गौरव की अपील, भाजपा को बाहरी लोगों की पार्टी करार देने, 27 फीसद मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण और केंद्रीय निधि जारी करने में केंद्र की तरफ से बंगाल के साथ भेदभाव करने जैसे मुद्दों पर केंद्रित है.

2019 का चुनाव ममता को गहरा झटका देने वाला साबित हुआ था क्योंकि भाजपा ने राज्य की 42 सीटों में से 18 पर जीत दर्ज करके राज्य में प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा हासिल कर लिया था. उनके बीच वोट शेयर में तीन फीसद का अंतर ही रहा था.

कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के वोटों में उछाल टीएमसी की कीमत पर ही आने के आसार हैं. हो सकता है कि गठबंधन न करने का फैसला ममता की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो ताकि सत्ता विरोधी वोटों को भाजपा के खाते में जाने से रोका जा सके. लेकिन, ममता का यह दांव जोखिम भरा है.

'इंडिया' ब्लॉक को बड़ी उम्मीद दिल्ली, गुजरात और हरियाणा में ही नजर आ रही है, जिन राज्यों की कुल 43 सीटों पर गैर-भाजपा वोटों का विभाजन रोकने के लिए कांग्रेस और आप ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया है.

केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद दोनों ही पार्टियों को कम से कम दिल्ली में सहानुभूति लहर का फायदा मिलने की उम्मीद है, जहां भाजपा पिछले दो लोकसभा चुनावों से लगातार सातों सीटों पर कब्जा जमाती आ रही है.

हालांकि, सहानुभूति वोट के अलावा भी आप-कांग्रेस गठबंधन को भाजपा के वोट शेयर के बड़े अंतराल को पाटना होगा. 2019 में भाजपा को गुजरात में 63 फीसद और दिल्ली में 57 फीसद वोट मिले थे. गठबंधन को अपनी पूरी सामूहिक ताकत के साथ मतदाताओं का रुख अपने पक्ष में करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. 

हरियाणा में भी आप-कांग्रेस गठबंधन के 2019 में वोट 32 फीसद थे, इसलिए 58 फीसद वोट शेयर वाली भाजपा को हराने के लिए बड़े रुझान की दरकार होगी. जाट आधार वाली जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) और दलित आधार वाली बसपा के अकेले लड़ने से भी 'इंडिया' को इन समुदायों के शायद एकमुश्त वोट न मिलें. कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ नाराजगी का फायदा उठाना है तो उसे आंतरिक कलह पर लगाम लगानी होगी.

सबसे जटिल सियासी समीकरण पंजाब में नजर आ रहे हैं, जहां पहली बार लोकसभा चुनावों में मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है. राज्य में चारों प्रमुख खिलाड़ी, सत्तारूढ़ आप, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल मैदान में अलग-अलग किस्मत आजमा रहे हैं.

चार दलों के मैदान में होने से राज्य की 13 सीटों पर मुकाबला काफी कड़ा हो गया है, जिसमें 2019 में कांग्रेस ने आठ, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा ने दो-दो और आप ने एक सीट जीती थी. पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर आशुतोष कुमार का मानना है कि कांग्रेस के 2019 वाला प्रदर्शन दोहराने की संभावना अधिक है क्योंकि आप के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर है, और भाजपा तथा अकाली दल मुख्य खिलाड़ियों में शामिल नहीं हैं.

दक्षिणी गढ़

कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिणी गढ़ भाजपा की हमेशा दुखती रग ही रहा है. दूसरी तरफ विपक्षी 'इंडिया' 39 सीटों वाले तमिलनाडु और 20 लोकसभा सीटों वाले केरल में अच्छे प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त है, जहां भाजपा की गैर-मौजूदगी काफी तीखी है. तमिलनाडु में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी के जोरदार चुनावी अभियान के बावजूद द्रमुक की अगुआई में 'इंडिया' ब्लॉक 39 सीटों में से अधिकांश पर सफलता हासिल करने को तैयार दिख रहा है.

सत्ता विरोधी लहर से निबटने के लिए द्रमुक ने न सिर्फ छह मौजूदा सांसदों का टिकट काट दिया बल्कि अपने सहयोगी दल कांग्रेस के साथ उन कुछ सीटों को बदलने पर भी बात की, जहां उसने पिछली बार चुनाव लड़ा था. मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने अन्नाद्रमुक की पारंपरिक समर्थक मानी जाने वाली महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं.

केरल में कांग्रेस कुल 20 सीटों में से अपने 15 सीटों के आंकड़े को कम होने नहीं देना चाहती, यह इससे जाहिर है कि वहां तीन दिग्गज राहुल गांधी, के.सी. वेणुगोपाल और शशि थरूर मैदान में हैं. वहां भाजपा हाशिए की खिलाड़ी है.

वहां लड़ाई हमेशा कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और माकपा की अगुआई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के बीच ही रही है, इसलिए नतीजों से विपक्षी गठबंधन पर फर्क नहीं पड़ने वाला. यूडीएफ जीते या एलडीएफ, आंकड़े तो 'इंडिया' में ही जुड़ेंगे.

कर्नाटक में भले पिछले साल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस राज्य की सत्ता में आ गई थी लेकिन इतिहास भाजपा के पक्ष में है. लोकसभा चुनाव में मोदी की लोकप्रियता भी भाजपा के पक्ष में काम आती है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि पिछले चार चुनावों में भाजपा राज्य की कुल 28 में से अधिकांश सीटें अपनी झोली में डालती रही है. उसका वोट शेयर भी बढ़ता रहा है, जो 50 फीसद को छू गया है. 2019 में भाजपा 26 सीटें जीत गई थी.

भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. उसने वोक्कालिगा वोट हासिल करने के लिए एच.डी. देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर (जिसका 2019 में कांग्रेस के साथ गठबंधन था) के साथ गठजोड़ किया, और 2021 में बी.एस. येदियुरप्पा को हटाने से नाराज लिंगायतों को साधने के लिए उनके बेटे बी.वाई. विजयेंद्र को राज्य भाजपा का अध्यक्ष बना दिया.

भाजपा की सियासी रणनीतियों का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस काफी हद तक 'अहिंदा' राजनीति की शुरुआत करने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारामैया और वोक्कालिगा समुदाय के ताकतवर नेता तथा उप-मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर निर्भर है. कन्नड़ भाषा में अहिंदा का मतलब है अल्पसंख्यातरु (अल्पसंख्यक), हिंदूलिदावरु (पिछड़े वर्ग) और दलितारू (दलित) के सामाजिक गठबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाला संक्षिप्त शब्द.

सिद्धारामैया ने जाति गणना संबंधी एक रिपोर्ट स्वीकार करके पार्टी के लिए परेशानी बढ़ा दी थी. लीक जानकारी के मुताबिक, रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य की आबादी में 60 फीसद हिस्सेदारी अहिंदा की है, जिसमें मुसलमानों की संख्या वोक्कालिगा और लिंगायतों से अधिक है. यह तथ्य इन समुदायों को खासा निराश करने वाला है.

बहरहाल, कर्नाटक कांग्रेस महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली जैसी अपनी पांच चुनावी गारंटियों पर अमल को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में उतरी है, जो उसके लिए भाजपा से अधिक सीटें छीनने में मददगार हो सकता है.

बेंगलूरू यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर वाई.एस. सुरेंद्र कुमार बताते हैं, "पांच गारंटी, सिद्धारामैया और शिवकुमार के दोहरे नेतृत्व की बदौलत इस बार कांग्रेस को अहिंदा, महिलाओं और वोक्कालिगा समुदाय के बड़े वर्ग का समर्थन मिल सकता है. हालांकि, अधिकांश लिंगायत वोट भाजपा के साथ ही रहने के आसार हैं."

कांग्रेस तेलंगाना में भी अधिक सीटें मिलने की उम्मीद कर रही है, जहां पिछले साल विधानसभा चुनाव में उसने भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को हराकर सत्ता हासिल की थी. 2019 में राज्य की 17 लोकसभा सीटों में से नौ पर बीआरएस (जो तब टीआरएस हुआ करती थी), चार पर भाजपा और तीन पर कांग्रेस जीती थी और एक सीट एआईएमआईएम (ऑल-इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) के खाते में गई थी.

बीआरएस की स्थिति के कमजोर पड़ने से राज्य में अब कांग्रेस और भाजपा के बीच ही सीधी लड़ाई नजर आ रही है. अमिताभ तिवारी कहते हैं, "कांग्रेस के लिए यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि जब भाजपा मुख्य प्रतिद्वंद्वी होती है तो कांग्रेस लड़खड़ा जाती है और उसके नेता आसानी से बैकफुट पर आ जाते हैं."

वहीं, आंध्र प्रदेश में 'इंडिया' ब्लॉक ने एक संभावित सहयोगी खो दिया. पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया. कांग्रेस की मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी (युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी) के साथ हमेशा से सियासी प्रतिद्वंद्विता रही है और राज्य में उसके चुनावी अभियान की कमान मुख्यमंत्री की बहन वाई.एस. शर्मिला संभाल रही हैं.

इस त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस को फायदे का सीधा मतलब होगा एनडीए-विरोधी वोटों में विभाजन, जिसका लाभ परोक्ष रूप से विरोधी गठबंधन को मिल सकता है. इसके अलावा, शर्मिला का विधानसभा चुनाव के बजाए लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला दर्शाता है कि कांग्रेस 2009 में उसे केंद्र की सत्ता में पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस राज्य में अपनी जमीन खोना नहीं चाहती.

एक अदद नेता की तलाश

प्रधानमंत्री मोदी की छवि निर्णायक नेता और देश को दिशा प्रदान करने वाले की बनी हुई है, वहीं विपक्षी खेमा व्यक्तिगत या संकीर्ण एजेंडे से प्रेरित नेताओं के अस्थिर झुंड की तरह देखा जा रहा है.

मैसूरू यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर कृष्णा होम्बल का मानना है कि लोग मोदी को निर्णय लेने में सक्षम नेता के तौर पर देखते हैं जिसने विकास को आगे बढ़ाया और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को भी निभाया. ज्यादातर विपक्षी नेताओं के पास अपने प्रदर्शन को लेकर दिखाने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं है.

अपनी बात में वे आगे कहते हैं कि 'इंडिया’ को ऐसे दलों का जमावड़ा माना जा रहा है, जो सरकार चलाना तो दूर, एक-दूसरे पर भी भरोसा नहीं करते. कोलकाता में प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर जाद महमूद का इस पर तर्क देते हैं कि विपक्ष के उठाए सभी मुद्दों की गूंज जमीन पर है. लेकिन क्या वोटर फर्क लाने के लिए विपक्षी पार्टियों पर यकीन कर सकता है? असली सवाल यही है.

विपक्षी गठजोड़ में एक ऐसे नेता का भी अभाव है, जो लोगों में आकर्षण पैदा कर सके और खासकर केंद्र में सरकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को चुनौती दे सके.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर संगीत कुमार रागी बताते हैं, "नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति का व्याकरण बदल दिया है. आमने-सामने की लड़ाई वाले लोकसभा चुनावों में भी विपक्षी दल अब तक उन्हें अपनी भाषा में जवाब देने में सक्षम नहीं हो पाए हैं. अक्सर, वे बुरी तरह से उनकी कॉपी करते नजर आते हैं."

वैसे, राहुल गांधी सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी बने हुए हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता में बहुत ज्यादा अंतर है. फरवरी 2024 में इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में 55 फीसद लोग मोदी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते थे, जबकि राहुल के मामले में यह आंकड़ा 15 फीसद था. एक तथ्य यह भी है कि अक्सर वे ऐक्शन में नजर आने से चूक जाते हैं या अनजाने में गफलतों की वजह से अपनी गंभीरता की छवि का नुकसान कर बैठते हैं.

चुनावों में एक पखवाड़े का ही समय बचा है और गांधी भाई-बहन ने अभी तक अमेठी या रायबरेली से चुनाव लड़ने को लेकर अपने इरादे साफ नहीं किए हैं, जबकि मां सोनिया ने राज्यसभा का रास्ता चुन लिया है. राहुल के बचाव में उनके सहयोगी इसके पीछे उनके दीर्घकालिक दृष्टिकोण का तर्क देते हैं. एक सहयोगी कहते हैं, "वे भविष्य की वैचारिक लड़ाई की रूपरेखा तय करना चाहते हैं. एक बार जब लोग उनके संदेश को समझ जाएंगे, तो नतीजा अपने आप सामने होगा."

कुछ अन्य को 2004 का इतिहास दोहराने की उम्मीद है जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे और भाजपा के भारत उदय वाले नैरेटिव को चुनौती देने के लिए मैदान में दूर-दूर तक कोई विपक्षी नेता नजर नहीं आ रहा था. फिर भी पासा पलट गया था.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो. नारायण सुकुमार का मानना है कि लड़ाई जब विचारधाराओं की हो तो नतीजा कोई चेहरा तय नहीं करता. वे कहते हैं, "इस मुकाबले को दो विचारधाराओं की लड़ाई के तौर पर देखा जाना चाहिए. यह तो मतदाता तय करेंगे कि कौन-सा पक्ष जीतता है. नेता तो उभर ही आएगा."

भाजपा अपने नेता की लोकप्रियता, हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद का मजेदार मिश्रण और विकास कार्यों पर केंद्र सरकार के रिकॉर्ड के बलबूते अजेय पार्टी नजर आती है, लेकिन चुनावी बॉन्ड पर विवाद, विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों को लगाना तथा उनकी गिरफ्तारियां, पार्टियां तोड़ना और नेताओं का पाला बदलवाने से असहज स्थितियां भी पैदा हो रही हैं. लेकिन विपक्षी दलों को सिर्फ लोकतंत्र की हत्या का भय दिखाने के बजाए वोटर को यह बताना चाहिए कि आर्थिक और सामाजिक अन्याय को दूर करने के लिए उनके पास क्या समाधान हैं. वे यह कितनी निपुणता से करते हैं, इसी से 2024 के चुनावी नतीजे तय होंगे.

खास बातें

- 'इंडिया' ब्लॉक इस तथ्य से सांत्वना ले सकता है कि 2019 में एनडीए का वोट शेयर 45 फीसद था. मतलब यह कि 55 फीसद वोटरों ने भाजपा विरोधी पार्टियों को वोट दिया था. 

- उत्तर प्रदेश और बिहार में 'इंडिया' के घटक दल जाति कार्ड को भुनाने की उम्मीद में हैं, तो पश्चिम बंगाल में ममता को अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के सहारे जीतने की उम्मीद है. 

- आप के अकेले लड़ने के फैसले से पंजाब में लड़ाई चौतरफा हो गई है, जबकि महाराष्ट्र में एमवीए के घटक दलों को भाजपा के तिकड़मी जोड़तोड़ के खिलाफ सहानुभूति लहर की आस है. 

- 'इंडिया' ब्लॉक में कमी ठोस जनाधार वाले मजबूत नेता की है, जो मोदी की लोकप्रियता को टक्कर दे सके. राहुल गांधी न सिर्फ कई बार सक्रिय नहीं दिखते, बल्कि गाहे-बगाहे गफलतें भी उनकी गंभीर छवि को नुकसान पहुंचा जाती हैं. 

- 'इंडिया' के घटक दलों को दक्षिण से ही भाजपा को रोकने की उम्मीद है. तमिलनाडु और केरल में जोरदार प्रदर्शन और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अहम फायदों के साथ यह उम्मीद की जा रही है. 

- गैर-यादव और दलित वोटों की भाजपाई गोलबंदी के मुकाबले के लिए सपा ने पीडीए का नारा दिया. पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों का समीकरण तैयार करने की कोशिश है.

—साथ में, अमिताभ श्रीवास्तव के इनपुट

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