डिजिटल पेमेंट स्टार्ट-अप पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा और एडटेक स्टार्ट-अप बायजूज के सह-संस्थापक बायजू रवींद्रन शख्सियत में इससे ज्यादा अलहदा नहीं हो सकते थे. 45 वर्षीय शर्मा मिलनसार और आक्रामक हैं, और दफ्तर में हों या बाहर, अपने जज्बात जाहिर करने से नहीं हिचकिचाते. दूसरी तरफ, 44 वर्षीय रवींद्रन शर्मीले और थोड़े अंतर्मुखी हैं, बहुत कम बोलने वाले, सिवाय तब जब वे वह काम करते हैं जो उन्हें सबसे अच्छा लगता है, पढ़ाना.
अलबत्ता दोनों में बहुत-सी बातें साझा भी हैं. दोनों छोटे कस्बों में पले-बढ़े, स्थानीय स्कूलों में पढ़ाई की और अंग्रेजी कुछ और करते हुए आनन-फानन में सीखी. एक ने रॉक संगीत के बोल याद करते हुए और दूसरे ने क्रिकेट कमेंटरी सुनते हुए. बहुत साधारण स्थितियों से शुरुआत करके दोनों ने ऐसी मजबूत कंपनियां बनाईं जो तेजी से यूनिकॉर्न बन गईं और वे अपने-अपने कारोबार के पोस्टर बॉय बन गए.
शर्मा डिजिटल पेमेंट के कारोबार में, जहां उनके पेमेंट बैंक में 33 करोड़ डिजिटल वॉलेट हैं, 11.8 करोड़ ग्राहक हैं जिन्होंने उससे जुड़े कर्जदाताओं से 15,500 करोड़ रु. का कर्ज लिया, और उसकी फास्टैग सर्विस के छह करोड़ यूजर हैं जो इसके जरिए देश भर के टॉल बूथों पर डिजिटल भुगतान कर सकते हैं. पेटीएम की पैरेंट कंपनी वन97 कम्युनिकेशंस ने वित्त वर्ष 2022-23 में 6,028 करोड़ रुपए का राजस्व दर्ज किया और 19 नवंबर, 2021 को आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) के जरिए बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने के वक्त इसका मार्केट कैप 1.1 लाख करोड़ रुपए था.
रवींद्रन ने ऑनलाइन शिक्षा के कारोबार में, जहां उन्होंने ऐसा उद्यम खड़ा किया, जिसका मूल्य 2022 में 22 अरब डॉलर (1.8 लाख करोड़ रुपए) था, वित्त वर्ष 2021-22 में जिसने 5,298 करोड़ रुपए का राजस्व कमाया और जिसके पास 12 करोड़ छात्र व 600 ऑफलाइन केंद्र थे. शर्मा ने 1.2 अरब डॉलर (9,950 करोड़ रुपए) की निवल संपदा के साथ 2022 में फोर्ब्स की वर्ल्ड बिलियनेयर लिस्ट में जगह हासिल की, तो रवींद्रन दो साल पहले ही 2020 में 1.8 अरब डॉलर (14,900 करोड़ रुपए) की संपदा के साथ इस सूची में पदार्पण कर चुके थे.
इन अरबपति उद्यमियों ने देश के जानदार स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के मशालचियों के तौर पर सुर्खियां बटोरीं, जिसकी शानदार खासियत नई और मुश्किल स्थितियों के बीच कामयाबी की बलवती इच्छा से आगे बढ़ती उत्साही युवाओं की वह पीढ़ी थी जिसने पारंपरिक नियमों को धता बताते हुए ऐसी कंपनियां शुरू कीं जिन्होंने अक्सर कारोबारों में उथल-पुथल मचा दी. दोनों बिल्कुल अचानक और अप्रत्याशित होने वाली ब्लैक स्वान घटनाओं के बूते फले-फूले.
शर्मा का तब नवजात भुगतान बैंक पेटीएम उस वक्त परवान चढ़ा जब 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के कदम ने अर्थव्यवस्था से नकदी को सोखकर बाहर कर दिया और डिजिटल मुद्रा के इस्तेमाल पर जोर दिया. बायजूज ने तब आसमान की उड़ान भरी जब 2020 में कोविड-19 महामारी ने दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया और ऑनलाइन शिक्षा में अभूतपूर्व उछाल को बढ़ावा दिया.
दोनों स्टार्ट-अप निवेशकों के दुलारे बन गए और उन्होंने इनमें करोड़ों रुपए झोंक दिए. शर्मा की झोली में घरेलू के साथ विदेशी निवेशकों के धन की झड़ी लग गई, जो नवंबर 2020 तक कुल 3.5 अरब करोड़ (29,000 करोड़ रुपए) पर पहुंच गया. उन्होंने इस धन से अधिग्रहण किया और अपने भुगतान कारोबार का जबरदस्त विस्तार किया. रवींद्रन को 2020 और 2023 के बीच 4.8 अरब डॉलर (39,750 करोड़ रुपए) जितनी ज्यादा रकम मिली, जिसका इस्तेमाल उन्होंने भारतीय के साथ विदेशी सब्सिडरी कंपनियों की चेन का अधिग्रहण करने के लिए किया.
हालांकि दोनों ही कंपनियां तितर-बितर होने से पहले तेज चमकने वाले उल्कापिंडों की तरह 2023 के आखिर तक अलग-अलग वजहों से थकान अनुभव करने लगीं. न केवल दोनों के बाजार मूल्य धड़ाम से नीचे आ गिरे बल्कि भारत के स्टार्ट-अप धमाके के हैरतअंगेज कामयाब होनहारों के तौर पर उनकी साख और प्रतिष्ठा भी.
दो साल पहले 1,564 रुपए के शिखर से पेटीएम के शेयर की कीमत 6 मार्च को 393 रुपए और इसका बाजार पूंजीकरण नवंबर, 2021 के उसके मूल्य से एक-चौथाई महज 24,961 करोड़ रुपए था. बायजूज की संपदा भी 2022 में 22 अरब डॉलर (1.8 लाख करोड़ रुपए) के मूल्य के शिखर से इस वक्त 22 करोड़ डॉलर (1,820 करोड़ रुपए) पर आ गई, जो 99 फीसद की गिरावट है.
शर्मा और रवींद्रन जहां अपने-अपने रसातलों से वापस ऊपर आने के लिए जूझ रहे हैं, उनके तेज उत्थान और गहरे पतन का भारत की सरपट छलांग भरती स्टार्ट-अप व्यवस्था पर होश दुरुस्त कर देने वाला असर पड़ा है, जहां निवेशक उनमें पैसा लगाने को लेकर लगातार ज्यादा से ज्यादा चौकस और सावधान होते जा रहे हैं.
दोनों अनुकरणीय आदर्श से इस बात के उदाहरण बन गए कि कैसे अतिमहत्वाकांक्षा और अतिरेक आपको ऐसी विनाशकारी मूर्खताएं करने और अपने साम्राज्य को नाटकीय ढंग से डांवांडोल करने पर मजबूर कर सकते हैं, जिनमें सभी भारतीय कारोबार के लिए सबक निहित हैं. यह पता लगाने के लिए यह सब कैसे घटित हुआ, पहले तो यह जानना होगा कि यह कैसे शुरू हुआ. तो यहां प्रस्तुत है विजय शेखर शर्मा और बायजू रवींद्रन के उत्थान और पतन की कहानी.
पेटीएम की गाथा
विजय शेखर शर्मा उद्यमिता के अपने सफर पर जल्द ही निकल पड़े. स्कूल की पढ़ाई उन्होंने उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के नजदीक एक छोटे-से कस्बे हरदुआगंज से की, जहां उनके पिता सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे और परिवार बमुश्किल गुजारा कर पाता था. उन्होंने अपने दम पर अंग्रेजी सीखी ताकि इंजीनियर कॉलेज में दाखिले की परीक्षा पास कर सकें.
उन्हें दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी) में दाखिला मिला और पढ़ाई के दौरान ही वे कंपनियों के लिए वेब प्रोग्राम लिखकर काफी पॉकेट मनी कमा लेते थे. उस वक्त वे उम्र के बीसेक साल में ही थे जब उन्होंने तीन दोस्तों के साथ कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम कंपनी एक्सएस कोर! शुरू की, जिसे उन्होंने 1999 में एक अमेरिकी फर्म को 1 अरब डॉलर में बेच दिया.
इस पैसे से उन्होंने टेलीफोन नंबरों के लिए ऑनलाइन सर्च इंजन वन97 कम्युनिकेशंस लॉन्च किया और इसका यह नाम इसलिए रखा क्योंकि 197 एनालॉग टेलीफोन डायरेक्टरी का हेल्पलाइन नंबर था. जब पैसे की तंगी होने लगी, तो शर्मा के साझेदारों ने हाथ खींच लिए और उन्होंने वेबसाइट को खबरें, क्रिकेट स्कोर और संगीत की पेशकश करने वाली वेबसाइट में बदल लिया.
बाद में प्राइवेट फोन कंपनियों के सहारे वे एसएमएस और डेटा पैक और रोमिंग सेवाओं सरीखे ऑनलाइन प्रीपेड उत्पाद बेचने लगे. मोबाइल ऐप और खासकर गेमिंग के मोबाइल ऐप लॉन्च होने के बाद शर्मा स्मार्टफोन की ताकत को समझने वाले पहले लोगों में थे. भारत में इन ऐप की खरीदारी के लिए कोई भुगतान व्यवस्था नहीं थी. इसलिए शर्मा ने 2010 में पेटीएम (पे थ्रू मोबाइल) शुरू किया और अपनी पहचान बनाने लगे.
फिनटेक यानी वित्तीय टेक्नोलॉजी कंपनी यूट्रेड सॉल्यूशंस के सह-संस्थापक और सीईओ कुणाल नंदवाणी कहते हैं, "पेटीएम कुछ मायनों में भारत में डिजिटल भुगतान लेकर आया. इसने हमें इतने साल तक पेटीएम के क्यूआर कोड का इस्तेमाल करना सिखाया. पेटीएम 2016 तक बेशकीमती था, क्योंकि उसके पास मर्चेंट नेटवर्क था. वेंचर कैपिटलिस्ट से मिले धन की बदौलत कुछ वक्त तो उन्होंने कोई शुल्क वसूल नहीं किया."
उस वक्त शर्मा को जानने वाले याद करते हैं कि स्टार्ट-अप उद्यमी होने के नाते वे बहुत ऊर्जावान और खासे जानकार थे, और आंकड़ों तथा फैसलों पर नियंत्रण रखते थे. दफ्तर स्थापित करने में पेटीएम की मदद करने वाली प्रशासनिक टीम के एक पूर्व कर्मचारी कहते हैं, "बैठकों में आने से पहले वे होमवर्क करते, भले वह उनकी विशेषज्ञता के दायरे में न हो, जैसे दफ्तर के लिए नई जगहें लीज पर लेना."
दूसरे याद करते हैं कि किस तरह शर्मा में यूजर के मनोविज्ञान को समझने और उत्पाद गढ़ने की जबरदस्त प्रतिभा थी. दफ्तर में शर्मा ने अपने वर्कस्टेशन पर बोस स्पीकर लगवाए थे और वे अक्सर पिंक फ्लॉयड और यू2 सहित रॉक संगीत के अपने पसंदीदा गाने बजाया करते थे.
वन97 कम्युनिकेशंस में एचआर के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट नीलेश सिंह याद करते हैं कि उनमें मोलभाव की भी बहुत तीक्ष्ण सूझबूझ थी, उनकी नजर बेहद पारखी थी और बातचीत के दौरान वे सबसे अहम बात पकड़ लेते थे. नीलेश सिंह ने इंडिया टुडे को बताया, "वे सारा गुणा-भाग मन ही मन चुटकी बजाते कर लेते और सारे सही सवाल पूछते."
शर्मा ने 2015 में पेटीएम क्यूआर कोड के अलावा मूवी टिकट खरीदने और बिलों के भुगतान की सुविधा लॉन्च की. मगर नवंबर 2016 में जब मोदी सरकार ने बड़े मूल्य के नोट रातोरात बंद कर दिए, तो मौका शर्मा की गोद में आ गिरा. उन्होंने राष्ट्रीय अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन छपवाया, जिसमें "स्वतंत्र भारत के वित्तीय इतिहास का सबसे साहसिक फैसला लेने" के लिए प्रधानमंत्री मोदी का शुक्रिया अदा किया गया था. यही वह वक्त था जब उनकी डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल परवान चढ़ा.
अलबत्ता डिजिटलीकरण की भारत की खोज जल्द ही दोधारी तलवार साबित हुई. शुरुआत में जहां इससे शर्मा को अपने कारोबार का दायरा बढ़ाने में मदद मिली, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) के आगमन से वॉलेट बिजनेस खतरे में पड़ गया. गूगल पे और फोनपे सरीखे कई प्लेटफॉर्म पर मुफ्त मिलने वाली इस सुविधा यूपीआई के जरिए ग्राहक कुछ सेकंड में अपने बैंक से व्यापारी के खाते में सीधे भुगतान या व्यक्ति से व्यक्ति के बीच लेन-देन कर सकते थे.
कंसल्टिंग फर्म ऑर्थर डी. लिटिल, इंडिया और साउथ एशिया, के मैनेंजिंग पार्टनर बार्निक मैत्रा कहते हैं, "खालिस भुगतान वाले सारे प्लेटफॉर्म के साथ दिक्कत यह है कि आपका एकाधिकार तो है नहीं. पेटीएम को गूगल पे सहित कई धनी-मानी खिलाड़ियों से लड़ना पड़ता, जिनके 2017-18 में आने की उम्मीद थी. ढांचागत तौर पर मूल कारोबार बहुत मुफीद नहीं था."
शर्मा को इन सीमाओं का एहसास था, लिहाजा उन्होंने तेजी से दूसरे क्षेत्रों में पैर पसारना शुरू किया. 2017 में पेटीएम ने पीपीबी या पेटीएम पेमेंट बैंक, और पीटीएम गोल्ड, पेटीएम इनसाइडर और पेटीएम फास्टैग सरीखी दूसरी शाखाएं लॉन्च कीं. 2018 में उन्होंने पेटीएम मनी, जो स्टॉक ब्रोकिंग फर्म है, पेटीएम पोस्टपेड और फर्स्ट गेम्स लॉन्च किए.
मैत्रा कहते हैं, "इरादा संपदा पैदा करने वाले कारोबारों में पैर फैलाने का था. बैंकिंग उनमें से एक था और इसने दिखाया कि कंपनी अपनी सहायक सेवाओं के आधार पर मुनाफा कमाने की राह पर जा सकती है."
पीपीबी में शर्मा की 51 फीसद हिस्सेदारी है, जबकि बाकी हिस्सेदारी पेटीएम के पास है. दूसरी तरफ वन97 कम्युनिकेशंस में उनकी हिस्सेदारी सितंबर 2023 तक 19.4 फीसद थी, जबकि बाकी सॉफ्टबैंक, एलीवेशन कैपिटल और ऐंट ग्रुप सहित विभिन्न निवेशकों के पास थी.
2019 में पेटीएम ने अपने प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों और व्यापारियों को तुरत-फुरत डिजिटल कर्ज की पेशकश करने के लिए डिजिटल गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) क्लिक्स फाइनांस के साथ हाथ मिलाया. कर्ज बांटने के लिए उसने करीब 10 बैंकों और एनबीएफसी के साथ भी भागीदारी कायम की.
पेटीएम ने मुख्य रूप से भुगतान प्रोसेसिंग और सब्सक्रिप्शन राजस्व से धन कमाया. इसने प्रोसेसिंग पर ग्रॉस मर्चेंडाइड वैल्यू (जीएमवी) या सकल व्यापारिक मूल्य के 0.07-0.09 फीसद का विशुद्ध भुगतान मुनाफा हासिल किया, जिसमें यूपीआई 0.03-0.04 फीसद और दूसरे साधन 0.15-0.18 फीसद देते हैं.
फिर इसने व्यापारियों के बीच पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) डिवाइस से धन कमाया, जो 100 रुपए औसत मासिक सदस्यता शुल्क और हाइ-एंड डिवाइस के लिए 250 रुपए के हिसाब से मिलता है. कर्ज बांटने के जरिए इसने वितरण के समय कर्ज के मूल्य का 2.5-3.5 फीसद और संग्रह के समय मौजूदा वितरण मूल्य का 0.5-1.5 फीसद हासिल किया.
तिस पर, पेटीएम के राजस्व में इजाफा होने के बावजूद उसकी परेशानियां भी जाहिर होने लगीं. विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनी वहां लड़खड़ाई जहां वह ऐसी कोई अलग पेशकश नहीं कर पाई जिसमें कुछ न कुछ धन और मुनाफे की गारंटी होती. हर किस्म की वित्तीय सेवाओं में उतरने की कोशिश में उसका ध्यान बंट गया. लिहाजा पेटीएम 'सुपरऐप' को तो नाकाम होना ही था.
मैत्रा कहते हैं, "जब आप एक ही वक्त बहुत सारे काम करने का जतन करते हैं, तो कारोबार में कोई विशिष्टता या अलहदापन नहीं रह जाता." इस बीच नवंबर 2021 में 18,300 करोड़ उगाहने के लिए पेटीएम आईपीओ लाया, जो मई 2022 के भारतीय जीवन बीमा निगम के आईपीओ के बाद अब तक दूसरे सबसे बड़ा आईपीओ है.
वन97 कम्युनिकेशंस का शेयर 1,955 रुपए पर सूचीबद्ध हुआ, जो उसकी 2,150 रुपए की ऑफर कीमत से 9.3 फीसद कम था और उसी दिन 1,564 रुपए पर बंद हुआ, जिसकी वजह से निवेशकों को करीब 5,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ बताया जाता है.
आईपीओ से कंपनी को उलटे झटका लगा. हर तिमाही में निवेशकों की छानबीन के दायरे में आने के बाद पेटीएम का अफसाना तितर-बितर होने लगा. नंदवाणी कहते हैं, "पेटीएम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत उसकी गलत कीमत तय होना है." फिर आश्चर्य क्या कि उसके शेयर की खरीद-फरोख्त सूचीबद्ध मूल्य के पांचवें हिस्से पर हो रही है. इसी पड़ाव पर शर्मा लड़खड़ाने लगे. विडंबना यह कि यही वह वक्त था जब बायजूज के रवींद्रन शिखर पर पहुंचने लगे थे.
बायजू का उत्थान
बायजू रवींद्रन की कहानी शर्मा की कहानी से कम दिलचस्प नहीं है. 20 साल की उम्र तक रवींद्रन केरल में तटीय शहर कन्नूर के उपनगर अझिकोड में रहते थे. वहां उनके माता-पिता सरकारी हाइस्कूल में शिक्षक थे. उन पर खेलों की धुन सवार थी और वे विश्वविद्यालय स्तर पर क्रिकेट, फुटबॉल और टेबल टेनिस खेलते थे. उन्होंने रेडियो पर क्रिकेट की कमेंटरी सुनते हुए अंग्रेजी सीखी और कन्नूर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
ग्रेजुएशन करने के बाद रवींद्रन एक शिप मैनेजमेंट कंपनी से जुड़ गए, जिसने उन्हें अगले तीन साल जहाज की मरम्मत करते और गड़बड़ियां दुरुस्त करते हुए दुनिया के सफर का मौका दिया. सालाना छुट्टियों में जब वे घर आते, तो बेंगलूरू के अपने दोस्तों से संपर्क करते, जिनमें से कुछ आईटी फर्म में काम कर रहे थे और एमबीए प्रोग्रामों में दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षा कॉमन एडमिशन टेस्ट (सीएटी या कैट) की तैयारी कर रहे थे.
गणित के दीवाने रवींद्रन ने पाया कि उनमें पढ़ाने की स्वाभाविक क्षमता है. 2006 में उन्होंने 35 छात्रों की खेप के लिए, जिनमें से सब उनके दोस्त और परिचित थे, बेंगलूरू के कोरामंडल मोहल्ले में अपनी पहली संडे मॉर्निंग कक्षा आयोजित की. छठी कक्षा आते-आते, टेक्नोलॉजी के हलकों के गंभीर अभिलाषियों तक सोशल मेसेजिंग सेवा ऑरकुट के जरिए उनकी ख्याति फैलने के बाद छुट्टियों के शगल के तौर पर शुरू हुई इन कक्षाओं में 1,200 जितनी भारी तादाद में छात्र खिंचे चले आए. फिर कक्षाएं बड़े सभागारों में लगाई जाने लगीं और रवींद्रन जल्द ही चेन्नई, पुणे और मुंबई का सफर करने लगे, जहां उनकी कक्षाओं की भारी मांग थी. उनका शिपिंग करियर तो खैर खत्म ही हो गया.
रवींद्रन ने 2011 में थिंक ऐंड लर्न (टीऐंडएल) प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई. यही कंपनी बायजूज ब्रांड की मालिक है. एक साल बाद अपनी लोकप्रिय कक्षाओं को हाइब्रिड ऑनलाइन वीडियो फॉर्मेट में ले जाने के लिए उन्होंने सीड फंडिंग उगाहना शुरू किया. बायजूज में रवींद्रन और उनके परिवार की 26.3 फीसद हिस्सेदारी है. 2015 आते-आते बायजूज अपनी भौतिक कक्षाओं को चरणबद्ध तरीके से कम कर रही थी, ताकि अपने लर्निंग ऐप के जरिए वह ऐसी टेक-एनेबल्ड फर्म बन सके जो टैबलेट के जरिए किंडरगार्टन से 12वीं कक्षा तक के छात्रों के लिए सुलभ हो.
बायजूज 1 अरब डॉलर के मूल्य निर्धारण के साथ 2018 तक यूनिकॉर्न बन चुकी थी. कोविड महामारी का हमला होते ही जबरदस्त कामयाबी और धन बायजूज के हाथ लगा, जब ऑनलाइन कक्षाओं में अपने बच्चों के नाम लिखवाने के लिए माता-पिताओं में मारामारी मच गई, क्योंकि स्कूल लंबे वक्त के लिए बंद हो गए थे.
फर्म को राजस्व अपने ऑनलाइन लर्निंग ऐप और भौतिक ट्यूशन केंद्रों के सब्सक्रिप्शन से मिला, जो लोअर किंडरगार्टन से कक्षा 3 के लिए शुरुआती शिक्षण सामग्री, चौथी से ऊपर की कक्षाओं के लिए सेल्फ-स्टडी पैक, लाइव कक्षाएं और वीडियो लेसन, और जेईई, एनईईटी, सीएटी, यूपीएससी और दूसरी प्रवेश परीक्षाओं के लिए ऑनलाइन लाइव कक्षाएं और क्रैश कोर्स मुहैया करते थे.
दाखिलों की तेज बढ़ती रफ्तार के साथ फर्म की फंडिंग में उछाल आ गई. उत्साह और जोशो-खरोश से भरे रवींद्रन उगाही गई पूंजी से एडटेक कंपनियों को चुनते हुए खरीदारी के सफर पर निकल पड़े. नतीजा यह हुआ कि उनका कारोबार ऑनलाइन लर्निंग ऐप से ऑफलाइन ट्यूशन केंद्रों तक फैल गया. ट्रांजैक्शन एडवाइजरी फर्म फीनिक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित खन्ना कहते हैं, "बायजू में एक हुनर यह है कि वे बेहतरीन सेल्सपर्सन हैं."
"वे कहेंगे कि सौदा करने के लिए इस वक्त किस चीज की जरूरत है." खन्ना का मानना है कि रवींद्रन के लिए दो चीजें कारगर रहीं. वे कहते हैं, "एक तो विदेशी फंडों में भारत आने की जबरदस्त भूख लगातार बढ़ती जा रही थी, क्योंकि चीन ने अपने एडटेक कारोबार पर ताले डाल दिए थे." उनका इशारा 2021 में चीन की तरफ से ऑनलाइन एडटेक पर लगाई गई सख्त पाबंदियों की तरफ था. वे आगे कहते हैं, "दूसरा कोविड की वजह से एडटेक के लिए यह पूरी अनुकूल हवा थी."
मगर जब आकाश के ट्रांजैक्शन एडवाइजर के तौर पर खन्ना टीऐंडएल के साथ बातचीत की मेज पर बैठे, तो उन्हें टीऐंडएल के बारे में कुछ अजीब लगा. जनवरी और अगस्त 2021 के बीच बातचीत के पूरे वक्त के दौरान टीऐंडएल का कोई मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) नहीं था.
पीछे मुड़कर देखने पर बाजार पर नजर रखने वाले ज्यादातर जानकार मानते हैं कि टीऐंडएल की परेशानियां लंबे वक्त से चली आ रही थीं, यहां तक कि तब भी जब फर्म का मूल्य निर्धारण आसमान छू रहा था. उनका मानना है कि बहुत लंबे वक्त तक सीएफओ का न होना उन बहुत-सी वजहों में से एक था जिसके चलते 2023 में वह बर्बादी के कगार पर आ गई. यही वह वक्त था जब शर्मा का बनाया पेटीएम का विशाल साम्राज्य चरमराने लगा था.
पेटीएम की गड़बड़ियां
अधिकांश स्टार्ट-अप उद्यमियों की तरह शर्मा ने भी पहले कारोबार बढ़ाने पर फोकस किया और नियम-कायदों की फिक्र बाद के लिए छोड़ दी. पेटीएम के जोखिम और नियम-कायदे टीम के एक पूर्व कर्मचारी के मुताबिक, शायद इसीलिए समस्याएं बढ़ती गईं. दरअसल, पेटीएम का शुरू से ही यह रवैया था कि उसका काम नियामकों को ही जागरूक करना है कि यह नए दौर की टेक्नोलॉजी कंपनी है, इसलिए कुछ अलग तरीके से चलेगी, इसमें कुछ भी गलत नहीं है, यह बात नियामकों को समझने की जरूरत है.
डेटा एनालिटिक्स विभाग के एक दूसरे पूर्व कर्मचारी ने बताया कि ग्राहकों को नकदी निकालने या जमा करने में मदद करने वाले पेटीएम के बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट और केवाईसी (अपने ग्राहक को जानें) एजेंट कमीशन बनाने के चक्कर में लेनदेन में हेराफेरी करते थे. ऐसे बेईमान एजेंटों ने लाखों 'निष्क्रिय वॉलेट' भी जोड़ लिए थे.
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भुगतान बैंकों के लिए लाइसेंसिंग नियमों का पेटीएम को उल्लंघन करते पाया, तो 2018 के बाद से ऐसे तमाम मसलों पर लाल झंडी दिखानी शुरू कर दी. इन मसलों में उसके वॉलेट लेनदेन पर निगरानी का अभाव और पेटीएम से बैंकिंग भागीदार पीपीबी को रकम हस्तांतरण की फर्जी जानकारी पेश करना शामिल था. बैंक के पास अब पेटीएम के सभी 33 करोड़ वॉलेट खाते हैं.
कम से कम चार मौकों पर आरबीआई ने पीपीबी की लाइसेंसिंग शर्तों के उल्लंघन, गलत जानकारी देने और टेक्नोलॉजी तथा साइबर सुरक्षा में खामियों के आरोपों पर खिंचाई की है. अक्टूबर 2023 में आरबीआई ने केवाईसी मानदंडों की 'लगातार अवहेलना' के लिए पीपीबी पर 5.39 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया. आरबीआई के मुताबिक, उसने पीपीबी के खातों का एक बाहरी ऑडिट भी कराया था, जिसमें कथित तौर पर बैंक में नियमों की लगातार अवहेलना और हमेशा जांच-परख के अभाव का पता चला, जिससे कड़ी निगरानी की जरूरत पड़ी. हालांकि, केंद्रीय बैंक ने इसके ब्यौरे जाहिर नहीं किए.
पेटीएम ने इस मामले में इंडिया टुडे के सवालों का जवाब नहीं दिया. जानकारों का कहना है कि आरबीआई भुगतान लेनदेन की निगरानी में भारी ढिलाई या कर्ज सहित दूसरी सेवाओं का लाभ उठाने वाली संस्थाओं की जोखिम जानकारी को लेकर चिंतित था, और उसे डर था कि ऐसे लेनदेन में फर्जीवाड़े और मनी-लॉन्ड्रिंग की आशंका है.
कथित तौर पर पेटीएम 31 जनवरी को केंद्रीय बैंक के सवालों का जवाब देने में नाकाम रहा, तो उसने पीपीबी को 29 फरवरी तक नए क्रेडिट और जमा, टॉप-अप, फंड ट्रांसफर और अन्य सभी बैंकिंग गतिविधियों बंद करने का आदेश दिया (बाद में तारीख बढ़ाकर 15 मार्च कर दी गई). ग्राहक अपने पीपीबी खातों से सिर्फ शेष राशि निकाल सकते हैं, वे कोई सामन्य बैंकिंग लेनदेन नहीं कर सकते.
कारोबार बंद होने का मतलब होगा कि वन97 कम्युनिकेशंस के एबिड्टा यानी ब्याज, कर, मूल्यह्रास और कंपनी के मुनाफे में अहम परिशोधन पूर्व कमाई की मद में औसतन 300-500 करोड़ रुपए का नुकसान. तिस पर, उसका घाटा पहले ही बढ़कर वित्त वर्ष 23 में 1,856 करोड़ रु. हो चुका है.
हालांकि इसका आकलन अभी संभव नहीं है कि शर्मा और उनकी प्रतिष्ठा को दीर्घकालिक नुकसान क्या होगा. अलबत्ता, उनका कहना है कि नाकामियों के बावजूद वे 'पेटीएम को एशिया लीडर' बनाने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे. दूसरी ओर, ऐसे ही झटके और प्रतिष्ठा में वैसी ही गिरावट रवींद्रन के चौखटे पर खड़ी है. हालांकि वजहें कुछ अलग किस्म की हैं.
बायजू का स्याह पक्ष
कोई नहीं जानता कि टीऐंडएल के पास 2021 और 2023 के बीच 16 महीनों तक सीएफओ क्यों नहीं था, जबकि 2021-22 के कंपनी के लेखा-जोखा के ऑडिट में साल भर से अधिक की देरी हुई थी. इस दौरान मीडिया खबरों के मुताबिक, कंपनी की 2021-22 में कुल देनदारी बढ़कर 17,678 करोड़ रुपए हो गई थी. रवींद्रन की लुकाछिपी ने शायद मामले को और बदतर बना दिया है.
उन्हें कंपनी खड़ी करते देख चुके एक व्यक्ति कहते हैं, "रवींद्रन प्रतिभाशाली हैं और नए आईडिया लेकर आ सकते हैं और टीम की अगुआई कर सकते हैं. वे बहुत ही तेज हैं, लेकिन लोगों के साथ व्यवहार में बहुत खुले और पारदर्शी नहीं हैं."
टीऐंडएल की समस्या जून 2023 से शुरू हुई जब तीन निवेशकों, प्रोसस, पीक एक्सवी पार्टनर्स और चैन जुकरबर्ग इनिशिएटिव ने उसके बोर्ड से इस्तीफा दे दिया. प्रोसस ने 25 जुलाई, 2023 को एक बयान में कहा, "2018 में हमारे पहले निवेश के बाद से बायजूज में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन, समय के साथ उसकी रिपोर्टिंग और कामकाज संचालन का तंत्र कंपनी के पैमाने के हिसाब से विकसित नहीं हुआ."
"हमारे निदेशक की लगातार कोशिशों के बावजूद, बायजूज के कार्यकारी नेतृत्व ने रणनीतिक, संचालन, कानूनी और कॉर्पोरेट मामलों से संबंधित सलाह और सिफारिशों की लगातार उपेक्षा की. बायजूज के बोर्ड से हमारे निदेशक के हटने का फैसला तब लिया गया जब यह साफ हो गया कि वह कंपनी और उसके संबंधित लोगों के दीर्घकालिक हितों को साधने के अपने कर्तव्य को पूरा करने में समर्थ नहीं थे."
कॉर्पोरेट गवर्नेंस सलाहकार फर्म इनगवर्न रिसर्च सर्विसेज के प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रह्मण्यम कहते हैं, "बायजूज हमेशा अपने संस्थापकों और निवेशकों की पूरी जानकारी में वैल्यूशएशन बढ़ाने में लगी थी. जब कंपनी में सीएफओ या समय पर वित्तीय लेखेजोखे को जाहिर करने की प्रक्रियाएं और प्रणालियां नहीं थीं, तो निवेशक सो रहे थे."
उनके मुताबिक, ये आरोप बार-बार उठते रहे कि कंपनी की वित्तीय जानकारी निवेशकों को उपलब्ध नहीं है. वे कहते हैं, "जब तक वैल्यूएशन का गुब्बारा फूल रहा था, निवेशक खुश थे." उनका मानना है कि यह पीछे छूट जाने के डर से उपजा है. इस बीच, बायजू के उत्पादों को गलत तरीके से बेचे जाने की शिकायतें बढ़ीं, जिस पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने चिंता जताई थी. उसके बाद, टीऐंडएल ने दावा किया कि वह साफ-साफ जानकारी और उसके साथ सुरक्षा उपाय ले आया था.
तीन निवेशकों ने बोर्ड छोड़ दिया, तो कंपनी आईटी दिग्गज टी.वी. मोहनदास पै और एसबीआई के पूर्व चेयरमैन रजनीश कुमार को बोर्ड में बतौर सलाहकार ले आई, जिसमें रवींद्रन, उनकी पत्नी दिव्या गोकुलनाथ और भाई रिजु रवींद्रन शामिल थे.
इन घटनाक्रमों से जुड़े एक व्यक्ति का कहना है कि निवेशकों के साथ कई बैठकें की गईं और कई कॉर्पोरेट संचालन परंपराएं शुरू की गईं, वित्त वर्ष 22 के लिए ऑडिट पूरा हो चुका था और वित्तीय ब्यौरे नवंबर 2023 में जाहिर किए गए थे. भारत में कामकाज के लिए नए सीईओ अर्जुन मोहन भी नियुक्त किए गए, और नकदी की समस्या सुलझाने की कोशिशें भी की गईं. कर्मचारियों की संख्या भी 2022 में 55,000 की उंचाई से घटकर लगभग 15,000 हो गई थी. उस व्यक्ति के मुताबिक, "काफी कटौती की गई लेकिन कंपनी चलाने के लिए फौरन नकदी की जरूरत है."
मामला फरवरी में आखिरी मुकाम पर पहुंच गया. निवेशकों के एक समूह ने संस्थापक को कंपनी पर नियंत्रण से हटाने के लिए असाधारण आम सभा की बैठक (ईजीएम) बुलाई. हालांकि, संस्थापकों ने 20 करोड़ डॉलर (1,656 करोड़ रुपए) के राइट्स ईश्यू के जरिए धन जुटाने की कोशिश की, जिसे इस साल जनवरी में 22-25 करोड़ डॉलर के कंपनी वैल्युएशन पर जारी किया गया था.
दोनों पक्ष अदालत पहुंच गए. टीऐंडएल ईजीएम को अमान्य करने की मांग को लेकर कर्नाटक हाइकोर्ट पहुंची. निवेशक राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में राइट्स ईश्यू पर रोक लगाने की मांग को लेकर पहुंचे, जिससे उन्हें डर था कि अगर उन्होंने सब्सक्राइब नहीं किया तो उनकी शेयरहोल्डिंग घट जाएगी. कर्नाटक हाइकोर्ट ने 13 मार्च को सुनवाई की अगली तारीख तक ईजीएम में किसी भी फैसले पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. उधर, एनसीएलटी ने टीऐंडएल को राइट्स ईश्यू वापस न लेने और उसके जरिए जुटाई गई रकम को अलग एस्क्रो खाते में रखने का निर्देश दिया.
फिलहाल, कंपनी ने अभी तक कर्मचारियों को फरवरी का वेतन नहीं दिया है, जबकि कर्मचारियों की भविष्य निधि, वेंडरों और अन्य सेवा प्रदाताओं से संबंधित भुगतान बकाया है. इस महीने की शुरुआत में राइट्स इश्यू बंद होने के बाद कर्मचारियों को लिखे एक पत्र में रवींद्रन ने कहा, "मैं चाहता हूं कि आप जानें कि मैंने आपके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करने का रास्ता खोजने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है और निडर होकर अथक प्रयास किया है."
"हालांकि, बेहतरीन कोशिशों के बावजूद हमारे पास दिल दहला देने वाली असलियत का सामना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है कि हम अस्थायी तौर पर आपको वह वित्तीय मदद देने के काबिल नहीं हैं जिसके आप हकदार हैं. हम इस कोशिश में जुटे हैं कि आपके वेतन का भुगतान 10 मार्च तक कर दिया जाए." इस संबंध में इंडिया टुडे के बायजूज को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं आया.
कई विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों कंपनियां कॉर्पोरेट संचालन विधियों में ढिलाई करने की गलती कर बैठीं. वेंचर कैपिटल नेटवर्क, मुंबई एंजेल्स के सह-संस्थापक प्रशांत चोकसी कहते हैं, "यहां दो बातें गौरतलब हैं. एक, कॉर्पोरेट संचालन के तौर-तरीकों का कोई विकल्प नहीं है. दूसरे, किसी को कंपनी के आकार से इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह परिपक्व हो चुकी है."
"पेटीएम के मामले में नियामक का डंडा है, तो बायजूज के निवेशक भड़क गए हैं. दोनों ही कॉर्पोरेट विधियों और परिपक्व कामकाज के मामले में लड़खड़ा गए." शर्मा और रवींद्रन दोनों को अपना खोया कद वापस पाने के लिए खड़े पहाड़ पर चढ़ना होगा. लेकिन दोनों ने साहसी बयान दिया है कि वे अपने कारोबार को बहाल करने और वापसी की दिशा में काम करना जारी रखेंगे.
बहरहाल, शर्मा और रवींद्रन की कहानी स्टार्ट-अप बिरादरी के लिए सबक होनी चाहिए. कॉर्पोरेट संचालन विधियों का पालन कारोबार के एकदम शुरुआत से ही किया जाना चाहिए. मैत्रा कहते हैं, "आज, ऐसी कंपनी चलाने से आप कोरोबार से दूर हो जाएंगे, जिसकी कोई अपनी हर इकाई की आर्थिकी न हो, कोई मुनाफे की न्यूनतम सीमा न हो, सिर्फ पूंजी जुटा-जुटाकर काम चलाया जा रहा हो. यही इस पूरे क्षेत्र में हो रहा है और होता रहेगा."
हालांकि इसके पोस्टर बॉय उद्यमियों के पतन का मतलब यह कतई नहीं होगा कि देश का जीवंत स्टार्ट-अप क्षेत्र थम जाएगा; यह नए उद्यमों से गुलजार रहेगा, जिनमें से कुछ अग्रणी होंगे. लेकिन शर्मा-रवींद्रन की कहानियों से यह संकेत मिलना चाहिए कि अच्छे कॉर्पोरेट तौर-तरीकों और वाजिब मेहनत का कोई विकल्प नहीं है. ये किसी स्टार्ट-अप की यात्रा के हर कदम पर जरूरी हैं. भले ही इसका मतलब उनके सपनों या उनकी महत्वाकांक्षाओं पर कुछ अंकुश लगाना हो.
—अजय सुकुमारन और सोनल खेत्रपाल

