
देश को आनन-फानन काले धन से निजात दिलाने की खातिर नरेंद्र मोदी सरकार के तड़क-भड़क वाले व्यापक कदम नोटबंदी के कुछ ही महीनों बाद 2017 के वित्त विधेयक में जब इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पेश की गई, तो उसे "साफ-सुथरी नकदी के प्रवाह के जरिए राजनैतिक कामों के लिए मिल रहे धन को ज्यादा पारदर्शी बनाने" वाला कदम बताकर खूब ढिंढोरा पीटा गया था.
लुब्बेलुबाब यह कि आप व्यक्ति हों, एनजीओ हों या कॉर्पोरेट कंपनी, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से ब्याज-मुक्त, कर से छूट प्राप्त ये बॉन्ड खरीदकर अपनी पंसद की राजनैतिक पार्टी को दान दे सकते थे और वह तय समय सीमा के भीतर उन्हें भुना सकती थी. यह पारदर्शिता अलबत्ता दानदाता की पहचान पर लागू नहीं थी, और वह गुमनाम बना रह सकता था. उस वक्त इस योजना के मुख्य वास्तुकार वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके पीछे दलील यह दी थी कि दानदाताओं को "राजनैतिक पार्टियों के किसी भी बदले की कार्रवाई" से बचाने के लिए यह जरूरी था.
सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को ऐतिहासिक कहकर सराहे जा रहे एक फैसले में इस चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया. सरकार की पारदर्शिता की दलीलों को मानने से इनकार कर दिया गया. प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्तियों संजीव खन्ना, बी.आर. गवई, जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्र की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 232 पन्नों के सर्वसम्मत फैसले में कहा कि कंपनियों की तरफ से राजनैतिक पार्टियों को असीमित चंदा देना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का उल्लंघन है, क्योंकि इससे कुछ निश्चित व्यक्तियों/कंपनियों को नीति-निर्माण को प्रभावित करने के लिए अपने रसूख और संसाधनों का इस्तेमाल करने का मौका मिल जा सकता है.
यह "एक व्यक्ति एक वोट" की अहमियत में निहित राजनैतिक समानता के सिद्धांत का उल्लंघन था. जजों ने अपने फैसले में कहा कि राजनैतिक चंदे के जरिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कंपनी की क्षमता किसी व्यक्ति की क्षमता के मुकाबले कहीं ज्यादा है. अदालत ने यह भी आदेश दिया कि भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) 13 मार्च तक चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करे.
शीर्ष अदालत के इस फैसले से देश में राजनैतिक फंडिंग के साफ-सुथरे तंत्र की जरूरत पर बहस एक बार फिर छिड़ गई है. राजनैतिक दलों के खजानों में आ रहा बेहिसाबी धन, जो अक्सर किसी न किसी एहसान के बदले आता है, देश में भ्रष्टाचार और चुनावी घपलों-धांधलियों के मूल में रहा है. विचारणीय सवाल यह है कि आम चुनाव से दो महीने पहले इस योजना को रद्द कर देने से क्या देश की राजनीति में आ रहे अकूत धन पर पड़ा अपारदर्शिता का परदा हटेगा.

कम से कम अगली सरकार के शपथ लेने तक कोई समाधान भी नजर नहीं आता. दिल्ली के ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो निरंजन साहू कहते हैं, "आर्थिक और कारोबारी क्षेत्रों पर सरकार और निर्वाचित पदाधिकारियों को जिस किस्म के विवेकाधीन अधिकार हासिल हैं, उसको देखते हुए वे मनचाहे तौर-तरीकों से बेहिसाब धन इकट्ठा करते रहेंगे. राजनीति और चुनाव प्रणाली में व्यापक ढांचागत सुधार नहीं होने के कारण राजनैतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा."
नकदी ही बादशाह क्यों
धन बल के मेल और बोलबाले की बदौलत देश में आम चुनाव बहुत महंगी कवायद हो गए हैं, जिन्हें लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार बताकर दुदुंभी बजाई जाती है. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के 2019 के एक अध्ययन के अनुसार, लोकसभा चुनावों के दौरान चुनाव खर्च 20 साल में छह गुना बढ़ गया - 1998 में 9,000 करोड़ रुपए से छलांग लगाकर 2019 में यह 55,000 करोड़ रुपए पर पहुंच गया.
यह चौंका देने वाली रकम उस साल मनरेगा के लिए किए गए बजटीय आवंटन की 90 फीसद थी, और इसके मद्देनजर कंपनियों की तरफ से दिए गए सार्वजनिक रूप से ज्ञात चंदे राजनैतिक दलों को मिलने वाली कुल रकम के मामूली हिस्सा भर थे.
देश की राजनीति में धन के प्रवाह को तेज और सुगम बनाने के लिए हालांकि चुनावी बॉन्ड को जिम्मेदार ठहराया गया, खासकर इसलिए कि उसने गुमनाम और असीमित धन के प्रवाह को आसान बना दिया, पर कारोबार और राजनीति के बीच सांठगांठ बहरहाल कोई हाल की घटना नहीं है. 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना की अधिसूचना जारी होने से पहले भी कॉर्पोरेट चंदा 2012 और 2016 के बीच राजनैतिक दलों को अज्ञात स्रोतों से मिले कुल धन का भारी-भरकम 89 फीसद था.
2013, जब राजनैतिक संगठनों को चंदा देने मात्र के मकसद से इलेक्टोरल ट्रस्ट या चुनावी न्यास बनाए गए थे, और 2016 यानी चुनावी बॉन्ड की शुरुआत के साल के बीच इन न्यासों के हाथों दिया गया चंदा पार्टियों की तरफ से घोषित कुल रकम का एक-तिहाई था. चुनावी बॉन्ड जारी होने के बाद वह तरीका कम पसंदीदा हो गया. मसलन, 2022-23 में न्यासों से सभी पार्टियों को 366 करोड़ रु. मिले, जबकि चुनावी बॉन्ड से 2,665 करोड़ रु. पार्टियों के खजाने में पहुंच गए.
साल 2018 और 2024 के बीच कुल 16,518 करोड़ रुपए के बॉन्ड बेचे गए. 2013 और 2023 के बीच 10 साल में चुनावी न्यासों ने कुल करीब 2,558 करोड़ रुपए विभिन्न राजनैतिक पार्टियों को बांटे. अगर मान भी लें कि ये सारे दानदाता कॉर्पोरेट थे - 90 फीसद चुनावी बॉन्ड सबसे ऊंचे 1 करोड़ रुपए मूल्यवर्ग के थे - तो बॉन्ड और न्यासों से मिला कुल चंदा सिर्फ 2019 के लोकसभा चुनाव में किए गए खर्च का महज 35 फीसद (19,076 करोड़ रु.) था. अगर राजनैतिक दलों का यकीन करें तो बॉन्ड उनकी आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत हैं. राष्ट्रीय पार्टियों ने कहा कि 2021-22 में उनकी कुल आमदनी का 55 फीसद हिस्सा बॉन्ड के जरिए आया, वहीं क्षेत्रीय पार्टियों के लिए यह 70 फीसद था.
काले धन की बाढ़
तिस पर भी पार्टियों और उम्मीदवारों के घोषित चुनाव खर्च से ही चुनाव प्रक्रिया में बेहिसाबी धन या काले धन के आमद की झलक मिल जाती है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के एक विश्लेषण से पता चला कि 2019 के लोकसभा चुनाव में हर जीतने वाले उम्मीदवार ने औसतन 58 लाख रुपए खर्च किए, जो चुनाव आयोग (ईसीआई) की तरफ से तब तय 70 लाख रुपए की खर्च सीमा से 12 लाख रुपए कम थे.
हारने वाले उम्मीदवारों ने अगर इसका आधा भी खर्च किया हो, तो मैदान में उतरे सभी 8,048 उम्मीदवारों का कुल खर्च 4,667 करोड़ रुपए पर पहुंच जाएगा. इसमें वे 2,591 करोड़ रुपए और जोड़ लीजिए जो 32 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने 2019 के चुनाव में खर्च के तौर पर घोषित किए हैं, तो खर्च की गई रकम बढ़कर 7,000 करोड़ हो जाती है.
हालांकि सीएमएस की गणना के मुताबिक, पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रचार अभियान पर 47,000 करोड़ रु. आंकी गई (सीएमएस के आकलन के हिसाब से कुल खर्च 55,000 करोड़ रु. था, चुनाव आयोग का खर्च 15 फीसद या 8,000 करोड़ रु. था). तो बाकी 40,000 करोड़ रुपए कहां से आए? इस धन के स्रोत का पता लगाने का कोई तंत्र या व्यवस्था अब भी नहीं है और इसके बिना देश के चुनाव नतीजों को भ्रष्टाचार और काले धन के असर से मुक्त नहीं किया जा सकता.
चुनावों में बेहिसाब धन के इस प्रसार की जड़ें देश के राजनैतिक फंडिंग के उस ढांचे में खोजी जा सकती हैं जो पार्टियों को अपनी खाता-बहियों में मनचाहे तरीके से हेरफेर करने की इजाजत देता है. जब राजनैतिक पार्टियां अपनी आमदनी की घोषणा करती हैं, तो इसका बहुत बड़ा हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आए चंदे के तौर पर दिखाती हैं, चाहे वह 'कूपनों की बिक्री’ हो या 'राहत निधि’, या 'विविध आमदनियां’, 'स्वैच्छिक योगदान’ या 'बैठकों में मिला चंदा’.
ऐसे स्वैच्छिक योगदानों के ब्यौरे सार्वजनिक नहीं कराए जाते. दरअसल, ज्यादातर राजनैतिक पार्टियों ने अपने संग्रहीत धन का बहुत बड़ा हिस्सा 20,000 रुपए (जिसे 2017 में घटाकर 2,000 रु. कर दिया गया था) से कम की नकद प्राप्तियों के रूप में दिखाया, क्योंकि इस रकम से कम का चंदा देने वालों का नाम बताना जरूरी नहीं था. बहुजन समाज पार्टी तो 11 साल तक यही घोषित करती रही कि उसे 20,000 रुपए से ऊपर कोई चंदा मिला ही नहीं.
ऐसे अज्ञात स्रोतों से आमदनी 2014-15 और 2015-16 के बीच राजनैतिक पार्टियों को मिली कुल रकम की 66 फीसद थी. 2018-19 और 2021-22 के बीच यह हिस्सा छलांग लगाकर 72 फीसद पर पहुंच गया, हालांकि तब तक नकदी की जगह चुनावी बॉन्ड ने ले ली थी. मसलन, भाजपा की आमदनी को ही लें. 2014-15 में जब चुनावी बॉन्ड नहीं थे, पार्टी ने कुल आय 571 करोड़ रु. घोषित की, जिसमें 461 करोड़ रु. या 81 फीसद अज्ञात स्रोतों से आया बताया गया.
2021-22 में पार्टी ने 1,917 करोड़ रु. की आमदनी की घोषणा की, जिसमें 1,161 करोड़ रु. (या 60 फीसद) अज्ञात स्रोतों से आया बताया गया. चुनावी बॉन्ड से 1,034 करोड़ रु. या 89 फीसद बेहिसाबी रकम आई. भाजपा सरकार ने दावा किया था कि ये बॉन्ड बैंकिंग प्रणाली के रास्ते साफ-सुथरे धन के प्रवाह को प्रोत्साहन देने के लिए लाए गए थे, पर पारदर्शिता लाने के बजाए चुनावी बॉन्ड ने कुल इतना किया कि वे उस धन को औपचारिक अर्थव्यवस्था में ले आए, जिसका लेनदेन पहले नकदी के तौर पर किया जाता था. कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, "बॉन्ड खत्म होने के साथ पार्टियों को 2,000 रुपए से कम की और ज्यादा प्रविष्टियां दिखानी होंगी."
गुमनामी बनाम पारदर्शिता
राजनैतिक फंडिंग की पारदर्शिता और जवाबदेही चंदे, खर्च, और खुलासे के नियम-कायदों और उसके सख्ती से लागू होने पर निर्भर करती है. सुप्रीम कोर्ट के चुनावी बॉन्ड को रद्द करने की एक वजह यह है कि उसकी राय में ऐसे बेनामी बॉन्ड संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मतदाता को मिले सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते थे, क्योंकि उन्हें यह पता नहीं चलता कि किस राजनैतिक पार्टी को चंदा दिया गया. पीठ ने कहा कि ऐसी जानकारी राजकाज में भ्रष्टाचार और एहसान के बदले धन की पहचान के लिए जरूरी है.
अदालत ने यह भी कहा कि दानदाता की निजता जरूरी है, पर संपूर्ण छूट की इजाजत देकर राजनैतिक फंडिंग में पारदर्शिता हासिल नहीं की जा सकती. यह बताते हुए कि इलेक्टरल बॉन्ड काले धन से लडऩे के लिए मौजूद अकेला तरीका नहीं हैं, अदालत ने कहा कि काले धन पर लगाम लगाने का इस योजना का घोषित मकसद इसके सूचना के अधिकार के उल्लंघन को जायज नहीं ठहराता.
पीठ ने कंपनी कानून 2017 की धारा 182 में किए गए उस संशोधन को भी नाजायज घोषित कर दिया जिसमें चुनावी बॉन्ड के जरिए राजनैतिक दल को कंपनी की तरफ दिए जाने वाले चंदे की ऊपरी सीमा - उसके मुनाफे की 7.5 फीसद - को खत्म कर दिया गया था. पीठ ने कहा कि कंपनियों और व्यक्तियों के राजनैतिक चंदों को एक सरीखा मानना संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
ज्यादातर विशेषज्ञ इस मामले में एक राय हैं कि जब तक बेनामी नकद चंदे का प्रावधान कायम रहता है, फिर सीमा भले कितनी भी कम क्यों न हो, देश में पारदर्शिता की जगदीप छोकर का कहना है कि राजनैतिक फंडिंग को साफ-सुथरा बनाने का अकेला तरीका राजनैतिक दलों को नकद भुगतान पर रोक लगाना है. छोकर सवाल करते हैं, "जब हर भुगतान डिजिटल तरीके से होना है, प्रधानमंत्री बिना नकदी भुगतान की वकालत करते रहे हैं, तो राजनैतिक दल ही इससे बाहर क्यों रहें?"
दुनिया भर के ज्यादातर देश पारदर्शिता, जो धन के स्रोतों के खुलासों की मांग करती है, और गुमनामी, जो दानदाताओं को राजनैतिक बदले की कार्रवाई से बचाने के लिए जरूरी है, के बीच संतुलन साधने की मुश्किल से जूझते रहे हैं. चुनावी बॉन्ड के पक्ष में एक दलील यह थी कि गुमनामी का प्रावधान राजनैतिक उत्पीड़न और प्रतिशोध के खिलाफ रक्षा कवच मुहैया करेगा.
कई देशों में छोटे दानदाताओं को तो गुमनाम रहने दिया जाता है, जबकि बड़े दानदाताओं का खुलासा करना जरूरी है. मसलन, ब्रिटेन में पार्टी को एक कैलेंडर वर्ष में एक ही स्रोत से प्राप्त 7,500 पाउंड (करीब 8 लाख रु.) से ज्यादा की कुल रकम के चंदों के बारे में बताना जरूरी है. जर्मनी में पार्टी के लिए यह रकम 10,000 यूरो (तकरीबन 9 लाख रु.) है.
डार्क मनी का उभार
अमेरिका का अनुभव गंभीर चेतावनी है कि कॉर्पोरेट समूहों के धन के प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रवाह की सीमा तय करना क्यों जरूरी है. अमेरिका की राजनैतिक फंडिंग में 2010 से "डार्क मनी" - बेनामी राजनैतिक चंदों - का जबरदस्त उभार देखा गया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में कॉर्पोरेट के धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाली कानूनी व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किया.
सोशल वेलफेयर संगठन और सुपर पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (पीएसी, करों की छूट से नवाजे गए संगठन जो चुनावों या नीतियों-कानूनों को प्रभावित करने के लिए निजी तौर पर धन उगाहते हैं) संघीय अभियानों में "डार्क मनी" के बड़े स्रोत बन गए हैं, क्योंकि दानदाता की पहचान अक्सर अज्ञात बनी रहती है और सार्वजनिक छानबीन से बचाई जाती है.
अमेरिका में राजनैतिक फंडिंग संघीय, राज्य और स्थानीय स्तरों पर होती है. कोई व्यक्ति, पीएसी और सरकार चुनावी अभियानों के लिए सीधे चंदा दे सकते हैं. पीएसी उम्मीदवारों और अभियान समितियों को सीधे धन दे सकती हैं. वे व्यक्तिगत चंदा देने वालों से 5,000 डॉलर तक का चंदा हर साल ले सकती हैं और हर चुनाव के लिए उम्मीदवार को 5,000 डॉलर तक और पार्टी समिति को 15,000 डॉलर तक दे सकती हैं. पीएसी एक और खर्च भी कर सकती हैं जिसे 'स्वतंत्र खर्च’ कहा जाता है, जो पार्टी या उम्मीदवार से स्वतंत्र असीमित खर्च होता है.
संघीय स्तर पर कैंपेन फाइनेंस लॉ के तहत यह जरूरी है कि उम्मीदवार समितियां, पार्टी समितियां और पीएसी अपनी तरफ से उगाहे और खर्च किए गए धन का खुलासा करते हुए समय-समय पर रिपोर्ट दाखिल करें. फेडरल इलेक्शन कमिशन इस डेटाबेस की साज-संभाल करता है और अभियानों तथा चंदा देने वालों के बारे में जानकारी अपनी बेवसाइट पर प्रकाशित करता है.
मगर ऐसे खुलासे हमेशा धन के असली स्रोतों को उजागर नहीं करते, क्योंकि कुछ चंदे "शेल कॉर्पोरेशन" या छद्म कंपनियों के जरिए दिए जाते हैं, जिनके मालिक छिपे रहते हैं. पीएसी असीमित चंदा जमा कर सकती हैं और असीमित रकम खर्च कर सकती हैं. उनके स्वतंत्र खर्च अब स्वतंत्र राजनैतिक फंडिंग का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. 2020 के चुनाव में सारी पीएसी ने मिलकर राजनैतिक पार्टियों, सोशल वेलफेयर संगठनों और उनकी तरफ से किए गए कुल 2.6 अरब डॉलर के स्वतंत्र खर्च का 63 फीसद खर्च किया.
चुनावी धन की सीमा
चुनाव प्रणाली को साफ-सुथरा बनाने के लिए एक बड़ा कदम खर्च की सीमा तय करना है. ज्यादातर देशों ने राजनैतिक दलों या उम्मीदवारों या दोनों की तरफ से किए जाने वाले खर्च की सीमा तय की है. ब्रिटेन, कनाडा और इज्राएल में दोनों के खर्चों की सीमा तय की गई है. अमेरिका में पार्टी के खर्च की सीमाएं हैं पर उम्मीदवार के खर्च पर कोई सीमा तय नहीं है. फ्रांस और जापान में पार्टी के खर्च पर कोई सीमा नहीं है, पर उम्मीदवार का खर्च निर्धारित रकम के भीतर ही होना चाहिए. ब्राजील, जर्मनी, नॉर्वे और स्वीडन में न पार्टी के खर्च पर कोई पाबंदी है और न उम्मीदवार के.
भारत में निर्वाचन आयोग ने चुनावों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के खर्च पर सीमा आयद की है. संसदीय चुनाव के खर्च की सीमा 2022 में बड़े राज्यों में 70 लाख रुपए से बढ़ाकर 95 लाख रुपए और छोटे राज्यों में 54 लाख रुपए से बढ़ाकर 75 लाख रुपए कर दी गई. विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए खर्च की सीमा बड़े राज्यों में 28 लाख रुपए से बढ़ाकर 40 लाख रुपए और छोटे राज्यों में 20 लाख रुपए से बढ़ाकर 28 लाख रुपए कर दी गई.
आयोग की व्यवस्था के तहत उम्मीदवारों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने या अपने चुनाव एजेंट की तरफ से किए गए या अधिकृत सारे खर्च का अलग और सही हिसाब रखें. नतीजे घोषित होने के 30 दिनों के भीतर चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवार को अपने चुनाव खर्च का पूरा लेखा-जोखा जिला चुनाव अधिकारी को प्रस्तुत करना होता है. ऐसा न करने पर आयोग उस उम्मीदवार को तीन साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य करार दे सकता है. मसलन, 2022 में रिपोर्ट पेश नहीं करने की वजह से 88 उम्मीदवार अयोग्य करार दिए गए, जिनमें ज्यादातर निर्दलीय थे.
अगर चुनाव खर्च का ब्यौरा गलत या असत्य पाया जाता है, तब भी ईसीआइ यही कार्रवाई कर सकता है. आयोग हर निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार के खर्च की निगरानी करता है और हिसाब-किताब से बाहर नकदी के प्रवाह पर नजर रखता है. 2019 में देश भर में 3,456 करोड़ रुपए मूल्य की नकदी, नशीले पदार्थ, शराब, बेशकीमती धातु (सोना, चांदी, वगैरह) और मुफ्त खैरातें जब्त की गई थीं.
जब्ती के मूल्य की यह रकम 2014 के लोकसभा चुनाव आयोजित करने के लिए सरकार की तरफ से किए गए आधिकारिक खर्च की रकम की करीब 90 फीसद थी. अलबत्ता ज्यादातर चुनाव आयुक्त स्वीकार करते हैं कि ऐसी बरामदगियां ऊंट के मुंह में जीरा के समान हो सकती हैं. बेनामी धन को जब्त करने की ईसीआइ की शक्ति चुनाव आचार संहिता की घोषणा के बाद ही प्रभावी होती है.
मगर नकदी का प्रवाह बहुत पहले ही शुरू हो जाता है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाइ. कुरैशी कहते हैं, "नेता जानते हैं कि ईसीआइ की आचार संहिता लागू होने के बाद बहुत मुश्किल हो जाता है. इसलिए वे छानबीन से बचते हुए बहुत पहले ही धन लाते-ले जाते हैं." बार-बार यह शिकायत करने के बावजूद कि खर्च की सीमा बहुत कम है, 2019 में लोकसभा के जीतने वाले उम्मीदवारों ने कागजों पर 70 लाख रुपए की खर्च सीमा का महज 83 फीसद ही खर्च किया.
नेताओं का ठंडा रुख
ज्यादातर चुनाव पर्यवेक्षक कहते हैं कि चुनावी पैसे को स्वच्छ करने के लिए न केवल उम्मीदवारों बल्कि राजनैतिक दलों के खर्च की भी सीमा होनी चाहिए. 2010 में मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके ओमप्रकाश रावत कहते हैं, "पार्टी के खर्च की कोई सीमा नहीं है, इसलिए कई बार उम्मीदवार का खर्च भी पार्टी के खाते में दिखा दिया जाता है जिससे उनको खर्च का ब्यौरा छुपाने का मौका मिल जाता है." उनके एक पूर्ववर्ती नवीन चावला कैग से नियुक्त पैनल के जरिए राजनैतिक दलों के खातों की ऑडिट की सिफारिश करते हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और इज्राएल जैसे देशों में पार्टी के खर्चों की सीमा बांधी गई है.
हालांकि किसी भी रंग-पांत के राजनैतिक दल ऐसी सिफारिशों को ज्यादा तवज्जो देते नहीं दिखते. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव का मानना है कि खर्च पर सीमा लगाना अनुचित है क्योंकि राजनैतिक दलों को अपनी बातों और विचारधारा को देश के हर कोने में पहुंचाना होता है. पारदर्शिता के प्रति उनकी स्वाभाविक अनिच्छा उस समय जाहिर हो गई थी जब तकरीबन सभी राजनैतिक दलों ने केंद्रीय सूचना आयोग का 3 जून, 2014 का वह आदेश खारिज कर दिया जिसमें पार्टियों को आरटीआई कानून के दायरे में लाने की बात थी.
अगले साल दो राष्ट्रीय दलों - भाजपा और कांग्रेस - ने एक और जटिल मसले पर गजब का दोस्ताना दिखाया. यह मसला था घरेलू राजनीति में विदेशी धन की आवक. दिल्ली हाईकोर्ट ने एक विदेशी कंपनी से चंदा स्वीकार करने के मामले में दोनों दलों को विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) 2010, जो एफसीआरए 1976 का नया रूप है, के उल्लंघन का दोषी पाया था.
जवाब में भाजपा सरकार ने 2016 के वित्त विधेयक के जरिए पिछली तारीख से एक संशोधन पास किया जिसमें 1976 के बाद से किसी भी राजनैतिक दल को मिले विदेशी चंदे को वैध करार दिया गया. इस संशोधन के तहत वे विदेशी कंपनियां भी राजनैतिक दलों को चंदा दे सकती हैं जिनकी भारतीय कंपनियों में अधिक हिस्सेदारी है. रावत कहते हैं, "यह प्रावधान खतरनाक है क्योंकि इससे हमारे लोकतंत्र के दरवाजे बाहरी प्रभाव के लिए खुल जाते हैं. यह बाहर का कोई भी देश हो सकता है, या यहां तक कि दाऊद इब्राहिम जैसा आतंकवादी भी जो इस खामी का फायदा उठाकर हमारे राष्ट्रीय हितों को गंभीर खतरे में डाल सकता है."
चुनाव में विदेशी चंदे की आवक दुनिया भर में विवाद का मसला रही है. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की इस बात के लिए जांच की जा रही है कि लीबिया के तानाशाह मुअम्मर कज्जाफी ने 2007 के चुनाव अभियान में उन्हें धन दिया. चुनाव में विदेशी प्रभाव एक बार फिर उस समय सुर्खियों में आया, जब 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस के दखल का आरोप लगा. स्टॉकहोम स्थित अंतर-सरकारी संगठन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी ऐंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (इंटरनेशनल आईडीईए) के अनुसार, विदेशी चंदे पर 125 देशों ने (पूरी या आंशिक तौर पर) प्रतिबंध लगा रखे हैं.
सरकारी फंडिंग का विकल्प
चुनाव में कॉर्पोरेट के असर को खत्म करने के लिए अक्सर एक विकल्प यह दिया जाता है कि निजी फंडिंग को पूरी तरह खत्म करके राजनैतिक दलों के लिए सरकारी फंडिंग की प्रथा शुरू की जाए. इस राय के ज्यादातर पैरोकारों का कहना है कि सरकारी फंडिंग से राजनैतिक प्रक्रिया में सीधे दखल, रिश्वत या भ्रष्टाचार के बदले में पक्षपात करने से बचाने में मदद मिल सकती है और यह कम खर्च में हो सकता है और नए दलों और उम्मीदवारों को बराबरी का मैदान मुहैया कराने में मददगार हो सकता है. यूरोप के 86 फीसद देशों, अफ्रीका में 71 फीसद, अमेरिका महाद्वीप के 63 फीसद और एशिया के 58 फीसद देशों में राजनैतिक दलों को सरकारी फंडिंग का चलन है.
पब्लिक फंडिंग के अलग-अलग मॉडल हैं. कुछ देशों में केवल दलों को ही धन मिलता है, उम्मीदवारों को नहीं. दूसरे देशों में इसका उलट है. भारत में चुनाव की सरकारी फंडिंग की व्यावहारिकता पर चार रिपोर्ट में विचार किया गया है. 1988 की इंद्रजीत गुप्ता कमेटी रिपोर्ट, 1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट, 2001 की संविधान की वर्किग समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट और 2008 में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में इसका जिक्र है. इनमें से तीन में किसी न किसी रूप में चुनाव की सरकारी फंडिंग की सिफारिश की गई है, लेकिन कुछ शर्तों के साथ. ये शर्तें हैं राजनैतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र हो और वित्तीय मामलों में पूरी तरह पारदर्शिता हो.
यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया इंस्टीट्यूट फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया के ई. श्रीधरन के अनुसार, किसी पारदर्शी फॉर्मूले के आधार पर सरकारी फंडिंग से राजनैतिक पार्टियां जमीनी स्तर पर छोटे-छोटे चंदे जुटाने की ओर बढ़ सकती हैं. पार्टियों को सरकारी फंडिंग उस अनुपात में दी जानी चाहिए, जितनी रकम वे चिह्नित व्यक्तियों से छोटा-छोटा चंदा खुलेआम जुटा पाते हैं.
मसलन, अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को सरकार से उतनी ही मात्रा में राशि मिलती है जितनी वे अपने बूते जुटाते हैं. इसमें कुछ शर्तें भी होती हैं. पिछले दो चुनावों में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों ने शर्तों से बचने के लिए सरकार से अनुदान नहीं लिया. 2020 में जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के लिए सीधे 1.8 अरब डॉलर जुटाए थे.
कुरैशी राष्ट्रीय चुनाव कोष के गठन की पैरवी करते हैं और कहते हैं कि इससे किसी दल को हासिल प्रत्येक वोट के बदले एक निश्चित राशि दी जा सकती है. वे कहते हैं, "मान लीजिए, एक वोट के लिए हम 100 रुपए तय कर देते हैं. अगर किसी राजनैतिक दल को एक करोड़ वोट मिलते हैं तो वह 100 करोड़ रुपए की सरकारी फंडिंग के लिए पात्र होगा." इंटरनेशनल आईडीईए ने जर्मनी, बेल्जियम, ग्रीस, फिनलैंड और स्वीडन सहित 180 देशों का अध्ययन कराया.
अध्ययन में पाया गया कि 71 देशों में प्राप्त वोटों के आधार पर सरकारी धन मुहैया कराने का चलन है. मसलन, जर्मनी में हर साल योग्य राजनैतिक पार्टियों को निश्चित राशि मुहैया कराई जाती है. यह राशि उन दलों को दी जाती है जिनको राष्ट्रव्यापी चुनाव में 0.5 फीसद से अधिक या मौजूदा चुनाव चक्र के दौरान 16 राज्य विधायिकाओं में से एक के लिए कुल वैध मतों का एक प्रतिशत मिला है.
वितरण के दो आधार हैं: ताजा राज्य, फेडरल और यूरोपीय चुनाव में डाले गए हर वोट के लिए पार्टी को 70 सेंट आवंटित किए जाते हैं, पिछले चुनाव के दौरान छोटे-छोटे चंदे से जुटाए गए प्रत्येक यूरो के लिए सार्वजनिक धन से 38 सेंट दिए गए हैं. जापान में हर डाले गए वोट के बदले राजनैतिक पार्टियों को 250 येन मिलते हैं. उधर, इज्राएल में जिन दलों को एक प्रतिशत से कम वोट मिलते हैं, उन्हें कोई सरकारी फंडिंग नहीं दी जाती. इस तरह पार्टियों के लिए वोट हासिल कर पाना जरूरी हो जाता है और वे बड़े चंदों के फेर में नहीं रहते, जिससे कुछ हद तक पारदर्शिता बनी रहती है.
कोई गारंटी नहीं
कुछ देशों में परोक्ष सरकारी फंडिंग का भी प्रावधान है. इंटरनेशनल आईडीईए के अनुसार, 68 फीसद से अधिक देश राजनैतिक दलों या उम्मीदवारों को किसी न किसी रूप में परोक्ष अनुदान की पेशकश करते हैं. यहां तक कि भारत में भी 1996 के बाद से सरकारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-दूरदर्शन और आकाशवाणी पर नि:शुल्क समय उपलब्ध कराया जाता है. केंद्र सरकार राजनैतिक दलों को अनुदान के रूप में जो दूसरी चीज देती है, वह है मतदाता सूचियों की नि:शुल्क प्रतियां और उम्मीदवारों को मतदाताओं की पहचान पर्चियां.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी कहते हैं, "लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सरकारी फंड मुहैया होने से चुनाव खर्च कम होगा या पारदर्शिता और जवाबदेही आएगी. जब तक चुनाव खर्च की सीमा पर सख्ती से अमल नहीं किया जाता, सरकारी फंडिंग से कोई फर्क नहीं पड़ेगा." रावत कहते हैं कि चुनाव में कॉर्पोरेट चंदे और काले धन पर नियंत्रण लगाए बिना सरकारी फंडिंग से व्यवस्था की गंदगी दूर नहीं हो पाएगी.
सरकारी फंडिंग का प्रयोग कर चुके इटली, इज्राएल और फिनलैंड जैसे देशों में चुनावी खर्च में कोई खास कमी नहीं आई है. जर्मनी, कनाडा, स्वीडन और जापान जैसे महज मुट्ठी भर देश ही कुछ हद तक अपना चुनाव खर्च कम करने में समर्थ हुए हैं. साहू कहते हैं, "कारगर सरकारी फंडिंग मॉडल के दो तत्व होते हैं: खर्च सीमा पर सख्त पाबंदी, कड़े कानून तथा सार्वजनिक करने के नियमों से निजी धन पर निर्भरता घटाना, और सरकारी फंडिंग के जरिए सफेद धन डालना या अन्य फंडिंग विकल्पों को प्रोत्साहित करना जैसे टैक्स फ्री चंदा वगैरह."
हालांकि भारत में सरकारी चुनाव फंडिंग की फिलहाल कोई संभावना नहीं है क्योंकि चुनाव आयोग उसके पक्ष में नहीं है. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने मार्च 2020 में लोकसभा में बताया था कि आयोग ने केंद्र सरकार को पहले ही बता दिया है कि वह कानूनी प्रावधानों के अलावा उम्मीदवारों के खर्चे पर नियंत्रण या प्रतिबंध लगाने में समर्थ नहीं हो पाएगा.
सरकार ने भले इस आकलन को गंभीरता से लिया है, लेकिन राजनैतिक फंडिंग और खर्च दोनों में पारदर्शिता लाने से संबंधित सुधार शुरू करने पर पिछले 25 साल में चुनाव आयोग के दिए गए ज्यादातर सुझावों पर कोई अमल नहीं हो सका है.
चावला कहते हैं, "देश के लिए ज्यादा अच्छा यही होगा कि उन सिफारिशों को कई रोगों की दवा मानकर उन पर नए सिरे से विचार किया जाए, क्योंकि चुनाव में धन बल की बढ़ोतरी से समस्या विकराल हो गई है." राजनैतिक इच्छा का अभाव भी देश में राजनैतिक फंडिंग की सफाई में लंबे समय से बाधक बना हुआ है. चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला याद दिलाता है कि अगली सरकार के पास संवैधानिक दायरे के तहत किए जाने वाले संशोधनों की लंबी सूची होगी.

