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कैसे एक-एक कर बिखरता चला गया इंडिया गठबंधन?

धराशायी हुआ 27 पार्टियों का इंडिया गठजोड़, इससे आम  चुनाव के नतीजों पर आखिर किस तरह से असर पड़ेगा?

नीतीश कुमार नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद जे.पी. नड्डा और चिराग पासवान के साथ
नीतीश कुमार नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद जे.पी. नड्डा और चिराग पासवान के साथ

भारत में राजनीति की दशा-दिशा संख्याओं से तय होती है, विचारधारा से नहीं. यह सचाई एक बार फिर शीशे की तरह साफ हो गई जब जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार सात साल में दूसरी बार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस को धता बताकर उसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पाले में लौट गए जिसे उन्होंने अभी अगस्त, 2022 में ही छोड़ा था.

28 जनवरी को उन्होंने नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. नीतीश की इस ताजातरीन पलटी ने राज्य के महागठबंधन को ही चोट नहीं पहुंचाई, कुछ ही महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

चुनाव रणनीतिकार से राजनैतिक कार्यकर्ता बने प्रशांत किशोर कहते हैं, "आईएनडीआईए के मुख्य वास्तुशिल्पियों में से एक को तोड़कर भाजपा ने विपक्ष को मनोवैज्ञानिक स्तर पर सदमा पहुंचाया है."

हालांकि ऐसा नहीं कि नीतीश ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश नहीं की होगी. वे उस महागठबंधन के मुख्य वास्तुशिल्पी थे जिसने अपना नाम इंडियन नेशनलिस्ट डेवलपमेंट इनक्लूसिव एलांयस रखा, भले ही पहले अक्षरों से मिलकर बना उसका छोटा नाम आई.एन.डी.आई.ए. (इंडिया) थोड़ा अस्वाभाविक था.

यह पटना में सर्कुलर रोड स्थित उनका सरकारी आवास ही था जहां पिछले जून में इस गुट की 27 पार्टियां एक ही मकसद से इकट्ठा हुई थीं - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा को केंद्र की गद्दी से उखाड़ फेंकना. रणनीति सीधी-सादी थी: ज्यादा से ज्यादा सीटों पर साझा उम्मीदवार उतारकर भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करना.

यहां तक कि कांग्रेस के लिए जगह छोड़ने को अनिच्छुक सहयोगी दलों को भी नीतीश ने यह कहकर मना लिया था कि देश भर में मौजूदगी रखने वाली अकेली पार्टी के बगैर इंडिया गठबंधन चुनावी तौर पर असरदार नहीं हो पाएगा. अपने राज्य में जाति सर्वेक्षण का वादा पूरा करके और देश भर में ऐसे ही सर्वे की मांग को मजबूती देकर उन्होंने उसे एक नया नैरेटिव भी दिया था.

सहयोगी दलों के बीच सीटों के असरदार बंटवारे के साथ अपनी पूरी ताकत लगाकर इंडिया 10 राज्यों में लोकसभा की 543 में से कम से कम 313 सीटों पर भाजपा की संभावनाओं में सेंध लगा सकता था, जहां 2019 में भगवा पार्टी ने 150 सीटें या अपनी कुल 303 सीटों में से करीब आधी जीती थीं.

बिहार में ही 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर अनुमान लगाएं तो जद (यू), राजद, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीआई-एमएल) की मिली-जुली ताकत छलांग लगाकर 52 फीसद पर पहुंच जाती.

अगस्त 2022 में जब नीतीश ने भाजपा का दामन छोड़ा था, बिहार में भगवा पार्टी के लिए लोकसभा की कमजोर सीटों की संख्या चार से छलांग लगाकर 10 पर पहुंच गई थी.

अब इंडिया की कहानी संकट में फंस गई है. नीतीश ने पाला बदल लिया है और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और इंडिया की एक और प्रमुख पार्टी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने 24 जनवरी को राज्य में अकेले चुनाव लड़ने के अपने फैसले का ऐलान कर दिया.

इन दोनों राज्यों में मिलाकर लोकसभा की 82 सीटें हैं और ये उन इने-गिने राज्यों में थे जहां इंडिया गठबंधन भाजपा की मौजूदा सीटें कम कर पाने की उम्मीद कर रहा था. नीतीश की वापसी से बिहार में भाजपा की संभावनाएं बेहतर होने की उम्मीद है.

ममता बनर्जी 22 जनवरी को कोलकाता में तृणमूल की धर्मनिरपेक्षता, शांति और समरसता के प्रति एकजुटता रैली में

राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार, जद (यू) की वोट हिस्सेदारी अब भी 12-15 फीसद है, जिसमें नीतीश की अपनी जाति कुर्मी (3 फीसद) भी शामिल है. उनके रुखसत होने और ममता के 'एकला चलो’ के बाद इंडिया के लिए इन 10 राज्यों की 313 सीटों में से अपनी मौजूदा 79 सीटों को बढ़ा पाना बेहद मुश्किल होगा.

दूसरे राज्यों में भी हालात अच्छे नहीं. पंजाब में, जहां लोकसभा की 13 सीटें हैं, आम आदमी पार्टी (आप) ने कांग्रेस के साथ सीटों का कोई बंटवारा नहीं करने का फैसला कर लिया. झारखंड में, जहां लोकसभा की 14 सीटें हैं, 31 जनवरी को ईडी के हाथों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद सोरेन की अगुआई वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), राजद और कांग्रेस का मौजूदा गठबंधन बिखर सकता है.

केरल में, जहां लोकसभा की 20 सीटें हैं, कांग्रेस की अगुआई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की अगुआई वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) अलग-अलग दिशाओं में जाते दिख रहे हैं.

लोकसभा की 48 सीटों वाले महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की फूट ने इंडिया की दोनों सहयोगी पार्टियों को काफी कमजोर कर दिया है. अटकलें लगाई जा रही हैं कि कांग्रेस के कुछ ताकतवर क्षत्रप—दो मराठवाड़ा के और एक विदर्भ का—फरवरी के अंत तक भाजपा की शरण में जा सकते हैं, जब संयोग से राज्यसभा के चुनाव भी होंगे.

निचले सदन में 80 सांसद भेजने वाले उत्तर प्रदेश में ही इंडिया गठबंधन के लिए ले-देकर थोड़ी गनीमत है, जहां समाजवादी पार्टी (सपा) ने कांग्रेस को 11 सीटों की पेशकश की है. हालांकि ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने अभी इसका कोई जवाब नहीं दिया है.

राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान 29 जनवरी को बिहार के अररिया में

सपा ने 16 सीटों पर उम्मीदवार उतार भी दिए हैं, जिनमें चार सीटें कांग्रेस चाहती थी. बचा तमिलनाडु, जहां 39 सीटें हैं और सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कलगम (डीएमके) और कांग्रेस का गठबंधन साबुत दिखता है. कांग्रेस उसे दी गई नौ सीटों पर राजी हो गई है.

कांग्रेस का ऊहापोह

इंडिया गठबंधन की कामयाबी बहुत कुछ सहयोगी दलों के साथ सीटों के सार्थक बंटवारे की व्यवस्था तैयार करने की कांग्रेस की क्षमता पर टिकी थी. वही गठबंधन की अकेली अखिल भारतीय पार्टी है.

नीतीश ने राष्ट्रीय पार्टी को गठबंधन की धुरी बनाए रखने की वकालत की थी, पर इसका तरीका भी साफ था - कांग्रेस उन राज्यों पर ध्यान देगी जहां भाजपा के साथ उसका सीधा मुकाबला है और दूसरे राज्य वहां दबदबा रखने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के लिए छोड़ देगी.

मगर मौके की नजाकत को भांपकर और उस पर खरा उतरने के बजाय कांग्रेस ने सीटों की मांग करते हुए बेतुका रवैया अपनाया. जैसा कि जद (यू) के के.सी. त्यागी ने आरोप लगाया है कि जिन राज्यों में वह मजबूत नहीं, वहां भी उसने अपनी हैसियत से ज्यादा सीटों की मांग की.

क्षेत्रीय दलों ने अगर इसका विरोध किया तो उसके पीछे दरअसल कांग्रेस का पिछला प्रदर्शन है. मसलन, 2020 में बिहार विधानसभा के चुनाव में तेजस्वी यादव के जोशीले प्रचार की बदौलत राजद सरकार बनाने की कगार पर पहुंच गया था.

मगर कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन ने उनके सरकार बनाने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया—कांग्रेस को 70 सीटों पर चुनाव लड़ने दिया गया, जिनमें से उसने महज 19 जीतीं.

पश्चिम बंगाल में ममता ने कहा कि जून 2023 में इंडिया गठबंधन की पहली बैठक के बाद उन्हें 210 दिन इंतजार करना पड़ा. उसके बाद कहीं जाकर कांग्रेस सीटों के बंटवारे के लिए आगे आई. और जब तैयार भी हुई तो ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने 10-12 सीटों की मांग रख दी.

ममता मात्र दो सीटें—बहरामपुर और माल्दा दक्षिण—देने को तैयार थीं, जो कांग्रेस ने 2019 में जीती थीं. तीसरी सीट वे उसी शर्त पर देने को तैयार थीं जब कांग्रेस असम और मेघालय में सीटें साझा करे. मगर कांग्रेस पश्चिम बंगाल में छह से कम सीटों पर कतई राजी न थी और उत्तरपूर्वी राज्यों में भी किसी साझेदारी के खिलाफ थी.

न ही पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बंगाल के अपने सूरमा अधीर रंजन चौधरी पर लगाम लगा पाया, जिन्होंने ममता और तृणमूल के दूसरे नेताओं पर तीखे हमले करने को आदत बना लिया.

और फिर जिन राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा के साथ है, वहां भी उसका रिकॉर्ड 2019 के आम चुनावों के नतीजों की रोशनी में बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है. सेफोलॉजिस्ट प्रदीप गुप्ता बताते हैं कि यह स्थिति तब है जब गैर-भाजपा सरकार की संभावना इन सीधे मुकाबलों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर बहुत ज्यादा निर्भर है.

2019 में कांग्रेस ने जिन 423 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से उसने महज 52 जीतीं. 186 सीटों पर पार्टी का भाजपा के साथ सीधा मुकाबला हुआ था, जिनमें से वह महज 16 जीत पाई. इस बार कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी से उन 255 सीटों पर ध्यान देने को कहा, जहां उसे अपने जीतने की ज्यादा संभावना दिखाई देती है.

इनमें से 128 सीटें सात राज्यों में हैं—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक. 2019 में कांग्रेस ने इनमें से महज चार सीटें जीती थीं. बाकी 88 सीटें असम, उत्तरपूर्व के दूसरे राज्यों, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में हैं, जहां इंडिया गठबंधन का नहीं बल्कि कांग्रेस का मुकाबला भाजपा या क्षेत्रीय पार्टी से होगा. 2019 में कांग्रेस को इनमें से 17 सीटें मिली थीं.

विपक्षी खेमे को अगर कहीं उम्मीद है तो वह दक्षिण और विंध्य क्षेत्र में. हालांकि वाईएसआर कांग्रेस, तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सरीखी पार्टियां इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, पर छह दक्षिणी राज्यों की 130 सीटों में से गैर-भाजपा पार्टियों के आधी जीतने की संभावना है क्योंकि भाजपा की यहां महज पांच सीटों पर हाशिए की मौजूदगी है.

इसलिए यह चुनौती फिर कांग्रेस के ही कंधों पर आ जाएगी कि वह भाजपा को अपना 2019 का वह प्रदर्शन दोहराने न दे. तब भाजपा ने कर्नाटक की 28 में से 25 सीटें जीती थीं.

कर्नाटक और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों की कामयाबी से बल्ले-बल्ले कांग्रेस 2019 में इन दो राज्यों की कुल 45 सीटों में से अपनी जीती चार सीटों की संख्या में काफी सुधार की उम्मीद कर रही है.

आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी की बहन वाई.एस. शर्मिला को लाकर कांग्रेस बेहतर संभावनाओं की उम्मीद कर रही है, खासकर जब उसकी नई राज्य अध्यक्ष अपने भाई के खिलाफ पार्टी के चुनाव अभियान की अगुआई करेंगी.

मोदी के बरअक्स कौन

इंडिया गठबंधन के सामने एकमात्र चुनौती आंकड़ों की नहीं है. इसमें शामिल क्षेत्रीय नेताओं की प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षाएं भी आपसी विरोध पैदा करती हैं. चाहे ममता हों या दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल अथवा नीतीश कुमार. देश की सत्ता के शीर्ष पद के लिए उनकी महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं रही है.

कांग्रेस ने यह ऐलान भले ही किया हो कि 2024 के आम चुनाव में इंडिया गठबंधन की जीत की स्थिति में वह किसी गैर-कांग्रेसी नेता के प्रधानमंत्री बनने पर विचार करने को तैयार है लेकिन राहुल गांधी पूरी मजबूती से पार्टी की सियासी गतिविधियों की धुरी बने हुए हैं.

यही नहीं, उनकी भारत जोड़ो न्याय यात्रा को भी उन्हें मोदी के मुकाबले मैदान में उतरे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के तौर पर स्थापित करने की स्पष्ट कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. यात्रा के समय और मार्ग ने भी सहयोगी दलों की बेचैनी बढ़ा रखी है. कांग्रेस ने इसे एक सामूहिक अभियान बनाने के बजाय राहुल को अपना चेहरा बनाकर यात्रा शुरू की है.

इस पर तृणमूल के एक नेता का कहना है, "उन्हें उन राज्यों में यात्रा करनी चाहिए थी जहां उनका भाजपा से सीधा मुकाबला है. जिन राज्यों में सहयोगी दल मजबूत स्थिति में हैं, वहां कांग्रेस उनसे राहुल गांधी के चीयरलीडर बनने की उम्मीद कैसे कर सकती है? अगर आप गठबंधन में हैं तो आपको एक टीम की तरफ मिलकर चलना होगा." 30 जनवरी को ममता की 'जन संजोग यात्रा’ ने लगभग वही मार्ग अपनाया, जहां से हफ्ते भर पहले ही राहुल गांधी गुजरे थे.

नीतीश के छिटकने की एक वजह राहुल गांधी भी रहे हैं. 13 जनवरी को जब नीतीश का नाम इंडिया गठबंधन के संयोजक के तौर पर प्रस्तावित किया गया तब वे राहुल गांधी ही थे जिन्होंने इस पर ऐतराज जताया. उन्होंने इसके लिए ममता बनर्जी की सहमति लेने पर जोर दिया, जो उस वर्चुअल बैठक में मौजूद नहीं थीं.

और जब नीतीश को संयोजक पद की पेशकश की गई तब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन का अध्यक्ष बनाया गया. ममता और केजरीवाल ने गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर भी खड़गे का नाम प्रस्तावित किया. यह एक तीर से दो शिकार करने जैसा था, ताकि राहुल और नीतीश दोनों ही खुद को इंडिया गठबंधन के चेहरे के तौर पर पेश न कर पाएं.

सिर्फ ममता और केजरीवाल ही नहीं, इंडिया ब्लॉक के अधिकांश सहयोगी मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता के मुकाबले राहुल को सबसे कमजोर कड़ी मानते हैं. यह अगस्त में आयोजित इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे से भी स्पष्ट है, जिसमें 52 फीसद लोगों ने माना था कि मोदी ही अगले प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त हैं. राहुल को सिर्फ 16 फीसद लोगों का समर्थन मिला.

विपक्षी नेता मोदी के खिलाफ अवधारणा की लड़ाई भी हारते जा रहे हैं क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो और ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच तेज कर दी है. नीतीश के मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से ही ईडी ने लालू और तेजस्वी यादव के खिलाफ मामलों में सक्रियता दिखानी शुरू कर दी थी, और झारखंड के मुख्यमंत्री सोरेन पर भी शिकंजा लगातार कसने में जुटी थी.

यही नहीं, दिल्ली शराब नीति घोटाले में मुख्यमंत्री केजरीवाल को भी बार-बार समन भेजती रही. हालांकि, आप नेता हर बार पेश होने से इनकार करते रहे. ऐसी अटकलें भी हैं कि मोदी सरकार विपक्षी नेताओं को गठबंधन में शामिल होने से रोकने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करती है जो कि चुनावी लिहाज से भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं.

केजरीवाल की तरफ से लोकसभा चुनाव के दौरान हरियाणा में कांग्रेस के साथ सीटें साझा करने की घोषणा किए जाने के एक दिन बाद ही ईडी ने मानेसर में भूमि अधिग्रहण में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा से पूछताछ की.

इसी तरह, ममता के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने इन अटकलों को हवा दी कि वे अपने भतीजे और तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को बचाना चाहती हैं, जो कथित भ्रष्टाचार के कई आरोपों को लेकर जांच एजेंसियों के शिकंजे में फंसे हैं.

वहीं, जानकार लोकसभा चुनाव में कुछ ही महीने का समय होने के बावजूद पार्टी की 'निष्क्रियता’ को लेकर सवाल उठा रहे हैं. भाजपा के साथ मुकाबले के लिए कोई खास रणनीति, कैंपेन आइडिया या नैरेटिव स्पष्ट नहीं दिख रहा.

तृणमूल की चुनावी रणनीतिकार इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आईपीएसी) को अक्टूबर में दुर्गा पूजा के बाद ही सभी 294 विधानसभाओं के लिए एक-एक व्यक्ति को तैनात करना था लेकिन अब तक किसी को भी कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है.

यह स्थिति तब है जब तृणमूल के लिए एजेंसी के एक सर्वे से पता चलता है कि बंगाल के लगभग 53 फीसद मतदाता मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते थे और मोदी के मुकाबले ममता का समर्थन आधार आधा ही है.

नैरेटिव कहां है?

मोदी की अगुआई वाली भाजपा से मुकाबले के लिए एक विश्वसनीय चेहरे के अभाव के साथ-साथ कोई भरोसेमंद नैरेटिव न होना भी इंडिया गठबंधन की स्थिति को कमजोर कर रहा है. गठन के बाद से ही गठबंधन क्षेत्रीय क्षत्रपों के एक ऐसे समूह के तौर पर सामने आया है, जो सिर्फ मोदी की हार की ही इच्छा रखते हैं.

और उनका मुकाबला एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी से है जो हर मोर्चे पर काम करने के दावे के साथ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार है, फिर बात चाहे विकास (भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना) की हो या भारत के वैश्विक कद को बढ़ाने (जी20 शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन) अथवा हिंदुत्व (अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा) या राष्ट्रवाद (जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना) की.

हां, राष्ट्रीय स्तर पर जाति जनगणना के मुद्दे ने विपक्ष के लिए कुछ उम्मीदें जगाई थीं लेकिन अब नीतीश के बाहर होने के साथ ही यह चिंगारी भी पूरी तरह बुझती नजर आ रही है.

यहां तक कि इंडिया गठबंधन एक ऐसे मुद्दे पर भी साझी प्रतिक्रिया नहीं दे पाया, जिसमें हर किसी को पता था कि भाजपा अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन और प्राण प्रतिष्ठा समारोह के साथ तेजी से आगे बढ़ेगी. यही वजह है कि केजरीवाल ने जहां मंदिर के उद्घाटन का स्वागत किया और राम राज्य के सिद्धांतों को अपनाने का वादा किया, वहीं कांग्रेस की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही.

शीर्ष नेतृत्व ने धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए पूरे आयोजन से दूरी बनाए रखना बेहतर समझा, वहीं पार्टी शासित हिमाचल प्रदेश में इस मौके पर उत्सव मनाने के लिए छुट्टी की घोषणा कर दी गई. राहुल ने राम मंदिर को लेकर किसी तरह की 'लहर’ को नकारते हुए अपनी यात्रा जारी रखी और समान भागीदारी, महिलाओं, युवाओं, किसानों और श्रमिकों जैसे पांच मुद्दों पर न्याय का नारा बुलंद करते नजर आए.

नीतीश के गठबंधन से बाहर हो जाने के बाद देखने वाली बात यह होगी कि उनके जाति गणना कराने का लाभ किस ओर जाएगा. इसकी घोषणा के बाद ही राहुल ने आबादी के अनुपात में अधिकार की वकालत की थी. इसे भाजपा के खिलाफ विपक्ष का सबसे बड़ा चुनावी हथियार माना जा रहा था.

इससे भाजपा के ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) वोट बैंक में सेंध लगने और इसके बलबूते पिछले दो लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी को मिली बढ़त की धार कुंद होने की उम्मीद की जा रही थी.

वह लाभ अब दूसरे खेमे यानी जद (यू)-भाजपा गठबंधन और उनके सहयोगी जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) की ओर जाता दिख रहा है. 2019 में एनडीए - जिसमें लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक जनता दल के दो गुट शामिल थे - ने 54 फीसद वोट शेयर हासिल किया था और बिहार की 40 में से 39 सीटें जीती थीं.

अब नीतीश की वापसी के साथ भाजपा को उम्मीद है कि ऊंची जातियों, गैर-यादव ओबीसी, अति पिछड़ा वर्ग (बिहार की आबादी में एक-चौथाई हिस्सेदारी वाला समूह, जिस पर नीतीश की अच्छी पकड़ है), पासवान, मुसहर और अन्य दलित समुदायों के समर्थन के बलबूते वह अपना बेहतरीन प्रदर्शन बरकरार रखेगी.

और भाजपा तो फिर भाजपा ही है, नीतीश के साथ आने के बावजूद वह अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रही. उसका जातिगत समीकरणों पर पूरा ध्यान है जो कि दो उपमुख्यमंत्रियों—सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा—के चयन से साफ नजर भी आता है.

सम्राट चौधरी कुशवाहा (जिन्हें कोइरी नाम से भी जाना जाता है) समुदाय से आते हैं और माना जा रहा है कि यह नीतीश से छिटके लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) का समर्थन जुटाने में मददगार साबित होंगे. कुल मतदाताओं में कुशवाहों की हिस्सेदारी छह फीसद है.

1968 में सतीश प्रसाद सिंह के पांच दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनने के बाद डिप्टी सीएम दूसरा सबसे बड़ा पद है, जिस पर कोई कुशवाहा काबिज हुआ है. सिन्हा भूमिहार हैं और उनकी नियुक्ति को राज्य में 11 फीसद हिस्सेदारी वाली हिंदू ऊंची जातियों को साधने की कोशिश माना जा रहा है. वैसे यह आबादी भाजपा का कोर वोट बैंक रही है.

इन सारे समीकरणों को साधने के अलावा भाजपा व्यापक जनाधार वाले ओबीसी वोट बैंक तक पहुंचने और सामूहिक बिहारी गौरव को जगाने के लिए कई प्रतीकात्मक कदम भी उठा रही है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ओबीसी आइकन कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित करना ऐसा ही एक अहम कदम है.

कुल मिलाकर, इस सबने बिहार में चुनावी लड़ाई को ओबीसी बनाम सवर्ण बनाने की विपक्ष की कोशिशों को धराशायी कर दिया है, क्योंकि उसका समर्थन आधार अब मुस्लिम-यादव फॉर्मूले तक सिमट गया है, जिसकी राज्य में भागीदारी एक-तिहाई है.

राजद अगर राज्य में किसी चीज पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकता है तो यह उसका यही कोर वोट बैंक है जिसने चुनाव-दर-चुनावी तमाम सियासी उलटफेरों के बावजूद कभी भी लालू का साथ नहीं छोड़ा.

यहां तक कि 2019 में जब राजद का प्रदर्शन सबसे खराब रहा और चुनाव मैदान में उतरे उसके 20 प्रत्याशियों में केवल एक को ही जीत नसीब हुई, तब भी पार्टी को 16 फीसद वोट मिले थे. वहीं, अनुसूचित जाति के मतदाताओं के एक वर्ग के बीच भी गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत है, जिसका श्रेय सीपीआई (माले) को दिया जा सकता है.

क्षेत्रीय स्तर पर कोर वोट बैंक का समर्थन जारी रहना बिल्कुल राहत की बात नहीं, खासकर तब जबकि जाति जनगणना के मुद्दे के राष्ट्रीय स्तर पर जोर पकड़ने या इंडिया को इसके चुनाव लाभ की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही. ये मुद्दा तुरुप का पत्ता साबित नहीं हो सकता, यह बात मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के हालिया विधानसभा चुनाव नतीजों से भी स्पष्ट है.

इन तीनों राज्यों में ओबीसी की अच्छी-खासी आबादी है और कांग्रेस ने यहां सत्ता में आने पर जाति जनगणना कराने का वादा किया था. लेकिन किसी भी राज्य में जीत हासिल करने में नाकाम रही. दूसरी तरफ, भाजपा अपने हिंदुत्व कार्ड के प्रभावी साबित होने के बावजूद विभिन्न सामाजिक समूहों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रही.

कहीं उनके प्रतीकों का जश्न मनाकर तो कहीं संबंधित समुदाय के सदस्यों को महत्वपूर्ण राजनैतिक पद देकर. यही नहीं, भाजपा ने बड़ी चतुराई के साथ जाति के इतर भी एक अच्छा वोट बैंक तैयार कर लिया है, जिसे लाभार्थी वर्ग कहा जा सकता है. इसमें वे मतदाता शामिल हैं जो सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी हैं.

बहरहाल, जातिगत समीकरणों का मुद्दा खत्म होने वाला नहीं है. महाराष्ट्र के हालिया घटनाक्रम से यह जाहिर भी है, जहां मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मराठों की आरक्षण की मांग स्वीकार कर ली है, और इसका असर एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों पर ही पड़ना तय माना जा रहा है.

संख्याबल के लिहाज से महाराष्ट्र में मराठा-कुनबी वर्ग (जिसकी राज्य की आबादी में 30 फीसद हिस्सेदारी का अनुमान है) सामाजिक और राजनैतिक रूप से एक प्रभावशाली समुदाय है. विभाजन से पहले शिवसेना को ओबीसी और गरीब मराठों की पार्टी के तौर पर देखा जाता था.

लेकिन मुंबई स्थित उद्धव ठाकरे गुट का शहरी नेतृत्व आरक्षण की मांग और उसके जवाब में उठाई जाने वाली मांगों पर कोई उचित प्रतिक्रिया देने में नाकाम रहा था. हालांकि, मुख्यमंत्री शिंदे फिलहाल खुद को दलित मराठों के नेता के तौर पर स्थापित करने में सफल रहे हैं लेकिन यह कदम अन्य ओबीसी की नाराजगी बढ़ा सकता है.

आरक्षण के बाद तकरीबन 57 लाख मराठों के राज्य की ओबीसी आबादी में जुड़ने से मौजूदा ओबीसी समुदायों के लिए अवसर घटेंगे. हालांकि मराठा परंपरागत तौर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के समर्थक रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र में एनडीए के साथ गठबंधन करने वाले पार्टी के अजित पवार गुट के नेता छगन भुजबल ने ओबीसी के पक्ष में जवाबी आंदोलन की चेतावनी दी है.

'इंडिया’ की खत्म कहानी!

जाति की बात छोड़ भी दें तो इंडिया गठबंधन के पास मतदाताओं को लुभाने के लिए कुछ नया नजर नहीं आ रहा, न ही विभिन्न मुद्दों पर उसके पास कोई प्रभावी जवाब है. अधिकांश मामलों में विपक्षी दल मूकदर्शक बने रहते हैं या फिर ऐसी खामियां निकालने की कोशिश करते हैं, जो उन पर ही भारी पड़ जाती हैं.

उधर, भाजपा सितंबर में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण की घोषणा करके अपने विरोधियों से काफी आगे निकल गई. पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाता निर्णायक बनकर उभरी हैं. नीतीश ने भी 2005 से महिला-केंद्रित तमाम नीतियों के माध्यम से महिलाओं का समर्थन जुटाने में सफलता हासिल की थी.

हालांकि, राजनैतिक विश्लेषक राहुल वर्मा सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि नीतीश को महिला मतदाताओं के वोट से फायदा तभी होता है जब वे भाजपा के साथ चुनाव लड़ते हैं.

यही वजह है कि महिलाओं ने 2019 के लोकसभा और 2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा-जद (यू) गठबंधन के पक्ष में वोट दिया, लेकिन 2015 के राज्य चुनाव में नहीं, जब जद (यू) ने राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

अन्य प्रमुख मुद्दों पर भी इंडिया ब्लॉक में कोई सहमति नहीं दिखती और सहयोगी दलों की तरफ से मतदाताओं को अलग-अलग संदेश दिए जा रहे हैं. मसलन, सीएए को लें. कांग्रेस और तृणमूल इस कानून का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे इसका समर्थन करते हैं.

ठाकरे और केजरीवाल समान नागरिक संहिता के पक्षधर हैं लेकिन कांग्रेस और तृणमूल कोई स्पष्ट रुख अपनाने से परहेज करते नजर आ रहे हैं. इस बीच, यह भी माना जाता है कि पूर्व में तीन तलाक पर पाबंदी के जरिए भाजपा मुस्लिम महिलाओं का समर्थन हासिल करने में सफल रही है.

राहुल की सारी उक्वमीदें इस पर टिकी थीं कि एनडीए सरकार आने के बाद फले-फूले उद्योगपति गौतम अदाणी पर लगाए आरोप पीएम मोदी को कमजोर करने वाले साबित होंगे. लेकिन यह मुद्दा मोदी या अदाणी को कोई खास नुक्सान नहीं पहुंचा पाया.

गठबंधन में शामिल एनसीपी नेता शरद पवार ने ही अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च की उस रिपोर्ट को नकार दिया जिसमें अदाणी समूह पर शेयर बाजार में हेरफेर का आरोप लगाया गया था. उन्होंने संयुन्न्त संसदीय समिति से जांच कराने के लिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से चलाए गए जोरदार अभियान को भी खारिज कर दिया, जिसकी वजह से पिछले साल बजट सत्र के दौरान संसदीय कार्यवाही बाधित रही थी.

राजनैतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव कहते हैं, ''विपक्षी दलों के लिए जरूरी है कि वे कम से कम देश को इतना तो बता सकें कि वे एक गठबंधन हैं. आप एक गठबंधन तभी हैं जब आपके बीच सीट बंटवारे की कोई संभावना हो. दूसरा, आपको देश के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि सत्ता में आने पर आप कौन-से पांच बड़े काम करने जा रहे हैं. लेकिन बड़े दुख की बात है कि इंडिया ब्लॉक इन दोनों मोर्चों पर नाकाम रहा है.’’

पिछले साल जून में गठबंधन के पटना सक्वमेलन के दौरान ममता ने कहा था कि जो चीज पटना से शुरू होती है, वह राष्ट्रीय आंदोलन बन जाती है. अगर इसे सच मानें तो 28 जनवरी को पटना में जो हुआ उसे इंडिया गठबंधन के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता.

एक तरफ तो भाजपा ने अपना पहला चुनाव अभियान शुरू कर दिया. वहीं, विपक्षी गठबंधन अपनी एकजुटता के लिए नेतृत्व और राजनैतिक समझ की कमी से जूझता दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ चुनावों में जनादेश निर्णायक ही रहा है. विपक्षी दल इस आम चुनाव की लड़ाई में बने रहना चाहते हैं तो उन्हें अधिक निर्णयात्मक रुख दिखाना होगा.

 - अर्कमय दत्ता मजूमदार और अमिताभ श्रीवास्तव

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