
सभी कामयाब राजनैतिक नेताओं की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसी पैनी नजर के धनी हैं, जो लुभावने नैरेटिव के साथ जुड़कर उन्हें बड़ी लड़ाइयों की फौरन पहचान करा देती है. उसके बाद वे चतुर रणनीति तैयार करते हैं, बिल्कुल माकूल वक्त पर हमला बोलते हैं, जरूरत पड़े तो मोर्चे पर सबसे आगे रहकर चाहे जैसा भी विरोधी सामने हो, उसे बुरी तरह मात दे देते हैं. इस काबिलियत का उन्होंने हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में बखूबी इजहार किया.
यह 2024 के बेहद अहम आम चुनाव से पहले विधानसभा चुनावों का अंतिम दौर था, इसलिए मोदी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के लिए दांव बेहद ऊंचे थे. दोनों की ख्वाहिश साथ-साथ लगातार तीसरी लोकसभा जीत दर्ज करके ऐसा उपलब्धि हासिल करने की है, जो अब तक सिर्फ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के नाम जुड़ी है.

और जीत भी सिर्फ पूर्ण बहुमत की नहीं, बल्कि ऐसे बहुमत की, जैसी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के आम चुनाव में राजीव गांधी ने हासिल की थी. तब कांग्रेस को लोकसभा की कुल 543 में से 414 सीटें मिली थीं, जो आजादी के बाद से अब तक किसी भी पार्टी को मिला सबसे बड़ा बहुमत है. उस शिखर पर कांग्रेस तब 46.4 फीसद वोट हिस्सेदारी से पहुंची थी.
इसके विपरीत, भाजपा की सर्वाधिक वोट हिस्सेदारी 2019 के आम चुनाव में 37.3 फीसद ही रही है, जब उसने अपने दम पर 303 सीटें जीती थीं. इस बार उसका लक्ष्य राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में अपने सहयोगियों के साथ 50 फीसद वोट हासिल करने का है. लगातार तीसरी बार जीत नरेंद्र मोदी को राजनेताओं की उस पांत में खड़ा कर देगी, जहां नेहरू खड़े दिखते हैं.
संपूर्ण राजनैतिक दबदबे के अपने सपने को साकार करने की खातिर पूरी मजबूती के लिए मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने तीन हिंदी भाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हर हाल में जीत हासिल करना जरूरी समझा, जहां नवंबर में तेलंगाना और मिजोरम के साथ चुनाव हो रहे थे. भाजपा नेतृत्व हैरान-परेशान था कि उनकी धुर विरोधी कांग्रेस पिछले साल के अंत और 2023 के मध्य में हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनावों में उनसे सत्ता छीनकर जोरदार लड़ाई का जज्बा दिखा चुकी थी.
बदतर तो यह था कि जनमत सर्वेक्षण देश की सबसे पुरानी पार्टी को चुनाव वाले तीन उत्तरी राज्यों में भी बढ़त दिखा रहे थे और दक्षिणी राज्य तेलंगाना में उसके नए सिरे से जी उठने संकेत दे रहे थे, जहां भाजपा को अपनी संभावनाएं देख रही थीं. इस बीच, विपक्ष ने कांग्रेस की अगुआई में 'इंडिया’ या भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन के बैनर तले 28 दलों को जोड़कर अपनी ताकत एकजुट कर ली थी.
फिर, उसने जल्द ही खुद को जाति आधारित सर्वेक्षण के बाद पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाने के ताकतवर नैरेटिव से लैस कर लिया. यह उस अखंड हिंदुत्व के मुद्दे के लिए सीधा खतरा था जिसे भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में मशक्कत से तैयार किया था, जिससे उसे राज्य और आम चुनावों में भरपूर लाभ मिला था.
इस महा दैत्य रूपी चुनौती को अपनी ओर बढ़ता देख मोदी, अपने मास्टर रणनीतिकार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा के साथ इसकी काट ढूंढने में लग गए. उन्होंने ऐसी युद्ध योजना तैयार की, जिससे भगवा पार्टी की बुलंदी के रास्ते में आने वाले सभी खतरों को एक झटके में ध्वस्त किया जा सके. कर्नाटक की गलतियां पार्टी और शीर्ष नेतृत्व के लिए सबक थीं.
चुनाव से साल भर पहले बी.एस. येदियुरप्पा की जगह बासवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद पर बैठाना शायद नासमझी भरा कदम था, जिसकी पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी. फिर, कांग्रेस ने गारंटियों के सिलसिले का ऐलान किया और उसे नए 'गारंटी कार्ड’ में जोड़कर हैरान कर दिया. इस रणनीति से पार्टी को पर्याप्त संख्या में वोट मिले. भाजपा ने राज्य में अपनी हार की समीक्षा में पाया कि पार्टी खराब राजकाज, भारी गुटबाजी, अप्रभावी नेतृत्व और महंगाई के कारण मतदाताओं (खासकर अपनी सामाजिक सुरक्षा क्षेत्र की योजनाओं के लाभार्थियों) को जोड़ने और उनका समर्थन पाने में नाकाम रही.
पांच-तरफा हमला
इन गलतियों से सीखकर भाजपा पांच व्यापक रणनीतियों के साथ तीन उत्तरी राज्यों में चुनावों में उतरी. एक, मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जैसे कांग्रेस के क्षत्रपों के खिलाफ मोर्चा खोलना था, जो अपने राज्यों में प्रचार अभियानों का नेतृत्व कर रहे थे.
इन ताकतवर दिग्गजों के मुकाबले सिर्फ एक चेहरे के बदले मोदी और शाह ने अपनी संयुक्त ताकत के इस्तेमाल का फैसला किया, ताकि वोटरों को सामूहिक नेतृत्व का एहसास कराया जा सके, जिसमें केंद्रीय मंत्रियों सहित राज्य के दिग्गज और केंद्रीय नेता शामिल थे. पार्टी ने इन सभी को न सिर्फ प्रचार में लगाया, बल्कि कुछ को चुनाव में भी उतारा.
यह रणनीति मध्य प्रदेश में सबसे अधिक स्पष्ट थी, जहां पार्टी पिछले 20 साल में 18 साल से सत्ता में थी, जिसके नतीजतन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ भारी सत्ता विरोधी लहर थी. मतदाताओं को व्यापक विकल्प देने के लिए तीन केंद्रीय मंत्रियों और एक राष्ट्रीय महासचिव सहित सात सांसदों को टिकट दिए गए.
दूसरी रणनीति कांग्रेस की 'मुफ्त’ योजनाओं का मुकाबला अपने लक्षित योजनाओं से करने की थी. यह दीगर बात है कि इसके पहले मोदी विपक्षी दलों को 'रेवड़ी’ राजनीति के लिए बुरा-भला कह चुके थे. राज्य चुनावों से कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री देश के 80 करोड़ से अधिक सबसे गरीब लोगों को मुफ्त अनाज देने की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) का अगले पांच वर्षों के लिए विस्तार का ऐलान कर चुके थे. उसके बाद एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) से जुड़ी धान की खरीद पर 500 रुपए (छत्तीसगढ़ में) बढ़ाने और कृषि मजदूरों के लिए आय समर्थन और एलपीजी सिलेंडर की कीमत 200 रुपए कम करने का वादा किया गया था.
तीसरी रणनीति भाजपा की वोट आकर्षित करने की क्षमता में इजाफे की थी, जो सामाजिक-आर्थिक समूहों, खासकर महिलाओं और युवाओं को लुभाने पर केंद्रित थी. मध्य प्रदेश में 'लाडली बहना योजना’ और अन्य महिला केंद्रित योजनाओं की वजह से राज्य में प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस पर भाजपा को महिलाओं की वोट हिस्सेदारी में 13 फीसद अंक की बढ़त हासिल हुई, जो पार्टी की बड़ी जीत में एक अहम वजह रही.
चुनावी राज्यों में महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं के अलावा, सितंबर में केंद्र में महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने से विधायिका में एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने के आश्वासन से उनका समर्थन और मजबूत हो गया. भाजपा ने अपना ध्यान अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर भी केंद्रित किया, जो पिछले चुनावों में उसका साथ छोड़ गए थे.
चौथी रणनीति उम्मीदवारों का ठोक-बजाकर चयन था, जिसके तहत जीतने की ताकत, न कि वफादारी को टिकट का मुख्य पैमाना बनाया गया. मसलन, छत्तीसगढ़ में भाजपा के कुल 90 उम्मीदवारों में से 55 नए चेहरे थे. मध्य प्रदेश में भाजपा के लगभग एक-तिहाई विधायकों को खराब प्रदर्शन के कारण टिकट नहीं दिया गया.
कांग्रेस की हवा निकालना
हालांकि, भाजपा के विजय अभियान में तुरुप का पत्ता पांचवीं रणनीति थी. मोदी ने उत्तरी राज्यों में कांग्रेस के क्षत्रपों के खिलाफ खुद को सीधे खड़ा करने का जोखिम भरा साहसिक फैसला किया और अपनी भारी लोकप्रियता और साख के जरिए वोटों का निर्णायक हिस्सा अपनी पार्टी के पक्ष में कर लिया. मोदी ने इन तीनों राज्यों में कुल मिलाकर 34 रैलियां कीं.
मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में 15-15 रैलियां कीं और कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं के बरअक्स 'मोदी की गारंटी' को औजार बनाया. उनका नाम दो राज्यों के लिए पार्टी के नारों में भी शामिल किया गया, 'एमपी के मन में मोदी है' और 'मोदी साथे अपनो राजस्थान.' इंडिया टुडे-माइ एक्सिस एग्जिट पोल के मुताबिक राजस्थान में 17 फीसद मतदाताओं ने मोदी के कारण भाजपा को वोट दिया.
इन सारी कोशिशों का नतीजा भाजपा को शानदार जीत की शक्ल में मिला. साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और कार्यक्रमों पर मतदाताओं ने जोरदार मोहर भी लगा दी. मध्य प्रदेश में भाजपा 18 साल की सत्ता विरोधी भावना को धता बताने में कामयाब रही और दो-तिहाई बहुमत के साथ यह राज्य उसने अपने पास बनाए रखा.
पार्टी ने राज्य की 230 सीटों में से 163 जीतीं और 48.55 फीसद वोट हिस्सेदारी हासिल की, जो 2018 के चुनाव के मुकाबले सात फीसद अंकों की बढ़ोतरी है. राजस्थान में वह अशोक गहलोत की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार से सत्ता छीनने में कामयाब रही, जो जनकल्याणकारी नैरेटिव के बलबूते दम भर रही थी, जिससे भाजपा को दूसरे राज्य जीतने में मदद मिली.
पार्टी राजस्थान की 199 सीटों में से 115 जीती (करतारपुर सीट का चुनाव 5 जनवरी को होगा), और खुद अपनी उम्मीद के विपरीत वह छत्तीसगढ़ भी जीत गई और राज्य की 90 सीटों में से 54 उसकी झोली में आ गईं. इन तीनों राज्यों में लोकसभा की कुल 65 सीटें हैं, जिनमें से 2019 के आम चुनाव में भाजपा 62 जीती थी, बावजूद इसके कि 2018 में वह इन तीनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव हार गई थी.
2024 में पार्टी उसी कामयाबी को दोहराने की उम्मीद कर रही है. भाजपा के लिए मायूसी की खबर तेलंगाना की हार है, जहां भाजपा अपना वोट दोगुना बढ़ाकर 14 फीसद करने के बावजूद कांग्रेस को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को सत्ता से बेदखल करने से नहीं रोक सकी.
अलबत्ता यह जीत कांग्रेस के लिए भी छोटी-सी सांत्वना भर है, जिसके तीन उत्तरी राज्यों में सफाए ने केंद्र में भाजपा की मुख्य चैलेंजर के तौर पर खुद को रखने के मंसूबों पर पानी फेर दिया है. राजनैतिक टिप्पणीकार और विश्लेषक अमिताभ तिवारी कहते हैं, "इन नतीजों से यही बात निकलती है कि कांग्रेस सीधे मुकाबले वाले राज्यों में भाजपा का धराशायी नहीं कर पाएगी."
ऐसे राज्यों में उसका ट्रैक रिकॉर्ड अपने आप में सबूत है. सात राज्यों मंज भाजपा उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी है—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक. 2019 में कांग्रेस ने इन राज्यों में लोकसभा की कुल 128 सीटों में से महज चार पर जीत हासिल की थी.
मोदी की भारी लोकप्रियता रेटिंग और मतदाताओं को निर्णायक ढंग से अपने पक्ष में झुकाने की क्षमता के मद्देनजर, जो उत्तर की तिहरी जीत से साफ है, विशेषज्ञों को इन सात राज्यों में नतीजे अलहदा होने की उम्मीद नहीं है. यहां तक कि कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी, जहां कांग्रेस सत्तारूढ़ दल है, जनमत सर्वेक्षण यही बताते हैं कि केंद्र में मोदी ही पसंदीदा विकल्प हैं.
उत्तर में कांग्रेस के सफाए का (उसके पास अब केवल हिमाचल प्रदेश है) 'इंडिया’ ब्लॉक के बैनर तले विपक्षी एकता पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है. तिवारी का मानना है कि कांग्रेस ने इन राज्यों में गठबंधन के सहयोगी दलों और खासकर समाजवादी पार्टी के सीटों में साझेदारी के अनुरोध को ठुकराकर शायद गलती की.
उसके निराशाजनक प्रदर्शन से गठबंधन के भीतर भी उसकी स्थिति कहीं ज्यादा नाजुक हो गई है. इससे कुछ हलकों में यह विश्वास मजबूत हुआ है कि अगर कांग्रेस अपने गढ़ों में भाजपा को चुनौती नहीं दे सकती, तो वह दूसरे सहयोगी दलों को अपने-अपने राज्यों में भगवा चुनौती से निबटने में भला कैसे मदद कर सकती है.
जनता दल (यूनाइटेड) के नीतीश कुमार और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, जिन्होंने वरिष्ठ सहयोगी के अधिकार कांग्रेस को सौंपना स्वीकार कर लिया था, अब खुद गठबंधन की अगुआई करने पर विचार कर सकते हैं. 'इंडिया’ ब्लॉक की छोटी पार्टियां गठबंधन को धता बताकर केंद्र में गद्दीनशीन निजाम का रुख कर सकती हैं. तटस्थ राज्य भी अब शायद भाजपा का आक्रामक ढंग से मुकाबला करना न चाहें.
भाजपा को बड़ी बढ़त
इस तिहरी जीत ने जाति जनगणना और ओबीसी आरक्षण के इर्द-गिर्द बढ़ते शोर-शराबे को भी शांत करने में भाजपा की मदद की है. बेशक, नीतीश ने सबसे पहले इस जिन्न को बोतल से बाहर निकाला, पर कांग्रेस ने हाथोहाथ इसकी संभावनाओं को लपक लिया और 2024 की तरफ बढ़ते हुए मंडल 2.0 को विपक्षी अभियान के अव्वल नैरेटिव की तरह पेश कर दिया.
तीन उत्तरी राज्यों में ओबीसी के जबरदस्त ढंग से भाजपा के पक्ष में वोट देने के साथ हाल के चुनावों ने इस नारे की सीमाओं को उघाड़कर रख दिया. मोदी का अपनी जनकल्याण योजनाओं को व्यापक सामाजिक-आर्थिक समूहों तक विस्तार करने और प्रदर्शन तथा डिलिवरी पर तेजी से अमल पर जोर शायद वोटरों के जाति आग्रह पर भारी पड़ा.
मोदी ने इसे करीने से पेश भी किया, "मैं सिर्फ चार जातियों का ध्यान रखता हूं—महिलाएं, युवा, किसान और गरीब." राजनैतिक विश्लेषक रजत सेठी कहते हैं, "ओबीसी जनगणना की समूची कवायद ने भाजपा को चिंता में डाल दिया था. मगर इन नतीजों के साथ भाजपा काफी राहत की सांस ले सकती है, क्योंकि इससे उसके वोट बैंकों में कोई सेंध लगती या विपक्ष को कोई फायदा मिलता दिखाई नहीं दिया."
देशव्यापी ओबीसी जातिगणना के विपक्ष के आह्वान को बेअसर करने के लिए मोदी सरकार ओबीसी जातियों के उप-वर्गीकरण पर न्यायमूर्ति रोहिणी समिति की रिपोर्ट लागू करने पर भी विचार कर रही थी, पर अब इसके लिए वक्त ले सकती है.
भाजपा ने तब और राहत की सांस ली जब पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) बहाल करने सरीखे मुद्दे कांग्रेस के पूरा जोर लगा देने के बावजूद उम्मीद के मुताबिक समर्थन हासिल नहीं कर पाए. इसके असर से चिंतित केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पहले ओपीएस की समीक्षा के लिए वित्त सचिव टी.वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में समिति का गठन कर दिया था और गृह मंत्री शाह ने वादा किया था कि समिति की रिपोर्ट आने के बाद इस पर चर्चा कराई जाएगी. हाल की चुनावी जीत से मोदी सरकार पर इसका दबाव कम हो जाएगा.
तीन राज्यों की इस जीत ने मोदी और भाजपा को शर्तिया केंद्र में तीसरे कार्यकाल के लिए मजबूत स्थिति ला दिया है. लेकिन यह पूरी तरह पक्का नहीं है. चेतावनी का पहला संकेत मई में मिला, जब भाजपा ने अपने शासन वाले इकलौते दक्षिणी राज्य को कांग्रेस के हाथों गंवा दिया. छह दक्षिणी राज्यों की 130 संसदीय सीटों में से भाजपा ने 2019 के आम चुनाव में 29 सीटें जीतीं, जिनमें 25 अकेले कर्नाटक से और अन्य चार तेलंगाना से आई थीं.
कांग्रेस ने अब दोनों राज्यों में जीत हासिल कर ली है, इसलिए भाजपा को दक्षिण में अपनी स्थिति सुधारने में मुश्किल हो सकती है, भले ही मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण पार्टी 2019 में अपनी जीत बरकरार रख सकी थी. कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारामैया ने कांग्रेस के लिए कम से कम 20 संसदीय सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है, जबकि तेलंगाना में ए. रेवंत रेड्डी का नेतृत्व भाजपा की थोड़ी-बहुत सीटों में भी सेंध लगाने की कांग्रेस की संभावनाओं को उज्ज्वल कर सकता है.
हालांकि भाजपा कोशिश किए बिना हार नहीं मानने वाली है. उसने पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे विजयेंद्र को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर लिंगायतों का भरोसा फिर हासिल करने और एच.डी. देवेगौड़ा की जनता दल (सेक्युलर) के साथ गठबंधन करके वोक्कालिगा वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है. लेकिन ये शुरुआती दिन हैं.
भाजपा की पूरबी चिंता
भाजपा की विपक्ष शासित चार पूर्वी राज्यों—बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड में भी पकड़ अच्छी नहीं है. इन चार राज्यों की 117 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2019 के आम चुनाव में 54 सीटें मिली थीं. लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और टीएमसी की अपनी ताकत बढ़ाने और 'इंडिया’ गठबंधन की एकजुटता की स्थिति में राज्य की कुल 42 संसदीय सीटों में से 2019 में जीती 18 सीटें भाजपा के लिए को बरकरार रख पाना मुश्किल हो सकता है.
इसी तरह बिहार में अगर नीतीश और तेजस्वी का जद (यू)-राजद गठबंधन अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखता है तो, वहां भगवा पार्टी को 2019 में मिली 17 सीटें पर भी मुश्किल पेश आ सकती है. अनिश्चित संभावनाओं का दूसरा राज्य महाराष्ट्र है. वहां कुल 48 संसदीय सीटों में 2019 में भाजपा को 23 सीटें मिली थीं और उसकी तब की सहयोगी अविभाजित शिवसेना को 18 सीटें.
भाजपा को अपने हिस्से की सीटों को बरकरार रखने का तो भरोसा है, लेकिन यह निश्चित नहीं है कि उसके मौजूदा गठबंधन सहयोगी—शिवसेना का शिंदे गुट और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का अजित पवार गुट अपनी पकड़ बनाए रख सकते हैं. हरियाणा में भी हालात अच्छे नहीं दिख रहे हैं. भाजपा 2019 में सभी 10 सीटें जीत गई थी, लेकिन बढ़ती सत्ता विरोधी लहर से उसे दोबारा जीत मुश्किल लगती है.
पंजाब में भाजपा के पास महज दो सीटें हैं इसलिए दांव बड़ा नहीं है, लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार के साथ, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल में आई नई जान दिखने लगी है और वे अधिक सीटें जीत कर वापसी करने की कोशिश कर सकते हैं. कुल मिलाकर राज्य की 13 सीटों में कुछ अधिक झटकना मुश्किल होगा.
भाजपा जिन राज्यों में मोटे तौर पर एकतरफा जीत का भरोसा कर सकती है, उनमें हाल में जीते तीन राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात और असम हैं. इन राज्यों में 185 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें भाजपा ने 2019 में अपने दम पर 159 सीटें और दो उसके सहयोगी ने जीती थी. उत्तर में उसकी जीत का थोड़ा-बहुत असर शायद महाराष्ट्र, बिहार और दक्षिण के छिटपुट क्षेत्रों में पड़ सकता है.
कुल मिलाकर भाजपा कुल 543 सीटों में 160 सीटों की बढ़त से शुरुआत करती है. उसे 272 का साधारण बहुमत हासिल करने के लिए बाकी 383 में से 112 सीटों की और दरकार है. पिछले रिकॉर्ड के मद्देनजर भाजपा दक्षिण की 100 सीटों में खाली हाथ रह सकती है. इस तरह कड़े मुकाबले वाले राज्यों में उसके पास 283 ही बचती हैं, जिनसे उसे बहुमत का जुगाड़ करना है. ऊपरी तौर तो यह संभव दिखता है लेकिन भारी जीत के लिए काफी सीटें हासिल करनी होंगी.
इस मायने में गणित से अधिक मतदाताओं के साथ मोदी की केमिस्ट्री ही भाजपा के ख्वाब को पूरा कर सकती है. अगस्त 2023 के इंडिया टुडे देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक, अपने राजकाज के 10वें वर्ष में होने के बावजूद मोदी की लोकप्रियता 50 फीसद से ऊपर बनी हुई है, जैसा कि उनकी सरकार के कामकाज की रेटिंग से पता चलता है.
वे अभी भी भाजपा के लिए तीसरी जीत की इकलौती वजह हो सकते हैं, क्योंकि अभी भी उनका कोई विकल्प नहीं है, न व्यक्तित्व में या न नैरेटिव में. लेकिन जानकार सत्तारूढ़ पार्टी को आत्म-संतुष्टि या अहंकार से दूर रहने चेतावनी देते हैं, क्योंकि एक भी गलत कदम आम चुनाव में भारी पड़ सकता है.
लेकिन अजेय होने के आभामंडल के बावजूद मोदी 2024 को हल्के में नहीं ले रहे हैं. दरअसल, वे यथासंभव सर्वाधिक जनादेश के साथ जीतना चाहते हैं. सितंबर में जी20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन ने पहले ही जनता की नजर में उनकी छवि बढ़ा दी है. उन्हें विश्व मंच पर देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला माना जाने लगा है. उसके फौरन बाद उन्होंने एक और कमाल किया और संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पारित करवाया.
अगले साल जनवरी में अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन उनके अभियान की एक और शुभ शुरुआत होगी. उम्मीद है कि हिंदुत्व भाजपा के चुनाव अभियान का मुख्य आधार बना रहेगा. 2019 के नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के नियम भी मार्च से पहले तैयार किए जा सकते हैं, जैसा कि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में संकेत दिया था.
यह कानून पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से 31 दिसंबर, 2014 से पहले आए हिंदू, सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध और जैन (लेकिन मुस्लिम नहीं) समुदायों को नागरिकता प्रदान करने के योग्य बनाता है, लेकिन उन्हें धार्मिक प्रताड़ना की बात साबित करनी होगी. सेठी कहते हैं, "भाजपा हर जगह हरे-भरे क्षेत्रों की तलाश करेगी, ताकि अधिक सीटें जीत सके.
वह उन राज्यों में अपने विधायकों को भेजेगी जहां काडर को सक्रिय करने और समर्थन आधार को बढ़ाने की जरूरत है." पार्टी अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को लुभाने के लिए भी ठोस प्रयास कर रही है, जिनके लिए लोकसभा में क्रमश: 84 और 47 सीटें आरक्षित हैं. इसी वजह से उसने अपने पसंदीदा मुद्दों में से एक—समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, क्योंकि कई आदिवासी समूह उसे अपने सदियों पुराने रीति-रिवाजों के खिलाफ मानते हैं.
2024 का रास्ता
यहां तक कि आर्थिक मूड भी प्रधानमंत्री के पक्ष में काम करता दिख रहा है. आर्थिक वृद्धि के आंकड़े बढ़ रहे हैं और शेयर बाजार में तेजी आ रही है, जिससे मोदी सरकार के प्रति सकारात्मक धारणाएं बन रही हैं. यह दीगर बात है कि आर्थिक विकास के-आकार का है, जिसमें अमीर और मध्यम वर्ग अधिक संपन्न हो रहे हैं जबकि गरीबों की आय और रोजगार के अवसर घट रहे हैं.
चुनावों में मुफ्त योजनाओं को लेकर जो उन्माद दिख रहा है, वह इस बात का प्रमाण है कि लोग गृहस्थी चलाने के लिए खैरात पर निर्भर हैं. ये अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं, जिससे भाजपा के माथे पर बल पड़ना चाहिए. यही वजह है कि मुफ्त और रियायती योजनाओं के प्रति नापसंदगी के बावजूद मोदी को मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकारी खजाना खोलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
उन्होंने पहले ही छोटे कारोबार वालों, खासकर पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की मदद और 3 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता देने के लिए 13,000 करोड़ रुपए की विश्वकर्मा योजना की घोषणा की है. कमजोर आदिवासी समूहों की मदद के लिए प्रधानमंत्री ने अगस्त में 24,000 करोड़ रुपए की कल्याण योजना शुरू की, जिसमें उनके लिए आवास, सड़क और नल से पानी की आपूर्ति शामिल है.
राज्य चुनाव जीत कर मोदी मई में होने वाले आम चुनाव के लिए तैयार हैं. तिवारी जैसे राजनैतिक विश्लेषक त्रिस्तरीय रणनीति की ओर इशारा करते हैं. एक, मोदी ने मंत्रियों और पार्टीजनों को पिछले 10 वर्ष में सरकार की उपलब्धियों को बताने के लिए अभियान चलाया है और इसे 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के दर्शन से जोड़ा है.
दूसरे, मोदी की तुलना पूर्ववर्ती सरकार से नहीं, बल्कि उनके सत्ता संभालने से पहले के 67 वर्षों से करनी है, ताकि उनकी उपलब्धियों का एहसास दिलाया जा सके. तीसरे, ऐसा नजरिया तैयार करना है, जो समाज के विभिन्न वर्गों में आशा और आकांक्षा जगाए. इसलिए 2047 तक देश को विकसित भारत बनाने का सपना है. यह 25-वर्षीय योजना मोदी को अल्पावधि में बिना कुछ किए दीर्घकालिक नजरिए में बड़ा राजनेता जैसा बनाने में मददगार है.
जैसे किसानों की आय दोगुनी करने का वादा अभी भी लटका है. लेकिन दीर्घावधिक लक्ष्य शायद ही वोटरों को खींचते हैं. उन्हें तो माली हालत ठीक करने वाले फौरी उपाय चाहिए. इस पर टीम मोदी को काम करना चाहिए. लेकिन मोदी की लोकप्रियता में इजाफा हो रहा है, जो किसी प्रधानमंत्री के दसवें साल में शायद ही दिखता है. वे 2024 में हैट्रिक की दौड़ में बेशक आगे हैं.

