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राज्य फतह और कब्जे की बड़ी लड़ाई

कांग्रेस और भाजपा, दोनों राष्ट्रीय पार्टियां 2024 की बड़ी लड़ाई की तैयारी में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी-अपनी चुनावी रणनीतियों को आजमाने और गढ़ बचाने की कोशिश में

मुठभेड़ को तैयार ग्वालियर में 2 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
मुठभेड़ को तैयार ग्वालियर में 2 अक्तूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

नवंबर में होने जा रहे पांच राज्यों में से तीन हिंदी भाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में ऐसी इबारत लिखी जाएगी, जो 2024 में लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए अहम साबित होगी. इन राज्यों में 520 विधानसभा सीटों में से ज्यादातर में भारतीय राजनीति की इन दो आला पार्टियों के बीच सीधी टक्कर होगी.

भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में हावी है, तो कांग्रेस दो राज्यों में सत्ता में है और तीसरे में मजबूत चुनौती दे रही है. देश की सबसे पुरानी पार्टी छह राज्यों (दो में बतौर जूनियर गठबंधन पार्टनर) की सत्ता में है और उसके लिए अपने गढ़ को बचना जरूरी है. भाजपा 10 राज्यों में अपने दम (पूर्वोत्तर में चार) पर और तीन गठबंधन सरकारों में सत्ता में है. इन राज्यों में जीत से हिंदी पट्टी में उसकी जगह मजबूत हो जाएगी.

करीब 28 विपक्षी दलों के भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन या 'इंडिया’ की नींव पड़ने के बाद ये पहले बड़े चुनाव हैं. इसलिए इनमें कांग्रेस की बड़ी जीत गठबंधन में जान फूंक देगी. दरअसल, गठबंधन की कामयाबी काफी हद तक उन सीटों पर जीत पर निर्भर करेगी, जहां कांग्रेस और भाजपा का सीधा मुकाबला है.

भोपाल में 4 अक्तूबर को एक कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

दोनों पार्टियों के बीच जिन 186 लोकसभा सीटों पर सीधी टक्कर होनी है, उनमें 65 इन तीन राज्यों में हैं. हालांकि राज्य चुनावों में शानदार प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में जीत की गारंटी नहीं होती है. 2018 में कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों में कुल 520 विधानसभा सीटों में से 282 जीत ली थीं, लेकिन भाजपा कुछ महीने बाद ही 65 संसदीय सीटों में से 62 जीत गई. फिर भी, नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा जोखिम उठाने को तैयार नहीं है और कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

बड़ी वजह यह भी है कि विपक्षी दलों की ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) वोटों में सेंध लगाने की कोशिश से भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति खतरे में पड़ गई है, जिससे उसे हाल के वर्षों में अच्छा-खासा चुनावी फायदा हुआ है. बड़ी ओबीसी आबादी वाले ये तीनों राज्य देशव्यापी जाति जनगणना के कांग्रेस के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे की परीक्षा-स्थली बनने जा रहे हैं. पार्टी इसमें कामयाब रहती है, तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए हिमाचल और कर्नाटक के बाद जीत की हैट्रिक होगी.

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए ये राज्य चुनाव उनके 'विकासित भारत’ अफसाने की परीक्षा साबित होंगे. यह (अब तक) ओबीसी को लुभाने का सफल फॉर्मूला रहा है, लेकिन व्यापक हिंदू छतरी और 'लाभार्थी वर्ग’ तथा डबल इंजन सरकार के फायदे गिनाकर जातिगत पहचान की आवाज को मंद की जाती है. तीनों राज्यों में प्रधानमंत्री मोदी ही चेहरा होंगे.

शाजापुर में 30 सितंबर को चुनावी रैली में भाषण देते मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ

अलबत्ता, यह प्रयोग हिमाचल और कर्नाटक में नाकाम हो गया था. वास्तव में, 2015 और 2023 के बीच पार्टी 10 विधानसभा चुनाव हार चुकी है, जहां मोदी ने बड़े पैमाने पर प्रचार किया. इससे राज्य चुनावों में उनकी घटती पकड़ उजागर हुई. हालांकि संसदीय चुनावों में वोट खींचने की उनकी ताकत पर खास फर्क नहीं पड़ा. फिर भी, प्रधानमंत्री शर्तिया यही चाहेंगे कि यह साल विजय पताका लहराते बीते.

दूसरी ओर कांग्रेस ने राज्य सिपहसालारों के हाथ कमान थमा दी है. बेशक, इन चुनावों के नतीजे राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा’ की सफलता की भी पुष्टि करेंगे, जिसके दौरान उन्होंने इन राज्यों में काफी दूरी तय की थी. इन राज्यों में जीत राहुल को पूरब से पश्चिम की यात्रा के दूसरे चरण के लिए प्रेरणा बन सकती है और उन्हें 2024 में मोदी से मुकाबले में बेहतर स्थिति में ला सकती है.

इतना कुछ दांव पर लगा होने से दोनों पार्टियां बड़े जोशोखरोश से मोटे तौर पर एकदम विपरीत रणनीतियां अपना रही हैं, जिससे राज्यों में वर्चस्व की यह लड़ाई बेहद दिलचस्प हो गई है.

तेलंगाना के रंगारेड्डी में 17 सितंबर को कांग्रेस नेता राहुल और सोनिया गांधी

जाति का जोर बरकरार

जबसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गांधी जयंती पर अपने राज्य में जाति सर्वेक्षण के नतीजों का ऐलान किया, कांग्रेस और खासकर राहुल को देशव्यापी जाति जनगणना का विचार भा गया. अब कांग्रेस चाहती है कि आरक्षण से 50 फीसद की सीमा हटे और ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातियों को अधिक आरक्षण मिले. तीनों राज्यों में उसने घोषणा की है कि अगर सत्ता में आई तो जाति जनगणना कराएगी.

भाजपा इस मुद्दे पर चुप्पी साधे है. वह चुनाव की पूर्व संध्या पर बर्र के छत्ते में हाथ डालने को तैयार नहीं है. फिर, उसे अपने उच्च जाति के मतदाताओं की ओर से तल्ख प्रतिक्रिया का भी डर है. सो, वह दोहरा रवैया अपना रही है. केंद्र सरकार देशव्यापी जाति जनगणना को इस आधार पर खारिज कर रही है कि यह भारी इंतजामात के मद्देनजर व्यावहारिक नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी इसे देश और समाज को बांटने की कोशिश बता रहे हैं. दूसरी ओर, पार्टी के राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा सहित राज्य इकाइयां और नेता राज्यों में जाति गणना की मांग उठा रहे हैं. पार्टी 'समग्र सामाजिक न्याय’ के अपने मॉडल को आक्रामक रूप से बढ़ा रही है और विपक्ष की मांग को 'महज प्रतिनिधि राजनीति’ बता रही है. वह 'समग्र सामाजिक न्याय’ के जरिए वास्तविक सशक्तिरकरण और गरीबों की आर्थिक आकांक्षाओं की पूर्ति का वादा करती है, जो उसके मुताबिक, आरक्षण से एक कदम आगे की बात है.

हाल में जारी 13,000 करोड़ रुपए की पीएम विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना को इसकी मिसाल बताया जा रहा है, जिसके तहत 18 छोटे कारीगर पिछड़े समुदायों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के साथ वित्तीय सहायता देने का प्रस्ताव है. चुनावी राज्यों में भाजपा ने ओबीसी उम्मीदवार उतारने की रणनीति भी अपनाई है. छत्तीसगढ़ की कुल 90 सीटों में 33 पर भाजपा ने ओबीसी उम्मीदवार उतारे हैं. मध्य प्रदेश में अब तक घोषित पार्टी प्रत्याशियों में करीब 29 फीसद ओबीसी हैं. राजस्थान की पहली सूची में तकरीबन 40 फीसद ओबीसी उम्मीदवारों को जगह दी गई.

उधर, कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा की बेचैनी को भांपकर जाति गणना की मांग को तेज कर रही है. उसे उम्मीद है कि इसके जरिए वह भाजपा के ओबीसी समर्थन आधार में सेंध लगा पाएगी. कांग्रेस लोगों को लगातार याद दिला रही है कि उसके चार मुख्यमंत्रियों में से तीन—राजस्थान में अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और कर्नाटक में सिद्धारामैया—ओबीसी हैं.

लेकिन प्रधानमंत्री खुद गुजरात में मोढ़ समुदाय के ओबीसी हैं. मुख्यमंत्री चौहान भी ओबीसी हैं और तीनों राज्यों के कई नेता ओबीसी हैं. छत्तीसगढ़ में पार्टी ने आदिवासी नेता विष्णु देव साई की जगह अरुण साव को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है, जो ओबीसी साहू समुदाय का हिस्सा हैं. साव के अध्यक्ष बनने से साहू समुदाय भाजपा की ओर लौट सकता है, क्योंकि कुर्मी जाति के मुख्यमंत्री बघेल की वजह से ताम्रध्वज साहू जैसे कांग्रेस नेता पीछे हो गए हैं. साहू समुदाय 14 फीसद आबादी के साथ राज्य में सबसे बड़ा ओबीसी समूह है.

आदिवासी अहमियत

चुनावी राज्यों में ओबीसी आबादी तकरीबन 65 फीसद जितनी भारी है, तो आदिवासी आबादी भी कम अहमियत नहीं रखती. मध्य प्रदेश में 21 फीसद आदिवासी आबादी है और ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चलता है कि एसटी के लिए आरक्षित सीटें ज्यादा तादाद में जीतने वाली पार्टी ही सरकार बनाती है. 2018 में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने एसटी के लिए आरक्षित 101 सीटों में से 71 जीती थीं.

सो, आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी-वाड्रा ने यह वादा करने के लिए मध्य प्रदेश के महाकौशल क्षेत्र के आदिवासी जिले मंडला को चुना कि उनकी पार्टी संविधान की छठी अनुसूची को यहां भी लागू करेगी, जिसके तहत फिलहाल असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में आदिवासी इलाकों के प्रशासन और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के प्रावधान हैं.

कांग्रेस ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 मध्य प्रदेश में लागू करने का वादा भी किया है, जो चौहान की सरकार पर सीधा हमला है, जिसने बार-बार वादा करने के बावजूद इसे अभी तक लागू नहीं किया. जुलाई में भाजपा के एक कार्यकर्ता के एक आदिवासी के चेहरे पर पेशाब करने जैसी घटनाओं ने भी कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ गोला-बारूद मुहैया कराया है.

आदिवासी महिला को देश का राष्ट्रपति बनाने के श्रेय का दावा करने वाली भाजपा ने तीनों राज्यों में आदिवासी वोटों पर चौकस नजर बनाए रखी है. सितंबर, 2021 में गृह मंत्री अमित शाह ने जबलपुर में आदिवासी राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया, तो दो महीने बाद प्रधानमंत्री मोदी ने भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नामकरण गोंड रानी कमलापति के नाम पर कर दिया.

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भाजपा 827 वन गांवों को राजस्व गांवों में बदलने का वादा कर रही है, जिससे वहां विकास परियोजनाओं को जमीन पर उतारना आसान हो जाएगा. छत्तीसगढ़ में 29 सीटें आदिवासी समाज के लिए आरक्षित हैं. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने इनमें से 25 सीटों पर जीत हासिल की थी. इन चुनावों में भाजपा अपने हाल के प्रयासों के जरिये इन सीटों पर अपनी संभावनाओं को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

स्थानीय बनाम राष्ट्रीय

राष्ट्रीय दलों के तौर-तरीकों में सबसे बड़ा फर्क तीनों चुनावी रण वाले राज्यों में प्रचार अभियान और रणनीतियों में है. हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के तजुर्बे से कांग्रेस ने राज्य इकाइयों को कमान सौंपी और चुनावी नैरेटिव तय करने दिया. इसके उलट भाजपा की प्रचार रणनीति दिल्ली से चलाई जा रही है. कांग्रेस ने कमलनाथ, गहलोत और बघेल को क्रमश: मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पदों का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, तो भाजपा ने ऐसा करने से परहेज किया. इससे पार्टी के तीन दिग्गजों—चौहान, राजे और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह—के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए.

कांग्रेस को आंतरिक कलह से पूरी तरह छुटकारा भले न मिला हो, उसने सभी राज्यों और खासकर अपनी हुकूमत वाले दोनों राज्यों में नेतृत्व का मुद्दा तय कर लिया. यह दरअसल एक साल पुरानी खड़गे की अध्यक्षता की सबसे बड़ी उपलब्धि है. जिस तरह उन्होंने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए दो झगड़ते दिग्गजों—सिद्धारामैया और डी.के. शिवकुमार—के बीच सुलह कराई थी, वैसे ही राजस्थान में गहलोत और पायलट तथा छत्तीसगढ़ में बघेल और उनके डिप्टी टी.एस. सिंहदेव के बीच सुलह करवाई.

केंद्रीय टीम मुश्किल से हासिल इस शांति को चुनाव खत्म होने तक कायम रखने के लिए भी जी-जान से जुटी है. सिंहदेव को पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल किया गया है और प्रियंका गांधी ने राजस्थान में दो ऐसी जगहों की रैलियों में हिस्सा लिया, जहां पायलट का अच्छा-खासा प्रभाव है. इस तरह उन्होंने संकेत दिया कि पायलट को परिवार का समर्थन है.

घर को चुस्त-दुरुस्त करने के बाद खड़गे और राहुल गांधी ने चुनाव अभियान संभालने की जिम्मेदारी राज्य के क्षत्रपों पर छोड़ दी, जबकि कांग्रेस आलाकमान कुछ भरोसमंद चुनाव रणनीतिकारों के जरिए नजर रख रहा है.

इन रणनीतिकारों में प्रशांत किशोर के पूर्व साथी तथा कर्नाटक में पार्टी की जीत के वास्तुकारों में से एक सुनील कानूनगो, पार्टी के सदस्य बने पूर्व आइएएस अफसर तथा कर्नाटक के चुनाव में कानूनगो की टीम के साथ काम कर चुके शशिकांत सेंथिल, और कर्नाटक में शिवकुमार के अभियान की देखरेख करने वाली फर्म डिजाइनबॉक्स्ड के नरेश अरोड़ा शामिल हैं. सेंथिल को राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो कानूनगो राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों के लिए हैं. कर्नाटक के अभियान के एक और सदस्य, राज्य के प्रभारी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला यही भूमिका मध्य प्रदेश में निभाएंगे.

दूसरी तरफ भाजपा भले डबल इंजन सरकार के फायदे गिनाए लेकिन राज्य नेतृत्व पर भरोसा करने के बजाए मोदी के नाम पर ही इन राज्यों में चुनाव लड़ रही है. मोदी ने 19 नवंबर को मध्य प्रदेश के लोगों के नाम एक चिट्ठी लिखी कि उनके वोट केंद्र में उनके प्रति 'सीधे समर्थन’ का काम करेंगे. बीते साल मोदी ने इन तीनों राज्यों का दर्जन भर से ज्यादा बार दौरा किया.

उन्होंने बुनियादी ढांचे या विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया या आधारशिला रखी, और इन मौकों का इस्तेमाल पार्टीजनों के साथ संवाद के लिए किया, यहां तक कि बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को संबोधित भी किया. भाजपा की योजना पांचों चुनावी राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीब तीन दर्जन रैलियां आयोजित करने की है. सबसे अधिक 11 रैलियां प्रधानमंत्री मोदी मध्य प्रदेश में करेंगे. राजस्थान में मोदी की 10 रैली होंगी. छत्तीसगढ़ में छह रैलियों के जरिए मोदी भाजपा की संभावनाओं को मजबूती देने का काम करेंगे.

भाजपा ने तीन केंद्रीय मंत्रियों सहित 21 सांसदों को भी मैदान में उतारा है. मध्य प्रदेश में, जहां आठ सांसद चुनाव मैदान में हैं, अभियान समिति के प्रमुख और खुद उम्मीदवार केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बिल्कुल नजदीक से चौहान की हर कारगुजारी पर नजर रख रहे हैं, जैसा कि केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते और प्रह्लाद पटेल, राज्य में मंत्री नरोत्तम मिश्रा और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय सहित मुख्यमंत्री पद के दूसरे अभिलाषी भी कर रहे हैं.

राजस्थान में राजे किसी चुनाव समिति का हिस्सा तक नहीं हैं. वे गहलोत की अगुआई वाली कांग्रेस के बजाए केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा सरीखे अपनी पार्टी के साथियों की तरफ से ही चुनौती का सामना कर रही हैं. भाजपा के कई अंदरूनी सूत्र लोकसभा सांसद और जयपुर राजघराने की दीया कुमारी को मैदान में उतारने के फैसले को एक और राजघराने की नेता को तैयार करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं ताकि रैलियों में आ रही भीड़ के हिसाब से राज्य में भाजपा की सबसे कद्दावर नेता राजे के प्रभाव का मुकाबला किया जा सके.

छत्तीसगढ़ में भाजपा ने पिछले साल पहली बार सांसद बने 54 वर्षीय साव को राज्य प्रमुख बनाकर पीढ़ीगत बदलाव किया. नारायण चंदेल ने धरमलाल कौशिक की जगह विपक्ष के नेता का पद संभाला. उन्हें रमन सिंह का उत्तराधिकारी बताया जा रहा है, तो आदिवासी मामलों की केंद्रीय राज्यमंत्री रेणुका सिंह सरुता के उतरने से मामला पेचीदा हो गया.

कर्नाटक और हिमाचल की गलतियों को दोहराने से बचने के लिए, जहां अंदरूनी कलह ने पार्टी की संभावनाओं को नुक्सान पहुंचाया, राष्ट्रीय नेतृत्व किसी एक गुट को अपनी ताकत दिखाने का मौका दिए बिना राज्य के मामलों पर कड़ी नजर रख रहा है. राजे को राजस्थान के चुनाव अभियान की कमान सौंपने से इनकार कर दिया गया, तो पार्टी ने अति-महत्वाकांक्षी राज्य अध्यक्ष सतीश पूनिया को भी बदल दिया, जिनकी राजे के साथ निरंतर अदावत सिरदर्द बनी हुई थी. उनकी जगह चुपचाप काम करने वाले चित्तौड़गढ़ के सांसद सी.पी. जोशी को लाया गया, जो गृह मंत्री शाह के करीबी हैं. छत्तीसगढ़ में मोदी-शाह के भरोसे के ओम माथुर को चुनाव प्रभारी बनाया गया.

मेरा कल्याण, तुम्हारी रेवड़ियां

चाहे प्रधानमंत्री की तरह 'रेवड़ियां’ कहें या कांग्रेस की नई शब्दावली में 'गारंटियां’ कहें, पर सच्चाई यही है कि लोक कल्याणवाद और लोकलुभावनवाद पार्टी घोषणापत्रों के अमिट हिस्से बन गए हैं. भाजपा ने लाभार्थी वर्ग को खुश रखना जारी रखा है. यह वोट बैंक उसने विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के 12 करोड़ लाभार्थियों से तैयार किया है.

उसके कार्यकर्ता इन राज्यों के हर कोने में प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, पीएम-किसान (प्रधानमंत्री किसान सक्वमान निधि) योजना, सुकन्या समृद्धि योजना-बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पीएम गरीब कल्याण योजना (पीएमजीकेवाइ) और आयुष्मान भारत सरीखी योजनाओं के बारे में बता रहे हैं. पार्टी बीते नौ साल में सरकार की उपलब्धियों का बखान करने के लिए अफसरशाहों को 'रथ प्रभारियों’ के तौर पर आगे बढ़ा रही थी, लेकिन कांग्रेस ने इसके अमल में रोड़ा अटका दिया. 

अलबत्ता जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है, वहां वह भी भाजपा की कुछ नकल कर रही है. मध्य प्रदेश में उसने पढ़ो-पढ़ाओ योजना का ऐलान किया, जिसमें कक्षा 1 से 12 तक के छात्रों को मुफ्त शिक्षा और 500 रुपए से लेकर 1,500 रुपए तक मासिक छात्रवृत्ति का वादा किया गया है. भाजपा उसके इस वादे को बेअसर करने वाली कोई योजना न ले आए, यह पक्का करने के लिए कांग्रेस ने चुनाव आचार संहिता लागू होने का इंतजार किया और उसके बाद ही प्रियंका गांधी ने मंडला में इस योजना का ऐलान किया.

इसके अलावा, कांग्रेस के घोषणापत्र में 1,200 से ज्यादा वादे हैं, जिनमें सभी के लिए 25 लाख रुपए का स्वास्थ्य और 10 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा, 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली, 200 यूनिट बिजली का आधा शुल्क, हरेक महिला को 1,500 रुपए प्रति माह, बेरोजगार शिक्षित युवाओं को दो साल तक 1,500-3,000 रुपए हर महीने, पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, 2 लाख रुपए तक के कृषि कर्ज माफ, किसानों से धान 2,500 रुपए और गेहूं 2,600 रुपए प्रति क्विंटल में खरीदना, गोबर दो रुपए प्रति किलो के भाव से खरीदना और मध्य प्रदेश के लिए आइपीएल टीम शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री बघेल कल्याणकारी योजनाओं को बढ़-चढ़कर सामने रख रहे हैं जिनमें राजीव गांधी किसान न्याय और गोधन न्याय योजनाएं, बेरोजगारी भत्ता, समर्थन मूल्य पर मोटे अनाज और तमाम वनोपज की खरीद, धान के किसानों को सब्सिडी और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को नकद सहायता शामिल है. राजस्थान में गहलोत जिन योजनाओं के बूते सत्ता में वापसी की आस लगाए हैं, उनमें 25 लाख रुपए तक का कवरेज देने वाला चिंरजीवी स्वास्थ्य बीमा, अन्नपूर्णा फूड किट, बुजुर्ग पेंशन में बढ़ोतरी, गैस सिलेंडर पर सब्सिडी, 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली, ओपीएस की बहाली, और युवतियों तथा अविवाहित महिलाओं को मुफ्त मोबाइल फोन सरीखी योजनाएं शामिल हैं.

अलबत्ता भाजपा के पास अब तीनों राज्यों के अहम वोट बैंक यानी महिला मतदाताओं को रिझाने के लिए एक और तुरुप का पत्ता है—हाल में पारित महिला आरक्षण विधेयक. मध्य प्रदेश में राज्य के 2023-24 के बजट में महिला केंद्रित योजनाओं का एक-तिहाई हिस्सा है. मुख्यमंत्री चौहान लाडली बहना योजना (एलबीवाइ) पर भी दांव लगा रहे हैं, जिसके तहत करीब 13 करोड़ महिलाओं को हर माह 1,250 रुपए का भुगतान किया जाता है, जिसे बढ़ाकर 3,000 रुपए करने का वादा है. 500 रुपए में एलपीजी सिलेंडर की कांग्रेस की पेशकश को भोथरा करने के लिए एलबीवाइ लाभार्थियों को 450 रुपए में गैस सिलेंडर का भी वादा है.

भाजपा की महिला केंद्रित पहलों का मुकाबला के लिए कांग्रेस महिलाओं के व्यापक कोटे के भीतर ओबीसी महिलाओं को अलग आरक्षण देने की अपनी मांग दोहरा रही है और बढ़-चढ़कर मतदाताओं को बता रही है कि मोदी सरकार ने महिला आरक्षण के अमल को परिसीमन के साथ जोड़कर किस तरह देश की आंखों में धूल झोंकी है. कांग्रेस महिलाओं को टिकट देने के मामले में भाजपा को पछाड़ने की कोशिश कर रही है. छत्तीसगढ़ में उसने कुल 90 में से 19 महिलाओं के मैदान में उतारा है.

हिंदुत्व बनाम नर्म हिंदुत्च

भाजपा का जोर भले कल्याणकारी कार्यक्रमों के साथ विकास के एजेंडे पर है, मगर वह खासकर ठीक-ठाक मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में अपने हिंदुत्व के मुद्दों के जरिए ध्रुवीकरण करने से कतई नहीं हिचकती. कर्नाटक के चुनावों में कांग्रेस के घोषणापत्र में सत्ता में आने पर बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई तो पार्टी का अभियान पटरी से उतरता हुआ लगा था. प्रधानमंत्री मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं ने इसे बजरंगबली के अपमान से जोड़ दिया.

इस बार भी, भाजपा ने ध्रुवीकरण को हवा देने के लिए तीन राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों का खुलकर जिक्र कर रही है. मसलन, मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी हिंसा, राजस्थान में दो मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा एक हिंदू दर्जी का सिर काटने की घटना, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और ईसाइयों के बीच तनाव तथा राज्य में हिंदू-मुस्लिम हिंसा. हालांकि, तीनों राज्यों में स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह सतर्क है कि भाजपा को हिंदुत्व के मुद्दे को न ले उड़े.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से पूछा गया कि क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस की बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की कोई योजना है, तो फौरन जवाब आया, नहीं. फिर, पूछा गया कि क्या धीरेंद्र शास्त्री के हिंदू राष्ट्र के आह्वान का समर्थन करते हैं, तो मंजे हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि 82 प्रतिशत हिंदू आबादी वाला भारत पहले ही हिंदू राष्ट्र है. जब द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म पर टिप्पणियों से हलचल मचा दी, तो कमलनाथ ने विवाद में फंसने से बचने के लिए भोपाल में 'इंडिया’ गठबंधन की पहली साझा रैली आयोजित करने से इनकार कर दिया.

छत्तीसगढ़ में बघेल क्षेत्रीय गौरव या छत्तीसगढ़ियावाद को बुलंद करके हिंदुत्व का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने स्थानीय त्योहारों के लिए सार्वजनिक छुट्टियों की घोषणा की है, स्थानीय खेलों और व्यंजनों को बढ़ावा दिया है और एक राज्य गीत और आइकन पेश किया है. उनकी सरकार ने राम वनगमन पथ, रामायण मेला, राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों का निर्माण और रायपुर में माता कौशल्या मंदिर का जीर्णोद्धार जैसी परियोजनाएं भी शुरू की हैं.

संगठन की ताकत

पिछले दशक के चुनावों में भाजपा की ताकत संगठन और अनुशासन रही है. इसी वजह से कांग्रेस की आंतरिक रिपोर्टों और उसके अधिवेशनों में संगठन-निर्माण पर काफी जोर रहा है. मध्य प्रदेश कांग्रेस को यह एहसास शिद्दत से हो गया है. कमलनाथ ने जिला समितियों और बूथ स्तर के बीच मंडलम नाम से संगठन की एक इकाई कायम की है, जिसमें अपनी पसंद के कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया है.

मतदाताओं और मतदाता सूचियों से जुड़े बूथ स्तर के एजेंट या बीएलए भाजपा के लिए गेम-चेंजर साबित होते रहे हैं. पार्टी ने उन्हें मध्य प्रदेश के अधिकांश मतदान केंद्रों के लिए पहले से ही नियुक्त किया है. इस बार बीएलए की भूमिका खास होने वाली है. चुनाव आयोग ने शरीर से असक्त लोगों और 80 वर्ष तथा उससे अधिक उम्र के लोगों को घर से वोट करने की अनुमति दी है और बीएलए ही उन्हें मदद करने के लिए अधिकृत हैं. मतदाता सूची में नामों के दोहराव को रोकने के लिए एक ऐप भी बनाया गया है.

कमलनाथ ने भी झुग्गी-झोपड़ी वालों, बुनकरों, पुजारियों, मैकेनिकों और डॉक्टरों जैसे विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के लिए 42 समितियां बनाई हैं. युवा मतदाताओं पर खास फोकस है. तीनों राज्यों में इस बार 54 लाख पहली बार के मतदाता होंगे. मुख्यमंत्री बघेल 13,000 राजीव युवा मितान क्लबों पर भरोसा कर रहे हैं, जो स्थानीय संस्कृति और खेल को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है. हाल में राहुल गांधी क्लबों के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे.

भाजपा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अपनी पन्ना समितियों और पन्ना प्रमुखों (बीएलए का पार्टी संस्करण) के आसरे है. मध्य प्रदेश में 19 लाख पार्टी कार्यकर्ता 64,000 से अधिक मतदान केंद्रों पर सक्रिय हैं. दोनों पार्टियों ने राय जुटाने और सार्वजनिक चर्चा में दखलअंदाजी के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर टेक्स्ट और वीडियो की बाढ़ लाने के खातिर साइबर योद्धाओं को काम पर लगा रखा है.

भाजपा ने पहली बार के युवा वोटरों को लुभाने के लिए भी खास योजनाएं बनाई हैं. राजस्थान में नव मतदाता संगम का आयोजन किया गया. छत्तीसगढ़ में युवा मोर्चा सक्रिय है. मध्य प्रदेश में उन्हें लुभाने के लिए पार्टी ने 'खिलते कमल’ के नाम से कई कार्यक्रम किए. इस बारे में मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा कहते हैं, ''युवा मोर्चा ने पूरे प्रदेश में 23,000 पंचायत और शहरों में 1,820 वार्ड के लिए समिति बनाई है. हर समिति में 11 लोग हैं. ये युवाओं को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों उनका पहला वोट राष्ट्र, भाजपा, नरेंद्र मोदी और विकास के लिए होना चाहिए.’’

उम्मीदवार चयन

अधिकांश चुनाव-पूर्व जनमत सर्वेक्षणों में तीनों राज्यों में कड़ी टक्कर का अनुमान है. इसलिए कोई भी पार्टी टिकट से इनकार किए गए लोगों की बगावत से नुक्सान नहीं झेलना चाहती. इसे टालने के लिए भाजपा ने कई ऐसे दिग्गजों को टिकट दिया है जो पिछली बार हार गए थे.

मध्य प्रदेश में भाजपा ने 127 में से 27 विधायकों का टिकट काट दिया है. खास बात यह है कि पार्टी ने 75 वर्ष से अधिक उम्र वालों या एक परिवार में एक से अधिक टिकट न देने के अपनी शर्तों में ढील दे दी. अस्सी वर्षीय नागेंद्र सिंह को गढ़ से मैदान में उतारा गया है, जबकि उनके हमनाम और साथी अस्सी वर्षीय को नागोद से टिकट दिया गया है.

कांग्रेस आलाकमान, खासकर राहुल गांधी उम्मीदवार चयन की शर्त जीत की संभावना चाहते थे, जो पार्टी के कराए विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों के आधार पर हो. लेकिन राज्य इकाइयां इस फॉर्मूले को पूरी तरह पालन करने को तैयार नहीं थीं. उनका मानना था कि कुछ पदाधिकारी, खासकर राज्य के शीर्ष नेताओं के करीबी लोग चुनाव लड़ें. राज्य नेतृत्व के विरोध के मद्देनजर केंद्रीय टीम ने यथासंभव सर्वेक्षण के नतीजों के आधार पर टिकटों को बांटा है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने 39 उम्मीदवार उतारे हैं जो पहली बार चुनाव लड़ेंगे, लेकिन राजस्थान में घोषित 76 उम्मीदवारों में से अधिकांश मौजूदा विधायक या उनके रिश्तेदार हैं. छत्तीसगढ़ में 71 में से 22 विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं.

फिर भी, दोनों पार्टियों में कई बगावती नजारे दिखे. पार्टी के संकटमोचन असंतुष्टों को मनाने में जुटे हुए हैं. लेकिन, पहले की तरह बागी हार-जीत का अंतर तय कर सकते हैं. 2018 में राजस्थान में 12 निर्वाचन क्षेत्रों में निर्दलीयों ने जीत हासिल की थी, जिनमें ज्यादातर बागी थे.

समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसी पार्टियों की मौजूदगी भी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है. 'इंडिया’ ब्लॉक का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और सपा के बीच अभी तक किसी भी राज्य में सीट-बंटवारा नहीं हो पाया है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस सपा के लिए छह सीटें छोड़ना चाहती थी. इससे नाराज होकर उत्तर प्रदेश में मजबूत पार्टी ने मध्य प्रदेश में 33 उम्मीदवार उतार दिए हैं. 2018 में सपा मध्य प्रदेश में एक सीट जीत पाई थी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ गठबंधन में पांच सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी.

दूसरों दलों की मौजूदगी कांग्रेस की संभावनाओं पर अधिक असर डालती है, क्योंकि तीनों राज्यों में भाजपा की पकड़ ज्यादा है. मध्य प्रदेश की 56 विधानसभा सीटों पर भाजपा पिछले तीन चुनावों से नहीं हारी है; जबकि कांग्रेस सिर्फ 10 पर नहीं हारी है. राजस्थान में भाजपा 28 सीटों पर पिछले तीन चुनावों में नहीं हारी है, जबकि कांग्रेस पांच सीटों पर. सिर्फ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को मामूली फायदा है, जहां पार्टी ने पिछले तीन चुनावों में भाजपा की छह सीटों के मुकाबले नौ सीटें बरकरार रखी हैं.

इसलिए न सिर्फ रणनीति, बल्कि पुराने प्रदर्शन भी तीन राज्यों में उम्मीदवारों और मतदाताओं के दिमाग पर असर डालेगा. 3 दिसंबर को आने वाले नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों के साथ दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों—मोदी और राहुल—पर बड़े असर डालेंगे, क्योंकि वे 2024 की गर्मियों में बड़ी लड़ाई की ओर बढ़ रहे हैं.                
  —साथ में, हिमांशु शेखर

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