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विधानसभा चुनाव 2023 : जुझारू शुरुआत

कई सामाजिक कल्याण योजनाओं और राज्य गठन में पहल की भावनाएं जगाकर केसीआर तीसरी बार सत्ता हासिल करने की उम्मीद में हैं

लोगों से मिलते केसीआर
लोगों से मिलते केसीआर
अपडेटेड 20 अक्टूबर , 2023

सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) लोगों से इस भावुक अपील के साथ अपने संस्थापक और मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के लिए वोट मांग रही है, ''तेलंगाना की जनता ने केसीआर को दो बार अपना आशीर्वाद दिया है. क्या आप तीसरी बार ऐसा करने के लिए तैयार हैं? दक्षिण भारत में किसी मुख्यमंत्री की यह पहली हैट्रिक होगी.’’ चंद्रशेखर राव केसीआर के नाम से चर्चित हैं और लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लिए जूझ रहे हैं. राज्य में 30 नवंबर को चुनाव हैं. उस अपील में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजनाओं की सूची पर भी जोर दिया गया है, जिन्हें केसीआर ने राज्य के वंचित समुदायों के लिए शुरू किया है. 

आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के बाद 2014 में अपनी पार्टी की पहली चुनावी जीत के बाद से केसीआर ने तेलंगाना को उच्च विकास पथ पर ले जाने की कोशिश की है. बुनियादी ढांचे का विकास, कृषि उपज को बढ़ाने के लिए सिंचाई प्रणालियों की स्थापना और बिजली के संसाधनों का कुशल प्रबंधन सरीखे शुरुआती पहलों के साथ-साथ उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी में निवेश से राज्य की अर्थव्यवस्था में तेजी आई है.

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यान्वयन मंत्रालय के 2022-23 के आंकड़ों के मुताबिक, तेलंगाना की प्रति व्यक्ति आय 3.12 लाख रुपए है. यह देश में तीसरी सबसे अधिक प्रति व्यक्तिआय है तथा इस मामले में केवल सिक्किम और गोवा ही इससे आगे हैं. तेलंगाना के गठन के समय राज्य की प्रति व्यक्ति आय केवल 1.12 लाख रुपए थी, लेकिन अब यह 1.72 लाख रुपए के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हो चुकी है.

सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) भी ऐसी ही तस्वीर पेश करता है- यह 2014 में 4.51 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर अब 13.1 लाख करोड़ रुपए हो गया है. तेलंगाना ने 12.1 फीसद की विकास दर के साथ देश की 10.5 फीसद की जीडीपी विकास दर को भी पीछे छोड़ दिया है. राज्य के वित्त और स्वास्थ्य मंत्री टी. हरीश राव कहते हैं, ''हमारे मुख्यमंत्री ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति को बढ़ावा दिया है और इससे प्राथमिक क्षेत्र तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विकास हुआ है.’’

तेलंगाना की इस शानदार प्रगति के बावजूद, केसीआर की दो कार्यकाल की सत्ता से बीआरएस के लिए कई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं. सुस्त कार्यान्वयन ने कई कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित किया है. 2 बीएचके अपार्टमेंट के आवंटन या दलित बंधु अनुदान के तहत व्यवसाय शुरू करने के लिए दलित परिवारों को मिलने वाले 10 लाख रुपए के आवंटन में भी जन प्रतिनिधियों पर कमिशन मांगने के आरोप लगे हैं.

विरोधी कांग्रेस और भाजपा ने मुख्यमंत्री के परिवार पर कालेश्वर लिफ्ट सिंचाई स्कीम सरीखे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करने और भारी संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया है. असंतोष को दूर करने के मकसद से केसीआर ने शुरुआती बढ़त हासिल करने के लिए 21 अगस्त को 119 निर्वाचन क्षेत्रों में से चार को छोड़कर बाकी सभी के लिए अपने पार्टी उम्मीदवारों की सूची जारी की.

तेलंगाना कांग्रेस के प्रमुख ए. रेवंत रेड्डी दूसरी पार्टी से आए नेताओं का स्वागत करते हुए

बीआरएस ने 2018 में अपनी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल करने वाले 88 विधायकों में से अधिकतर को इस बार भी सूची में बरकरार रखा है. तब बीआरएस का नाम टीआरएस यानी तेलंगाना राष्ट्र समिति था. पार्टी के दायरे को बढ़ाते हुए केसीआर दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के 19 विधायकों को भी अपने पाले में करने में कामयाब रहे थे.

उसके अलावा, वे तेलुगु देशम पार्टी के कई नेताओं को भी लुभाने में कामयाब रहे और उनकी पार्टी की ताकत बढ़कर 104 विधायकों की हो गई थी. संभावित विद्रोह की समस्या से निपटने के लिए उम्मीदवारों का जल्दी ऐलान किया गया था, लेकिन इससे ए. हनुमंत राव जैसे विधायकों को रोका नहीं जा सका. हनुमंत राव ने बीआरएस का टिकट ठुकरा दिया और कांग्रेस में चले गए क्योंकि केसीआर ने उनके बेटे को टिकट नहीं दिया.

बीआरएस उम्मीदवारों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व भी एक अन्य मसला है. खासकर, उसमें प्रभावशाली रेड्डी समुदाय के कम-से-कम 39 उम्मीदवार हैं, जबकि राज्य की आबादी में उस समुदाय की हिस्सेदारी महज 7 फीसद है. इसके विपरीत, राज्य में 52 फीसद ओबीसी आबादी होने के बावजूद उनकी सूची में 24 उम्मीदवारों के साथ ओबीसी का प्रतिनिधित्व महज 20 फीसद है.

हैदराबाद विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के ई. वेंकटेशु कहते हैं, ''टिकटों के अनुपातहीन वितरण की वजह से ओबीसी में बीआरएस के खिलाफ असंतोष है. अगर कांग्रेस और भाजपा इस पर ध्यान देती हैं तो ओबीसी की वोट हिस्सेदारी में महत्वपूर्ण बदलाव होगा और बीआरएस के लिए समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.’’

फिलहाल, केसीआर का पलड़ा भारी लग रहा है क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अभी तक अपने टिकट फाइनल नहीं किए हैं. कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद, यह धारणा बढ़ती जा रही है कि मुख्य रूप से मुकाबला बीआरएस और उभरती कांग्रेस के बीच होगा. अपने जुझारूपन के बावजूद, अपनी ग्राम-स्तरीय समितियों के कमजोर होने की वजह से भाजपा काफी पीछे है. केसीआर की ओर से कराए गए सर्वे और जनमत सर्वेक्षण भी इसकी पुष्टि करते हैं, इसलिए बीआरएस लगतार कांग्रेस को निशाना बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है.

केसीआर ऐसी सभी बाधाओं को पार करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. पहले केसीआर के वित्त एवं स्वास्थ्य मंत्री रहे और अब भाजपा विधायक इटेला राजेंद्र जोर देते हैं कि मुख्यमंत्री ने अपने भव्य अभियान पर भारी खर्च की हदों को पार कर दिया है. वे कहते हैं, ''मुख्यमंत्री हजारों एकड़ जमीन बेचकर उससे प्राप्त आय से अपने अभियान में पैसा लगा रहे हैं, और हर निर्वाचन क्षेत्र में खर्च पहले ही 15 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है.’’

सोनिया गांधी ने 2014 में अलग तेलंगाना राज्य बनाने का वादा पूरा किया था. लेकिन मतदाताओं का समर्थन केसीआर को मिला क्योंकि उनका मानना था कि राज्य का निर्माण केसीआर की कोशिशों से हुआ. 2018 में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को ऐसी पार्टी के रूप में देखा गया जिसने लोगों के साथ ऐसा कुछ भी गलत नहीं किया जिससे लिए उसे दंडित किया जाए.

तब कांग्रेस-टीडीपी के गठबंधन को तेलंगाना विरोधी माना गया और इसने अनजाने में केसीआर के मकसद को पूरा कर दिया. टीआरएस ने 2014 की 63 सीटों के अपने प्रदर्शन मंं सुधार करते हुए 88 सीटें जीत लीं. लेकिन इस बार सत्ता विरोधी रुझान तेलंगाना के हितों की जंग पर भारी पड़ रही है. संभवत: इसको भांपते हुए बीआरएस ने 9 अक्तूबर को चुनाव की तिथियों के ऐलान के एक घंटे के भीतर राज्य के दर्जे के लिए केसीआर के भूख हड़ताल के पुराने फुटेज को चला दिया. एनएएलएसएआर, हैदराबाद में राजनीतिशास्त्र पढ़ाने वाले हरथी वागीसन कहते हैं, ''चुनाव तिथियों के ऐलान के बाद केसीआर आत्मविश्वास और चिंता दोनों से भरे शख्स हो गए होंगे.’’

केसीआर की बड़ी चुनौती यह है कि उनकी सरकार रोजगार के अवसर मुहैया कराने और इस तरह युवाओं को लुभाने में नाकाम रही है, जबकि वे मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा हैं. इसके अलावा, केसीआर की सियासी समझ को भी झटका लगा है. अपनी पार्टी को टीआरएस से बीआरएस में तब्दील करने के एक साल बाद भी उन्हें राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में बहुत कम कामयाबी मिली है. पड़ोसी महाराष्ट्र में बीआरएस की केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति है. वागीसन का कहना है, ''अब, बीआरएस के पास लोगों के पास पहुंचाने के लिए कोई नया विचार नहीं है.’’

विश्लेषकों का कहना है कि आगामी चुनावी जंग मुख्य तौर पर बीआरएस और कांग्रेस के बीच होने की संभावना है. हालांकि, सत्तासीन पार्टी को मात देने की कांग्रेस की क्षमता हर विधानसभा क्षेत्र में वहां की विशिष्ट चुनौतियों पर निर्भर करेगी. केसीआर सूक्ष्म प्रबंधन की तैयारी कर रहे हैं जो इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस किसे मैदान में उतारेगी.

टिकटों की अधिक मांग की वजह से कांग्रेस ने उम्मीदवारों के ऐलान को 24 अक्तूबर तक के लिए टाल दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ए. रेवंत रेड्डी का कहना है, ''तेलंगाना के लोगों के लिए सोनिया गांधी ने छह गारंटियों का ऐलान किया है. उम्मीदवारों की सूची सही समय पर जारी होगी.’’ 17 सितंबर को एक रैली में सोनिया गांधी ने छह गारंटियों का ऐलान किया था. उसमें महिलाओं को मासिक भत्ता और किफायती रसोई गैस सिलेंडर वगैरह हैं. बीआरएस और भाजपा ने इन गारंटियों के लिए कांग्रेस की आलोचना की है.

विश्लेषकों का कहना है कि बीआरएस और भाजपा के बीच अनकहे आपसी तालमेल के बावजूद, भाजपा 10 विधानसभा क्षेत्रों में बीआरएस को नुक्सान पहुंचा सकती है. दरअसल, भाजपा वहां अगले साल के लोकसभा चुनावों के लिए रणनीतिक पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. 2019 में भाजपा 17 लोकसभा सीटों में से चार सीटें जीत गई थी और 2024 में सीटों में इजाफा करने की उम्मीद कर रही है. लेकिन, उसे मजबूत उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे हैं और इसलिए वह अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय नेताओं पर निर्भर है.

केसीआर राज्य के गठन से जुड़ी भावनाओं और बलिदानों पर जोर देंगे. लेकिन, बीआरएस के आधे से अधिक विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान के साथ-साथ भ्रष्टाचार के आरोप और वंशवादी शासन की धारणा, उनकी पार्टी की ओर से पेश की जा रही दक्षिण भारत की ऐतिहासिक जीत की राह में रुकावट बन सकते हैं.

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