
वाकई यह 2024 के चुनावों की बाजी है. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कामयाब जी20 शिखर सम्मेलन की चमक से जगमग थे, बेशक कनाडा का अफसाना हल्की-फुल्की विसंगति था, और फिर संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक की गुगली फेंकी, जिससे उनकी निजी लोकप्रियता छलांग लेने लगी, तभी बिहार के मुख्यमंत्री तथा जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) के दिग्गज नीतीश कुमार ने ऐसा छक्का जड़ दिया, जिससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) फिलहाल भौचक दिख रही है.
हरिजन उत्थान के झंडाबरदार महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्तूबर को नीतीश ने बिहार जाति आधारित गणना के नतीजे सार्वजनिक कर दिए. अलबत्ता इसे सामाजिक न्याय की जीत बताया गया, लेकिन इस कवायद की राजनीति किसी से छुपी नहीं है.
बिहार के जाति सर्वेक्षण ने वह साबित कर दिया, जिसकी शंका कुछ समय से हर किसी के मन में थी. यह कि ओबीसी या अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 1931 की जनगणना के अनुमान 52 फीसद से ज्यादा है (जिसके आधार पर 1980 में मंडल आयोग की रिपोर्ट आई थी). इससे इस दलील को बल मिलता है कि आरक्षण में उनकी हिस्सेदारी उससे काफी कम है, जो उनका हक होना चाहिए. बिहार की जाति गणना से खुलासा हुआ कि ओबीसी और ईबीसी (अति पिछड़े वर्ग) राज्य की आबादी में 63.1 फीसद हैं.
एससी और एसटी मिलाकर 21.3 फीसद हैं, जबकि अगड़ी जातियां बाकी 15.5 फीसद में हैं. देश भर में एससी और एसटी के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 22.5 फीसद आरक्षण है, जबकि ओबीसी के लिए 27 फीसद. बिहार की जाति जनगणना से शर्तिया तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में फेरबदल की मांग को ताकत मिलेगी.
इस जोरदार धमाके से नीतीश न सिर्फ बतौर ओबीसी मसीहा अपनी साख पर चमकदार कलई चढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं, बल्कि यह भी बताने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की दिलचस्पी सिर्फ उन्हें अपने बड़े हिंदुत्व एजेंडे में जोड़ने की है, उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान में नहीं. नए-नए बने विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठजोड़ या 'इंडिया’ के लिए बिहार के सर्वेक्षण से अगले सात महीने में तय लोकसभा चुनावों के लिए ठोस चुनावी मुद्दा हाथ लग गया है.
दरअसल, विपक्षी पार्टियां इसे मंडल 2.0 कह रही हैं, क्योंकि यह उस मंडल 1.0 का अगला कदम है, जिसे 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करके राष्ट्रीय राजनीति में तूफान ला दिया था. बिहार की जाति जनगणना से दूसरे राज्यों में ऐसी हलचल शुरू हो जाने की संभावना है. इस तरह दांव पर देश भर में केंद्र और राज्यों में करीब 90 लाख सरकारी नौकरियां और शिक्षा संस्थानों में दाखिले हैं, जिनमें 23 लाख इंजीनियरिंग और तकरीबन 1,00,000 मेडिकल की सीटें हैं. इससे बर्र के छत्ते को छेड़ने जैसे हालात पैदा हो सकते हैं और देश में हर जाति आरक्षण में अपनी हिस्सेदारी की मांग उठा सकती है.
मंडल 2.0 के मायने
मंडल 1.0 के दौरान कांग्रेस कमजोर हुई और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) तथा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का उदय हुआ. अब विपक्ष को उम्मीद है कि मंडल-2.0 से भाजपा का वही हाल होगा. हालांकि यह कहना आसान है, करना नहीं. कई वर्षों से भगवा पार्टी ओबीसी जातियों को लुभाकर, उनके नायकों, इतिहास तथा संस्कृति का महिमामंडन करके और उन्हें कई सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ दिलाकर क्षेत्रीय जाति आधारित संगठनों में सेंध लगा चुकी है.

सो, आश्चर्य नहीं कि 2014 और 2019 के लगातार दो संसदीय चुनावों में भाजपा की जीत में ओबीसी वोट की भारी अहमियत रही है. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (विकासशील समाज अध्ययन पीठ—सीएसडीएस) ने 2019 के अध्ययन में पाया था कि भाजपा के पक्ष में ओबीसी का वोट 2009 के 22 फीसद से दोगुना होकर 2019 में 44 फीसद तक पहुंच गया.
विपक्ष का मकसद इसी समर्थन आधार पर मंडल 2.0 के जरिए चोट करने की है. उसे उम्मीद है कि बिहार का सर्वे मंडल राजनीति के इस दूसरे दौर की नींव बनेगा और भाजपा की कमंडल राजनीति की काट में मददगार होगा. भाजपा जाति पहचान को व्यापक हिंदुत्व अफसाने में शामिल करके और सबके लिए कल्याणकारी नीतियों पर जोर देकर ओबीसी वोट को जाति के आधार पर बंटने से रोकती है.
भाजपा के लिए जाति जनगणना के दर्जन भर से अधिक राज्यों में गंभीर असर हो सकते हैं, जहां भारी ओबीसी आबादी है. मसलन, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश. इन राज्यों में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 374 सीटें हैं. चार राज्यों—राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में इसी साल चुनाव होंगे और मंडल बनाम कमंडल लड़ाई की पहली परीक्षा भी होगी.
भाजपा इस बर्र के छत्ते में हाथ डालने से कतरा रही है. हालांकि बतौर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह 2018 में कह चुके थे कि ओबीसी के आंकड़े 2021 की जनगणना में जुटाए जाएंगे. लेकिन कोविड-19 महामारी की वजह से वह कवायद ही टल गई और फिर 2021 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने कहा कि जाति जनगणना के इंतजामात संभव नहीं हैं. उसी साल केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में कहा कि केंद्र सरकार ने नीतिगत आधार पर तय किया है कि जनगणना में एससी और एसटी के अलावा जातिगत आबादी की गणना न की जाए.
विपक्ष की रणनीति
अपने गठजोड़ को 'इंडिया’ नाम देना विपक्ष का मास्टर स्ट्रोक था, तो मंडल 2.0 ने अगले साल लोकसभा चुनावों के लिए उसके हाथ में महाशस्त्र थमा दिया है. जाति आधारित जनगणना की ओर बढ़कर विपक्षी पार्टियों को उम्मीद है कि ओबीसी में उनकी संख्या और नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थाओं में अधिक आरक्षण की चेतना जगाकर उन्हें गोलबंद किया जा सकेगा.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 16 अप्रैल को ही कर्नाटक के कोलार शहर की चुनावी रैली में ही इसका संकेत दे दिया था. वहां उन्होंने कांशीराम के नारे ''जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’’ में थोड़ा फेरबदल करके ऐलान किया, ''जितनी आबादी, उतना हक.’’ अब, बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के सर्वे के नतीजे सार्वजनिक कर दिए हैं, तो कांग्रेस नेता ने दोहराया, ''जितनी बड़ी आबादी, उतना बड़ा हक.’’
हालांकि, परंपरा से कांग्रेस जाति गणना के पक्ष में नहीं थी. जवाहरलाल नेहरू 1951 में इस विचार के खिलाफ थे. इंदिरा गांधी ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था. आयोग का गठन 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने किया था और 1980 में रिपोर्ट सौंपी गई थी. राजीव गांधी ने भी उसे नजरअंदाज किया. राजीव ने इसे देश को जाति के आधार पर बांटने जैसा बताया था.
यह खुद पार्टी के लिए भी उचित नहीं था जैसा कि बाद में क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियों के उभार से जाहिर हो गया. कांग्रेस पहले के मुकाबले बहुत कमजोर हो गई. लेकिन पार्टी को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दौरान ओबीसी संभावनाओं का एहसास हुआ. मनमोहन सिंह सरकार ने 2006 में केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 फीसद आरक्षण का ऐलान किया.
2011 में सरकार ने देशव्यापी सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) कराई और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान की. हालांकि उसके नतीजे जाहिर नहीं किए गए. अब, जाति जनगणना की मांग उछल रही है, तो कांग्रेस ने अपना वजन उसमें डाल दिया, क्योंकि उसे एहसास है कि यह मुद्दा क्षेत्रीय दलों के साथ जुड़ने का चुंबक बन सकता है और आखिरकार भाजपा को हराया जा सकता है.
भाजपा कई राज्यों के चुनावों और लोकसभा चुनाव की पूर्वसंध्या पर यथास्थिति गड़बड़ाने और सवर्ण जातियों की नाराजगी के डर से जाति आधारित जनगणना पर दुविधा में है. लेकिन विपक्ष धीरे-धीरे देशव्यापी जाति जनगणना की आवाज तेज कर रहा है.
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू), झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), द्रविड़ मुनेत्र कलगम, भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस), शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का शरद पवार गुट और तेलुगु देशम पार्टी सहित ज्यादातर विपक्षी पार्टियां केंद्र सरकार से पक्का वादा मांग रही हैं कि जब भी अगली जनगणना की कवायद हो, उसमें जाति गणना को शामिल किया जाए.
किसी गठजोड़ का हिस्सा नहीं बनीं युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस और बीजू जनता दल के अलावा कुछ भाजपा के सहयोगी राकांपा का अजित पवार गुट, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने भी सुर में सुर मिला दिया है.
इस बीच कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने पिछले साल जाति सर्वेक्षण कराया या कराने का इरादा जाहिर किया. ओडिशा ने ऐसा सर्वे शुरू कर दिया है. इस मामले में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पूर्व कार्यकाल 2015 में हुए 'सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वे’ के नतीजों को मंजूर करने का फैसला किया है और अगले महीने वे उसकेनतीजे सार्वजनिक कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश में सपा ने 2022 के विधानसभा चुनावों के अपने घोषणापत्र में सत्ता में आने पर जाति जनगणना कराने का वादा किया था, अलबत्ता वह हार गई थी. जाति की पहचान वाले इस सर्वे के नतीजे कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने सार्वजनिक नहीं किए थे. चुनाव वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में जाति जनगणना की बात की है.
इकलौती विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) कथित तौर इस विचार से नाखुश बताई जाती है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तथा टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी की असहजता कथित तौर पर इस फायदे को लेकर है कि मुसलमान ओबीसी समूह आरक्षण का लाभ उठाते हैं. लेकिन वहां एक दिलचस्प पेच है. पश्चिम बंगाल भाजपा को लगता है कि राज्य में जाति जनगणना न होने से ममता को फायदा हो रहा है. पार्टी का आरोप है कि यह समूह आरक्षण का 91.5 फीसद लाभ उठा रहा है और हिंदू ओबीसी समुदायों के खिलाफ भेदभाव हो रहा है. ऐसे में ममता के विरोधियों का दावा है कि जाति जनगणना उनके पूर्वाग्रह का भेद खोल सकती है.
भाजपा की काट नीतीश के बिहार जाति सर्वे के नतीजे सार्वजनिक करने के एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की रैली में विपक्ष की कवायद को हिंदुओं को बांटने की कोशिश बताया. उन्होंने कहा, ''वे पहले भी गरीबों की भावनाओं से खेलते थे. आज भी वे यही खेल खेल रहे हैं. वे पहले भी जाति के नाम पर समाज को बांटते थे और आज भी वही पाप कर रहे हैं. पहले वे भ्रष्टाचार के दोषी थे. आज वे और ज्यादा भ्रष्टाचारी हो गए हैं. वे तब भी सिर्फ और सिर्फ एक परिवार का गौरवगान करते थे. वे आज भी वही करने में अपना भविष्य देखते हैं.’’
मोदी ने जाति को पूरी तरह अलग रखकर भाजपा का सरोकार लोगों की आर्थिक स्थिति की तरफ मोड़ने पर जोर दिया. राहुल के नारे 'जितनी आबादी, उतना हक’ के जवाब में उन्होंने कहा, ''उनके नेता ने कहा है कि अधिकार आबादी के अनुपात में होना चाहिए. मैं कहता हूं कि सबसे बड़ी आबादी गरीबों की है और मेरा संकल्प उनका कल्याण है.’’
वाकई, चुनावी नतीजों पर गौर करें तो शायद मोदी सरकार ने सरकारी कल्याण योजनाओं का समय पर सीधे लाभ पहुंचाने का व्यापक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करके और राजनैतिक तथा अफसरशाही की दखलअंदाजी को दूर करके आश्वस्त किया है कि वोटर जाति के सरोकारों से कम प्रभावित हों. इलाहाबाद में गोविंद बल्लभ पंत समाज विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्री नारायण कहते हैं, ''सेवाओं की कारगर आपूर्ति, लाभार्थी तबके के उदय से भाजपा को जाति पहचान की राजनीति को कम प्रभावी बनाने में मदद मिली है.’’
भाजपा ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष के. लक्ष्मण का कहना है कि पार्टी ओबीसी मतदाताओं को यह बताने के लिए देशव्यापी अभियान चलाएगी कि मोदी ने उनके लिए क्या किया है. वे कहते हैं, ''नीतीश कुमार सरकार ने जाति जनगणना के आंकड़े राजनैतिक मकसद से जारी किए हैं. वे हल्ला मचा सकते हैं लेकिन पिछड़े वर्गों के लिए मामूली काम ही किया है. मोदी सरकार ने पिछले दस साल में बहुत सारे लाभ पहुंचाए हैं. यही वजह है कि पिछड़े वर्गों के लोग पन्न्के तौर पर भाजपा के साथ हैं.’’
चुनाव विशेषज्ञ प्रदीप गुप्ता भी सोचते हैं कि सेवाओं का लाभ पहुंचाने का मोदी का रिकॉर्ड विपक्ष के जाति आधारित राजनैतिक अफसाने की हवा निकाल देगा. वे कहते हैं, ''इतिहास गवाह है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल सहित जिस किसी पार्टी ने किसी समुदाय के लिए बड़े आरक्षण की शुरुआत की, वह अगला चुनाव हार जाती है.’’
भाजपा ने पार्टी संगठन और सरकार में ओबीसी नेताओं को अच्छा-खासा प्रतिनिधित्व देने का खास ख्याल रखा है. लोकसभा में कुल ओबीसी सांसदों में भाजपा के 68 फीसद हैं, जबकि उसके अपने कुल सांसदों में ओबीसी 38 फीसद हैं. 77 सदस्यीय मोदी मंत्रिमंडल में 27 ओबीसी मंत्री हैं. पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ''हमारे 1,358 विधायकों में से 29 फीसद और 163 एमएलसी में से तकरीबन 40 फीसद ओबीसी हैं.’’
भाजपा में ओबीसी और दलित जाति के लोगों को तरजीह देने की इस सोशल इंजीनियरिंग का श्रेय पार्टी के कई नेता पूर्व संगठन महासचिव के.एन. गोविंदाचार्य को देते हैं. 1980 के दशक के अंत से 1990 के दशक में भाजपा ने हिंदुत्व के सहारे अगड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ा तो वहीं दूसरी तरफ अन्य पिछड़ा वर्ग की अति पिछड़ी जातियों और दलितों के एक बड़े वर्ग को साधने की कोशिश की. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने उसे और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया.
अमित शाह को जब 2014 के चुनावों से पहले राष्ट्रीय महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया तो उन्होंने प्रदेश के कुछ खास हिस्सों में प्रभाव रखने वाले पिछड़ी जातियों के नेताओं को भाजपा के साथ जोड़ा जिन्हें ओबीसी की राजनीति में उस तरह से जगह नहीं मिल रही थी जिस तरह मिलनी चाहिए थी. इसी प्रयोग को 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में और आगे बढ़ाया गया. अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर जैसे नेताओं को भाजपा इन्हीं कोशिशों के तहत अपने साथ लाई.
पहले दो ऊंची जातियों ब्राह्मण और बनिया की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा ने कुछ वर्षों में अपना राजनैतिक आधार संख्या में छोटी व कमजोर ओबीसी जातियों में इस बढ़ती धारणा का लाभ लेकर बढ़ाया है कि सपा या राजद जैसी पार्टियों की अगुआई दबंग यादवों के हाथ में है और वे उन्हीं को लाभ पहुंचाती हैं. इसी तरह छोटी दलित जातियों में इस धारणा का उसे लाभ मिला कि बसपा से सिर्फ जाटवों को फायदा हुआ है.
भाजपा ने इन जातियों में अपना आधार जाति के बदले व्यापक हिंदू धार्मिक पहचान और राष्ट्रवाद के झंडे तले बढ़ाया है. लेकिन वह लाभ पहुंचाने के लिए भी सचेत रहती है. जुलाई 2021 में मोदी सरकार ने मेडिकल और डेंटल कोर्स में अखिल भारतीय कोटे के तहत ओबीसी छात्रों के लिए 27 फीसद आरक्षण का ऐलान किया. ओबीसी क्रीमी लेयर की आय सीमा 6 लाख रु. से बढ़ाकर 8 लाख रु. की गई.
प्रधानमंत्री मोदी ने 17 सितंबर को ओबीसी पर लक्षित पीएम विश्वकर्मा योजना की शुरुआत की. उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में कहा था, ''इस विश्वकर्मा जयंती को हम 13,000-15,000 करोड़ रु. उन लोगों को देंगे, जो पारंपरिक हुनर से जीवनयापन करते हैं, जो औजार और अपने हाथों से काम करते हैं, जो ज्यादातर ओबीसी समुदाय के हैं.’’
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को भी मोदी के शासन में संवैधानिक दर्जा हासिल हुआ. दरअसल, भाजपा ने ओबीसी को लुभाने के साथ यह खास ख्याल रखा कि उसके मूल वोट आधार सवर्णों के हित पर चोट न पहुंचे. मोदी सरकार ने 2019 में सामाजिक रूप से विकसित वर्गों के आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 फीसद आरक्षण की शुरुआत की.
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के मराठा आरक्षण देने के फैसले को रद्द कर दिया, तो सरकार 2021 में राज्यों को अपनी ओबीसी सूची तैयार करने का अधिकार बहाल करने के लिए 127वां संविधान संशोधन ले आई. हाल में महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री तथा भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने मराठा समुदाय को ओबीसी दर्जा बहाल करने का फिर वादा किया.
इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत भी कह रहे हैं कि उनका संगठन ''संविधान के तहत प्रदत्त’’ आरक्षणों का समर्थन करता है. यह 2015 के उनके उस बयान के एकदम विपरीत है, जब उन्होंने आरक्षण नीति की ''सामाजिक समीक्षा’’ की अपील की थी. राज्य विधानसभा चुनाव से ऐन पहले आरएसएस प्रमुख के इस बयान से कथित तौर पर भाजपा को नुक्सान हुआ और वह इस मामले में पहले से ज्यादा सचेत हो गई.
अब यह भी अटकल है कि मोदी सरकार 27 फीसद ओबीसी आरक्षण में उप-वर्गीकरण की पेशकश कर सकती है, जैसा कि कथित तौर पर रोहिणी आयोग की सिफारिश है. इस आयोग का गठन 2017 में इस मकसद से हुआ था कि केंद्रीय सूची में शामिल ओबीसी जातियों के बीच आरक्षण के लाभ के गैर-बराबर लाभ की जांच करे, ओबीसी में उप-वर्गीकरण का तरीका बताए और केंद्रीय सूची में कोई गलती हो तो सुधार की सिफारिश करे. आयोग ने इस साल 31 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी है.
उप-वर्गीकरण का मकसद यह आश्वस्त करना है कि आरक्षण का लाभ ओबीसी छतरी के तहत संख्याबहुल और ताकतवर जातियों तक सीमित न रहे. रोहिणी आयोग के 2018 में तैयार किए कार्य-पत्र में पता चला कि यादव, कुर्मी, जाट, सैनी, थेवर, ईझावा और वोक्कालिगा जैसी कुछ खास ओबीसी जातियां आरक्षित नौकरियों का 97 फीसद पा जाती हैं, जबकि तकरीब 37 फीसद ओबीसी जातियों का आरक्षित सीटों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. रिपोर्टों के मुताबिक, आयोग ने सभी जातियों को समाहित करने के लिए ओबीसी कोटा में 3-4 उप-वर्गीकरण का सुझाव दिया है.
वैसे, ओबीसी जातियों का उप-वर्गीकरण कोई नया विचार नहीं है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, झारखंड, बिहार, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और पुदुच्चेरी जैसे 11 राज्यों में यह पहले ही हो चुका है. नीतीश भी बिहार में महादलित जैसी उपेक्षित दलित जातियों के उप-वर्गीकरण से अच्छी-खासी चुनावी फसल काट चुके हैं.
हालंकि भाजपा को डर है कि ओबीसी आरक्षण में बंटवारे से प्रभुत्वशाली ओबीसी जातियां उससे दूर जा सकती हैं, जो पहले ही पार्टी के साथ हैं या पार्टी जिनमें पैठ बनाने की कोशिश में है. यही नहीं, जैसा कि लखनऊ स्थित गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंटल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर प्रशांत के. त्रिवेदी बताते हैं, ''भाजपा को शायद एहसास हो गया है कि उप-वर्गीकरण घाटे का सौदा है, क्योंकि अब कई दबंग ओबीसी जातियां उसके समर्थन में हैं.’’
भाजपा के शायद यह तथ्य काम का हो सकता है कि बिहार जाति सर्वे के आंकड़े हिंदू पिछड़े वर्गों की आबादी में कोई पुख्ता बदलाव की बात नहीं बताते. रोहिणी आयोग के सदस्य तथा इंडियन सोशल साइंसेज रिसर्च के पूर्व चेयरपर्सन प्रोफेसर जे.के. बजाज के मुताबिक, बिहार जाति सर्वे का अनुमान है कि हिंदू ओबीसी समुदायों की आबादी 46 फीसद है, जो मंडल आयोग के 44 फीसद के अनुमान से दो फीसद अंक ज्यादा है, क्योंकि बनिया को ओबीसी में गिना गया है. वे कहते हैं, ''17 फीसद मुसलमान ओबीसी को जोड़ने के बाद आंकड़ा 63 फीसद पर पहुंचा है. मंडल आयोग ने उन्हें 8 फीसद माना था, जिससे कुल ओबीसी 52 फीसद बैठे थे.’’
हालांकि भाजपा के लिए सबसे ज्यादा कारगर प्रधानमंत्री की खुद की जाति पहचान है. उनकी मोध-घांची (तेल का व्यापार करने वाली) जाति गुजरात में ओबीसी सूची है.
आगे कठिन राह
जाति जनगणना को लेकर विपक्ष में उत्साह और भाजपा के ना-नुकुर की वजह जाति पहचान पर नए जोर और चुनावी नतीजों में बदलाव की संभावना से पैदा होती है. विपक्षी पार्टियों की दलील है कि जाति जनगणना से नए और सटीक आंकड़े ऐसी आरक्षण नीति की राह प्रशस्त करेंगे, जिसमें सच्चे सामाजिक न्याय के दर्शन होंगे. यहां तक कि एनसीबीसी ने भी जाति जनगणना की सिफारिश की है.
जाति जनगणना से शर्तिया अधिक आरक्षण की मांग तेज होगी और अधिक समुदायों से भी ऐसी मांग उठेगी. पहले ही यह महसूस किया गया है कि 1931 की जनगणना में 52 फीसद ओबीसी 27 फीसद से अधिक आरक्षण के हकदार हैं, जो अभी उन्हें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिल रहा है. बिहार सर्वे में उनकी संख्या अधिक जाहिर होने के बाद यह मांग और तेज होगी. पहले ही नीतीश महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं.
हर हाल में सरकार कानूनी रोकथाम की वजह से एकतरफा ओबीसी आरक्षण की हिस्सेदारी नहीं बढ़ा सकती. 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण 50 फीसद से अधिक नहीं हो सकता. एससी/एसटी के लिए 23 फीसद आरक्षण का प्रावधान है, इसलिए ओबीसी की आरक्षण सीमा बढ़ाने की गुंजाइश न के बराबर है. लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने मांग की है कि अब सीमा को संसदीय हस्तक्षेप के जरिए हटा दिया जाए. कई राज्य सरकारों ने अतीत में राजनैतिक सुविधा के मद्देनजर विभिन्न समुदायों को आरक्षण मुहैया कराने के लिए इस सीमा को लांघा है, लेकिन न्यायपालिक ने ऐसी सभी कोशिशों को रद्द कर दिया है.
इसके अलावा ऐसी कवायद के लिए इंतजामात की दिक्कतें भी कई हैं. एक तो यही कि ऐसी कोई कवायद जल्दबाजी में नहीं हो सकती. फिर, इसमें इतना ज्यादा समय लगेगा कि यह भी महिला आरक्षण विधेयक की तरह 'जुमला’ बनकर रह जा सकता है, जो कभी भविष्य में लागू होना है और कई तरह के किंतु-परंतु में उलझा हुआ है.
यही नहीं, कुछ जाति समूहों के सरकारी वर्गीकरण में भी कई उलझने हैं. मसलन, जाटों को राजस्थान में ओबीसी दर्जा मिला हुआ है, मगर हरियाणा या केंद्रीय सूची में नहीं. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ब्राह्मण भी ओबीसी सूची में हैं. दक्षिण में, रेड्डी कर्नाटक में पिछड़े वर्ग में शुमार हैं, लेकिन दूसरे राज्यों में नहीं.
इसके अलावा कई राज्यों में प्रभुत्वशाली जाति समूह ओबीसी दर्जे के लिए आंदोलन करते रहे हैं, जो कई बार हिंसक भी रहा है. मसलन, गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट. देश ने इन जातियों के आंदोलनों को देखा है. हर सूरत में इन विवादास्पद मसलों का समाधान किए बगैर कोई भी गणना केंद्र के लिए भारी सिरदर्दी बन सकती है. संभवत: इसी वजह से प्रोफेसर बजाज कहते हैं, ''देशव्यापी जाति जनगणना मुनासिब नहीं है. जाति गणना राज्य के स्तर पर ही होनी चाहिए.’’
भाजपा खुद इस बारे में राजी है कि राज्यों में जाति जनगणना हो, लेकिन सिर्फ ''कल्याण कार्यक्रमों की बेहतर डिजाइन’’ के लिए ही होनी चाहिए. इसलिए भाजपा ओबीसी मोर्चा के मुखिया लक्ष्मण चाहते हैं कि हर राज्य जाति जनगणना करे. बिहार क पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तो राज्य में जाति सर्वे का श्रेय लेने का दावा करते हैं. उनके मुताबिक, यह फैसला तब हुआ था, जब जद (यू) की अगुआई में भाजपा की गठजोड़ सरकार थी.
केंद्र की सत्ता में रहीं सरकारें हमेशा ही देशव्यापी जाति जनगणना कराने के प्रति रजामंद नहीं रही हैं, चाहे यूपीए की सरकार रही हो या अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार. शायद उन्हें 1990 जैसे बवाल खड़ा होने का डर सताता रहा है. शायद यही वजह रही है कि 2011 के सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) के नतीजों को लगातार सरकारों ने सार्वजनिक करने से परहेज किया.
2021 में मोदी सरकार ने आंकड़े साझा करने की महाराष्ट्र सरकार की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि वह ''इस्तेमाल योग्य नहीं’’ है. यह अलग बात है कि देश के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त ने 2016 में ग्रामीण विकास पर संसदीय प्रवर समिति को जानकारी दी थी कि एसईसीसी में व्यक्तिगत जाति और धर्म के आंकड़े 98.87 फीसद तक ''गलतियों से मुक्त’’ हैं.
लगभग तीन दशक बाद मंडल का साया फिर देश के सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य को मथने के लिए लौट आया है. जातिगत अन्याय भारत की दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है और इससे मुकाबले के लिए लगातार और संवेदनशील पहल और जागरूकता फैलाने की जरूरत है.
इस मामले में लोगों की गणना से सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी की अधिक सही तस्वीर हासिल की जा सकती है, लेकिन उसकी मांग या उसे खारिज किया जाना अल्पकालिक चुनावी जरूरतों के लिए नहीं होना चाहिए. देश में सामाजिक न्याय का एजेंडा लंबे समय से वोट बैंक राजनीति का बंधक बना रहा है. मंडल 2.0 भी उसी दिशा में बढ़ता हुआ दिख रहा है.
—साथ में अनिलेश एस. महाजन, अमिताभ श्रीवास्तव, अर्कमय दत्ता मजूमदार और हिमांशु शेखर

