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अंतरिक्ष में भारत की नई महत्वाकांक्षाएं

चंद्रयान की फतह के बाद अब इसरो की निगाहें सूर्य, शुक्र और मानवयुक्त अंतरिक्षयान की ओर हैं

इसरो के आदित्य एल1 मिशन की प्रतीकात्मक तस्वीर (इलस्ट्रेशन : तन्मय चक्रवर्ती)
इसरो के आदित्य एल1 मिशन की प्रतीकात्मक तस्वीर (इलस्ट्रेशन : तन्मय चक्रवर्ती)
अपडेटेड 13 सितंबर , 2023

चंद्रमा को फतह करने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अब सूरज तले अपनी जगह खोजने का जतन कर रहा है. यहां तक कि जब चंद्रयान-3 के लैंडर और रोवर चांद की सतह पर अपने वैज्ञानिक कामों को अंजाम देने में जुटे थे, इसरो के दूसरे वैज्ञानिक और इंजीनियर सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य एल1 को उसकी लंबी यात्रा के लिए तैयार करने पर ध्यान दे रहे थे. हमारे सबसे नजदीकी तारे की खोजबीन के लिए भारत के इस पहले मिशन में भी उन्हीं सिद्धांतों का सहारा लिया गया है, जो चंद्रयान मिशन में अपनाए गए और जिसमें इसरो ने नए-नवेले तरीकों का इस्तेमाल करते हुए कम से कम वित्तीय संसाधनों में कामयाबी हासिल की.

अमेरिका का नेशनल एयरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस ऐडमिनिस्ट्रेशन (नासा) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए या ईसा) सूर्य पर केंद्रित 20 से ज्यादा वैज्ञानिक अंतरिक्ष मिशन भेज चुकी है, पर इसरो अपनी अनूठी खोजें लेकर आना चाहता है, जैसा कि उसने चंद्रयान के मामले में किया. खासकर सूर्य की सबसे बाहरी परत यानी कोरोना, फोटोस्फीयर या प्रकाशमंडल और क्रोमोस्फीयर या वर्णमंडल की बनावट के बारे में वह नई खोजें लेकर आना चाहता है. अंतरिक्ष संगठन आदित्य पर लगे वैज्ञानिक उपकरणों के जरिए यह सब करने की उम्मीद कर रहा है, जिसमें सौर विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों और कण उत्सर्जनों को मापा जाएगा, जिससे उनके व्यवहार पर नई रोशनी डाली जा सकेगी.

इसरो के रडार पर एक और प्रमुख अंतरग्रहीय परियोजना शुक्र ग्रह की बनावट और वायुमंडल का अध्ययन करने के लिए वहां ऑर्बिटर भेजना है. एक बार फिर, बुध के बाद हमारे इस सबसे नजदीकी ग्रह पर केवल कुछ मुट्ठी भर देशों ने ही खोजी अंतरिक्षयान भेजे हैं. ये ही अकेली परियोजनाएं नहीं हैं जो इसरो के कई वैज्ञानिकों को रात-रात भर जगाए रखती हैं. इसरो के अब तक के सबसे महत्वाकांक्षी अभियान को साकार करने के लिए भी देश भर में फैली उसकी विभिन्न प्रयोगशालाओं में जोर-शोर से काम चल रहा है, और वह है तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में ले जाना.

उन्हें अंतरिक्ष में ले जाने और फिर सुरक्षित ढंग से पृथ्वी पर वापस लाने के लिए स्वदेशी ढंग से 'ह्यूमन-रेटेड’ रॉकेट लॉन्चर और क्रू मॉड्यूल का निर्माण किया जा रहा है. गगनयान नामक इस मिशन के लिए इसरो को अंतरिक्ष से जुड़े दर्जन भर विषयों में महारत हासिल करने की जरूरत है, जिसमें उसके क्रू मॉड्यूल में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पृथ्वी जैसी स्थितियों की नकल तैयार करना भी शामिल है, ताकि वे शून्य गुरुत्वाकर्षण में कई दिनों तक वहां रहकर प्रयोग कर सकें. अंतरिक्ष एजेंसी एक क्रू एस्केप मॉड्यूल का परीक्षण भी कर रही है, ताकि प्रक्षेपण वाहन की विनाशकारी विफलता की स्थिति में—जो उड़ान की शुरुआत में लॉन्चपैड पर अंतरिक्ष यात्रियों की जिंदगियों को खतरे में डाल सकती है- उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल सके.

इस मिशन के लिए तीन अंतरिक्ष यात्रियों का चयन कर लिया गया है. सभी भारतीय वायु सेना के पायलट हैं. उन्हें रॉकेट पर सवार होकर आवाज से 10 गुना ज्यादा तेज रफ्तार से अंतरिक्ष में जाने और फिर शून्य गुरुत्वाकर्षण की स्थितियों में रहने के लिए जरूरी कठोर प्रशिक्षण दिया जा रहा है. केवल तीन देशों- अमेरिका, रूस और चीन- ने अभी तक चालक दल के साथ अपने अंतरिक्षयान भेजे हैं. इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ कहते हैं, ''कई प्रणालियां नई हैं और उन्हें जानने-समझने में हमें कई तकनीकी चुनौतियां पेश आईं. हमें कई परीक्षण करने पड़ते हैं क्योंकि विश्वास बनाने की प्रक्रिया बहुत अहम और जरूरी है. हम अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने से पहले मानवरहित उड़ानों के जरिए प्रणालियों की जांच-परख करेंगे, जिसमें रोबोट भेजना भी शामिल है. इसे नाकामी की आशंका से पूरी तरह मुक्त होना होगा, क्योंकि इसमें जिंदगियां शामिल हैं.’’

इन सभी मिशनों में इसरो वह काम करने पर ध्यान लगा रहा है जो वह सबसे अच्छा करता है और यह है किफायती तरीके से टेक्नोलॉजी में नवाचार. आदित्य इस बात का अच्छा उदाहरण है कि इसरो इसे कैसे हासिल करता है. सूर्य के अनुसंधान के लिए यह एजेंसी पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर या चांद से तीन गुना दूरी पर स्थित कक्षा में अंतरिक्ष यान लॉन्च करेगी. तिस पर भी आदित्य सूर्य से 15 करोड़ किमी दूर होगा और पृथ्वी के मुकाबले सूर्य से महज एक फीसद नजदीक होगा. मंसूबा आदित्य को लैग्रेंज पॉइंट 1 या एल 1 के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में स्थापित करने का है, जहां सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सेंट्रिपेटल फोर्स यानी अभिकेंद्रीय बल के बराबर होता है जो अंतरिक्षयान के साथ-साथ चलने के लिए जरूरी है.

इससे अंतरिक्षयान बहुत ज्यादा ईंधन की खपत किए बिना लगातार सूर्य का अवलोकन कर पाता है. चुने गए लैग्रेंज पॉइंट तक पहुंचने के लिए इसरो अपने सबसे ज्यादा काम में आने वाले पीएसएलवी लॉन्चर में कुछ बदलाव कर रहा है, जिससे उसे और ज्यादा ताकत मिल सके और तय जगह पर पहुंचने के लिए आदित्य को सही रास्ते पर डाल सके. यही नहीं, जैसा कि यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर (यूआरएससी) के डायरेक्टर एम. शंकरन बताते हैं, इस मिशन की टीम आदित्य को उसकी मंजिल पर पहुंचाने के लिए अंतरिक्ष के गुरुत्वाकर्षण राजमार्गों के रूप में जाने जाने वाले रास्तों का इस्तेमाल उसी तरह कर रही है जैसे चंद्रयान के लॉन्चरों ने इसे तेजी से चंद्रमा की कक्षा में पहुंचाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल किया और ईंधन बचाया था.

इसके लिए जटिल पथ-निर्देशन और मार्गदर्शन की जरूरत होती है. मगर इसरो को मंगल ग्रह पर अंतरिक्षयान मंगलयान भेजने का अनुभव है, जब यह पृथ्वी से करीब 9.90 करोड़ लाख किमी दूरी पर था. मगर ऐसा करने के लिए उसे 66 करोड़ किमी की दूरी तय करनी पड़ी, क्योंकि ऑर्बिट-रेजिंग मनूवर यानी कक्षा बढ़ाने वाली युक्तियां भी करनी पड़ी थीं.

इस विशेषज्ञता की बदौलत इसरो आदित्य एल-1 पर ढेरों ज्यादा उपकरण रख पाएगा, ताकि पृथ्वी पर हमें प्रभावित करने वाले बेहद अहम सौर मानदंडों का विस्तृत अध्ययन किया जा सके. यह महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि, जैसा कि हम सब जानते हैं, सूर्य समूचे सौर मंडल को प्रभावित करने वाले चुंबकीय क्षेत्रों के अलावा, विकिरण, ताप और कणों के निरंतर प्रवाह के जरिए पृथ्वी पर बहुत ज्यादा असर डालता है. कभी-कभी कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) यानी सूर्य के प्रभामंडल से विशाल उत्सर्जनों और सौर ज्वालाओं सरीखी विस्फोटक और अचानक फूट पड़ने वाली घटनाएं भी होती हैं, जो अन्य नतीजों के अलावा पृथ्वी के नजदीक चुंबकीय तूफान पैदा करती हैं और अंतरिक्ष-स्थित तथा स्थलीय संचार प्रणालियों के कामकाज में खलल डालती हैं.

इसरो के पूर्व चेयरमैन किरण कुमार कहते हैं, ''यह जरूरी है कि सूर्य की ऐसी विघटनकारी परिघटनाओं का अध्ययन करें, उन्हें समझें और इस तरह पृथ्वी पर इनसे होने वाले नुकसान को कम से कम करने के लिए शुरुआती चेतावनी संकेत प्राप्त कर पाएं.’’ किरण कुमार यह भी बताते हैं कि अपने कक्षीय पथ की बदौलत आदित्य अंतरिक्षयान सूर्य को अबाधित ढंग से देख पाएगा, जिससे इस पर लगे उपकरण सीएमई और सौर प्रभामंडल के गतिविज्ञान का अध्ययन कर पाएंगे.

भारतीय वैज्ञानिकों को ऐसी घटनाओं का बारीकी से अध्ययन करने की सहूलियत मुहैया कराने की खातिर आदित्य में न सिर्फ इसरो, बल्कि अन्य प्रमुख भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों के सात वैज्ञानिक पेलोड हैं. मसलन, बेंगलूरू स्थित भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान ने सूर्य के कोरोना और सीएमई डायनेमिक्स दोनों के अध्ययन के लिए विजिबल इमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (वीईएलसी) विकसित किया है. पुणे में इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर ऐस्ट्रोनॉमी ऐंड ऐस्ट्रोफिजिक्स ने सोलर अल्ट्रावॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (एसयूआइटी) का निर्माण किया है, जो सूर्य की फोटोस्फीयर और क्रोमोस्फीयर की छवियों को कैप्चर करेगा और उसकी संरचना पर नई रोशनी डालने के लिए उसके विकिरण को मापेगा.

अहमदाबाद की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) ने आदित्य सोलरविंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (एएसपीईएक्स) को एक साथ रखा है, जो तिरुवनंतपुरम में अंतरिक्ष भौतिकी प्रयोगशाला द्वारा निर्मित आदित्य (पीएपीए) के लिए प्लाज्मा विश्लेषक पैकेज के साथ सूर्य की हवा और ऊर्जा आयनों और उनके ऊर्जा वितरण का अध्ययन करेगा. दो पेलोड- सोलर लो एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (एसओएलईएक्सएस) और हाई एनर्जी एल-1 ऑर्बिटिंग एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (एचईएल1ओएस) सूर्य से एक्स-रे प्लेयर्स का अध्ययन करने के लिए और दूसरा, मैग्नेटोमीटर, अंतरग्रहीय चुंबकीय क्षेत्रों को मापने के लिए हैं. उन्हें इसरो के बेंगलूरु स्थित दो केंद्रों क्रमश: यूआरएससी और लैबोरेटरी फॉर इलेक्ट्रो ऑप्टिक्स सिस्टम्स (एलईओएस) में तैयार किया गया है. दरअसल, आदित्य वैज्ञानिक संस्थानों के अनोखे सहयोग की बेहतरीन मिसाल है. 

इस बीच, अपने अस्तित्व के 54 वर्षों में इसरो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव से गुजर रहा है. मोदी सरकार देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में आमूल-चूल नीतिगत बदलाव ले आई है. 2020 से पहले, इसरो ने देश के सभी अंतरिक्ष यान की योजना बनाई, डिजाइन किया और निर्माण किया, चाहे वह रॉकेट लॉन्चर, उपग्रह या ग्रहीय कक्षाओं में स्थापित उपग्रह हों. वैसे, यह अंतरिक्ष एजेंसी खासकर उप-प्रणालियों के निर्माण और अंतरिक्ष यान की असेंबली में निजी क्षेत्र की मदद लेती रही है. लेकिन, मई, 2020 में कोविड-19 महामारी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यापक निजी भागीदारी के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के द्वार खोल दिए.

इसके तहत निजी क्षेत्र को अपने रॉकेट और उपग्रह बनाने और असेंबल करने की अनुमति दी गई और उन्हें लॉन्च पैड और प्रयोगशालाओं सहित इसरो की व्यापक सुविधाओं का उपयोग करने की सहूलियत दी गई. निजी खिलाड़ियों को इसरो से करार और उसकी सुविधाओं के उपयोग के तालमेल के लिए महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के पूर्व सीईओ पवन गोयनका की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) नामक सरकारी निकाय का गठन किया गया. इस साल अप्रैल में, निजी क्षेत्र की भागीदारी को संस्थागत बनाने के लिए भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 की घोषणा कर प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया.

यह नीति नतीजे देने लगी है और वाणिज्यिक रॉकेट लॉन्चरों और उपग्रहों के लिए नए निजी अंतरिक्ष तकनीक तंत्र का तेजी से विस्तार हो रहा है. 150 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्ट-अप उतर आए हैं और स्काइरूट, पिक्सेल और अग्निकुल जैसे कई स्टार्ट-अप को पर्याप्त विदेशी पैसा मिला है. नवंबर, 2022 में स्काइरूट स्वदेशी तौर पर रॉकेट लॉन्चर बनाने और उसे श्रीहरिकोटा से उप-कक्षीय अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक लॉन्च करने वाली पहली भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनी बन गई. कंपनी को 2020 से अब तक अच्छा-खासा 5.1 करोड़ डॉलर (421 करोड़ रु.) और पांच साल पहले उसकी स्थापना के बाद 7.23 करोड़ डॉलर (597 करोड़ रु.) का निवेश प्राप्त हुआ है. अंतरिक्ष स्टार्ट-अप के लिए कुल फंडिंग तेजी से बढ़ी है, जिसमें 2022 में 11.2 करोड़ डॉलर (925 करोड़ रु.) निवेश आया है. इस साल निजी संस्थाओं को फंडिंग 6.2 करोड़ डॉलर (512 करोड़ रु.) तक पहुंच गई है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 60 प्रतिशत अधिक है.

केंद्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष तथा परमाणु ऊर्जा राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह कहते हैं, ''यह सब इसलिए है क्योंकि प्रधानमंत्री ने देश में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी संस्थाओं के लिए पूरी तरह से खोलने का निर्णय लिया. लंबे समय तक, हमने अनावश्यक रूप से अपनी अंतरिक्ष गतिविधियों पर गोपनीयता का पर्दा डाल रखा था. इसकी अब जरूरत नहीं थी. हमारे अंतरिक्ष अभियानों में भारी उछाल आया है.’’

देश में अंतरिक्ष क्षेत्र के तेजी से विस्तार के लिए निजी निवेश और पहल महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए सरकारी संसाधनों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता. जितेंद्र सिंह कहते हैं, ''अगर हमें अपनी वैश्विक भूमिका की कल्पना करनी है, तो वैश्विक मापदंडों और वैश्विक रणनीति की जरूरत है. अमेरिकी सरकार ने यही किया और उसकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अब मिशनों को अंजाम देने के लिए धन या विशेषज्ञता के लिए सरकारी स्रोतों पर निर्भर नहीं है." बेशक, भारतीय उद्योग को उस स्थान तक पहुंचने में थोड़ा समय लगेगा, जहां, मसलन, अमेरिका में एलॉन मस्क अपने स्पेस एक्स और जेफ बेजोस ब्लू ओरिजिन के साथ पहुंचे हैं.

सोमनाथ के मुताबिक, दुनिया की 360 अरब डॉलर (29.7 लाख करोड़ रुपए) की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में उपग्रह और प्रक्षेपण बाजार की हिस्सेदारी सिर्फ 30 फीसद है; अंतरिक्ष प्रयोगों का कारोबार 70 फीसद है. इसी मामले में भारतीय निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर आगे बढ़ सकती हैं. अंतरिक्ष कारोबार में भारत की वर्तमान हिस्सेदारी लगभग 8 अरब डॉलर (66,000 करोड़ रु.) या कुल कारोबार के सिर्फ दो फीसद के आसपास है. वैश्विक कंसल्टेंसी फर्म आर्थर डी. लिटिल के मुताबिक, अगर सब ठीक रहा तो 2040 तक, भारत 40 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर (8.26 लाख करोड़ रु.) का अंतरिक्ष उद्योग बनने का क्षमता विस्तार कर सकता है और प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बन सकता है. यह ऐसा मिशन है जिस पर रॉकेट की रफ्तार से आगे बढऩा चाहिए.

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