मेटावर्स. एक नाम, एक विचार. यह विचार विज्ञान गल्प कथा और साइबर संस्कृति की कल्पनाओं में था जब तक कि मार्क जुकरबर्ग ने इसे अपने विशाल डिजिटल साम्राज्य का नया नाम नहीं बना दिया. यह नामकरण आपस में जुड़ी डिजिटल कायनातों के विशाल से विशालतर होते जाते महाजाल की नुमाइंदगी करता है, जो अगर सोचा जाए तो भौतिक यथार्थ का वस्तुत: विस्तार कर सकता है जबकि वास्तविक यथार्थ को भौतिक रूप से बदल सकता है. कुछ अगड़म-बगड़म-सा लगता है? तो यह रही सीधी-सादी कैफियत. टेक्नोलॉजी में शानदार तरक्की के बावजूद इस वक्त हम मोटे तौर पर 2डी संचार के भरोसे हैं—कुछ वैसा ही जो आप जूम या एमएस टीम्स पर देखते हैं.
आप वर्चुअल बैठकें करते हैं, पर आपको लगता नहीं कि आप किसी भौतिक जगह में साथ थे. क्या होगा जब आप आखिरकार असल में आंख से आंख मिला पाएंगे और देह भाषा पढ़ पाएंगे? क्यों आप ''बीम मी अप, स्कॉटी'' (स्टार ट्रेक में बोला गया मुहावरा, मोटे तौर पर जिसका अर्थ है मुझे यहां से निकालो) किस्म की चीज भी कर सकेंगे और अपने डिजिटल अवतार को टेलीपोर्ट करके पलक झपकते फैक्टरी का जायजा लेने जा सकेंगे या किसी दुकान में नए कपड़े ट्राइ कर सकेंगे. जरूरत है तो बस 3डी कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी की. इस पर अभी काम चल रहा है और आपको इसके लिए इंतजार करना होगा. 2047 तक नहीं, जब भारत आजादी की 100वीं सालगिरह मनाएगा. बस 2027 तक, यानी अब से महज चार साल.
2047 में तो आपको 4डी कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी मिल सकती है, जो आने ही वाली है. यह जिंदगी को ज्यादा आरामदेह और रोमांचक बना देने की संभावनाओं से भरी है. कल्पना कीजिए कि आपके पास 4डी नक्शे हैं जो स्वायत्त (ड्राइवर के बिना) ट्रैवल मशीनों को सड़कों पर या उड़ान पथों पर अपना रास्ता बनाने में मदद कर रहे हैं, जिससे टक्कर की जरा गुंजाइश नहीं है और आप सबसे तेजी से अपनी मंजिल पर पहुंचते हैं. या आपका अपना रोबोटिक एक्सोस्केलेटन यानी बहिकंकाल—आयरन मैन की तरह शरीर को पूरा ढंक लेने वाला पहनावा—जो आपके मन में चल रही बातों का जवाब देता है और मशीन की ताकत से आपकी शारीरिक क्षमताओं को बेहिसाब बढ़ा देता है.
क्या कहा आपने, हाथ कांप रहे हैं? तो ठीक है, यह बहिकंकाल आपका गिलास थाम लेगा, ताकि आपके कांपते हाथों से कहीं छलक न जाए. यह तो बहुत सीधा-सादा-सा काम है, यह कहीं ज्यादा पेचीदा फरमान तामील कर सकता है. कंप्यूटर के कामों, संचार और इनसान की असाधारण रचनात्मकता में लंबी छलांग की बदौलत तमाम किस्म की टेक्नोलॉजी इस तरह आपस में घुल-मिल रही हैं कि वह सब मुमकिन हो रहा है जिसे कभी नामुमकिन माना जाता था.
कौतुक और कौतूहल से भरे इस बिल्कुल नए साहसी संसार में आपका स्वागत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में अगले 24 वर्षों को अमृत काल कहा और 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र में बदलने के लिए लोगों से मिल-जुलकर काम करने की गुजारिश की. अलबत्ता विकसित भारत@100 की परिभाषा विकसित देश को नापने के लिए फिलहाल इस्तेमाल किए जा रहे पारंपरिक फीते से काफी अलग है. आज इसका मतलब सिर्फ वह देश नहीं है जिसके पास परिवहन और संचार के मजबूत और सुघड़ बुनियादी ढांचे के साथ सतत आर्थिक विकास है. जरूरी तौर पर इसके लिए भरा-पूरा मानव विकास सूचकांक होना चाहिए, जिससे स्वस्थ और शिक्षित नागरिकों के साथ रहन-सहन के समान उच्च स्तर की झलक मिले. यहां तक कि वह अमेरिकी मॉडल भी इसे इसी तरह मापता है जिसमें घोर गैर-बराबरी पैवस्त है.
हमें औसतन 20,000 डॉलर (करीब 16.7 लाख रुपए) सालाना या उससे ज्यादा जितनी अधिक प्रति व्यक्ति आय का लक्ष्य लेकर चलना चाहिए. फिलहाल भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,400 डॉलर (2 लाख रुपए) है. यह विश्व बैंक के मानक के हिसाब से हमें निम्न मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था के खाने में रखता है, जिसमें प्रति व्यक्ति आय की सीमा 1,136 डॉलर से 4,465 डॉलर (94,000 रुपए से 3.7 लाख रुपए) के बीच है. इस तरह हम उसी पांत में है जिसमें बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान हैं. चीन में प्रति व्यक्ति आय 12,800 डॉलर (करीब 10.6 लाख रुपए) है—वही चीन जिसका जीडीपी भारत के 34 खरब डॉलर से करीब छह गुना ज्यादा 180 खरब डॉलर है और जिसकी आबादी अब हमारे बाद दूसरे नंबर पर चली गई है. चीन की यह प्रति व्यक्ति आय उसे उच्च मध्यम आय अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में रखती है, लेकिन विकसित देशों की जमात में फिर भी नहीं रखती.
भारत के पक्ष में वही चीजें काम कर रही हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री ने अंग्रेजी के 'डी' अक्षर की तिकड़ी के रूप में पहचाना— डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी), डेमोक्रेसी (लोकतंत्र), डायवर्सिटी (विविधता). उन्हें पूरा विश्वास है कि फिलहाल दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने से भारत 2030 तक जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. तकरीबन उसी वक्त चीन 280 खरब डॉलर जीडीपी वाले अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. मगर, जैसा कि भारत और चीन दोनों से पता चलता है, अर्थव्यवस्था का निरा आकार भर किसी को विकसित देश का दर्जा नहीं देता.
तो 15 अगस्त, 2047 को आजादी के 100 साल पूरे होने पर सचमुच विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत को क्या करना होगा? ऐसा कोई तरीका नहीं कि अपनी आम चाल-ढाल से हम यह ऊंचा दर्जा हासिल कर सकें. इसके बजाए देश को 10 प्रमुख क्षेत्रों—ऊर्जा, परिवहन, संचार, कृषि, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स और कंप्यूटिंग—में क्रांति की जरूरत होगी. इनमें से हरेक अहम क्षेत्र टेक्नोलॉजी में तेज-रफ्तार नवाचारों की बदौलत नाटकीय बदलावों से गुजर रहा है. अगर भारत इन घटनाक्रमों से वाकिफ नहीं रहता और इनके हिसाब से खुद को नहीं ढालता, तो वह पीछे छूट जाएगा और शोषण व तंगहाली हमेशा के लिए उसकी नियति बन जाएंगे.
चलिए, संचार से शुरू करते हैं. भारत इस बात पर गर्व कर सकता है कि 1 जीबी मोबाइल इंटरनेट डेटा के लिए 14 रुपए की उसकी औसत लागत दुनिया में सबसे कम है. इसके मुकाबले अमेरिका के उपयोगकर्ता 33 गुना ज्यादा और ब्रिटेन के 4.5 गुना ज्यादा चुकाते हैं. उसे इस बात का श्रेय भी दिया जा सकता है कि 5जी टेलीकॉम नेटवर्क लाने के लिए भारत उन्नत देशों के साथ कदमताल करते हुए तेजी से आगे आया. हालांकि असल परख अगली पीढ़ी की टेलीफोनी—6जी—के मामले में होगी. इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह 5जी के मुकाबले 100 गुना ज्यादा तेज होगा और बिना किसी देरी के जबरदस्त मात्रा में डेटा भेजने की साज-संभाल कर सकेगा. इसके आने से घर-दफ्तर में हमारे संवाद और खेलने के तौर-तरीकों का कायापलट हो जाएगा.
अपने बहुतेरे इस्तेमाल में यह स्वायत्त कारों को रास्ता दिखाएगा, टेलीपोर्टिंग के जरिए आपको दूर-दराज की जगहों पर पहुंचा देगा, और इसके अलावा आप होलोग्राम बैठकें कर सकेंगे, जो भौतिक को वर्चुअल या आभासी से जोड़ देंगी. भारत 4डी तस्वीरें जुटाकर इसका इस्तेमाल उन भू-अभिलेखों को डिजिटाइज करने में कर सकता है जो विवादों और भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत हैं. इससे ई-गवर्नेंस और खासकर ग्रामीण इलाकों में जनसेवाओं को पहुंचाने में भी जबरदस्त सुधार आएगा, जबकि आर्थिक वृद्धि के एक और बड़े इंजन ई-कॉमर्स को ज्यादा तेज और सुरक्षित बनाने में मदद मिलेगी.
यह सब और इससे भी ज्यादा करने के लिए भारत को जिन टेक्नोलॉजी में महारत हासिल करनी होगी, उनमें क्वांटम कंप्यूटिंग भी है, जो पारंपरिक बायनरी ट्रांजिस्टर के मुकाबले जानकारियों को हजार गुना ज्यादा तेजी से प्रोसेस कर सकता है. इतने सुपरफास्ट प्रोसेसर से बैंकिंग, स्वास्थ्य और रक्षा क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) में अगुआई हासिल करने के लिए भारत को सरकार और उद्योग दोनों की तरफ से मिशन स्तर की कोशिश करनी होगी. चैटजीपीटी के पराक्रम ने व्यापक रूप से लोगों का ध्यान खींचा है, पर यह अभी शुरुआत भर है. हौसला बढ़ाने वाली बात यह है कि एआइ में भारतीय कंपनियां विश्व की अग्रणी कंपनियों में शुमार हैं. मसलन, मुंबई स्थित फ्रैक्टल एनालिटिक्स 150 से ज्यादा फॉर्चून 500 कंपनियों के साथ काम कर रही है.
इसके अलावा भारत को लाइट फिडेलिटी या लाइ-फाइ सरीखी दूसरी उभरती टेक्नोलॉजी से भी जुड़ना होगा. रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करने वाले वाइ-फाइ के विपरीत, लाइ-फाइ एलईडी बल्ब से निकले फोटॉन का इस्तेमाल करके 14 गुना ज्यादा तेज रफ्तार से डेटा भेजती है और राउटर व मॉडम सरीखे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जरूरत को खत्म कर देती है. इस बीच, भारती ग्लोबल—जिसके पास पृथ्वी की निचली कक्षाओं में 634 उपग्रहों की मंडली है—जो सैटेलाइट इंटरनेट सुविधा मुहैया करवा सकती है, उसके जरिए दूर-दराज के इलाकों में तेज-रक्रतार कनेक्टिविटी पहुंचाई जा सकती है और ग्रामीण भारत के कायापलट की संभावनाओं को साकार किया जा सकता है. अलबत्ता सेमीकंडक्टर चिप्स के मामले में देश को महारत हासिल नहीं है और तत्काल स्वदेशी क्षमता विकसित करने की जरूरत है. संक्षेप में, अगले दो दशकों में हमें भारत के अपने ताकतवर ब्रह्मांड का निर्माण करना होगा.
इसके बाद है ऊर्जा. फिलहाल भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का 85 फीसद आयात करता है और 2022-23 में उसने इस मद में 13 लाख करोड़ रुपए खर्च किए, जो उसके जीडीपी के 4 फीसद के करीब थे. यह न तो वित्तीय हिसाब से मुनासिब है और न ही जीवाश्म ईंधन को लेकर पर्यावरण से जुड़े विश्वव्यापी दबावों को देखते हुए चल सकता है. पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन सघनता में 2005 के स्तर के मुकाबले 2030 तक कम से कम 45 फीसद कमी लाने की प्रतिबद्धता जाहिर की है.
इसके अलावा यह भी वादा किया है कि उसकी बिजली की कुल स्थापित क्षमता का 50 फीसद गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों से प्राप्त किया जाएगा. अभी तक पवन, सौर ऊर्जा और जैव ईंधन अक्षय ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं जिन पर भारत भरोसा करके चल रहा है. मगर ग्रीन हाइड्रोजन गेमचेंजर की शक्ल में उभर सकती है, खासकर जब भारत ने खुद को इसके उत्पादन, उपयोग और निर्यात का केंद्र बनाने का अभियान छेड़ दिया है. ग्रीन हाइड्रोजन हाइस्कूल में पढ़ाए जाने वाले इलेक्ट्रोलिसिस के सिद्धांत से बनाई जाती है, जिसमें पानी के अणुओं में ऑक्सीजन से हाइड्रोजन को अलग करने के लिए ताप या ऊष्मा का प्रयोग किया जाता है. इसकी लागत इतनी ज्यादा है कि हौसला पस्त कर देती है, लेकिन रिलायंस, अदाणी और एलऐंडटी सरीखी देश की दिग्गज कंपनियों सहित दुनिया भर की बड़ी फर्म इसकी लागत को नीचे लाने की दिशा में काम कर रही हैं.
परिवहन क्षेत्र ऊर्जा से गहन रूप से जुड़ा है, इसलिए भारत को उन्नत अर्थव्यवस्था बनने की ओर छलांग लगाने के लिए दूसरी अहम टेक्नोलॉजी में भी महारत हासिल करनी होगी. मसलन, लीथियम बैटरियां पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियों का सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं, केवल इसलिए नहीं कि वे कहीं ज्यादा तेजी से चार्ज हो जाती हैं बल्कि इसलिए भी कि वे समान आयतन में कहीं ज्यादा मात्रा में ऊर्जा संग्रहीत करके रख सकती हैं और इसलिए ज्यादा लंबे समय तक चलती हैं और इन्हें देर से रीचार्ज करने की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि ली-ऑयन बैटरियां इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए पसंदीदा बैटरियां बन गई हैं. इन्होंने पेट्रोल और डीजल इंजनों को बेदखल कर दिया है, जिनका कार्बन उत्सर्जन गंभीर चिंता का सबब रहा है.
नीति आयोग का अनुमान है कि इस दशक के अंत तक उन्नत रसायन सेल बैटरियों की घरेलू मांग में 50 गुना बढ़ोतरी होगी—ईवी के लिए भी और पवन तथा सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले इलेक्ट्रिक ग्रिड के भंडारण के लिए भी. वैश्विक स्तर पर चीन बैटरियों का भीमकाय आका है, जिसके पास दुनिया की 70 फीसद मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है. भारत को बहुत तेजी से आगे बढ़ना होगा. उसने कश्मीर में खनन किए जा सकने वाले लीथियम की खोज कर ली है, पर व्यावसायिक स्तर पर ऐसी बैटरियां बनाने की टेक्नोलॉजी में उसे अभी महारत हासिल करनी है. तब तो और भी जब लक्ष्य 2030 तक 30 फीसद निजी कारों और 80 फीसद दोपहिया और तिपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाने का है.
मोबिलिटी में आमूलचूल बदलाव लाने की खातिर भारत के लिए दूसरी अहम जरूरत परिवहन के तेज-रफ्तार साधनों को अपनाने की है. मसलन, देश का गौरव बन चुकी वंदे भारत ट्रेन 160 किमी प्रति घंटे की सबसे तेज रफ्तार से चलती है. इसके मुकाबले जापान की शिंकानसेन या बुलेट ट्रेन 320 किमी प्रति घंटे यानी तकरीबन दोगुनी रफ्तार से दौड़ सकती है. भारत ने 500 किमी लंबे मुंबई-अहमदाबाद रेल गलियारे के लिए जापान के साथ हाथ मिलाएं हैं और पहली शिंकानसेन 2027 में चलना शुरू होगी, जो इन दो व्यावसायिक केंद्रों के बीच यात्रा में लगने वाले समय को सात घंटों से घटाकर महज दो घंटे कर देगी. भारत को ऐसी कई तेज-रफ्तार ट्रेनों की जरूरत होगी, पर तेज रेल यातायात की जबरदस्त मांग को पूरा करने के लिए इन्हें स्वदेशी ढंग से बनाना होगा.
जब सड़कों की बात आती है, तो केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मोदी सरकार के नौ साल में 50,000 किमी से ज्यादा लंबाई के राजमार्ग जोड़ने का सराहनीय काम किया है. मगर भारत के ट्रक चालक रोज औसतन 350 किमी का सफर तय करते हैं. यह उनके अमेरिकी समकक्षों के मुकाबले अब भी आधा है. टोल कम करने के अलावा भारत को अक्लमंद तरीकों से नियंत्रित राजमार्गों की भी जरूरत है, जो जाम और दुर्घटनाओं के बारे में वास्तविक समय में डेटा प्रदान करें और तेज-रफ्तार सफर के लिए सड़कों को हर तरह की बाधाओं से मुक्त बनाने में मदद करें.
आत्मनिर्भरता दूसरा बड़ा मामला है, जो हमें अपने खाद्य और रक्षा क्षेत्रों में हासिल करने की बेहद जरूरत है. इससे बड़ी विडंबना दूसरी नहीं हो सकती कि देश दलहनों का दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक है, वहीं वह उनका सबसे बड़ा आयातक भी है. इस बात का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए कि भारत आयात पर अपनी इस निर्भरता को पिछले दशक में कुल मांग के 19 फीसद से घटाकर 9 फीसद पर ले आया है, पर हम अपने लोगों की प्रोटीन की प्रति व्यक्ति जरूरत को पूरा करने के जरा भी करीब नहीं हैं. दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने की गरज से दलहन क्रांति को अंजाम देने के लिए भारत को अगले दशक में टेक्नोलॉजी में बड़ी कामयाबियों की जरूरत होगी. इसी तरह हम अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का 60 फीसद आयात करते हैं, जो फिर दुनिया में सबसे ज्यादा है. पर्यावरण की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भी हमें वनस्पति तेल का अपना उत्पादन बढ़ाने के लिए बहुत लंबी छलांगें लगाने की जरूरत है.
यही दुखद कहानी भारत के रक्षा क्षेत्र में भी दिखाई देती है, जहां देश अपने रक्षा उपकरणों का 60 फीसद से ज्यादा आयात करता है. अगर हमें अपनी सामरिक स्वाधीनता को बनाए रखना है, तो यह बहुत जरूरी है कि हम जेट इंजन और मारक शस्त्रों से लैस ड्रोन सरीखे अत्याधुनिक उपकरण स्वदेशी ढंग से बनाने के लिए पूरी ताकत लगा दें और उसमें जल्दी से जल्दी महारत हासिल करें.
अब बचे दो अन्य बेहद अहम क्षेत्र—शिक्षा और स्वास्थ्य—जिनमें भारत को कायापलट कर देने वाले बदलावों की जरूरत है, अगर वह विकसित राष्ट्रों की आला जमात में शरीक होना चाहता है. अपनी 54 फीसद आबादी 25 साल की उम्र से कम होने के साथ भारत अपनी जनसांख्यिकीय बढ़त पर गर्व कर सकता है. मगर हुनर के मामले में विशाल खाई से यह बढ़त बेकार हो जाती है. यूनिसेफ के एक हालिया अध्ययन से पता चला कि 2030 तक भारत के 50 फीसद से ज्यादा युवाओं में रोजगार के लिए जरूरी हुनर का अभाव होगा. लिहाजा, केंद्र और राज्य सरकारों को इस स्थिति को उलटने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे और ऐसा करने के लिए जितना जरूरी हो, उतना खर्च करना होगा. भारत में एसटीईएम विषयों (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमैटिक्स) को बढ़ावा देने—और ज्यादा एकसार ढंग से फैलाने—की भी जरूरत है. देश में 2016 और 2019 के बीच एसटीईएम विषयों से जुड़ी नौकरियों की मांग में 44 फीसद का इजाफा हुआ है, जिस पर गौर करने की जरूरत है.
इतना ही जरूरी यह भी है कि स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में सुधार किया जाए ताकि वह आम लोगों को सस्ती, सुलभ और अच्छी सेवाएं देना और इस दिशा में जीन थेरेपी सरीखे उन्नत समाधानों का इस्तेमाल करना पक्का कर सके. भारत के समक्ष ऐक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआइ) या सक्रिय दवा सामग्री—दवा बनाने के लिए जरूरी प्रमुख अवयव—की मैन्युफैक्चरिंग में वह आत्मनिर्भरता फिर हासिल करने का विशाल अवसर भी है जो उसने चीन के कदमों के डाल दी थी. साथ ही, बायोसिमिलर बनाने में भी वही आत्मनिर्भरता हासिल करने का मौका है, जो महंगी दवाओं की कीमत में खासी कमी लाने की संभावना से भरपूर है.
बहरहाल, ये 10 क्षेत्र किसी भी तरह उन नवाचारों और सुधारों की संपूर्ण सूची नहीं हैं जिनकी प्रथम विश्व का दर्जा पाने की तलाश में भारत को जरूरत है. बल्कि ये एक रोडमैप हैं जो देश को बताता है कि किन चीजों पर अपनी ऊर्जा केंद्रित करके वह सर्वश्रेष्ठ लोगों का कल्याण आश्वस्त कर सकता है. जैसा कि प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा, ''इस युग में हम जो काम करते हैं, हम जो त्याग करते हैं, हम जो तपस्या करते हैं, वे सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की तरफ ले जाएंगे.'' भारत@100 के लिए इससे उदात्त आकांक्षा दूसरी भला क्या हो सकती है.

