वक्त अच्छे-अच्छों के कसबल ढीले कर देता है. ओलंपिक पदक विजेता बजरंग पूनिया तथा साक्षी मलिक और एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता विनेश फोगाट ने तकरीबन पूरी जिंदगी अखाड़े में योद्धा के गुर सीखे, मगर 30 मई को हरिद्वार में हर की पैड़ी पर गंगा किनारे खड़े इन पहलवानों में पहली बार जैसे लड़ने की हिम्मत टूटती लगी. परिजनों और दोस्तों के घेरे में जब वे तीनों के मिलाकर दो ओलंपिक, छह विश्व चैंपियनशिप और चार एशियाई खेलों के गाढ़े पसीने से कमाए अपने पदकों को सीने से चिपकाए रो पड़े, जिन्हें उन्होंने ''हमारी जान, हमारी आत्मा’’ कहा.
उनका इरादा उन्हें पवित्र नदी में बहा देने का था. महज दो दिन पहले उन्हें नई दिल्ली की सड़कों से निकाल दिया गया था, दिल्ली पुलिस ने उनके साथ हाथापाई की थी और अब महिला पुलिस अधिकारियों पर हमला करने के लिए उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज कर ली गई थी.
2021 में अपनी श्रेणी में दुनिया में नंबर 1 रहीं विनेश को हरिद्वार में बार-बार यह पूछते सुना गया कि ''यह कैसे हुआ?’’ यह 28 वर्षीया पहलवान समझ नहीं पा रही थीं कि भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआइ) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश में कैसरगंज से भाजपा के सासंद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप में किए जा रहे विरोध प्रदर्शन का हश्र यह कैसे हुआ कि उलटे उन्हीं के खिलाफ हमले के आरोप लगा दिए गए.
यह ऐसा मुकाबला था जिसे उन्होंने बेहद कम करके आंका. बीते छह महीने में वे न सिर्फ अपने परिवार और दोस्तों का कुछ समर्थन बल्कि रियाज का वक्त और चुस्ती-फुर्ती भी गंवा चुके हैं. इसी साल बाद में चीन के शहर हंगझाऊ में होने वाले एशियाई खेल और बेलग्रेड में विश्व चैंपियनशिप अब काफी दूर के मुकाम लगते हैं. उनकां लोगों के एक वर्ग के विरोध से नया-नया पाला पड़ा, जो हाल तक उन पर प्यार बरसाते थे.
पेशेवर संपर्क भी टूटने लगे हैं. सबसे बढ़कर उनसे वही सब ऐसे छूटता जा रहा है, जैसा कभी हुआ ही नहीं, जो उनकी ताकत हुआ करता था. यह संघर्ष उन्हें ऐसे वक्त करना पड़ रहा है, जब तमाम खेलों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ रही है. हाल के टोक्यो ओलंपिक में भारत ने 56 एथलीटों का अपना सबसे बड़ा महिला दस्ता उतारा, तो अभी चल रहे खेलो इंडिया यूथ गेम्स में 1,715 लड़कियां हिस्सा ले रही हैं.
यही बात इन पहलवानों की लड़ाई को भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए ऐसा ऐतिहासिक लम्हा बना देती है जिसके नतीजे से यह तय होगा कि खेल महासंघ और सरकारें तमाम खेलों में यौन उत्पीड़न, शोषण और बदसुलूकी के मामलों से कैसे निबटती हैं. लंबी लड़ाई के बाद जीत का एक संकेत (देखें, लंबा संघर्ष) 15 जून को सिंह और डब्ल्यूएफआइ के सचिव विनोद तोमर के खिलाफ दिल्ली पुलिस के आरोप-पत्र दाखिल करने से मिला.
उन्होंने 18 जनवरी को नई दिल्ली के जंतर मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया, ये लड़कियां पक्के इरादे से भरी हुई थीं. उनके मन में भावनाओं का यह ज्वार 2022 के बाद के महीनों से ही धीरे-धीरे बढ़ रहा था. प्रदर्शन में मौजूद एक महिला पहलवान धृति कुमार (बदला हुआ नाम) याद करती हैं कि जब उन्होंने सिंह के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए, तो क्या हुआ था.
वे कहती हैं, ''डब्ल्यूएफआइ में सभी महिलाओं के लिए भूषण जाना-माना आतंक है. वह इतना ताकतवर है कि हर कोई उसके खिलाफ बोलने से डरता है. अगर बोले तो आपका करियर खत्म. महिला पहलवानों को दूसरी 'नौकरी’ नहीं मिल सकती. बस एक ही संगठन है और उस पर उसका कब्जा है. हमें पता था कि 2023 में उसका कार्यकाल खत्म होने वाला है, इसलिए हमने सोचा जल्द ही यह सब खत्म हो जाएगा.’’
फिर, उन्होंने अफवाहें सुनीं कि सिंह डब्ल्यूएफआइ में दूसरे पद के लिए खड़े होने का मंसूबा बना रहे हैं और उनका बेटा, जो पहले ही उपाध्यक्ष हैं, उनकी जगह ले सकता है. उनमें से कई खौफ से भर गईं. धृति कहती हैं कि सिंह के हाथों प्रताड़ित लड़कियों में विनेश सबसे बहादुर थी और उनके इर्द-गिर्द विरोध का एक छोटा-सा घेरा बढ़ने लगा.
शुरुआत में उन्होंने डब्ल्यूएफआइ की उस पांच सदस्यीय यौन उत्पीड़न समिति में शिकायत करने की योजना बनाई जिसमें डब्ल्यूएफआइ के महासचिव एन. प्रसूद, संयुक्त सचिव जय प्रकाश, कार्यकारिणी के सदस्य विशाल सिंह, देबेंद्र कुमार साहू और खुद साक्षी मलिक हैं.
यह वैसी आंतरिक शिकायत समिति (आइसीसी) नहीं थी, जो 2013 के यौन उत्पीड़न रोकथाम (पीओएसएच) कानून की व्यवस्था के तहत अनिवार्य है, और जिसके मुताबिक इसकी करीब आधी सदस्य महिलाएं होनी चाहिए और किसी एनजीओ या महिलाओं के लिए काम कर रहे संगठन से जुड़ा एक बाहरी प्रतिनिधि जरूर शामिल होना चाहिए.
यह एहसास होने पर कि समिति में केवल एक व्यक्ति—मलिक, जिन्हें, बकौल उनके, पता तक नहीं था कि वे समिति में हैं—महिला हैं और वे भी खुद सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली हैं, पहलवानों ने इसके बजाए अपनी लड़ाई सड़कों पर ले जाने का फैसला किया, यह देखकर कि इंसाफ के लिए यही एक रास्ता उनके सामने बचा है.
पूर्वाग्रहों से टकराना
यौन उत्पीड़न के खिलाफ बोलने का फैसला अपने आप में चुनौतियों से भरा है. एक शीर्ष खेल संगठन से जुड़े देश के प्रतिष्ठित खेल वकीलों में से एक कहते हैं, ''आइसीसी कुल इतना कर सकती है कि जांच के नतीजे नियोक्ता को बताए और फिर कार्रवाई करना उसके हाथ में होता है. असल चुनौती यह है कि उस शख्स के खिलाफ कोई भी क्या करेगा जिसने अकेले संगठन पर पूरा कब्जा कायम कर रखा है?’’
एथलीट बदले के डर से ऐसी घटनाओं के बारे में रिपोर्ट नहीं करना चाहते. वे वकील यह भी कहते हैं, ''खेलों में केवल एक नियोक्ता होता है, इसलिए प्रभावी तौर पर आप एकाधिकार से निबट रहे होते हैं. जीत भी जाएं तो वास्ता उसी से पड़ेगा. आप छोड़कर दूसरी जगह जा नहीं सकते.’’ वे पहलवानों की रणनीति को ''गुरिल्ला युद्ध’’ जैसी, बहुत कुछ मीटू आंदोलन जैसी मानते हैं. वे कहते हैं, ''अगर किसी के पास संसाधन या ताकत नहीं है और व्यवस्था पूरी तरह खिलाफ है, तो ऐसी चीजें करके आवाज ऊंची उठाते हैं जिससे संदेश पूरे जोर से सुनाई दे.’’
जनवरी में जब पहलवानों ने सिंह के हाथों हुए अपने बुरे तजुर्बों का खुलासा करना शुरू किया, उन्होंने न कोई कानूनी सलाह ली थी और न ही उन्हें जरा भी अंदाज था कि क्या होगा. अप्रैल आते-आते वे जान गए कि उनका मुकाबला किन ताकतों से है. तब अन्य दो पहलवानों और पूनिया की पत्नी संगीता के साथ जंतर मंतर पर धरने पर बैठी और अस्थायी तिरपाल की छत के तले अप्रैल की बेमौसम बारिश झेलती मलिक ने कहा था, ''हम इसके लिए अपना पूरा करियर, अपने परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगा रहे हैं.
हम ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हैं—इसके बारे में बोलना आसान नहीं है.’’ हर सुबह वे फुटपाथ पर तुरत-फुरत थोड़ी-सी कसरत करते और धरने पर लौट आते. शुरुआत में वहां कई सारी दूसरी लड़कियों की मौजूदगी से उन्हें तसल्ली मिलती थी. मगर ज्यों-ज्यों लड़ाई लंबी खिंचती गई, उनमें से कई मायूस होकर जाने लगीं. मलिक कहती हैं, ''हम उन्हें हिम्मत हारने के लिए दोषी नहीं ठहराते. यह आसान लड़ाई नहीं है.
हममें से किसी ने भी इस तरह पीड़ितों को ही शर्मसार करने और धमकियां मिलने की उम्मीद नहीं की थी.’’ यह सब तब हो रहा था जब ये लड़कियां पहले ही यौन उत्पीड़न के भय और सदमे से गुजर रही थीं. ट्रॉमा साइकिएट्रिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, ''सदमा हमारे तंत्रिका तंत्र पर काफी असर डालता है. सदमे के शिकार व्यक्ति से हर बात पूरी तरह साफ-साफ और सोच-समझकर बताने के लिए कहना मुनासिब नहीं है. दरअसल, अशांत या बेचैन होना, याददाश्त में भूल-चूक करना, और उत्तेजित महसूस करना सदमे की ही प्रतिक्रियाएं हैं.’’
फिर पारिवारिक प्रतिष्ठा और आजीविका पर जो आंच आनी थी, सो अलग. हरियाणा के चरखी दादरी जिले का बलाली गांव, जिसके प्रवेश चिह्न पर विनेश का नाम गर्व से लिखा है, उनके या उनके पति सोमवीर राठी या उनकी चचेरी बहन संगीता और उनके पति पूनिया के पीछे हमेशा खड़ा नहीं रहा. वे जिस गहरे पितृसत्तात्मक हरियाणवी परिवेश से आए हैं, उसमें इन लड़कियों को अपने मौजूदा मुकाम तक पहुंचने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ा.
यौन उत्पीड़न के खिलाफ बोलने और विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की उनकी कोशिश को अक्सर हद से आगे जाने की तरह देखा जाता है. नाम न छापने की शर्त पर एक महिला पहलवान उस जबरदस्त सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिक्रिया के बारे में बात करती हैं जो उन्हें झेलनी पड़ रही है. वे कहती हैं, ''मैं पहले दो महीने विरोध प्रदर्शन में गई थी, फिर मेरे पिता मुझे घसीटकर ले आए. घर लाकर उन्होंने मुझे इसलिए मारा क्योंकि मैं इस भीड़ से जुड़ी थी. सारे परिवार हमारी बहादुरी पर गर्व नहीं करते. वे बस परिवार के नाम, हमारी शादी, हमारी आमदनी के बारे में सोचते हैं. हम उस संस्कृति से नहीं हैं जहां इन चीजों के बारे में खुलकर बात की जाती है.’’
जिन्होंने खुलकर बात की, उन्होंने खासी कीमत चुकाकर ऐसा किया. मसलन, विनेश अपने परिवार की अकेली कमाऊ सदस्य हैं. वे महज नौ बरस की थीं जब उनके पिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और बाद में उन्होंने अपनी मां को कैंसर से जूझते देखा. मगर उन्हें अपने ताऊ जी महावीर सिंह फोगाट में पितृतुल्य व्यक्ति और मार्गदर्शक मिला. फोगाट खानदान, यानी पांच भाई, उनके परिवार और दर्जन भर बच्चे, सब एक टूटे-फूटे घर में रहा करते थे, जब तक कि इन लड़कियों की कामयाबी ने उनकी माली हालत नहीं बदल दी.
महावीर ने पहले अपनी चार बेटियों—गीता, बबीता, संगीता और ऋतु—को कुश्ती के दांव-पेच सिखाए. उन्हें पहलवान बनाने की उनकी धुन और लगन का वृतांत ब्लॉकबस्टर फिल्म दंगल में दिखाया गया है, जिसमें महावीर का किरदार आमिर खान ने निभाया है. महावीर के मन पर सबसे ज्यादा छाप विनेश ने छोड़ी. उन्होंने कहा कि वह उनकी बेटियों से ज्यादा निडर थी और जो करती थी, दिल से करती थी. महावीर की बेटी बबीता ने, जो भाजपा की नेता भी हैं, हालांकि खुद को अपनी बहनों के आंदोलन से अलग कर लिया, पर महावीर, जो खुद भी भाजपा में हैं, अपनी भतीजी के कट्टर समर्थक बने रहे. वे कहते हैं कि अगर उसे इंसाफ नहीं मिला तो वे भी अपने पदक लौटा देंगे.
मलिक की जिंदगी फोगाट बहनों से थोड़ी अलहदा रही है. वे हरियाणा में रोहतक जिले के मोखरा गांव के अपेक्षाकृत संपन्न परिवार से हैं. उन्होंने अपने पहलवान चाचा से प्रेरित होकर 12 साल की उम्र में कुश्ती सीखना शुरू किया. इंडिया टुडे से पहले की एक बातचीत में उन्होंने भयभीत करने वाले आदमियों और पसीने की दुर्गंध से भरे दमघोंटू जिम में जाने के बारे में बात की थी. शायद वहीं उन्होंने पुरुष-प्रधान अखाड़े में अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा रहना सीखा.
हालांकि इन पांच महीनों के दौरान मलिक और उनके संगी-साथियों ने अपने विरोध को लगातार कमजोर किए जाते देखा. पहले इसे ठाकुरों और जाटों की लड़ाई और बाद में डब्ल्यूएफआइ पर कब्जे के लिए उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच टकराव बताकर खारिज किया गया और फिर कांग्रेस के पिठ्ठू होने से लेकर एक परिवार (यानी फोगाट परिवार) की रची साजिश तक कहा गया.
मलिक कहती हैं, ''यह सब असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की रणनीति है.’’ (देखें, 'दूसरों ने भी बोलने की कोशिश की...’). वे कहती हैं, ''विरोध का मुख्य मकसद यह कि बृजभूषण के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच हो और डब्ल्यूएफआइ को ऐसे अधिकारी चलाएं जो खेल को साफ-सुथरा रखते हुए आगे ले जाएं और लड़कियों व औरतों का शोषण न हो.’’
यूपी का बाहुबली
इन 12 साल में जब डब्ल्यूएफआइ पर सिंह का एकछत्र राज रहा, उन्होंने कथित तौर पर संगठन पर अपनी लोहे सरीखी पकड़ बनाए रखी और अपने चौतरफा असर का बेधड़क इस्तेमाल किया. महासंघ के दूसरे पदों पर भी उनके परिवार के सदस्यों का कब्जा था. बेटा करण उपाध्यक्ष था, दामाद आदित्य प्रताप संयुक्त सचिव था, और एक और दामाद विशाल सिंह बिहार कुश्ती संघ का अध्यक्ष था.
डब्ल्यूएफआइ की चयन समिति का और एथलीटों की शिकायत निवारण समिति का भी प्रमुख होने के नाते उन्होंने पक्का कर लिया कि सभी खिलाड़ी हर चीज के लिए उन्हीं के पास आएं. इसके चलते पहलवानों के लिए राष्ट्रीय राजधानी में 21 अशोक रोड स्थित उनके सरकारी आवास पर जाना अक्सर जरूरी हो जाता, जो अजीबोगरीब ढंग से डब्ल्यूएफआइ का दफ्तर भी है. यही वह जगह है जहां कम से कम दो आरोपियों का कहना है कि उनका यौन उत्पीड़न किया गया.
स्कूल के दिनों से पहलवानी कर रहे सिंह अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत से गोंडा में कुश्ती के आयोजन करते रहते थे. एक करीबी सहयोगी बताते हैं, ''उन्होंने कई बार अपनी देखरेख में जूनियर और राष्ट्रीय चैंपियनशिप आयोजित कीं. मैट रेस्लिंग के चलन में आने से पहले वे अपने खर्च पर दंगल करवाया करते थे.’’ 2009 में जब भाजपा के सितारे फीके पड़ने लगे, सिंह पाला बदलकर समाजवादी पार्टी में चले गए और उस साल लोकसभा का चुनाव जीता.
उनके करीबी सूत्र दावा करते हैं कि 2011 में उन्हें डब्ल्यूएफआइ का अध्यक्ष बनवाने में समाजवादी पार्टी के संस्थापक दिवंगत मुलायम सिंह यादव ने अहम भूमिका अदा की. इससे तमाम पार्टियों में सिंह के रिश्तों का पता चलता है और यह भी कि मुलायम के बेटे और सपा के मुखिया अखिलेश यादव मौजूदा विवाद में ज्यादातर खामोश क्यों रहे, जबकि उनके सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख जयंत चौधरी प्रदर्शन कर रहे पहलवानों के समर्थन में जंतर मंतर गए थे. सिंह ने दूसरे तरीकों से भी अपना रसूख बनाया. चार जिलों में 54 ऐसे शैक्षणिक संस्थान हैं जिन्हें या तो वे चलाते हैं या उनसे जुड़े हैं (देखें, उनसे डर और नफरत की वजहें).
उत्तर प्रदेश के एक कुश्ती कोच नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि सिंह ने अपने दबदबे के बल पर यह पक्का किया कि डब्ल्यूएफआइ को कभी पैसों की तंगी न हो और भारतीय खेल प्राधिकरण में उसकी श्रेणी 1 की रैंकिंग हमेशा बनी रहे. हालांकि उन्होंने यह भी खुलासा किया कि सिंह ''बदमिजाज’’ शख्स के तौर पर जाने जाते हैं, जो न किसी कोच की इज्जत करता है और न खिलाड़ियों की. वे कहते हैं, ''फोटो खिंचाने तक रेस्पेक्ट थी.’’
छह बार के लोकसभा सदस्य सिंह एक वायरल वीडियो में 2021 में रांची में राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान एक नाटे कद के पुरुष खिलाड़ी को थप्पड़ जड़ते देखे गए. उन्होंने यह कहकर इसका बचाव किया कि वे इसलिए अपना आपा खो बैठे क्योंकि वह खिलाड़ी उम्र को लेकर फर्जीवाड़ा करने का दोषी था और एक और मौका देने की जिद कर रहा था.
कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य तथा हरियाणा कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष दीपेंद्र हुड्डा कहते हैं कि सिंह की ''तानाशाही’’ का उन्हें तब पता चला जब गुस्से में पहलवान कुछ साल पहले उनके पास आए. हुड्डा ने सीधे सिंह के सामने इन आरोपों को उठाया, जिनमें बेतरतीब चयन और पहलवानों को निकाल देना शामिल था. हुड्डा का आरोप है कि डब्ल्यूएफआइ में पूरा नियंत्रण कायम रखने के लिए सिंह ने ज्यादातर राज्य इकाइयों में वफादारों को बिठा रखा है. वे कहते हैं, ''वे चुनाव लड़ें या न लड़ें, किसी को भी अध्यक्ष बनवा सकते हैं. यह उनकी बेनामी जागीर बन गई है.’’
अलबत्ता अपने घरेलू अखाड़े के बाहर उन्होंने चाहे जितना हंगामा बरपाया हो, उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के लोग सिंह को बाहुबली मानते हैं. कोई नहीं बता सकता कि ऐसा वे डर से मानते हैं या श्रद्धा से. उनके वकील ए.पी. सिंह कहते हैं, ''आरोपी ऐसे पहलवान हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल है, जिनके पास शारीरिक ताकत और वित्तीय स्थिरता है. यह यकीन कर पाना मुश्किल है कि 66 साल का बूढ़ा आदमी उनका उत्पीड़न कर सकता है.
दूसरे पहलवान भी राजनीति से प्रेरित हैं. हमें पक्का यकीन है कि उन्हें इस मुद्दे पर क्लीन चिट मिल जाएगी.’’ जब इतने सारे लोग उनके असर में हों, तो हैरानी क्या कि सिंह पूरी बेपरवाही और दिलेरी से कामकाज में जुटे हैं कि मानो कुछ हुआ ही न हो. 16-18 अप्रैल को उनके गढ़ नवाबगंज में अंडर-17 वर्ग की राष्ट्रीय चैंपियनशिप और साथ ही सीनियर ओपन नेशनल रैंकिंग रेस्लिंग टूर्नामेंट का आयोजन किया गया.
आयोजन स्थल नंदिनी नगर महाविद्यालय था, यानी वह पहला कॉलेज जिसकी स्थापना सिंह ने 1990 में की थी और जिसके वे अध्यक्ष हैं. प्रदर्शनकारी पहलवानों के लिए यह विश्वासघात था क्योंकि सरकार ने कहा था कि कमान अब सिंह के हाथ में नहीं होगी. उन्होंने प्रदर्शन स्थल पर लौटना और वकील नरेंद्र हुड्डा से कानूनी सलाह लेना चुना.
टेढ़ी-मेढ़ी कानूनी राह
ऐसा नहीं है कि इंसाफ का चक्का घूम नहीं रहा है, बस पहलवानों के हक में बेहद धीमे घूम रहा है. जंतर मंतर पर 18 जनवरी को उनके धरना शुरू करने के एक दिन बाद केंद्रीय खेल और युवा मामले मंत्री अनुराग ठाकुर प्रदर्शनकारियों से मिले थे और उसके दो दिन बाद आरोपों पर गौर करने के लिए प्रतिष्ठित मुक्केबाज मैरी कॉम की अगुआई में छह सदस्यों की निगरानी समिति (ओसी) के गठन का ऐलान हुआ था.
मैरी कॉम समिति से महीने भर में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था, मगर उसने दो बार वक्त बढ़ाने की मांग की. वजह, ठाकुर के मुताबिक, ''समिति एकदम खुली हुई थी और आने वाले हर किसी की बात धैर्य से सुनी गई.’’ (देखें, 'हमारा विश्वास वक्त पर पारदर्शी जांच में है’).
समिति ने 5 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन उसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसकी सफाई में ठाकुर कहते हैं कि मामला संवेदनशील है और रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी गई है, जो मामले की पड़ताल कर रही है. ठाकुर यह भी कहते हैं कि अदालतों को तय करना है कि उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए या नहीं.
वैसे, एक निष्कर्ष इस चिंताजनक तथ्य को उजागर करता है कि डब्ल्यूएफआइ में पीओएसएच कानून के तहत अनिवार्य आइसीसी नहीं है. समिति ने कथित तौर पर इस मामले में आगे बढ़ने के लिए दो बड़ी सिफारिशें कीं. एक, कुश्ती संघ के मौजूदा निजाम की जगह रोजमर्रा के कामाकज के लिए अस्थाई कमेटी का गठन किया जाए और जल्दी से जल्दी नई कार्यकारी व्यवस्था के लिए पारदर्शी चुनाव कराए जाएं. दूसरी, दिल्ली पुलिस से यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच करने को कहा जाए.
आखिर 21 अप्रैल को सिंह के खिलाफ शुरुआती शिकायत दर्ज हुई. नरेंद्र हुड्डा कहते हैं कि पावती पाने के लिए ही पीड़ितों को चार घंटे से ज्यादा दिल्ली में कनॉट प्लेस थाने की सीढ़ियों पर इंतजार करना पड़ा. पहलवानों ने डब्ल्यूएफआइ के मुखिया के खिलाफ 10 शिकायतें दर्ज कराईं, मगर एफआइआर नहीं हुई. फिर, पहलवानों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली. हुड्डा कहते हैं, ''अदालत के आदेश के बाद ही पुलिस को 28 अप्रैल को एफआइआर दर्ज करनी पड़ी.’’ उसी दिन सरकार ने डब्ल्यूएफआइ का कामकाज देखने के लिए नए चुनाव के पहले अस्थाई समिति के गठन का ऐलान किया.
सिंह के खिलाफ 28 अप्रैल को दो एफआइआर दर्ज हुई. एक, यौन अपराध से बाल सुरक्षा (पॉक्सो) कानून के तहत, और दूसरी भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की अस्मत पर चोट करने की नीयत से उत्पीड़न या आपराधिक बल प्रयोग), धारा 354ए (यौन उत्पीड़न), 354डी (पीछा करना) और 34 (आम इरादे) के तहत, जिनमें एक से तीन साल तक की जेल की सजा हो सकती है.
पॉक्सो के तहत, सिंह को कम से कम से पांच साल की सजा भुगतनी पड़ सकती है, लेकिन सजा सात साल तक भी हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है. यह अपराध गैर-जमानती है. एफआइआर में मूल 10 शिकायतें सात तक घटा दी गईं. इनमें यौन उत्पीड़न की 10 वारदातें और गलत नीयत से छूने की 2012 में तीन, 2016 में एक, 2017 में दो, और 2018, 2019 तथा 2021 में एक-एक, और 2022 में पांच वारदातें हैं, जिसमें एक पीड़ित नाबालिग बताई गई.
इन शिकायतों के मुताबिक, सिंह आदतन अपराधी लगते हैं. एक शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि अगस्त 2022 में बुल्गारिया में वर्ल्ड जूनियर रेस्लिंग चैंपियनशिप के दौरान छेड़छाड़ की और बाद में अपने आवास पर ''सेक्सुअल फेवर’’ के बदले उसकी चोट के इलाज का खर्च संघ की ओर से करने का लालच दिया.
दूसरी शिकायतकर्ता ने कहा कि 2016 में मंगोलिया में ओलंपिक क्वालिफायर के दौरान एक रेस्तरां में सिंह ने बार-बार अपना हाथ उसके सीने पर रखा, भींचा और उसके पेट पर हाथ फिराया. तीसरी पहलवान ने किर्गिजिस्तान में 2018 के एक वाकये का जिक्र किया कि जब वह मैट पर लेटी हुई थी तो सिंह ने ''मेरी सांस की जांच करने के बहाने’’ मेरी टी-शर्ट खींची और मेरी सीने और पेट पर हाथ फिराया.
2022 की एक वारदात में जबरन शारीरिक संपर्क बनाने का जिक्र है, जिसमें एक टीम फोटोग्राफ के दौरान सिंह ने उसके कंधे से नीचे की ओर हाथ फिराया और गलत ढंग से छुआ. कम से कम चार मौकों पर उत्पीड़न सिंह के आवास/डब्ल्यूएफआइ के दफ्तर में हुआ. सभी का मानना है कि वारदात के दौरान शिकायत दर्ज न कराने की वजह अपने करियर की फिक्र और बदले का डर था.
गिरफ्तारी का मामला
गिरफ्तार करने या न करने का अधिकार मामले के जांच अधिकारी के पास होता है. पॉक्सो के तहत एफआइआर एक पहलवान की शिकायत पर दर्ज है, जिसके मुताबिक, सिंह ने पहली दफा जब फोटो लेने के बहाने उसे गलत ढंग से छुआ और फिर पीछा किया, तब वह नाबालिग थी.
अमूमन, पॉक्सो अपराध की गंभीरता के मद्देनजर, गिरफ्तारी फौरन की जाती है. लेकिन पॉक्सो के तहत 28 अप्रैल को एफआइआर दर्ज होने के बाद 5 जून तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, जब उसे वापस ले लिया गया और अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत नया बयान दर्ज हुआ, क्योंकि पुलिस के मुताबिक, शिकायतकर्ता की जन्म तिथि में कुछ फर्क दिखा.
इसके अलावा, आइपीसी की अधारा 41ए के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के मुताबिक, अगर संबंधित अपराध में सजा का प्रावधान सात साल जेल से कम है तो आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. सिंह के खिलाफ जो कई आरोप हैं, उनमें फिलहाल सात साल से ज्यादा की जेल का प्रावधान नहीं है. गिरफ्तारी का दूसरा आधार आरोपी के भागने की आशंका है. हालांकि सिंह सार्वजनिक व्यक्ति हैं इसलिए भागने का जोखिम नहीं है.
हालांकि दीपेंदर हुड्डा का कहना है कि राजनैतिक संरक्षण और आरोपी के भाजपा सांसद होने की वजह से दिल्ली पुलिस का रवैया पहले ही दिन से नाइंसाफी वाला रहा है. वे कहते हैं, ''दिल्ली पुलिस ने अपने इरादे साफ कर दिए और आप जानते हैं कि उसके आका कौन हैं. वह बेशर्मी से उसे गिरफ्तारी से बचा रही है. ऐसे मामलों में गिरफ्तारी जरूरी होती है क्योंकि ज्यादातर आरोपी ताकतवर होते हैं, जो सबूत नष्ट कर सकते हैं, या गवाहों या शिकायतियों तथा उनके परिवारवालों पर दबाव डाल सकते हैं, पैसे से उनकी चुप्पी भी खरीद सकते हैं.’’
उधर, दिल्ली पुलिस की विशेष जांच टीम ने 28 अप्रैल को एफआइआर दर्ज करने के बाद तकरीबन 40 दिनों की पड़ताल में 200 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए हैं. चार्जशीट दाखिल करने से पहले अधिक से अधिक सबूत और परिस्थितिजन्य साक्ष्य जुटाने की कोशिश की है. आरोपों को साबित करने का काम चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि 2012-2022 के एक दशक के दौरान विभिन्न स्थानों पर वारदातों का जिक्र है, जिनमें कुछ वारदातें विदेश में हुई हैं.
जांचकर्ताओं ने भारतीय दूतावासों के जरिए कम से कम पांच देशों—बुल्गारिया, किर्गिजिस्तान, मंगोलिया, कजाकिस्तान और इंडोनेशिया के कुश्ती संघों को पत्र लिखा है और पहलवानों के ठहरने के स्थानों और वहां के सीसीटीवी फुटेज के साथ वीडियो या तस्वीरें मांगी हैं. दिल्ली पुलिस का कहना है कि सभी पहलवानों ने ओसी की जांच को ''पक्षपातपूर्ण’’ बताया है.
उनका आरोप है कि बंद कमरे में कार्रवाई ठीक से नहीं की गई और जब उनके बयान दर्ज किए जा रहे थे तो कैमरे बार-बार बंद कर दिए गए थे. एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''हम चार्जशीट दाखिल करने से पहले सभी उपलब्ध सबूतों के साथ मामले को मजबूत और फूलप्रूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं.’’
हालांकि, कई एक्टिविस्ट हैरान हैं कि पीड़ितों के साथ कैसा खौफनाक व्यवहार किया जा रहा है. अपराध के दृश्य को फिर से बनाने की अजीबोगरीब कोशिश में, एक पहलवान को सिंह के घर/डब्ल्यूएफआइ दफ्तर में ले जाया गया, जबकि सिंह कथित तौर पर उसी परिसर में मौजूद थे.
नारीवादी एक्टिविस्ट कविता कृष्णन कहती हैं, ''यह कानून का मजाक है. किसी भी पीड़ित को मौका-ए-वारदात पर नहीं ले जाना चाहिए और दहशतनाक वारदात को फिर बताने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.’’ पुलिस ने वारदात के वीडियो और फोटोग्राफिक सबूत भी मांगे हैं. वे पूछती हैं, ''क्या ऐसी वारदात खुलेआम और पकड़े जाने की संभावना को ध्यान में रखे बिना की जाती है? और, पीड़ित क्या रिकॉर्डर लेकर जाती हैं?’’
मकसद की खातिर दंगल
दुनिया भर में खेलों में यौन उत्पीड़न गहरे धंसा हुआ है, ताकतवर लोगों के हाथों एथलीटों का शोषण के असंख्य मामले हैं. अमेरिका में ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता सिमोन बाइल्स सहित 200 से अधिक महिला जिम्नास्टों ने खुलकर बोलने का साहस दिखाया, ताकि अमेरिकी महिला टीम के डॉक्टर लैरी नासर को ताउम्र सलाखों के पीछे डाला जाए.
नासर अक्सर नाबालिगों का इलाज के बहाने लगभग दो दशक से शोषण करता रहा था. दक्षिण कोरियाई शॉर्ट ट्रैक स्पीड स्केटिंग खेल यौन उत्पीड़न के आरोपों से हिल उठा था, जिसमें एक कोच को बलात्कार का दोषी पाया गया था. हाल ही में, कनाडा की 50 वर्तमान और पूर्व तलवारबाजों ने दो दशकों तक किए गए ''भावनात्मक, शारीरिक और यौन शोषण और दुराचार’’ के लिए अपने संघ के खिलाफ न्यायिक जांच की मांग की.
यौन उत्पीड़न के आरोपों पर भारत का ट्रैक रिकॉर्ड सराहनीय नहीं रहा है. 2020 में, अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक आरटीआइ के जवाब में भारतीय खेल प्राधिकरण ने खुलासा किया कि पिछले एक दशक में 24 सरकारी केंद्रों में यौन उत्पीड़न की 45 शिकायतें थीं, जिनमें 29 में कोचों पर दाग थे. इनमें कुछ मामलों में जांच लंबी चली और सबसे कड़ी सजा यही थी कि आरोपी को किसी दूसरी जगह ट्रांसफर कर दिया गया या फिर पेंशन या वेतन में कटौती कर दी गई.
तथ्य यह है कि कई खेल महासंघों का नेतृत्व नेता करते हैं, जिनमें कई को भरोसा है कि राजनैतिक संबंधों की वजह से वे किसी भी चीज से बरी हो जाएंगे, इसलिए अपनी करतूत जारी रखते हैं. भारत में विभिन्न खेलों के कम से कम सात महासंघों का नेतृत्व नेता या उनके रिश्तेदार करते हैं (देखें खेल और राजनीति). ओलंपिक पदक विजेताओं के साथ काम कर चुके एक प्रमुख खेल प्रशासक कहते हैं, ''भारत अगर कभी भी खेल राष्ट्र बनना चाहता है, तो खेल संघों को नेताओं और हर तरह के पक्षपात से निजात दिलानी होगी और उनमें ऐसे लोगों को लाना होगा जो खेल को जानते-समझते हैं. संघों को खेल के हित में चलाना होगा.’’
इसी वजह से महिला पहलवानों का खुलकर मोर्चा संभालाना देश में खेलों के हित में बेहद जरूरी है. आजकल बेंगलूरू में अकादमी चलाने वाली अर्जुन पुरस्कार विजेता तैराक निशा मिलेट कहती हैं, ''हमें दुराचार से लडऩे के लिए संघों में ज्यादा महिलाओं की जरूरत है.’’ मिलेट खिलाड़ियों से पहलवानों को मामूली समर्थन मिलने से भी निराश हैं.
1983 की विश्व कप विजेता क्रिकेट टीम (लेकिन बीसीसीआइ अध्यक्ष रोजर बिन्नी नहीं) और अभिनव बिंद्रा, सुनील छेत्री, नीरज चोपड़ा और निकहत जरीन के कुछ ट्वीट को छोड़कर अधिकांश एथलीटों ने चुप्पी साध रखी है. आइओए अध्यक्ष और पूर्व धावक पी.टी. उषा ने पहलवानों की कार्रवाई को ''घोर अनुशासनहीनता’’ कहा. जब बबीता फोगाट ने इंडिया टुडे से कहा कि पहलवानों को विपक्ष गुमराह कर रहा है, तो विनेश ने ट्वीट किया, ''बबीता बहन, मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूं कि हमारे आंदोलन को कमजोर न करें... आप भी एक महिला हैं, हमारे दर्द को समझने की कोशिश करें.’’
दरअसल, विनेश और पुनिया सबसे भारी कीमत चुका रहे हैं. दोनों क्रमश: 53 और 65 किग्रा भार वर्ग में भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं. अगस्त में एशियाई खेल और सितंबर में विश्व चैंपियनशिप तय हैं. 2024 के पेरिस खेलों में 14 महीने से भी कम समय बचा है और डब्ल्यूएफआइ अधर में है, आखिरकार इस सबका खेल को ही नुक्सान होगा.
दुनिया भर में बॉक्स-ऑफिस पर लगभग 2,000 करोड़ रु. की कमाई करने वाली फिल्म दंगल के आखिरी रोमांचक दृश्य में फोगाट बहनों में बबीता ने स्टेडियम में राष्ट्रगान के साथ जीत का जश्न मनाया था. इससे कई युवा लड़कियां सपनों को पूरा करने के लिए पास के अखाड़ों में पहुंची थीं.
मलिक कहती हैं, ''हम खेलों में लड़कियों की स्थिति में सुधार के लिए ऐसा कर रहे हैं, ताकि वे सुरक्षित महसूस कर सकें.’’ इस दंगल का अंत भी मायने रखेगा. यह तय होगा कि क्या युवा लड़कियां बड़ी संख्या में खेलों में शामिल होंगी या अपनी उम्मीदों को किसी नदी में बहा देंगी.
—सोनाली आचार्जी साथ में प्रदीप सागर और प्रशांत श्रीवास्तव
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उनसे खौफ और नफरत की वजहें
दिवंगत तेजतर्रार विहिप नेता अशोक सिंहल के करीबी, 1991 में भाजपा में शामिल, उसी साल गोंडा से पहला लोकसभा चुनाव जीता.
बृजभूषण शरण सिंह
● 66 वर्षीय बृजभूषण शरण सिंह उत्तर प्रदेश के गोंडा, बलरामपुर और कैसरगंज से छह बार के लोकसभा के सदस्य हैं
● 1985 में छात्र नेता के तौर पर शुरुआत, राम मंदिर आंदोलन में अपनी राजनैतिक ताकत का इजहार, बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपी, 2020 में बरी
● दिवंगत तेजतर्रार विहिप नेता अशोक सिंहल के करीबी, 1991 में भाजपा में शामिल, उसी साल गोंडा से पहला लोकसभा चुनाव जीता
● 1996 में टिकट न मिलने पर पत्नी केतकी देवी सिंह को गोंडा लोकसभा सीट से लड़वाया. वे जीतीं (उन पर माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम के गुर्गों को पनाह देने के लिए टाडा का मुकदमा चल रहा था. बाद में क्लीन-चिट मिली)
● 2009 में समाजवादी पार्टी में जा मिले, कैसरगंज से लोकसभा चुनाव जीते
● कथित तौर पर दिवंगत सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की मदद से 2011 में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बने
● ठाकुर जाति के सिंह के 54 शिक्षा संस्थान हैं, जो अयोध्या-गोंडा हाइवे के 100 किमी. के दायरे में फैले हुए हैं. उनमें करीब 80,000 छात्र पढ़ते हैं
● गोंडा से 45 किमी दूर नवाबगंज में सिंह का एक होटल, शूटिंग रेंज और कुश्ती अकादमी है
● पत्नी केतकी सिंह फिलहाल गोंडा जिला पंचायत की अध्यक्ष और पुत्र प्रतीक भूषण सिंह गोंडा सदर से विधायक हैं
● एसयूवी के बेड़े और रॉबिनसन आर-66 टर्बाइन हेलिकॉप्टर के मालिक. हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव के हलफनामे के मुताबिक, सिंह के पास 4 करोड़ रु. से कुछ ज्यादा की चल-अचल संपत्ति है. उनकी पत्नी ने 6.3 करोड़ रु. की संपत्ति का ऐलान किया
● एक मौके पर सिंह के खिलाफ 40 से ज्यादा आपराधिक मुकदमे थे. हलफनामे के मुताबिक, सिर्फ चार लंबित हैं. इसमें हत्या की कोशिश, डकैती जैसे संगीन आरोप हैं
● îपिछले साल एक वीडियो इंटरव्यू में एक हत्या की बात कबूली भी. दूसरे वायरल वीडियो में दिसंबर 2021 में अंडर-15 राष्ट्रीय चैंपियनशिप में एक युवा पहलवान को थप्पड़ मारते दिखते हैं
● बतौर डब्ल्यूएफआइ मुखिया उन पर बार-बार यौन उत्पीड़न के कई आरोप लगे. दिल्ली पुलिस ऐसी सात शिकायतों की पड़ताल कर रही है. इसमें 14 खास वारदातों का जिक्र है, जिसमें पांच तो पिछले साल के ही हैं. उसमें कथित तौर पर उन्होंने महिला पहलवानों के साथ यौन दुर्व्यवहार किया या सेक्स की मांग की और वे नहीं मानीं तो गंभीर नतीजे भुगतने की धमकी दी.
'हमारा विश्वास वक्त पर पारदर्शी जांच में है’
महिला पहलवानों को उन्होंने आश्वस्त किया था कि 15 जून तक दिल्ली पुलिस चार्जशीट दाखिल करेगी, उसके कुछ देर बाद ठाकुर ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार के कदमों के बारे में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से बातचीत की. प्रमुख अंश:
केंद्रीय खेल, युवा मामले और सूचना-प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर के जिम्मे भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पदक विजेता महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपों के मामले को सुलझाने का मुश्किल काम है. उन्हें यह भी ख्याल रखना है कि इससे खेल पर ही कहीं आघात न लगे. महिला पहलवानों को उन्होंने आश्वस्त किया था कि 15 जून तक दिल्ली पुलिस चार्जशीट दाखिल करेगी, उसके कुछ देर बाद ठाकुर ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार के कदमों के बारे में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से बातचीत की. प्रमुख अंश:
● जनवरी से ही पहलवान डब्ल्यूएफआइ के मुखिया बृजभूषण शरण सिंह के कथित यौन उत्पीड़न के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. यह मुद्दा इतना लंबा क्यों खिंचा? क्यों उन्हें प्रदर्शन करने सड़कों पर उतना पड़ा?
मामले में पहले ही जांच चल रही है और सरकार ने पहले ही दिन से जरूरी कदम उठाए हैं. एक, उनके प्रदर्शन शुरू करने के एक दिन बाद 19 जनवरी को प्रदर्शनकारी एथलीटों के साथ मेरी बैठक हुई. दूसरे, उसके फौरन बाद मैरी कॉम की अगुआई में (निगरानी) कमेटी बनाई गई. तीसरे, रिपोर्ट मिलने के बाद हमने आइओए (भारतीय ओलंपिक संघ) से डब्ल्यूएफआइ की मौजूदा कमेटी की जगह रोजमर्रा के कामकाज के लिए अस्थाई कमेटी बनाने और जल्द नई कमेटी का पारदर्शी चुनाव कराने को कहा. चौथे, हमने (मैरी कॉम) कमेटी की रिपोर्ट दिल्ली पुलिस को आगे की जांच के लिए सौंपी, जिसके बाद एफआइआर दर्ज हुई और जांच जारी है.
● लेकिन क्या कार्रवाई इससे काफी जल्दी नहीं होनी चाहिए थी?
कई आरोप सात साल पहले हुई वारदात को लेकर हैं. एथलीट शिकायत लेकर पुलिस थाने में नहीं गए, बल्कि जंतर मंतर पर पहुंच गए. मैंने इसके लिए अपना दौरा रद्द कर दिया और उनसे कई घंटे तक मिला. यह संवेदनशील मामला है. हमने उनकी बात गौर से सुनी और उनकी मांग के मुताबिक (मैरी कॉम) कमेटी बनाने के लिए सही कदम उठाया. कमेटी काफी खुली थी और जो भी आया, हर किसी की सुनी गई. एक तरफ, कमेटी हर किसी को बिना सुने ताबड़तोड़ अपनी रिपोर्ट नहीं दे सकती थी, क्योंकि कई वारदातें सात साल पहले की थीं. दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस जांच कर रही है और जितना जरूरी है, उतना समय लगेगा.
● मैरी कॉम कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
यह संवेदनशील मामला है. हमें कुछ छुपाना नहीं है. मुद्दा सिर्फ यह था कि पुलिस आगे की जांच कर रही है तो उसे सार्वजनिक करना सही नहीं होता. पुलिस की जांच पूरी हो जाए तो इस पर अदालत को फैसला करने दीजिए.
● दूसरा आरोप यह है कि सिंह भाजपा के सांसद हैं, इसलिए मोदी सरकार उनको बचाने की कोशिश कर रही है. आपका क्या कहना है?
यह बड़ी नाजायज आलोचना है. हमें किसी को बचाने की जरूरत नहीं है, कानून अपना काम कर रहा है. कमेटी ने मामले को देखा, पुलिस भी जांच कर रही है और 15 जून तक चार्जशीट दाखिल करने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश देखिए—उसमें कहा गया कि दिल्ली पुलिस ने एफआइआर दर्ज कर ली है और अर्जी डालने वालों से कहा गया कि अगर इस बारे में कोई समस्या है तो उसे लेकर स्थानीय मजिस्ट्रेट के पास जाएं. मुझे औपचारिक तौर पर यह कहने दीजिए कि हम एकदम स्पष्ट हैं कि समयबद्ध तरीके से पारदर्शी जांच पूरी होनी चाहिए और चार्जशीट दाखिल की जानी चाहिए. आगे की कार्रवाई अदालत को तय करने दीजिए.
● हाल में आपकी खिलाड़ियों से लंबी बातचीत हुई. उनकी मांग क्या है और आपका जवाब क्या है?
उनकी कुछ मांगें थीं. वे चाहते थे कि चार्जशीट 15 तारीख तक दाखिल हो, हम राजी हो गए. वे चाहते थे कि कुश्ती महासंघ के चुनाव जल्दी से जल्दी हों, हमने कहा ठीक है. इसमें 21 दिन का वक्त लगता है और हम इसे 30 जून तक करने की कोशिश करेंगे. वे अपने लिए सुरक्षा चाहते थे, हमने कहा, हां, इस बारे में सरकार विचार कर सकती है.
उन्होंने कहा कि आंतरिक शिकायत समिति (आइसीसी) का गठन होना चाहिए, हमने कहा, हां, इसका गठन प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए. वे चाहते थे कि उनके खिलाफ मामले वापस ले लिए जाएं, हमने कहा, हां. उन्होंने कहा कि नई कार्यकारी समिति के गठन में पहलवानों से सलाह ली जानी चाहिए. हमने कहा कि जो भी मुकाबले में हैं, उनके साथ वे जुड़ें और अपने विचार उस पर बनाएं. यानी हम हर तरह के सुझाव के लिए खुले हुए हैं.
● उनकी इस मांग पर क्या राय है कि संबंधित सांसद इस बार चुनाव न लड़ें?
वे नहीं लड़ेंगे क्योंकि उनकी 12 साल के कार्यकाल की सीमा पूरी हो चुकी है और वे अब चुनाव के लिए अयोग्य हैं.
● डब्ल्यूएफआइ में आइसीसी नहीं है. दूसरे खेल संघों में क्या है?
कुश्ती महासंघ में भी है. उसके रिकॉर्ड के मुताबिक, साक्षी उसकी अगुआई कर रही थीं. हमने सभी महासंघों को कहा है कि आइसीसी होनी चाहिए—ज्यादातर में है और दूसरों में भी बन रही है.
● इस पूरे प्रकरण के क्या सबक हैं, क्योंकि लड़कियां विभिन्न खेलों में अब बड़ी संख्या में हिस्सेदारी कर रही हैं?
एक, यह नहीं होना चाहिए. दो, उन्हें अपने अधिकारों से बाखबर होना चाहिए और ऐसी वारदातों की बिना डरे फौरन रिपोर्ट करनी चाहिए.
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'दूसरों ने भी बोलने की कोशिश की, पर उन्होंने कीमत चुकाई’
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे कई पहलवानों में से एक ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक बता रही हैं कि विरोध प्रदर्शन के राजनीति से प्रेरित होने की अफवाहों का सच क्या है, खुलकर सामने आने में उन्हें इतना वक्त क्यों लगा, और खेल संघों में महिलाओं की नुमाइंदगी क्यों मायने रखती है.
● कुछ लोग पहलवानों के आरोपों पर शक कर रहे हैं और विरोध के पीछे मंशा पर सवाल उठा रहे हैं कि एक राजनैतिक पार्टी के इशारे पर ऐसा किया जा रहा है
न तो किसी पार्टी से हमारा कोई वास्ता है और न हमें किसी ने लुभाया है. विरोध का मकसद है कि बृजभूषण सिंह के खिलाफ आरोपों की जांच हो, भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआइ) ऐसे अधिकारी चलाएं जो खेल को साफ-सुथरा रखें, और लड़कियों व औरतों का शोषण न हो.
● दूसरा नैरेटिव यह घूम रहा है कि यह डब्ल्यूएफआइ पर कब्जे के लिए ठाकुर बनाम जाट लड़ाई है.
यह असली मुद्दे—यानी बृजभूषण शरण सिंह—से ध्यान भटकाने की रणनीति है. शुरुआत में उन्होंने कहा कि यह 'ठाकुर-जाट’ मुद्दा है, फिर यह 'हरियाणा बनाम यूपी’ बन गया, फिर नैरेटिव यह था कि 'कोई राजनैतिक पार्टी उनके पीछे खड़ी है’, और फिर यह कि 'वे सब (विरोध करने वाले) एक ही परिवार के हैं.’ यह हमारे विरोध को कमजोर करने का औजार है.
● खुलकर आने में इतना वक्त क्यों लगा? ट्रिगर क्या था?
अब जब सारे आरोप सामने आ चुके हैं और आप टालमटोल की चालाकियां देख सकते हैं, तो आपको एहसास होता है कि वह (बृजभूषण) राजनैतिक तौर पर कितना ताकतवर है. हमसे पहले दूसरे लोग भी थे जिन्होंने बोलने की कोशिश की, पर उन्होंने कीमत चुकाई. एक फिजियोथेरैपिस्ट ने 2014 में शिकायत करने की कोशिश की, पर उसका और प्रशिक्षण दे रही उसकी पत्नी का नाम काट दिया गया.
लोग पूछते हैं ''अब क्यों?’’ मैं मानती हूं कि हर चीज का सही वक्त होता है. 2022 की विश्व जूनियर चैंपियनशिप में भी लड़कियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं हुईं. हमने तय किया कि बस बहुत हुआ, अब हमें विरोध करना पड़ेगा. बजरंग (पूनिया) और विनेश (फोगाट) ने पिछले साल सीडब्ल्यूजी के मेडल जीतने के बाद गृह मंत्री अमित शाह से बात की, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.
दूसरे भी हैं, पर हमने इसलिए आवाज उठाई क्योंकि हम मानते हैं कि भगवान ने हमें बहुत सारा दिया और ऐसा करने के काबिल बनाया. करियर के मध्य में चल रहे या अभी शुरू ही कर रहे एथलीट हैं, जो डरते हैं कि इसके दुष्परिणाम होंगे.
● कुछ लोगों का कहना है कि विरोध कर रहे पहलवान सेलेक्शन ट्रायल में हिस्सा नहीं लेना चाहते और इसलिए सिंह की गिरफ्तारी चाहते हैं.
क्या आपको वाकई लगता है कि हममें से कोई भी ट्रायल के बिना प्रतिस्पर्धा में जा सकता है? दूसरे भी कड़ी मेहनत कर रहे हैं और जगह हासिल करने के लिए मुकाबले में उतरने का सभी को हक है. अपने कुश्ती के करियर में अभी तक मैं ट्रायल के बिना और नेशनल में खेले बिना कभी किसी मुकाबले में नहीं गई. अपने को बचाने के लिए वह (सिंह) कुछ भी बोलेगा.
● पॉक्सो के तहत की गई शिकायत हाल में वापस ले ली गई. क्या वह लड़की उस वक्त नाबालिग नहीं थी?
दबाव में बयान बदला. उसके पिता ने कहा कि वह नाबालिग थी और वे दबाव में हैं.
● क्या आपके संकल्प को तोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं?
हां. गलत खबरें फैलाई जा रही हैं कि विरोध वापस ले लिया गया है या मैंने या विनेश (फोगाट) ने पैर पीछे खींच लिए हैं. ये झूठी अफवाहें हैं जो इसलिए फैलाई जा रही हैं ताकि विरोध खत्म किया जा सके. बजरंग के पास छोड़ने के लिए फोन आए और (कहा गया कि) उसे जो चाहिए मिल जाएगा. मगर हम एकजुट हैं और लड़ाई जारी रखेंगे.
●भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं? क्या आप कोचिंग अपनाना चाहेंगी और पहलवानों के सुरक्षित जगह का निर्माण करेंगी?
इस बारे में सोचा नहीं. मेरा अखाड़ा है जहां मैं अगली पीढ़ी को सिखाना चाहूंगी. डब्ल्यूएफआइ से जुड़ने की योजना नहीं है. खेल संघों में महिलाओं की ज्यादा नुमाइंदगी होनी चाहिए ताकि महिला मुद्दे हल हो सकें.
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लंबा संघर्ष
इंसाफ के लिए पहलवानों के चुनौतीपूर्ण संघर्ष की तारीख-दर-तारीख
दिसं. 2022 पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआइ) की यौन उत्पीड़न समिति से संपर्क किया लेकिन जब यह एहसास हुआ कि उसके पांच में से चार सदस्य तो पुरुष हैं और डब्ल्यूएफआइ अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के सहयोगी हैं, उन्होंने विरोध को सड़क पर ले जाने का फैसला किया
18 जन., 2023 (बाएं से दाएं) विनेश फोगाट, संगीता फोगाट और साक्षी मलिक के साथ बजरंग पुनिया तथा दूसरे पहलवान बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न, पीछा करने, धमकी, सेक्स संपर्क की मांग, और वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप के साथ जंतर मंतर पहुंचे. उनकी मांग थी कि सिंह से इस्तीफा लिया जाए और डब्ल्यूएफआइ को भंग किया जाए. सिंह का कार्यकाल मार्च में खत्म हो रहा था
19 जन. पूर्व कुश्ती खिलाड़ी तथा भाजपा सदस्य बबीता फोगाट ने पहलवानों से भेंट की और उनकी ओर से मध्यस्थता का वादा किया, पहलवानों ने कहा कि वे किसी नेता का समर्थन नहीं चाहते. उसी शाम वे केंद्रीय खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से उनके आवास पर मिले. लेकिन कोई हल नहीं निकला
21 जन. उसके बाद फिर बैठक में ठाकुर ने कहा कि आरोपों की जांच के लिए एक निगरानी समिति (ओसी) बनाई जाएगी और जांच पूरी होने तक सिंह अपने पद से अलग रहेंगे. पहलवानों ने विरोध प्रदर्शन वापस ले लिया
28 अप्रैलः दिल्ली पुलिस ने आखिरकार सिंह के खिलाफ दो एफआइआर दर्ज कीं. एक, पॉक्सो कानून के तहत और दूसरी आइपीसी की धारा 354 ए (यौन संबंधित टिप्पणियां) और 354डी (पीछा करना) के तहत. डब्ल्यूएफआइ के सहायक सचिव विनोद तोमर भी बुक किए गए
27 अप्रैल भारतीय ओलंपिक संघ (आइओए) की अध्यक्ष पी.टी. उषा ने प्रदर्शन को ''घोर अनुशासनहीनता’’ बताया, जिससे देश का नाम बदनाम होता है
25 अप्रैल सर्वोच्च अदालत ने पहलवानों की अर्जी पर नोटिस जारी किया
24 अप्रैल खेल मंत्रालय ने ओसी रिपोर्ट के एक नतीजे का खुलासा किया कि डब्ल्यूएफआइ में यौन उत्पीड़न कानून के तहत अनिवार्य आइसीसी का गठन नहीं किया गया. इस बीच पहलवानों ने सिंह की गिरफ्तारी की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
23 अप्रैल शिकायतों पर कोई प्रगति और कार्रवाई न होने से नाराज पहलवान जंतर मंतर पर आ जुटे
21 अप्रैल सात महिला पहलवानों, जिनमें वारदात के वक्त एक नाबालिग थी, ने कनॉट प्लेस थाने में सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी की शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की. बकौल उनके, पुलिस ने एफआइआर दर्ज नहीं की. प्रदर्शनकारियों ने ओसी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की
5 अप्रैल ओसी ने खेल मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपी. कथित तौर पर पुलिस जांच की सिफारिश की गई
23 जन. मुक्केबाज मैरी कॉम ओसी की प्रधान बनाई गईं. ओलंपिक रजत पदक विजेता पहलवान तथा भाजपा नेता योगेश्वर दत्त पांच सदस्यों में एक थे. ओसी को जांच पूरी करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया गया. एक हफ्ते बाद खिलाड़ियों के आग्रह पर बबीता फोगाट को ओसी में शामिल किया गया
29 अप्रैल प्रगति के अभाव में निराश होकर पहलवानों ने राजनैतिक समर्थन आमंत्रित किया. प्रियंका गांधी वाड्रा धरना स्थल पर पहुंचीं और विनेश तथा साक्षी को ढांढस बंधाया. दिल्ली के मुक्चयमंत्री अरविंद केजरीवाल भी समर्थन जताने पहुंचे
12 मई आइओए ने अस्थाई समिति बनाई, जो अगले चुनाव तक डब्ल्यूएफआइ का कामकाज देखेगी. चुनाव की तिथि 6 जुलाई घोषित की गई
28 मई सिंह नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर पहुंचे तो पहलवानों ने उस ओर मार्च किया लेकिन दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया. पहलवानों के साथ हाथापाई और पटकने, जबरन उठाने का नजारा देख पूरा देश दंग रह गया. जंतर मंतर को खाली करा लिया गया और पहलवानों पर पुलिस का आदेश न मानने तथा महिला पुलिसवालों से हाथापाई करने के लिए एफआइआर दर्ज की गई
30 मई पहलवान गंगा में अपने पदक बहाने हरिद्वार पहुंचे. भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत भी पहुंचे और पहलवानों को ऐसा न करने के लिए मनाया. उन्होंने सरकार को कार्रवाई करने केलिए पांच दिन की अवधि का ऐलान किया
3 जून पहलवान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके आवास पर मिले
6 जून पॉक्सो की शिकायत वापस ली गई, और आइपीसी की धारा 164ए के तहत दोबारा बयान दर्ज किए गए. अब अदालत को तय करना है कि उसके आरोपों पर गौर किया जाए या नहीं
7 जूनअनुराग ठाकुर पहलवानों से मिले और आश्वासन दिया कि 15 जून तक आरोप-पत्र दाखिल हो जाएगा और सिंह के परिवार का कोई भी डब्ल्यूएफआइ के चुनाव में खड़ा नहीं होगा. अगले दिन पहलवानों ने अपना प्रदर्शन स्थगित कर दिया और रेलवे की अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली
11 जून आरोपों से बेपरवाह सिंह ने अपने कैसरगंज चुनाव क्षेत्र के हिस्से गोंडा में विशाल रोड शो किया और ऐलान किया कि वे अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे
15 जून दिल्ली पुलिस ने सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के लिए आइपीसी की धारा 354 (गैर-जमानती), 354ए, 354डी और 506 के तहत आरोप-पत्र दाखिल किया. पॉस्को मामले में रद्दगी की रिपोर्ट दायर की गई.

