दिसंबर 2021 की 29 तारीख. उस दिन नागपुर की 31 वर्षीया मनोचिकित्सक सुरभि मित्रा और 27 वर्षीया ऑपरेशंस एग्जीक्यूटिव परोमिता मुखर्जी ने जिंदगी बदल देने वाले सफर पर निकलना तय किया. वे मैचिंग लेदर जैकेट पहनकर बाइक पर सवार हुईं और शहर के बाहरी छोर पर बने होटल वाइल्डरनेस्ट के लिए रवाना हो गईं. आसमान में तैरती कंदीलें थीं, मेन्यू में मुखर्जी का पंसदीदा खाना व्हाइट सॉस पास्ता था, और पृष्ठभूमि में युगल के चुने हुए गाने—दुआ लिपा का 'लैविटेटिंग’ और कोल्डप्ले का 'समथिंग जस्ट लाइक दिस’—बज रहे थे.
दो साल की डेटिंग के बाद दोनों मोहतरमा को आखिरकार एहसास हुआ कि ''रिंग कमिटमेंट सेरेमनी’’ का एकदम सही वक्त आ गया है. उनके दोस्त और सहकर्मी भी इस खास दिन उनके साथ शामिल हुए. मुखर्जी के माता-पिता की गैर-हाजिरी की भरपाई मित्रा के पिता की मौजूदगी ने कर दी. अगले हफ्ते समारोह की तस्वीरें वायरल हो गईं. लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में मित्रा कहती हैं, ''हमें धीरे-धीरे एहसास हुआ कि इस दुनिया में नफरत उतनी नहीं, जितनी हमने मान ली थी.’’
दोनों अब बीच वेडिंग यानी समुद्र तट पर शादी का सपना देख रही हैं और उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इसे वैधता प्रदान कर देगा. कानूनी मान्यता इस युगल के लिए बहुत अहम होगी और शायद यह मुखर्जी के माता-पिता की मंजूरी भी दिला दे. इसी से प्रेरित होकर वे इंटीग्रटेड नेटवर्क ऑफ सेक्सुअल माइनॉरिटीज (आइएनएफओएसईएम) और चार अन्य से जुड़ गईं, ताकि अप्रैल के पहले हफ्ते में समलिंगी विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकें.
यह महज माता-पिता या समाज की स्वीकृति की जरूरत ही नहीं है जिसकी वजह से बीते चार साल में देश के दो हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में समलिंगी शादी को मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं की बाढ़ आ गई. उनका कहना है कि मान्यता नहीं मिलना भारतीय नागरिक के तौर पर उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है और उनकी क्षमता को बाधित करता है जिसे जाने-माने विधिवेत्ता अभिषेक मनु सिंघवी ''सिविक, सेक्यूलर इरिटेंट’’ या चिढ़ पैदा करने वाली चीजें कहते हैं, जो बीमे का फॉर्म भरने या निवास का प्रमाणपत्र पेश करने जैसी बुनियादी जरूरतें हो सकती हैं.
मसलन, जब राष्ट्रीय चैंपियन धाविका 27 वर्षीया दुत्ती चंद अपनी जोड़ीदार 23 वर्षीया मोनालिसा दास को भुवनेश्वर के अस्पताल में लेकर गईं, तो जीवन-साथी के रूप में कागजों पर दस्तखत न कर सकीं. वे कहती हैं, ''डॉक्टर मुझसे पूछते रहे कि मैं उसकी कौन हूं.’’ चंद ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद खुलकर सामने आने का साहस दिखाया था, जिसमें समान लिंग के सहमत वयस्कों के बीच यौन संबंधों को गैर-आपराधिक बना दिया गया और भारतीय दंड संहिता में औपनिवैशिक काल से चली आ रही धारा 377 को कमजोर कर दिया था.
समान लिंग वाली जोड़ियों की बराबरी की खोज को ताकत तब मिली जब 25 नवंबर, 2022 को शीर्ष अदालत ने उन दो याचिकाओं पर गौर किया जिनमें विशेष विवाह अधिनियम (एसएमए) 1954 के प्रावधानों में एलजीबीटीआइक्यूए+ जोड़ियों (महिला समलैंगिक, पुरुष समलैंगिक, उभयलिंगी, ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स, क्वीर, अलैंगिक और अन्य) को भी शामिल करने की मांग की गई थी.
एक याचिका हैदराबाद के 33 वर्षीय इवेंट मैनेजर सुप्रियो चक्रबर्ती और उनके आइटी पेशेवर जोड़ीदारी 36 वर्षीय अभय डांग ने, और दूसरी दिल्ली के एक प्रकाशन घराने में एडिटर 36 वर्षीय पार्थ फिरोज मल्होत्रा और 35 वर्षीय कारोबारी उदय राज आनंद ने दाखिल की थी. विशेष विवाह कानून उन जोड़ों को नागरिक या पंजीकृत रिश्ते में बंधने में समर्थ बनाने के लिए लाया गया था जो अपने-अपने पर्सनल लॉ के तहत शादी नहीं कर सकते. इसने सामाजिक और धार्मिक संहिताओं के दायरे से बाहर खड़े अंतरधार्मिक और अंतरजाति जोड़ों के लिए विवाह करना आसान बना दिया.
समान लिंग वाली जोड़ियों की तरफ से दाखिल मौजूदा याचिका कहती है कि एसएमए अपने मौजूदा स्वरूप में बराबरी के अधिकार और जीवन व स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े संविधान के अनुच्छेद क्रमश: 14 और 21 का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह समान लिंग वाले जोड़ों और विपरीत लिंग वाले जोड़ों के बीच भेदभाव करता है और समान लिंग वाले जोड़ों को कानूनी अधिकारों और विवाह से उत्पन्न सामाजिक मान्यता और दर्जे से वंचित करता है.
तकरीबन सभी याचिकाओं में एसएमए और भारत से बाहर पंजीकृत शादियों या विदेशियों के साथ भारतीय नागरिकों के विवाह पर लागू होने वाले विदेशी विवाह अधिनियम (एफएमए) 1969 सरीखे कानूनों को चुनौती देते हुए एक ही तर्ज पर दलीलें दी गईं. हालांकि एक याचिका में हिंदू विवाह कानून 1955 में संशोधन की मांग भी की गई है.
इस मामले में पैरवी कर रहे वकील सिंघवी कहते हैं, ''हमारी दलील के दो हिस्से हैं. एक यह कि एसएमए और एफएमए में 'व्यक्ति’ या 'जीवनसाथी’ के रूप में 'पुरुष’, 'महिला’, 'विधवा’ और 'विधुर’ सरीखे लिंग-विशिष्ट शब्द जोड़कर समान-लिंग विवाह को शामिल करने के लिए इन कानूनों की संविधान का पालन करने वाले तरीकों से व्याख्या की जाए. और यह कि एसएमए के तहत नोटिस और आपत्तियों की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किया जाए.’’
इस याचिका के साथ ही विभिन्न हाइकोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं पर ध्यान देते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ की अगुआई में पीठ पहले समान-लिंग विवाह से जुड़ी तमाम याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ले आई. फिर पांच जजों की संविधान पीठ गठित कर दी, जिसमें उनके अलावा न्यायमूर्ति एस.के. कौल, एस. रवींद्र भट्ट, पी.एस. नरसिंह और हिमा कोहली हैं.
18 अप्रैल से सुनवाई भी शुरू कर दी. हालांकि सुनवाई में शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि वह विवाह पर लागू होने वाले निजी और धार्मिक कानूनों में नहीं जाएगी और उसने वकीलों से दलीलें एसएमए तक सीमित रखने को कहा. सीजेआइ ने कहा कि अदालत आम राय बनाने और ''समान भविष्य’’ की तरफ बढ़ने के लिए ''संवाद की भूमिका’’ अदा कर रही है.
समान विवाह
यह समान भविष्य याचिकाकर्ता चक्रबर्ती और डांग के लिए अहम है. सिर्फ इसलिए नहीं कि वे डर या शर्म के बिना अपनी यौन उन्मुखता का खुलेआम ऐलान कर सकें—वे अपने-अपने माता-पिता की मंजूरी से शादी तो कर ही चुके हैं—बल्कि इसलिए भी कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में मान्यता और गरिमा हासिल कर सकें. कानून विवाहित विषम-लिंगी जोड़ों को कई अधिकार, विशेषाधिकार और दायित्व सौंपता और उनकी रक्षा करता है, चाहे वे उत्तराधिकार, भरण-पोषण और कर लाभ के अपने आप मिलने वाले अधिकार हों या बच्चों को गोद लेने का अधिकार. विवाहित जोड़ों को निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े कई विशेषाधिकार भी हासिल हैं.
मगर चक्रबर्ती और डांग को ये अधिकार हासिल नहीं हैं, जिससे उनकी जिंदगी के तकरीबन हर पहलू पर असर पड़ता है. मसलन, डांग शहर में एक घर के मालिक हैं, पर चक्रबर्ती निवास के प्रमाण के तौर पर अपने लिए उनके पते का इस्तेमाल नहीं कर सकते, जबकि विषम-लिंगी विवाहित जोड़ों को यह विशेषाधिकार सहज ही दिया गया है, जिसमें पति या पत्नी दूसरे के पते का इस्तेमाल निवास के प्रमाण के तौर पर कर सकता या कर सकती है.
यही दिक्कत तब भी आती है जब चक्रबर्ती और डांग निवेश करना चाहते हैं. दोनों के उत्तराधिकार में एक दूसरे की संपत्तियां प्राप्त करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है. लेखक, होटल कारोबारी और वास्तुकला बहाल करने वाले अमन नाथ कहते हैं, ''अगर दो लोग अपनी जिंदगी साझा करना चाहते हैं, अपनी यौन या अन्य पसंद के किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति वसीयत करना चाहते हैं, तो इसमें परिवार के बाकी सदस्यों की दिलचस्पी भला क्यों होनी चाहिए?
उस व्यक्ति को कानूनी मान्यता कैसे दी जाए, यह महज तकनीकी मुद्दा भर है जिसे एक प्रगतिशील राष्ट्र के नागरिकों को निरे पाखंड में रहने के लिए मजबूर करने के बजाए हमारी विद्वान अदालतें सुलझा सकती हैं.’’ नाथ 2018 के उस मामले में वादी थे जिसने सहमत वयस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को गैर-आपराधिक करार दिया था. दुनिया के 34 देशों ने समान-लिंग विवाह को मान्यता दी है (देखें ग्राफिक).
समान लिंग वाले जोड़े जिन प्रमुख अधिकारों की मांग रहे हैं, उनमें एक बच्चा गोद लेने और परिवार के अंग के रूप में उसका लालन-पालन करने का अधिकार है. मौजूदा नियम एक साथी को एकल माता-पिता के रूप में बच्चे को गोद लेने की इजाजत देते हैं, पर दूसरे साथी को बच्चे पर कोई कानूनी अधिकार रखने की इजाजत नहीं देते.
पिछले साल सरकार ने इस अधिकार में भी कटौती कर दी, जब 16 जुलाई, 2022 को एक सरकारी आदेश के जरिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) ने तय किया कि किसी साथी के साथ लिव-इन रिश्ते में रह रहे संभावित गोद लेने वाले एकल माता-पिता को बच्चा गोद लेने के योग्य नहीं माना जाएगा.
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी समान लिंग वाले जोड़ों के बच्चा गोद लेने का विरोध करते हुए शीर्ष अदालत में कहा कि ''समान लिंग वाले जोड़ों को बच्चा गोद लेने देना बच्चों को खतरे में डालने के बराबर है.’’ उसका कहना है कि समलिंगी माता-पिता को पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं के प्रतिमानों का सीमित अनुभव हो सकता है, जिससे बच्चे का अनुभव भी सीमित हो सकता है और उनके व्यक्तित्व के समग्र विकास को प्रभावित कर सकता है.
यहां तक कि हिमाचल के कांगड़ा जिले की छोटी-सी वनवासी बस्ती चौकी में भी सोशल मीडिया कंटेंट ऑपरेटर 34 वर्षीय प्रदीप राणा और जनसंपर्क अधिकारी 32 वर्षीय सुमित्रो सरकार आस लगाए बैठे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधिपति समान-लिंग विवाह को हरी झंडी दिखाएंगे. विवाह से कहीं ज्यादा इससे दोनों को बच्चा गोद लेने का सपना पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है. राणा की मां उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं. वे कहते हैं, ''मां कहती हैं कि 'पता नहीं मैं कितने दिन जिंदा रहूं’, वे चाहती हैं कि हम जल्द से जल्द गोद लें ताकि वे अपने पोते-पोती के साथ खेल सकें.’’
समान-लिंग विवाह के लिए वैधता की मांग करके याचिकाकर्ता दरअसल चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट 2018 के अपने उस फैसले से आगे बढ़े, जिसमें उसने समान लिंग वालों के बीच रिश्तों को अपराध के दायर से बाहर निकाल दिया, और कहा था कि एलजीबीटीआइक्यूए+ समुदाय तमाम दूसरे लोगों की तरह साथी की पसंद सहित संवैधानिक अधिकारों की पूरी शृंखला का हकदार है. सिंघवी कहते हैं, ''संविधान का पालन करने वाली व्याख्या इसलिए जरूरी है क्योंकि मौजूदा व्याख्या पक्षपातपूर्ण तरीके से वर्जनात्मक है. समान लिंग वाले जोड़ों को यौन उन्मुखता के कारण अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, जबकि उनकी यौन उन्मुखता उन्हें प्राप्त ऐसी मूल विशेषता है जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है.’’
कानूनी बाधा वैवाहिक वैधता की तलाश कर रहे समलैंगिक जोड़ों की राह में आने वाली कई बाधाओं में पहली है. राजनैतिक तबके और समाज के कुछ हिस्से भी इसका विरोध कर रहे हैं.
गैर-वाजिब सियासत
भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली केंद्र सरकार समलिंगी विवाह को कानूनी मान्यता के विचार के ही खिलाफ है, इस मुद्दे पर सर्वोच्च अदालत में सुनवाई का मौका देने को भी तैयार नहीं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी अलग-अलग मौकों पर इन याचिकाओं की सुनवाई के लिए सर्वोच्च अदालत के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए. उनकी दलील थी कि कानून बनाना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार क्षेत्र है.
इस मामले में अक्सर पार्टी लाइन भी धुंधली हो जाती है. बीजू जनता दल के राज्यसभा सदस्य तथा वकील सस्मित पात्रा ने कोर्ट में कहा कि ऐसे मामले पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र सिर्फ संसद का होना चाहिए, जिसका असर व्यापक हो. उन्होंने बताया, ''42 कानूनों पर फर्क पड़ेगा, लिहाजा 182 संशोधनों की दरकार होगी, जो 19 मंत्रालयों से संबंधित हैं.’’ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत बेहद पेचीदा मसले में हाथ डाल रही है, जिसके भारी सामाजिक असर हो सकते हैं.
उनकी दलील थी कि इस मामले पर कोई भी फैसला सिर्फ और सिर्फ समाज और लोगों को करना है और इसलिए इसे संसद पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह तय करे कि समलिंगी विवाह को मान्यता दी जानी चाहिए या नहीं, क्योंकि वही लोगों की सीधी प्रतिनिधि है. उन्होंने कहा, ''स्वीकार्यता समाज से निकलनी चाहिए.’’ कांग्रेस शासित राजस्थान सरकार ने भी अदालत में समलिंगी शादी का विरोध किया है.
समलिंगी विवाह पर केंद्र सरकार के बुनियादी विरोध का आधार यह है कि देश में भारतीय परिवार को सिर्फ और सिर्फ एक जैविक पुरुष और महिला के मिलन से तैयार इकाई के रूप में देखा जाता है. उसने अपनी याचिका में कहा है कि ''भारतीय विधि और पर्सनल लॉ व्यवस्था में विवाह की वैधानिक समझ’’ में सिर्फ जैविक पुरुष और महिला के बीच विवाह का ही जिक्र है, और इसमें किसी तरह की दखल ''देश में पर्सनल लॉ के नाजुक संतुलन और स्वीकृत सामाजिक मूल्यों में उथल-पुथल का कारण बनेगा.’’
सरकार की दलील थी कि विषम लिंगी विवाह ''राज्य के अस्तित्व और विकास की बुनियाद है.’’ इसलिए उसने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि ''वैधानिक मान्यता सिर्फ विषम लिंगी लोगों के विवाह तक ही सीमित रखने में राज्य का वाजिब हित है.’’ उसने समलिंगी संबंध को विषम लिंगी विवाह के बराबर रखने से इनकार किया और कहा कि दंपती की तरह साथ रह रहे समलिंगी लोगों का दर्जा भारतीय पारिवारिक इकाई जैसा नहीं है, जिसमें पुरुष, महिला और उनके बच्चों की इकाई होती है.
केंद्र सरकार ने एसएमए को लिंग-तटस्थ बनाने की मांग को भी खारिज कर दिया है. मेहता ने तर्क दिया है कि ऐसा करने से कई प्रशासनिक पेचीदगियां पैदा होंगी. मसलन, एसएमए के तहत, पति अगर किसी और से बलात्कार करने का दोषी पाया जाता है तो पत्नी को गुजारा भत्ता का दावा करने या तलाक की मांग करने का अधिकार है.
फिर, पत्नी को अधिकार है कि वह सुविधानुसार किसी भी अदालत में तलाक की याचिका दायर कर सकती है, न कि पति. इसलिए कहा गया कि अगर कानून लिंग-तटस्थ हो जाए, तो ऐसे लिंग-विशिष्ट अधिकार समाप्त हो सकते हैं. सरकार की दलील है कि शादियां आइपीसी, गोद लेने और विरासत जैसे कानूनों से भी जुड़ी हुई हैं. अगर समलिंगी विवाहों को इन संबंधित कानूनों को समायोजित किए बिना मान्यता दी जाती है, तो अराजकता फैल जाएगी.
सामाजिक दबाव
समलिंगी पार्टनरों के लिए वैवाहिक दंपती जैसे अधिकारों का विरोध कानूनी बिरादरी के साथ-साथ राजनैतिक और सामाजिक तबकों से भी उठा है. बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 23 अप्रैल को एक अप्रत्याशित बयान में सरकार की दलील की ही गूंज दिखी. उसमें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को बेमानी बताया गया और कहा गया कि बुनियादी सामाजिक संरचना में कोई भी फेरबदल विधायिका की प्रक्रिया से ही होनी चाहिए.
शीर्ष बार निकाय के बयान में कहा गया, ''शादी की बेहद बुनियादी अवधारणा से छेड़छाड़ विनाशकारी होगा.’’ मार्च में हाइकोर्टों के 21 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट को एक खुला पत्र लिखा कि समलिंगी विवाह की अनुमति देने से ''बच्चों, परिवार और समाज पर विनाशकारी असर’’ पड़ेगा. न्यायाधीशों ने कहा कि इससे एचआइवी-एड्स बढ़ सकता है और ''समलिंगी दंपतियों के तहत पले-बढ़े बच्चों के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक विकास पर असर पड़ेगा.’’
सत्तारूढ़ भाजपा के मूल वैचारिक संगठन आरएसएस ने भी समलिंगी विवाहों को वैध बनाने के संबंध में एक रेखा खींची है, हालांकि अतीत में उसके नेतृत्व ने समलैंगिक संबंधों पर मुहर लगाई थी. आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले कहते हैं, ''आप किसी के भी साथ रह सकते हैं, लेकिन हिंदू दर्शन में विवाह एक संस्कार है. यह सिर्फ आनंद का साधन नहीं है, न ही यह कोई करार है...इस संस्था में कुछ सुधार की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन विवाह हमेशा एक पुरुष और एक महिला के बीच होगा.’’
पौराणिक कथाकार देवदत्त पटनायक हिंदू दर्शन की इस संकीर्ण व्याक्चया से असहमत हैं और याद दिलाते हैं कि आज की अमान्य प्रथाओं को अतीत में स्वीकार्यता प्राप्त थी. वे कहते हैं, ''हिंदू पौराणिक कथाओं में विविध संबंधों का बखान है. वहां हर के लिए जगह है, बशर्ते यह धर्म यानी करुणा, पारस्परिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पर आधारित हो.’’
सरकार और आरएसएस को इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा वकील कपिल सिब्बल के रूप में एक अप्रत्याशित सहयोगी मिल गया है, जो इस मुद्दे पर जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से अदालत में खड़े हैं. जमीयत ने अदालत में समलिंगी विवाह का कड़ा विरोध किया क्योंकि ''इस्लामी मजहब की शुरुआत से ही इस्लाम में समलैंगिकता वर्जित रही है.’’
सिब्बल ने कहा कि विवाह संस्था को ''सामाजिक मानकों और नैतिकता’’ में निहित ''रीति-रिवाज के जैविक विकास’’ की तरह देखा जाना चाहिए. उनकी दलील थी कि विषम-लिंगी जोड़ों का विवाह समय की कसौटी पर खरा उतरा है क्योंकि इसे तीन स्तरों—व्यक्तियों, परिवार और समाज की स्वीकृति मिली है. सिब्बल ने अदालत से कहा, ''समलिंगी संबंधों को विषम-लिंगी संबंधों के बराबर रखते हैं, तो उन सभी पहलुओं की जरूरत है जो विषम-लिंगी संबंधों से जुड़े हैं.’’
सरकार ने समलिंगी विवाहों के कई संबंधित मुद्दों जैसे समलैंगिक जोड़े की देखरेख में पले-बढ़े बच्चे का मनोविज्ञान पर असर के बारे में भी आगाह किया है. दरअसल, इसमें सबसे विवादास्पद मुद्दों में एक समलैंगिक जोड़ों का बच्चों को गोद लेने का अधिकार है.
समलैंगिक विवाह को वैध बनाने के खिलाफ सबसे मजबूत तर्क यह है कि समलिंगी जोड़े बच्चे पैदा नहीं कर सकते हैं. मध्य प्रदेश भाजपा सरकार के वकील राकेश द्विवेदी कहते हैं, ''संतान उत्पति के मामले में संयम की वजह से कई देशों में उम्रदराज आबादी बढ़ गई है, जो उन देशों के वजूद के लिए गंभीर समस्या बन गई है. संतानोत्पत्ति के उद्देश्य के बिना विवाह से राष्ट्र की मृत्यु हो जाएगी.’’
लेकिन याचिकाकर्ता इस धारणा का खुलकर विरोध करते हैं. उन्हें देश के प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य समूह इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (आइपीएस) की दलील से बल मिला है. आइपीएस का तर्क है कि समलिंगी परिवार इकाइयों को कानूनी अनुमति से समाज में उनकी मान्यता में इजाफा होगा. यही नहीं, दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) ने भी समलिंगी विवाह और समलैंगिक जोड़ों द्वारा गोद लेने का समर्थन किया है. कहा गया है कि ऐसा कोई अनुभवजन्य डेटा नहीं है कि समलिंगी जोड़े माता-पिता बनने के अयोग्य हैं, या बच्चों के मनोसामाजिक विकास में कोई फर्क पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट के पाले में गेंद
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब इन विरोधाभासी दलीलों और नजरियों पर फैसला सुनाने का असंभव-सा कार्य है. सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह मामले में ''प्रगतिशील कैनवास’’ पर आगे बढ़ रही है. हालांकि सिब्बल ने कहा है कि अदालत को हर आयाम पर विचार करना चाहिए या किसी पर भी नहीं करना चाहिए, इस मुद्दे पर ''टुकड़े-टुकड़े’’ पर विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है.
याचिकाकर्ताओं की वकील मेनका गुरुस्वामी और अरुंधति काटजू ने भी यह कहा कि पूर्ण विवाह से कम कुछ भी उन्हें व्यक्तिगत भेदभाव के मामलों में बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर करेगा क्योंकि अधिकांश ''कानूनी अधिकार रक्त संबंधों और पूर्ण विवाह से ही मिलते हैं.’’
हालांकि, अदालत नहीं चाहती कि आरपार की राह पर चला जाए. प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि सुनवाई का दायरा ''दीवानी संबंध’’ की धारणा विकसित करने तक सीमित रहेगा, जिसे एसएमए के तहत कानूनी मान्यता मिले और भविष्य में इसकी व्यापक स्वीकृति का काम विधायिका और समाज पर छोड़ दिया जाना चाहिए.
दरअसल, अदालत ने सुझाव दिया कि समलिंगी संबंधों को ''विवाह’’ के बजाए ''अनुबंध’’ और ''साझेदारी’’ कहा जाए. ''दीवानी संबंध’’ ऐसी कानूनी स्थिति है जिसके तहत समलिंगी जोड़ों को कुछ खास अधिकारों और दायित्वों की अनुमति दी जाए, जो आम तौर पर विवाहित दंपती को होती है. अमूमन कुछ अपवादों के साथ, दीवानी संबंधों को उसी तरह के लाभ और सुरक्षा दी जा सकती है जैसा विवाह में होता है.
कोर्ट ने कहा कि समलिंगी विवाहों के प्रश्न ऌको अलग नहीं माना जा सकता है क्योंकि इससे तमाम तरह के पहलू जुड़े हैं. यह भी कहा कि वह सरकार को प्रशासनिक कदम उठाने के लिए ''माकूल’’ स्थिति पैदा करनी चाहती है, ताकि वह समलिंगी जोड़ों के रोजमर्रा की मानवीय दिक्कत दूर करने के लिए ''बाधाएं’’ हटा सके.
जवाब में, केंद्र ने 3 मई को शीर्ष अदालत को बताया कि वह कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करेगी, जो समलिंगी जोड़ों को वैवाहिक संबंधों जैसी मान्यता दिए बगैर उनके ''मानवीय सरोकारों’’ पर विचार करेगी. लेकिन गुरुस्वामी ने जब कहा कि पेंशन और भविष्य निधि जैसे मदों में विवाह अनिवार्य है, तो मेहता ने पलटकर जवाब दिया कि प्रावधान में थोड़े से बदलाव से इस मुद्दे को हल किया जा सकता है. जैसे नामांकित के रूप में रिटायर होने वाला परिवार के किसी सदस्य या किसी को चुन सकता है. उन्होंने कहा, ''कई बार समाधान समस्याओं से आसान होता है.’’
हालांकि, ऐसे सरल समाधान तक पहुंचने के लिए लोकतंत्र के तीनों स्तंभों-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका-में समस्या की एक जैसी समझ की दरकार है. सौभाग्य से, न्यायपालिका और केंद्र के बीच टकराव जैसा शुरू हुआ मसला अब मध्य-मार्ग तलाशने की ओर बढ़ रहा है. यह ऐतिहासिक परिवर्तन की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम होगा. एक याचिकाकर्ता 34 वर्षीय वकील उदित सूद कहते हैं, ''सबसे अहम यह कहना है कि हम कमतर नहीं हैं, हमारा प्यार कम मूल्यवान नहीं है. यही ऐलान हम चाहते हैं.’’ अब संतुलित समाधान निकालने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की है.
केस स्टडी
''ऐसी कई सारी चीजें हैं जो हम कानूनी तौर पर एक साथ कर ही नहीं सकते’’
अदिति आनंद 40 वर्ष, फिल्मकार और आंत्रेप्रेन्योर
सूजन डायस 35 वर्ष, आंत्रेप्रेन्योर और डायरेक्टर, नेटिव ब्रूज
(अदिति और सूजन गुड़गांव में रहती हैं)
अदिति और सूजन ने प्रेम, साहचर्य, बराबरी और एक प्यारे-से कुत्ते के साथ अपनी एक दुनिया रची है. अब इसमें ढाई साल का एक बेटा और जुड़ गया है. पर कई सारी चीजें वे साथ-साथ नहीं कर सकते. मसलन, बेटे का कानूनी अभिभावक होना. दूसरे युगलों की तरह उनमें से भी एक ने सिंगल पैरेंट की तरह बेटे को गोद लिया था. पर अब इसे पिछले साल भारत के सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (सीएआरए) की ओर से जारी प्रतिमानों का उल्लंघन माना जा रहा है. इसके तहत दो अविवाहित व्यक्ति, उनका लैंगिक रुझान जो भी हो, सिंगल पैरेंट के रूप में बच्चा गोद नहीं ले सकते. इन्हीं वजहों के चलते युगल ने याचिका दायर करने का फैसला किया. उन्हीं के शब्दों में, ''हम नहीं चाहते कि बड़ा होने पर बेटे को किसी तरह की शर्मिंदगी का सामना करना पड़े.’’
हम नहीं चाहते कि बड़ा होने पर हमारे बेटे को किसी तरह की शर्मिंदगी झेलनी पड़े. हम उसे पूरी गरिमा और सम्मान के साथ पालना चाहते हैं
''हमें बदहाल छोड़ दिया गया था’’
वैभव जैन 36 वर्ष, नेशनल आउटरीच डायरेक्टर, एएपीआइ विक्ट्री फंड
पराग विजय मेहता 46 वर्ष, मैनेजिंग डायरेक्टर, जेपी मॉर्गन चेज ऐंड कंपनी
वैभव और पराग ने कानूनी तौर पर 2017 में अमेरिका में शादी कर ली. वैभव भारतीय नागरिक हैं जबकि पराग का दर्जा ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया का है. फिर भी उनकी शादी का भारत में रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया. पराग के मुताबिक, ''न्यूयॉर्क में भारतीय वाणिज्य दूतावास के एक अफसर ने माना कि हमारे समलैंगिक युगल होने की वजह से ऐसा हो रहा है.’’
विदेशी विवाह कानून, 1969 के तहत विदेशों में कानूनी तौर पर शादी करने वालों को भारत में भी मान्यता देनी होती है. इसके बावजूद यह नहीं हो रहा. पराग बताते हैं, ''हमारी दो महीने की एक बिटिया है. हम एक बेटा गोद लेने वाले थे...पर कानूनी संरक्षण के बिना हम सब पूरी तरह असुरक्षित हैं.’’ तभी 2020 में उन्होंने दिल्ली हाइकोर्ट का रुख किया.
वैभव ने बचपन में स्कूल में और रिश्तेदारों की भी ज्यादतियां सहीं. अब वे भारत में एलजीबीटीक्यूआइए+समुदाय की मदद कर रहे आंदोलन का हिस्सा बनना चाहते हैं. पराग कहते हैं, ''सरकार को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे कि यहां के लाखों-करोड़ों लोग विवाह और परिवार जैसी मूलभूत संस्थाओं से वंचित हो जाएं. ऐसी संस्थाएं जिनका हम सब मिलकर आनंद लेते हैं. उसका जश्न मनाते हैं.’’
जब आप अपने देश से प्यार करते हैं तो वह देशभक्ति कहलाता है. जब आपका देश आपको प्यार करता है तो वह न्याय कहलाता है. हम थोड़े-से और न्याय और उससे कहीं अधिक प्यार की उम्मीद लगाए बैठे हैं
पराग विजय मेहता
नजरिया किरण रिजिजू
केंद्रीय कानून मंत्री. समलैंगिक विवाह को मान्यता देने संबंधी याचिका की सुनवाई करती सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ पर
''अगर पांच प्रबुद्ध प्राणी किसी चीज के बारे में तय करते हैं कि उनके हिसाब से वह ठीक है तो मैं उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं कर सकता. लेकिन लोग अगर उसे नहीं चाहते तो आप उन पर उसको जबरदस्ती थोप थोड़े ही सकते हैं’’
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का हलफनामा
''भारतीय संविधान और पर्सनल लॉ वाली व्यवस्थाओं में विवाह को लेकर जो कानूनी समझ बनती है, उसके तहत एक जैविक पुरुष और जैविक स्त्री के बीच विवाह को विवाह कहा जाता है. इस व्यवस्था में अगर किसी तरह की छेड़छाड़ की गई तो देश में कई किस्म के पर्सनल लॉ और स्वीकार्य सामाजिक मूल्यों के बीच जो एक नाजुक संतुलन है वह पूरी तरह से तहस-नहस हो जाएगा’’
'हमें अभी भी एक परिवार नहीं माना जाता’
श्रीधर रंगायन, 61 वर्ष, फिल्ममेकर
सागर गुप्ता, 54 वर्ष, लेखक-निर्देशक
श्रीधर और सागर 1994 से ही मुंबई में साथ-साथ रह रहे हैं
श्री धर और सागर के लिए 13 अप्रैल को इंडिया नेटवर्क फॉर सेक्सुअल माइनॉरिटीज (इन्फोसेम) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में शामिल होना एक निर्णायक कदम था. इसका फैसला उन्हें कठोर अनुभव के बाद लेना पड़ा था. लगभग तीन दशक तक साथ रहने के बाद भी जब बात स्वास्थ्य से जुड़े मामलों की आती, वे एक दूसरे के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकते. श्रीधर कहते हैं, ''अगर मैं और सागर बीमार पड़ जाते हैं, तो हम अस्पतालों में उन दस्तावेजों पर दस्तखत नहीं कर पाते हैं जिसमें एक व्यक्ति दूसरे के लिए जिम्मेवारी लेता है.’’
वे जोड़ते हैं, ''सागर इतने सालों से मेरे पार्टनर हैं, लेकिन उन्हें परिवार का सदस्य नहीं कहा जा सकता. मेरे लिए आज की तारीख में उनका दर्जा सिर्फ एक रूममेट का है.’’ यहां तक कि मुंबई में किराए पर एक घर लेना भी दोनों के लिए आसान नहीं रहा है. लोगों की आम धारणा यही रहती है कि वे दोनों ''कुंवारे’’ हैं और रहने के लिए घर तलाश रहे हैं. दोनों जॉइंट बैंक अकाउंट नहीं खोल सके पर उन्होंने एक प्रोडक्शन कंपनी सोलारिस पिक्चर्स शुरू की जो संयुक्त उद्यम बन गई. श्रीधर समलैंगिकों के बीच लोकप्रिय कशिश मुंबई इंटरनेशनल क्वीर फिल्म फेस्टिवल भी चलाते हैं.
लोग 2018 के फैसले से पहले भी कह रहे थे कि सांस्कृतिक ताना-बाना बिखर जाएगा. पर कुछ नहीं हुआ. इसी तरह से अगर हमें विवाह के अधिकार मिल जाते हैं तो भी दूसरों के लिए कुछ नहीं बदलने वाला --श्रीधर रंगायन
'मेरे माता-पिता फिक्रमंद थे’
सुरभि मित्रा, 31 वर्ष, मनोचिकित्सक (बाएं)
परोमिता मुखर्जी, 27 वर्ष, ऑपरेशंस एग्जीक्यूटिव
परोमिता कोलकाता से हैं और सुरभि नागपुर से. यह युगल फिलहाल नागपुर में ही सुरभि के पिता काजल के साथ रहता है
जब सुरभि और परोमिता ने दिसंबर 2021 में नागपुर में एक दूसरे को अंगूठियां पहनाकर सगाई की तो इस अवसर पर परिवार के जो एकमात्र सदस्य मौजूद थे वे थे सुरभि के पिता. उन्होंने अपनी बेटी के इस समलैंगिक रिश्ते को बहुत बाद में समर्थन दिया जब उन्हें अपनी बेटी के करियर पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर खासी चिंता होने लगी. सुरभि याद करती हैं, ''मेरे पिता इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोग उंगलियां उठाएंगे और कहेंगे कि जिस मनोचिकित्सक पर वे इतना विश्वास करते हैं, वह खुद एक मानसिक विकार की शिकार है. उन्हें डर था कि वे मुझे बदनाम करने की कोशिश करेंगे.’’
हालांकि उनके परिवारों ने अब रिश्ते को स्वीकार कर लिया है पर वे इस बात को लेकर परेशान हैं कि दोनों समाज का सामना कैसे करेंगे. परोमिता के माता-पिता यह मानते हैं कि दोनों तभी शादी के बंधन में बंधने का फैसला करें जब समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिल जाए. सुरभि कहती हैं, ''समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलने पर ही वे इसे एक शादी मानने को राजी होंगे.’’अप्रैल में सुरभि और परोमिता इन्फोसेम और मुंबई के ही दो अन्य जोड़ों के साथ समलैंगिकों के विवाह को मान्यता दिलाने के अभियान में शामिल हुए.
समलैंगिकता नहीं, समलैंगिकों से नफरत एक रोग है. पर इसका भी इलाज है: उचित तालीम, जानकारी और इस बारे में अच्छी जागरूकता-सुरभि मित्रा
''बैंक वालों ने जॉइंट अकाउंट खुलने न दिया’’
विश्व पल्लव श्रीवास्तव, 36 वर्ष, शिक्षक/शिक्षा प्रबंधक, गुड़गांव
विवेक पटेल, 29 वर्ष, एनजीओ वर्कर, गुड़गांव
पल्लव और पटेल गुड़गांव में पल्लव के माता-पिता के पास रह रहे हैं
समलैंगिक रिश्ते में रह रहे विश्व पल्लव श्रीवास्तव ने घरवालों को दसेक साल पहले अपनी यौन अभिरुचि के बारे में बताया तो सबने इसे स्वीकार लिया पर मां उदास थीं. उन्होंने कहा कि वे बेटे को इतने सालों में ठीक से पहचान न सकीं.
पल्लव के माता-पिता के साथ रह रहे इस युगल को घर की शादियों और दूसरे समारोहों में भी जोड़े की तरह बुलाया जाता है और वे भी वर-वधू को दूसरों की तरह आशीर्वाद देते हैं. हालांकि फरवरी, 2017 में उनके सात फेरों के वक्त पंडित ने भी मंगल सूत्र की जगह एक-दूसरे को चेन पहनाने को कहा, ताकि शादी जेंडर न्यूट्रल हो.
शादी को कानूनी मान्यता न मिलने से उपजी दिक्कतों का उन्हें भी सामना करना पड़ रहा है. वे किसी को कानूनी तौर पर अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकते. पल्लव अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं, ''अगर मेरी मौत हो जाए तो फिर मेरे रक्त संबंधियों का मेरी संपत्ति और दूसरी चीजों पर अधिकार होगा. मेरे न रहने पर वे मेरी ओर से नामित व्यक्ति को कानूनी तौर पर चुनौती दे देंगे और मेरा नॉमिनी पार्टनर कानून के अभाव में मेरे रक्त संबंधियों से हार जाएगा. जाहिर है, आज की तारीख में मेरे पार्टनर को कानूनी तौर पर कोई संरक्षण नहीं है.’’
बैंक में जॉइंट अकाउंट खुलवाने में भी उनके पसीने छूट जा रहे हैं. आइसीआइसीआइ बैंक ने एलजीबीटी बिरादरी के लिए जॉइंट एकाउंट की योजना का प्रचार किया तो गुड़गांव की एक ब्रांच पर वे भी पहुंचे. वहां पहले तो स्टाफ टालमटोल करता रहा. कस्टमर सर्विस वालों ने घंटे भर बैठाए रखा फिर मैनेजर के पास ले गया. उन्होंने भी घंटे भर बिठाकर, ''पता करते हैं’’ कहकर टरका दिया. पल्लव और भी कानूनी दिक्कतों की ओर इशारा करते हैं: ''मैं अपने पार्टनर को पांच लाख रुपए दूं तो यह रकम गिफ्ट टैक्स के दायरे में आएगी लेकिन पति-पत्नी या माता-पिता के मामले में ऐसा नहीं होता.’’ कानूनी संरक्षण न मिलने तक यह परेशानी रहेगी ही. हालांकि दफ्तर वाले उनके साथ पार्टनर के भी हेल्थ इंश्योरेंस के लिए राजी हो गए. कई कंपनियां ऐसे जोड़ों को स्वास्थ्य बीमा सुविधा देती हैं.
अगर मेरी मौत हो गई तो मेरी संपत्ति और दूसरी चीजों पर मेरे रक्त संबंधियों का अधिकार होगा. मेरे न रहने पर मेरे नामित को वे कोर्ट में चुनौती दे देंगे और कानून के अभाव में वह हार जाएगा. -विश्व पल्लव श्रीवास्तव
'ग्रामीण भारत अक्सर ज्यादा प्रगतिशील नजर आता है’
ऋतुपर्णा बोरा 42 वर्ष, क्वीयर एक्टिविस्ट
अमृता त्रिपाठी 35 वर्ष, पीआर प्रोफेशनल
ऋतुपर्णा असम के लखीमपुर जिले के छोटे-से गांव माउटरचक की हैं और अमृता उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की
ऋतुपर्णा और अमृता 2016 से एक-दूसरे से मिलते आ रहे थे. ऋतुपर्णा के भाई के अलावा इस जोड़े को सभी परिजनों से स्वीकृति मिल गई थी. 2014 में समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन नजरिया की स्थापना करने वाली ऋतुपर्णा कहती हैं, ''मेरा यह सुपर एजुकेटेड भाई और उसकी प्रोफेसर बीवी हमारे लिए कर कदम पर परेशानी का सबब थे.’’ वे एक अखिल भारतीय समूह लेस्बियन, बाइसेक्सुअल, इंटरसेक्स विमेन ऐंड ट्रांसजेंडर नेटवर्क का भी हिस्सा हैं, जो कोर्ट में उनके साथ आ खड़ा हुआ है.
उनकी याचिका का मूल बिंदु है लिंगभेद से परिवार में उपजने वाली हिंसा और उससे सुरक्षा के कानूनी उपाय. इस युगल का यह भी मानना है कि ग्रामीण भारत के लोग ऐसे रिश्तों के मामले में ज्यादा समावेशी देखे गए हैं. वे साफ इशारा करती हैं कि माउटरचक के लोगों ने किस खुले दिल से दोनों को अपनाया. ऋतुपर्णा कहती हैं, ''पिछले साल मेरे पिता के निधन पर अमृता ने सारी रस्मों में हिस्सेदारी की और मेरे गांव में कहीं से किसी ने भी कोई ऐतराज नहीं किया.’’
एलजीबीटीक्यू+ बिरादरी के लिए न्याय, बराबरी और आजादी जैसी चीजें हासिल करने की दिशा में पारिवारिक हिंसा सबसे बड़ी बाधा है--ऋतुपर्णा बोरा
'हमारी ख्वाहिश है कि हमारा भी परिवार हो और हमारे भी बच्चे हों’
अनन्य कोटिया 32 वर्ष, अर्थशास्त्री
उत्कर्ष सक्सेना 34 वर्ष, वकील और विकास अर्थशास्त्री
अनन्य और उत्कर्ष दिल्ली में रहते हैं. उनके परिवार क्रमश: राजस्थान और यूपी के हैं
अनन्य कोटिया कहते हैं कि ''समलैंगिक युगलों के साथ राज्य व्यवस्था क्यों भेदभाव बरतती है, इसकी कोई वजह समझ नहीं आती.’’ अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के अधिकार की मांग के साथ इस जोड़े ने इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट की राह ली थी. उत्कर्ष का तर्क है कि वे किसी नए कानून की मांग नहीं कर रहे, वे तो स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत समलैंगिक विवाह की मंजूरी मांग रहे हैं.
वे चाहते हैं कि कानून में पति, पत्नी, पुरुष और स्त्री जैसे जेंडर वाले शब्दों को हटाकर व्यक्ति या साथी जैसे शब्द रखे जाएं. यह निर्णायक पहलू है क्योंकि संबंधित अधिकार शादी की अवधारणा से जुड़े हुए हैं. कोटिया कहते हैं, ''हमें परिवार नहीं माना जाता, इस वजह से हम जॉइंट एकाउंट नहीं खोल सकते. मैं अपने पार्टनर की बीमा पॉलिसी में शुमार नहीं हो सकता. हम एक-दूसरे को पैसे भेजें तो इनकम टैक्स के कानूनों की चिंता करनी होगी. अधिकारों के बिना शादी का क्या मतलब?’’
इस युगल ने अभी शादी नहीं की है लेकिन परिवार बसाना उनका सपना है. कोटिया के शब्दों में, ''हम बच्चे चाहते हैं. बाल-बच्चे वाले युगलों को देखकर हम खुद को कमतर महसूस करते हैं. यह सोच कि समलैंगिकों के बच्चे रखने से उन बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ेगा, एक भ्रांत किस्म की धारणा है.’’
विवाह के लिए एक जरूरी पूर्व शर्त है संतानोत्पत्ति की क्षमता, इस तरह के तर्कों की कानून में कोई जगह नहीं --उत्कर्ष सक्सेना
धारा 377 निरस्त होने से मुझे खासी ताकत मिली
दुती चंद, 27 वर्ष, एथलीट
मोनालिसा दास, 23 वर्ष, आइटी प्रोफेशनल
दो बार की ओलंपियन और 100 मीटर राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक धाविका दुती चंद ने 2019 में सुर्खियां बटोरीं जब उन्होंने अपनी लैंगिकता के बारे में दुनिया को बताया. वे देश की पहली समलैंगिक एथलीट बनीं जिसने खुले तौर पर इसका ऐलान किया. यह मोनालिसा दास के प्यार में पड़ने के दो साल बाद हुआ. उनसे वे पहली बार गांव के एक मेले में मिली थीं. शुरू में दोनों परिवारों की ओर से कुछ नाराजगी थी लेकिन दुती को ज्यादा फिक्र इसकी थी कि उनके यौन रुझान से करियर पर क्या असर पड़ेगा?
समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन्हें खुलकर इस बारे में बात करने का साहस दिया. लेकिन उनके पास आज भी दूसरे दंपतियों की तरह अपनी चहेती के साथ कानूनी रूप से विवाह करने का अधिकार नहीं है. इस युगल को जीवन के लगभग हर कदम पर एहसास कराया जाता है कि उन्हें इस रिश्ते को किसी भी प्रकार की कानूनी सुरक्षा हासिल नहीं. दुती कहती हैं, ''हम साथ रहते हैं पर कल अगर मुझे कुछ हो जाता है तो मोनालिसा मेरी संपत्ति में से एक रुपए पर भी अधिकार का दावा नहीं कर सकती...अगर हम एक बच्चा गोद लेना चाहें तो मौजूदा कानून के तहत हमें माता-पिता नहीं माना जाएगा.’’
दुती ओडिशा के चकगोपाल गांव की रहने वाली हैं, जबकि मोनालिसा पास के जाजपुर जिले की हैं. दोनों अब भुवनेश्वर में एक साथ रहती हैं
भारत में आप जो भी करते हैं, हर चीज के लिए सर्टिफिकेट चाहिए. यहां तक कि आपका जन्म और मृत्यु भी अधिकारियों से प्रमाणित होनी चाहिए. तो समान लिंग वाले दो लोगों की शादी के लिए भी हमें वह चाहिए--दुती चंद
बहस के मुख्य मुद्दे सवाल जेंडर का
सुप्रीम कोर्ट लिंग की अवधारणा के बारे में दिलचस्प बहस का गवाह बना, जब वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि 'समान-लिंग वालों का विवाह’ संकीर्ण शब्दावली है और अगर अदालत को समलैंगिक जोड़ों को विवाह की समानता प्रदान करनी है तो यह 'शारीरिक लैंगिकता और सेक्स स्पेक्ट्रम’ में सभी रजामंद वयस्कों के लिए होना चाहिए. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ''जैविक लिंग आखिर व्यक्ति का ही जेंडर है.’’
सीजेआइ डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने फौरन हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ''पुरुष की कोई संपूर्ण अवधारणा या महिला की कोई संपूर्ण अवधारणा’’ नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि ''सवाल यह नहीं कि हमारे जननांग क्या हैं. यह कहीं ज्यादा जटिल है... इसलिए जब स्पेशल मैरिज ऐक्ट पुरुष और महिला कहता है, तो पुरुष और महिला की यह धारणा ही जननांगों पर आधारित संपूर्ण धारणा नहीं है.’’ मेहता ने एक व्यावहारिक कठिनाई की तरफ भी इशारा किया कि एलजीबीटीक्यूआइए+के विस्तार में जेंडर के कई रंग हैं.
मेहता ने कहा, ''ऐसे लोग हैं जो किसी लिंग के रूप में पहचाने जाने से इनकार करते हैं. कानून उन्हें कैसे मान्यता देगा—पुरुष या महिला के रूप में? एक श्रेणी जेंडर को मनोदशा के उतार-चढ़ाव पर निर्भर मानती है. ऐसे में उनका जेंडर क्या होगा.’’ इस विमर्श को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं और मीम की झड़ी लग गई.
तो क्या यह शहरी और संभ्रांत लोगों का मसला है?
समलैंगिकों की शादी के मसले पर केंद्र ने अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इस तरह का विवाह देश के सामाजिक लोकाचार से काफी हटकर ''शहरी कुलीनतावादी अवधारणा’’ है और यह देश की 'समूची आबादी’ की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करती. लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समान-लिंग वालों के विवाह के बारे में महज इसलिए ऐसी राय नहीं बनाई जा सकती क्योंकि शहरों में ज्यादा लोग इसे लेकर सामने आ रहे हैं.
वादियों की पैरवी कर रहे कई वकीलों ने भी बताया कि समलैंगिकों का विवाह परिजनों के ही नामंजूर कर देने पर घर से भागे लोगों की बड़ी तादाद छोटे कस्बों से थी. मसलन, वादी काजल पंजाब के मुक्तसर की हैं और उनकी जोड़ीदार भावना हरियाणा के बहादुरगढ़ की हैं. ऋतुपर्णा बोरा असम के दूरदराज के एक गांव की हैं. 2016 में सर्जरी के जरिए अपनी लिंग परिवर्तन कराकर अब स्त्री के तौर पर पहचानी गईं जैनब पटेल याद करती हैं कि किस तरह उन्हें उनके परिवार ने छोड़ दिया.
वे झुग्गी बस्ती में आ गईं, सड़कों पर भीख मांगने लगीं और जिंदा रहने के लिए वेश्या बन गईं. तमाम मुश्किलों में उन्होंने मैनेजमेंट की पढ़ाई करते हुए डिग्री हासिल की और यूएनडीपी और फिर केपीएमजी के साथ काम किया. अब पेरनोड रिकार्ड में इक्न्लूजन ऑफिसर के पद पर काम करते हुए भी वे मुंबई की अच्छी-सी हाउसिंग सोसाइटी में रहने की जगह नहीं हासिल नहीं कर सकतीं. वे कहती हैं, ''हां, मैं झुग्गी बस्ती में रहने वाली शहरी कुलीनतावादी हूं.’’
विवाह के मूल तत्व
सुनवाई के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने कहा कि विवाह के मूल तत्व संवैधानिक मूल्यों द्वारा संरक्षित हैं. उन्होंने कहा, ''एक, विवाह स्वयं दो व्यक्तियों के सहवास को प्रस्तावित करता और स्वीकृति देता है. दो, परिवार का अस्तित्व विवाह के साथ-साथ चलता है. तीन, प्रजनन विवाह का अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है. हालांकि हमें संज्ञान में रखना ही होगा कि यह विवाह की वैधता की शर्त नहीं है.
चार, विवाह अन्य सभी के लिए एक्सक्लूजनरी या अपवर्जनात्मक है. पांच, विवाह के अस्तित्व की सामाजिक स्वीकृति, (यानी) सामाजिक स्वीकृति उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि समाज उस संस्था को कैसे देखता है.’’ यह स्वीकार करते हुए कि विवाह को नियम-कायदों के दायरे में रखने में राज्यसत्ता का वैध हित है. सीजेआइ ने कहा कि जांच का अगला विषय यह है कि विषमलैंगिकता विवाह का मूल तत्व है या नहीं.
साझा कड़ी
डी.वाइ. चंद्रचूड़, भारत के प्रधान न्यायाधीश
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 6 सितंबर, 2018 को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द करके रजामंद वयस्कों के बीच समलैंगिक रिश्तों को गैर-आपराधिक करार दिया था. इसका मतलब था कि एलजीबीटी समुदाय के लोग किसी कानूनी कार्रवाई को न्यौता दिए बिना अपने एकांत स्थलों पर आपसी सहमति से संभोग कर सकते थे.
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली उस पीठ में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ भी थे, जो अब भारत में समलैंगिक विवाह के लिए कानूनी मंजूरी की मांग करने वाली कई जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही पांच जजों की पीठ के प्रमुख हैं. वे नौ जजों की उस पीठ में भी थे जिसने 24 अगस्त, 2017 को निजता को संविधान की तरफ से प्रदत्त मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी.
यह पुट्टास्वामी मामले के रूप में जाना जाता है और कई जनहित याचिकाओं में अपने मकसद के समर्थन में इस फैसले की दुहाई दी गई है. तमाम जनहित याचिकाएं शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. (8 मार्च, 2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र करती हैं, जिसमें व्यक्ति के अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी और धर्म चुनने के अधिकार का अनुमोदन किया गया था. इस फैसले के लेखक भी न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ थे.
—साथ में शैली आनंद और मनीष दीक्षित

