
कर्नाटक के कई मुख्यमंत्रियों की तरह, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई बेंगलूरू में आलीशान मुख्यमंत्री आवास 'अनुग्रह’ में नहीं रहते हैं. उनके कई पूर्ववर्ती इसे अशुभ मानते थे. बोम्मई ने भी पिता और पूर्व मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई के आरटी नगर में बनवाए अपने घर में रहना पसंद किया. लेकिन यह फैसला शायद अंधविश्वास के बजाए, सुविधा और व्यावहारिकता का था.
पार्टी के दिग्गज बी.एस. येदियुरप्पा की जगह लाए गए बोम्मई को सिर्फ 21 महीने का वक्त मिला. इस महत्वपूर्ण दक्षिणी राज्य में भाजपा की सरकार बरकरार रखने की संभावनाएं कम हैं. पिछले 38 साल में कोई सरकार नहीं लौटी. हालांकि, बोम्मई और भाजपा को इस मिथक के टूटने की उम्मीद है. कर्नाटक में 10 मई के मतदान में दो मुख्य दावेदारों—भाजपा और कांग्रेस—के बीच कांटे की टक्कर की स्थिति है.
बड़ा दांव
चुनाव में दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए बड़े दांव लगे हैं. भाजपा के लिए, कर्नाटक एकमात्र दक्षिणी राज्य है जहां उसके पास लोकसभा और विधानसभा दोनों में अच्छी-खासी सीटें हैं. राज्य की 28 लोकसभा सीटों में से भाजपा के पास 25 सीटें हैं. मौजूदा विधानसभा में 224 सीटों में से भाजपा के पास 118 सीटें हैं. हालांकि, वह 2018 के चुनावों के एक साल बाद कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) या जेडी (एस) के 17 दलबदलुओं को शामिल करने के बाद ही बहुमत हासिल कर पाई.
छह दक्षिणी राज्यों—कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी—की 130 लोकसभा सीटों में भाजपा के पास कुल 29 सीटे हैं, जिनमें करीब 90 फीसद कर्नाटक में हैं. बाकी सभी पांच राज्यों की विधानसभाओं में पार्टी की कोई खास हैसियत नहीं है. कर्नाटक में जीत पड़ोसी तेलंगाना में भाजपा के अभियान को मजबूती देगी, जहां इसी दिसंबर में चुनाव होने हैं. बोम्मई ने इंडिया टुडे से कहा, ''कांटे की लड़ाई है. जहां कर्नाटक कांग्रेस के लिए करो या मरो का चुनाव है, वहीं भाजपा के लिए भी इसे जीतना बहुत जरूरी है.’’
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, जो अपनी पार्टी कांग्रेस में मुख्यमंत्री की दावेदारी में सबसे आगे हैं, बोम्मई और सरकार चलाने की उनकी शैली का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन वे अपने प्रतिद्वंद्वी के इस आकलन से सहमत हैं कि चुनाव दोनों पार्टियों के भविष्य के लिए अहम हैं. झक सफेद कुर्ता और अपनी खास दाढ़ी में 75 वर्षीय सिद्धरमैया कार्यालय में कार्यकर्ताओं की भीड़ की परवाह किए बिना खुलकर बोलते हैं. वे कहते हैं, ''भाजपा का लक्ष्य दक्षिण भारत में जीत हासिल करना है.
हम कांग्रेसियों को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से कर्नाटक का चुनाव जीतकर अपनी ताकत सुरक्षित रखनी होगी. यह चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर पुनरुद्धार की शुरुआत करेगा और 2024 के आम चुनाव के लिए बुनियाद रखेगा.’’ विडंबना यह है कि सिद्धरमैया और बोम्मई दोनों तत्कालीन जनता दल में थे, जो 1999 में दो फाड़ हुई और जेडी (एस) और जनता दल (यूनाइटेड) या जेडी (यू) बने. सिद्धरमैया पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की अगुवाई वाली जेडी (एस) में चले गए और फिर वहां से 2006 में कांग्रेस में. वहीं बोम्मई ने जेडी (यू) के साथ रहना चुना और फिर 2008 में भाजपा में शामिल हुए.
कर्नाटक में नेताओं का पार्टी बदलना सामान्य घटना है. लोकनीति-सीएसडीएस के चुनाव विश्लेषक संदीप शास्त्री के अनुसार, वर्तमान विधानसभा में हर छठवां विधायक अपने करियर में एक से अधिक पार्टी के टिकट पर निर्वाचित हुआ है. इस बीच, पुराने मैसूरू क्षेत्र में जेडी (एस) की ताकत बरकरार है, जहां 67 सीटें हैं. यह पार्टी 18-20 फीसद वोट हासिल करने के साथ औसतन 30-40 सीटें जीतती है.

दोनों बड़ी पार्टियों में से कोई अपने दम पर बहुमत नहीं पातीं, जैसा कि हाल के अतीत में होता रहा है, तो ये संख्याएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं. जेडी (एस) किंगमेकर बन उठता है और उसके नेता एच.डी. कुमारस्वामी किंग भी बन जाते हैं. 2006 और 2018 में, जेडी (एस) को क्रमश: 58 और 40 सीटें ही मिली थीं, लेकिन कुमारस्वामी एक बार भाजपा और फिर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री बन गए, हालांकि दोनों दौर में उनका कार्यकाल बमुश्किल दो साल चला. भाजपा और कांग्रेस अब जेडी (एस) के फिर गरजने से सतर्क हो गई हैं और निर्णायक बहुमत पाने के लिए जोर लगा रही हैं.
भाजपा में नेतृत्व की दुविधा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव अभियान से ठीक पहले बोम्मई से मुलाकात की और बताया जाता है कि उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा, ''आप चुनाव को लेकर क्या महसूस कर रहे हैं?’’ जब बोम्मई ने कहा कि वे विश्वास से भरे हैं, तो मोदी ने फिर पूछा, ''क्या आपमें बहुत आत्मविश्वास, अति आत्मविश्वास या फिर सतर्क आत्मविश्वास है?’’ बोम्मई ने कहा, ''सतर्क आत्मविश्वास.’’ इस पर प्रधानमंत्री ने कहा, ''आपके कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी है.’’ बोम्मई उनसे सहमत थे, ''हां, चुनौती तो है.’’ मोदी ने तब उन्हें अच्छी तैयारी करने और एकदम स्थानीय स्तर तक चुनावी रणनीति तैयार करने की सलाह दी.
63 वर्षीय बोम्मई जिनके सिर के बाल उड़ चुके हैं और जो थोड़ा लंगड़ाकर चलते हैं, के लिए यह कठिन नहीं होना चाहिए. उनके मिलनसार व्यवहार के पीछे एक चतुर और सतर्क दिमाग है. पार्टी आलाकमान के परामर्श से, उन्होंने चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के महीनों पहले ही काफी जमीनी कार्य कर लिया था. बोम्मई अच्छी तरह वाकिफ हैं कि भाजपा को पिछले 15 वर्षों में राज्य में शासन करने के दो मौके मिले हैं, मगर पार्टी ने कभी भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं किया. 2008 में उसे सर्वाधिक 110 सीटें मिली थीं जो 224 सदस्यीय विधानसभा में साधारण बहुमत से तीन कम थी.
भाजपा के सत्ता में आने पर शीर्ष नेतृत्व में बार-बार परिवर्तन हुआ. 2008 और 2013 के बीच, तीन मुख्यमंत्री बनाए गए—येदियुरप्पा, डी.वी. सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टार. 2018 के चुनाव में, भाजपा ने 104 सीटें जीतीं और उसे एक साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ा क्योंकि कांग्रेस और जेडी (एस) ने चुनाव बाद गठबंधन कर लिया. प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के दल-बदल के बाद ही वह अगले साल जुलाई में सरकार बनाने में सक्षम हुई. इस कार्यकाल में, भाजपा के दो मुख्यमंत्री रहे हैं—येदियुरप्पा और बोम्मई.
हालांकि अभी तक भाजपा ने औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, लेकिन बोम्मई समर्थकों का मानना है कि पार्टी जीतती है तो वे ही पार्टी की स्वाभाविक पसंद होंगे. बोम्मई लिंगायत समुदाय से आते हैं, जिसका 17 फीसद वोट है और 70 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभाव है. येदियुरप्पा भी लिंगायत हैं और उन्हें इस समुदाय के प्रमुख नेताओं में एक माना जाता है. येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री के पद से हटने के लिए कहा गया (हालांकि उनका दावा है कि उन्होंने स्वेच्छा से कुर्सी छोड़ी है क्योंकि वे 80 साल की उम्र छू रहे थे), तो बोम्मई को चुनने के पीछे एक बड़ा कारण यह देखना था कि लिंगायत वोट भाजपा के पास रहे.
बोम्मई के समर्थक दो अन्य हालिया तथ्यों की ओर इशारा करते हैं—चुनाव रणनीति के सूत्रधार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि चुनाव बोम्मई के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी माना कि बोम्मई को सरकार में दो साल से कम का समय मिला, इसलिए पार्टी के जीतने पर उन्हें शासन करने के लिए कुछ और साल दिए जाने चाहिए. मुख्यमंत्री के एक सहयोगी ने कहा, ''हवा की दिशा साफ-साफ मुख्यमंत्री के पक्ष में है.’’ फिर भी, चुनावी रणनीति के तहत, पार्टी ने अभी तक खुले तौर पर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है. नेतृत्व को लेकर अपने पत्ते नहीं खोलने के पीछे वाजिब वजहें हैं. उसी प्रकार कांग्रेस को भी सिद्धरमैया और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच नेतृत्व की उलझन को सुलझाना है.
कांग्रेस का कायाकल्प
जबसे 2020 में शिवकुमार ने प्रदेश अध्यक्ष का पदभार संभाला है, न्न्वीन्स रोड स्थित पार्टी मुख्यालय का पूरा कायाकल्प हो गया है. इस इमारत का अग्रभाग अब भव्य ग्रीक-रोमन शैली का है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में भारत जोड़ो भवन नामक शानदार एनेक्सी का उद्घाटन किया जिसमें अत्याधुनिक संचार सुविधाओं के अलावा एक विशाल सभागार है. कांग्रेस चार साल के अंतराल के बाद राज्य में फिर से सत्ता हासिल करने के लिए आश्वस्त दिख रही है और कड़ी मेहनत कर रही है कि उसे भी आराम से बहुमत मिले.
वार रूम के अंदर, पार्टी के रणनीतिकार और राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने एक सफेद बोर्ड पर 140+ सीटें लिख रखी हैं जो यह संकेत है कि पार्टी कितनी सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है. वल्लभ अपने स्मार्टफोन पर, एक स्थानीय अखबार की वेबसाइट पर जाते हैं जिसमें डेली ट्रैकर है जो बताता है कि कांग्रेस को 123 सीटें मिल रही हैं. वे गर्व के साथ यह भी बताते हैं कि कांग्रेस के 77 लाख सूचीबद्ध कार्यकर्ता लोगों के घरों में पार्टी का संदेश पहुंचा रहे हैं.

इस बीच, शिवकुमार भरपूर आत्मविश्वास का इजहार करते हैं. वे सफेद फोर्ड एंडेवर में सवार होकर अगली जनसभा के लिए हेलिकॉप्टर पकड़ने बेंगलूरू के जक्कुर हवाई अड्डे रवाना हो गए. उनमें आत्मविश्वास झलक रहा है. खिचड़ी दाढ़ी में 60 वर्षीय शिवकुमार कांग्रेस के लिए संकटमोचन हैं. वे बेंगलूरू ग्रामीण में सथानूर और कनकपुरा क्षेत्रों से लगातार सात बार विधायक चुने गए हैं. इस विधानसभा चुनाव में क्या फर्क है? वे कहते हैं, ''समाज के सभी तबके नाराज हैं. सत्तारूढ़ भाजपा ने उनकी जरूरतों को पूरा करने का कोई प्रयास नहीं किया. उसने कई वादे किए, लेकिन पूरा नहीं कर पाई. जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना बताता है कि सब ठीक नहीं है.’’
शिवकुमार से अच्छी तरह वाकिफ लोगों का कहना है कि उनकी छवि भले तुनकमिजाज और चतुर व्यक्ति की हो, लेकिन उन्होंने पार्टी के प्रति दृढ़ता और पूरी वफादारी का परिचय दिया है. 1,358 करोड़ रुपए की संपत्ति के साथ वे कर्नाटक के सबसे अमीर विधायकों में एक हैं. वे प्रभावी वोक्कालिगा समुदाय से हैं और हमेशा लड़ाई के लिए तैयार रहते हैं. शिवकुमार ने मई 2018 में त्रिशंकु विधानसभा के परिणामस्वरूप सत्ता के लिए विधायकों की तोड़-फोड़ की कोशिशों के बीच अपनी पार्टी के विधायकों को 'सुरक्षित’ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
इसी तरह से उसके पिछले साल, उन्होंने दिवंगत अहमद पटेल की राज्यसभा की सीट पर जीत हासिल करने में मदद की थी. शिवकुमार का दावा है कि उसी वजह से उनके खिलाफ आयकर चोरी और मनी-लॉन्ड्रिंग के कई मामले दर्ज करा दिए गए. वे कहते हैं, ''राजनीति मेरा जुनून है—मैं सिर्फ राजनीति खाता, पीता और बतियाता हूं. मैं लोगों के जीवन को बदलकर और समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण करके इतिहास बनाने और विरासत छोड़ जाने में विश्वास रखता हूं.’’
क्या इस चुनाव में बनो या टूटो जैसा मुद्दा है? तपाक से जवाब आता है, ''कांग्रेस के लिए टूटो कुछ नहीं है. हम तो बनाएंगे.’’ उन्हें पार्टी समर्थक घेरे हुए हैं, सबका अभिवादन करते वे तेज कदमों से हेलिकॉप्टर की ओर बढ़ जाते हैं और अपने सहायक से नाश्ता रख लेने को कहते हैं, ताकि रास्ते में खा सकें.
शिवकुमार ऊर्जा से भरे जोश में दिखते हैं, जबकि सिद्धरमैया आत्मविश्वास से भरपूर अक्लमंदी का एहसास कराते हैं. येदियुरप्पा भाजपा के मुखौटा हैं, तो सिद्धरमैया कांग्रेस के भीड़-खींचने वाले नेता, जो 1978 में डी. देवराज अर्स के बाद पांच साल का कार्यकाल (2013-2018) पूरा करने वाले कर्नाटक के इकलौते मुख्यमंत्री हैं. उन्होंने अपनी छवि पिछड़े वर्ग के नेता की बनाई है. उनके भाषणों में गंवई अंदाज और चुटीली हाजिरजवाबी होती है और कभी किसी लोक धुन पर उनके पांव भी थिरकने लग सकते हैं. अब उनकी निगाह दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर है. कांग्रेस को नेतृत्व के मुद्दे को सावधानी से देखना होगा क्योंकि शिवकुमार का मानना है कि पार्टी जीतती है तो अब की बारी उनकी है.
अब तक, दोनों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं और मिजाज पर नियंत्रण रखा है. दोनों ने स्वीकार किया है कि यह पार्टी के विधायक तय करें कि किसे मुख्यमंत्री होना चाहिए. फिर, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''एकजुटता का इजहार है, तो इसलिए कि कोई भी कांग्रेस से अलग होकर अपने दम पर पार्टी चलाने की क्षमता नहीं रखता. या वे पार्टी के लिए बन रही संभावनाओं को बर्बाद करना या फिर अपने फायदे के लिए ब्लैकमेल करना नहीं चाहते.
कुल मिलाकर, पार्टी एकजुट है और अपेक्षाकृत एकजुट मशीन है.’’ दरअसल कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की क्षमता वाले कई नेता हैं. इनमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष 80 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे भी हैं, जो उत्तर कर्नाटक से आते हैं. हालांकि, खड़गे ने साफ कर दिया है कि वे दौड़ में नहीं हैं. वे पूछते हैं, ''कांग्रेस अध्यक्ष के नाते जब मैं विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री नियुक्त करने की हैसियत में हूं, तो फिर मुझे खुद मुख्यमंत्री बनने में दिलचस्पी क्यों होगी?’’
भगवा पार्टी की रणनीति
भाजपा के शीर्ष नेता मोदी, शाह और नड्डा कर्नाटक में पार्टी की चुनावी संभावनाओं की समीक्षा के लिए मुख्य रणनीतिकारों से मिले तो उन्हें यही फीडबैक मिला कि राज्य में सुशासन का अभाव बड़ा मुद्दा है और खासकर कई मौजूदा विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चल रही है. मुख्यमंत्री बोम्मई की छवि 'बड़े बुद्धिजीवी’ की है, लेकिन वे मतदाताओं पर गहरा असर डालने वाले जननेता नहीं बन पाए हैं.
भाजपा की दूसरी चिंता यह थी कि आबादी में 17 फीसद हिस्सेदारी वाले ताकतवर लिंगायत समुदाय तो उसके साथ है मगर बहुमत के लिए अन्य जाति समूहों का समर्थन भी हासिल करना होगा. तटीय कर्नाटक, जहां हिजाब और हलाल विवाद छिड़ा था, में तो हिंदुत्व कार्ड चल सकता है और भाजपा वहां लगभग सभी 19 सीटों पर जीत हासिल करने को लेकर आश्वस्त भी है. लेकिन माना गया कि अन्य जिलों में ध्रुवीकरण की रणनीति नुक्सान पहुंचा सकती है. पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, ''रणनीति यह है कि अन्य क्षेत्रों से सीटें हासिल करने की मशक्कत के साथ अपने गढ़ को बचाए रखने पर ध्यान दिया जाए.’’
भाजपा की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा वह है जिसे पार्टी के शीर्ष नेता शिष्ट भाषा में 'सोशल इंजीनियरिंग’ कहते हैं, लेकिन सीधे शब्दों में कहें तो यह जाति और आरक्षण का कार्ड खेलना ही है. इस दिशा में पहला बड़ा कदम अक्तूबर, 2022 में यानी चुनाव से छह माह पहले उठाया गया. बोम्मई सरकार ने शिक्षा और रोजगार में अनुसूचित जाति के लिए 2 फीसद और अनुसूचित जनजाति के लिए 4 फीसद आरक्षण बढ़ाने का अध्यादेश जारी किया.


साथ ही, दलितों के लिए 17 फीसद आरक्षण को चार समूहों—एससी लेफ्ट (6 फीसद), एससी राइट (5.5 फीसद), स्पृश्य (4.5 फीसद) और अन्य (1 फीसद)—के बीच विभाजित कर दिया. एससी लेफ्ट, जिसमें अत्यधिक पिछड़ा समुदाय मडिगा शामिल है, काफी समय से आंतरिक आरक्षण की मांग कर रहे हैं, और यह मांग पूरी कर भाजपा उनका वोट अपने पक्ष में बरकरार रखने की उम्मीद कर रही है. हालांकि, इस पूरी कवायद से बंजारा और भोवी जैसे 'स्पृश्य’ समुदाय जरूर उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. फिर भी, भाजपा को उम्मीद है कि वह एससी और एसटी दोनों का वोट हासिल करने में सफल रहेगी, जो समुदाय ज्यादातर कल्याण कर्नाटक या हैदराबाद से सटे जिलों में बसे हैं.
सबसे विवादास्पद कदम तो चुनाव तिथियों की घोषणा और आदर्श आचार संहिता लागू होने से ऐन पहले उठाया गया. बोम्मई सरकार ने मुसलमानों के ओबीसी आरक्षण को खत्म कर दिया और इससे रिक्त हुए 4 फीसद कोटा को वीरशैव-लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के बीच बांट दिया. राज्य के ये दोनों प्रभावी समुदाय आरक्षण में वृद्धि की मांग कर रहे थे. केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने मुसलमानों के आरक्षण पर कहा, ''हमने वोट बैंक के लिए की गई व्यवस्था खत्म कर दी है.’’ भाजपा ने अपना हिंदुत्व कार्ड खेलकर दो प्रमुख समुदायों के बीच मजबूत पैठ बनाने की कोशिश की थी. लेकिन अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है, और कर्नाटक सरकार ने उस आदेश को फिलहाल रोक दिया है.
इंद्रधनुषी पलटवार
कांग्रेस आरोप लगा रही है कि चुनाव से ऐन पहले ध्रुवीकरण के लिए भाजपा मुसलमानों को उनके सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर मिला आरक्षण छीन रही है. सिद्धरमैया पूछते हैं, ''क्या कोई रिपोर्ट इसकी सिफारिश कर रही है? या कोई फैसला है? इन सबके बिना, क्या यह विभाजनकारी राजनीति नहीं है?’’ कांग्रेस को उम्मीद है कि राज्य में 13 फीसद मुस्लिम वोट पूरी तरह उसके पक्ष में गोलबंद हो जाएगा.
यही नहीं, सिद्धरमैया की सूझबूझकी बदौलत तमाम जातियों का इंद्रधनुषी गठबंधन भी पार्टी के पक्ष में ही खड़ा नजर आ रहा है. इसे अहिंडा कहा जा रहा है, जो कन्नड़ भाषा में अल्पसंख्यातुरू (अल्पसंख्यक), हिंदू लिदावारू (पिछड़े वर्ग) और दलितारू (अनुसूचित जाति) का संक्षिप्त रूप है. यही पार्टी की मूल ताकत है. सिद्धरमैया राज्य के प्रमुख ओबीसी समूह कुरुबा से आते हैं, जिसकी राज्य के कुल वोट में 7 फीसद हिस्सेदारी है, जबकि खड़गे दलित समुदाय से हैं, जिसकी हिस्सेदारी 17 फीसद है. शिवकुमार के रूप में पार्टी के पास खासे प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय का भी एक कद्दावर नेता है जिसकी कुल मतदाताओं में 12 फीसद हिस्सेदारी है. उसे जिस समुदाय पर ध्यान देना है, वह लिंगायत है. इधर के चुनावों में यह समुदाय भाजपा के साथ रहा है.
राहुल गांधी 24 अप्रैल को बसवा जयंती समारोह के मौके पर बागलकोट में कृष्णा और मालप्रभा नदियों के कुदाल संगम के पवित्र तीर्थस्थल पर मौजूद थे. बसवा 12वीं सदी के समाज सुधारक थे, जिन्हें लिंगायत समुदाय आध्यात्मिक संस्थापक और मार्गदर्शक का दर्जा देता है. राहुल ऐसे समय इस कार्यक्रम में शामिल हुए जब उनकी पार्टी लिंगायतों में पैठ बढ़ाने में जुटी है. यही नहीं, टिकट तय करते समय भी कांग्रेस ने राज्य के उत्तरी हिस्सों पर बारीक नजर रखी, जहां वीरशैव-लिंगायतों की संख्या अधिक है. पार्टी ने इस चुनाव में 51 लिंगायत उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जो पिछले चुनावों की तुलना में आठ अधिक हैं.
कांग्रेस में टिकटों के लिए 224 सीटों के लिए 1,350 से ज्यादा आवेदन आए थे. वल्लभ बताते हैं कि प्रदेश कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी ने हर आवेदन की जांच कांग्रेस की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता, क्षेत्र में विकास की स्थिति के साथ जीतने की क्षमता जैसे पैमाने पर किया. वरिष्ठ नेताओं को बगावत करने वालों से बात करने और उन्हें पार्टी के नजरिये से अवगत कराने का जिम्मा सौंपा गया. नतीजतन, 90 फीसद से अधिक विवाद निपटा लिए गए.
इस हद तक कि सी-वोटर का डेली ट्रैकर दिखाता है कि मतदान से पखवाड़े भर पहले कांग्रेस बढ़त में है, उसे 105 से 125 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि भाजपा करीब 80 और जेडी (एस) 30 सीटें जीतती लग रही है. सी-वोटर के संस्थापक-निदेशक यशवंत देशमुख इसके दो कारण गिनाते हैं कि कांग्रेस सबसे आगे क्यों है. वे कहते हैं, ''लोगों में बदलाव की भावना दिख रही है. हमारा आकलन यही बताता है कि भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है, और एक तथ्य यह भी है कि मजबूत विकल्प के तौर पर कांग्रेस के पास सिद्धरमैया जैसे नेता भी हैं.’’
सत्ता विरोधी लहर से उबरना
भाजपा के लिए सत्ता विरोधी लहर अहम फैक्टर बनी हुई है. इससे उबरने के लिए पार्टी ने 20 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं, और लगभग 80 निर्वाचन क्षेत्रों में नए चेहरों को मैदान में उतारा है. यह आंकड़ा उन कुल सीटों के एक-तिहाई से कुछ ज्यादा है जिन पर भाजपा लड़ रही है. पार्टी का कहना है कि ये फैसले कई दौर के सर्वेक्षण और आकलन के बाद लिए गए हैं.
पार्टी के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, ''हम जानते थे कि मौजूदा विधायकों को लेकर नाराजगी के अलावा कार्यकर्ताओं में भी हताशा है और ऐसे में बदलाव जरूरी हो गया था. इसलिए, शीर्ष स्तर के नेताओं के बजाए हमने मंडल स्तर के लोगों को चुना ताकि पार्टी में नई पीढ़ी को मौका मिले, उन्हें अगली पीढ़ी के नेताओं के रूप में तैयार किया जा सके और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरा जा सके. इसमें जोखिम था, लेकिन खुद प्रधानमंत्री जोर देते हैं कि हम सब कुछ ठीक होने का इंतजार नहीं कर सकते. हमें बदलाव करना होगा जो हम चाहते हैं.’’
मगर, बाद में कुछ झटके लगे. हुबली-धारवाड़ मध्य सीट से पार्टी का टिकट न मिलने पर वरिष्ठ नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार कांग्रेस में चले गए. इसी तरह एक अन्य वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी भी कांग्रेस में जा मिले. भाजपा के गढ़ माने जाने वाले बेलगावी के अथानी निर्वाचन क्षेत्र से उन्हें टिकट नहीं दिया गया था. ये दोनों लिंगायत नेता हैं. उनके जाने से भाजपा के लिए चुनावी समीकरण साधना आसान नहीं रह गया, क्योंकि लिंगायत कर्नाटक में पार्टी का मुख्य जनाधार रहे हैं. उसके बाद सबसे बड़े लिंगायत नेता येदियुरप्पा को डैमेज कंट्रोल के लिए बुलाया गया. वे कहते हैं, ''शेट्टार के जाने के बाद उनके साथ का कोई निर्वाचित सदस्य नहीं गया. कोई भी नहीं. मानो या न मानो, शेट्टार खुद हारने जा रहे हैं.’’
कोई कहे कि कर्नाटक में आपसी गुटबाजी से जूझ रही भाजपा ने टिकट वितरण की यह सारी कवायद व्यापक बदलाव के लिए की थी तो यह बात पूरी तरह सही नहीं है, क्योंकि अभी भी कई नए उम्मीदवार अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही चुने गए हैं. मसलन, येदियुरप्पा के बेटे बी.वाइ. विजयेंद्र को उनकी ही परंपरागत सीट शिकारीपुरा से टिकट मिला है. शेट्टार के मामले में, भाजपा स्वीकार करती है कि उसके शीर्ष नेताओं ने उनकी जगह पत्नी, या परिवार के किसी अन्य सदस्य को हुबली-धारवाड़ मध्य से उम्मीदवार बनाने की पेशकश करके उन्हें मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.
एक और शिकायत यह भी है कि विधानसभा में भाजपा को बहुमत दिलाने के लिए कांग्रेस और जेडी (एस) से टूटकर आए कई नेताओं को पार्टी ने टिकट दिया है और कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया है. भाजपा के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा, ''बदलाव के नाम पर इतनी सर्जरी की गई कि बस पार्टी संगठन बना और बचा रहे. हमने आंतें और लिवर बदल दिए हैं, अगली बार बस दिल बदलना बाकी रह गया है.’’ भाजपा केवल कर्नाटक ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी दलबदल करके साथ आए लोगों को ऐसा कोई गलत संदेश नहीं देना चाहती कि बाद में उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है.
भ्रष्टाचार का हल्ला
सत्तारूढ़ भाजपा से मुकाबले में कांग्रेस का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार ही बना हुआ है. करीब डेढ़ साल से '40 फीसद कमिशन सरकार’ का ठप्पा बोम्मई सरकार का पीछा कर रहा है. यह आरोप राज्य कॉन्ट्रैक्टर एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक चिट्ठी में टेंडर आवंटित करने में भ्रष्टाचार के मद्देनजर लगाया था. भाजपा की समस्या इतनी ही नहीं है. अप्रैल, 2022 में एक पार्टी कार्यकर्ता ने एक वरिष्ठ मंत्री के खिलाफ ऐसा ही आरोप लगाकर खुदकशी कर ली थी (बाद में मंत्री को क्लीन चिट मिल गई). उसके फौरन बाद पुलिस भर्ती घोटाला खुल गया, जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी हुई.
फिर, सबसे बढ़कर, लोकायुक्त ने मार्च, 2023 में भाजपा विधायक के. मदालु विरुपक्षप्पा को एक भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किया. बोम्मई ने '40 फीसद’ आरोप का खंडन किया और कहा कि कॉन्ट्रैक्टरों ने कोई सबूत पेश नहीं किया. उन्होंने यह भी कहा कि टेंडरों के आवंटन के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई गई है और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है. बोम्मई ने इसी के साथ पूर्व कांग्रेस सरकार को पूरी तरह भ्रष्ट बताया. सिद्धरमैया ने जवाब दिया, ''हमारे कार्यकाल में क्या कोई घोटाला खुला? वे आज कह रहे हैं तो क्या आप यकीन कर सकते हैं? वे चार साल से सत्ता में हैं. उन्होंने जांच क्यों नहीं करवाई?’’
कांग्रेस नंदिनी बनाम अमूल मसले के जरिए कन्नडिगा गौरव का मुद्दा भी उठा रही है. यह विवाद दिसंबर में शुरू हुआ, जब शाह ने, जो केंद्रीय सहकारिता मंत्री भी हैं, मांड्या जिले में एक बड़ी डेयरी का उद्घाटन किया और कहा कि कर्नाटक के हर गांव में प्राथमिक डेयरियों को खोलने की दिशा में काम करेंगे और कि कर्नाटक मिल्क फेडरेशन को अमूल से ''तकनीकी समर्थन, सहकारिता सेक्टर का समर्थन और कुल कामकाज के संबंध में समर्थन मुहैया कराया जाएगा.’’ इससे संभावित 'गुजराती’ कब्जे को लेकर हो-हल्ला मच गया. वोक्कालिगा राजनीति का मर्म स्थल मांड्या पुराने मैसूरू इलाके में है, जहां भाजपा पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. इस तरह, जब 5 अप्रैल को अमूल ने बेंगलूरू में दूध और दही की सप्लाइ शुरू करने के बारे में ट्वीट किया, तो तूफान खड़ा हो गया.
सिद्धरमैया ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार 'एक राष्ट्र, एक दूध’ नीति लादने की कोशिश कर रही है और कहा कि राज्य में दूध के 26 लाख किसान संकट में आ जाएंगे और उनकी रक्षा की जानी चाहिए. भाजपा ने फटाफट नुक्सान भरपाई की कोशिश शुरू की. कर्नाटक के सहकारिता मंत्री एस.टी. सोमशेखर ने कहा कि विलय की कोई योजना नहीं है और कि कर्नाटक मिल्क फेडरेशन से जुड़ी सभी 15 दूध यूनियनें फायदे में हैं.
मंत्री ने यह भी बताया कि अमूल अपना दूध ई-कॉमर्स के जरिए 57 रु. प्रति लीटर बेच रहा है जबकि नंदिनी अपनी दुकानों पर 39 रु. लीटर में सस्ता दूध बेचती है. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि नंदिनी के उत्पाद गुजरात सहित 12 राज्यों में बिकते हैं. अमूल के विभिन्न उत्पाद भी कर्नाटक में बरसों से बिक रहे हैं. हालांकि, चुनाव के दौरान दूध विवाद कन्नड़ गौरव का मुद्दा बन गया है.
भाजपा अपनी तईं यही उम्मीद कर रही है कि इस मुद्दे की हवा मतदान के दिन तक बैठ जाएगी. इस बीच, वह अपने दूसरे बड़े मुद्दों पर जोर दे रही है. वह वोटरों को राज्य और केंद्र सरकार की भारी कल्याणकारी योजनाओं को याद दिला रही है. पार्टी ''डबल इंजन सरकार’’ के फायदे के अपने दावे गिना रही है कि समाज के लगभग हर तबके को लाभ पहुंचा है. जिन योजनाओं के बारे में बताया जा रहा है, उनमें पीएम किसान सम्मान निधि (जिसमें केंद्र सरकार किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपए देती है, और कर्नाटक सरकार अतिरिक्त 4,000 रुपए देती है) और जल जीवन मिशन शामिल हैं, जिसके तहत कर्नाटक में 40 लाख परिवारों को नल का पानी मिला है.
नए राजमार्गों, रेलवे और हवाई अड्डों के माध्यम से कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा अन्य विषय हैं. इसके साथ-साथ बोम्मई सरकार की कई कल्याणकारी योजनाएं हैं, जिनमें किसानों के बच्चों के लिए रैयत विद्या निधि छात्रवृत्ति; कृषि सब्सिडी; भूमिहीन महिला खेतिहर मजदूरों को 1,000 रुपए मासिक सहायता की गृहिणी शक्ति जैसी महिला सशक्तीकरण योजनाएं; कामकाजी महिलाओं और छात्रों को मुफ्त बस पास वगैरह हैं. बोम्मई कहते हैं, ''कुल मिलाकर, 'डबल इंजन’ योजनाओं से कर्नाटक की कुल 6 करोड़ आबादी में 5 करोड़ से अधिक लोग लाभान्वित हुए हैं. हमें विश्वास है कि यही सब हमें दूसरी बार जीत दिला देगा.’’
उधर, कांग्रेस के मुख्य तीन मुद्दे तो महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी हैं लेकिन कल्याणकारी योजनाओं के खेल में वह भी पीछे नहीं है. पार्टी ने चार गारंटियों की घोषणा की है. इनमें हर घर को 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली; हर परिवार की मुखिया महिला के लिए 2,000 रुपए मासिक भत्ता; गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए चावल के मुफ्त वितरण को दोगुना करके 10 किलो करना.
दो साल की अवधि के लिए बेरोजगार स्नातकों के लिए 3,000 रुपए और डिप्लोमाधारियों के लिए 1,500 रुपए मासिक भत्ता देना शामिल है. पार्टी कार्यकर्ता हजारों घरों तक पर्चे-पोस्टर में ये संदेश पहुंचा रहे हैं, जिसमें इन चार गारंटियों के गारंटर के रूप में सिद्धरमैया और शिवकुमार की फोटो और हस्ताक्षर हैं. कांग्रेस आरक्षण के मुद्दे की भी समीक्षा करने का वादा कर रही है. पार्टी का कहना है कि भाजपा सरकार का कोटा बढ़ाने का दावा केवल कागजों पर है और अदालतों में यह नहीं टिक पाएगा.
इस बीच, मुकाबले का एक अहम पहलू यह भी है कि जेडी (एस) ने दोनों पक्षों से कई बागियों को उतार दिया है. इस क्षेत्रीय पार्टी का चुनाव अभियान 63 वर्षीय कुमारस्वामी के नेतृत्व में चल रहा है. शायद यह दक्षिणी कर्नाटक में मुकाबले को तितरफा बना देगी और कुछ अन्य इलाकों में लड़ाई बेहद करीबी बना देगी. कुमारस्वामी का सरकार में दो बार का कार्यकाल छोटा रहा है, अब वे तीसरे कार्यकाल के लिए अपने सभी घोड़े खोल चुके हैं.
पिछले चार महीने से वे लगातार सड़क पर 18-18 घंटे सक्रिय हैं, जबकि दो बार दिल की सर्जरी भी करा चुके हैं. जेडी (एस) का चुनाव अभियान पांच कल्याणकारी विषयों के इर्दगिर्द बुना गया है, जिन्हें पार्टी पंचरत्न कहती है. यानी सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और आवास. जेडी (एस) का घोषणापत्र कई अन्य कल्याणकारी उपायों का भी वादा करता है. हालांकि, पार्टी पर यह आरोप भारी पड़ रहे हैं कि उसका ज्यादा फोकस देवेगौड़ा परिवार के चुनाव जीतने पर है.
मोदी फैक्टर
भाजपा के रणनीतिकारों का दावा है कि उनकी सरकार के कल्याणकारी उपायों से पार्टी की मतदान के दिन से एक पखवाड़े पहले अनुमानित सीटों की संख्या लगभग 70 से बढ़कर 100 हो गई है. अब पार्टी नेता प्रधानमंत्री के खास फैक्टर पर काफी भरोसा कर रहे हैं. उनका मानना है कि अंतिम चरण में उनके धमाकेदार प्रचार से पार्टी बहुमत के आंकड़े से काफी आगे चली जाएगी. एक रणनीति यह बनाई गई है कि प्रधानमंत्री मोदी लोगों से कहें कि नए चेहरों को उतारकर भाजपा ने बदलाव की उनकी मांगों को स्वीकार किया है और उस दिशा में काम कर रही है.
पार्टी कई स्टार प्रचारक भी मैदान में उतारेगी. इस हफ्ते से शुरू करके कम से कम 20 रैलियां करने जा रहे प्रधानमंत्री के अलावा स्टार प्रचारकों में 11 केंद्रीय मंत्री और तीन मुख्यमंत्री—योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा और शिवराज सिंह चौहान—के अलावा महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस होंगे. इस बीच, कांग्रेस भी अपने सितारों को उतार रही है. राहुल गांधी पहले से ही रैलियों और रोड शो के साथ सड़क पर उतर चुके हैं और तीन मुख्यमंत्रियों—राजस्थान के अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल और हिमाचल प्रदेश के सुखविंदर सिंह सुक्खू भी रैलियां करने जा रहे हैं.
तो, चुनाव विश्लेषकों की राय क्या है? शास्त्री का मानना है कि स्थानीय मुद्दे कर्नाटक के मतदाताओं पर अधिक असर करते हैं. अलबत्ता, प्रधानमंत्री की कोशिशें 2024 के आम चुनाव के लिए उनकी संभावनाएं पुष्ट कर सकती हैं. शास्त्री कहते हैं कि कर्नाटक के मतदाताओं ने लगातार राज्य में एक पार्टी और लोकसभा में दूसरी पार्टी को चुनने का रिवाज-सा बना लिया है. चुनाव विश्लेषक देशमुख का तर्क है कि नए चेहरों को लाकर भाजपा सत्ता विरोधी लहर को कम करने में सफल रही है. मोदी की कारपेट-बॉम्बिंग भाजपा की संभावनाओं बेहतर बन सकती है. वे कहते हैं, ''प्रधानमंत्री बैकफुट पर भी छक्का मारने के लिए जाने जाते हैं.’’
अक्सर चुनावी भविष्यवाणियों से धमाका करने वाले एक्सिस माइ इंडिया के प्रदीप गुप्ता का मानना है कि कर्नाटक अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य है, कल्याणकारी उपायों की अपील सीमित है; मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं में विकास चाहता है. उनका अनुमान है कि विस्तृत विकास पर फोकस करने वाली पार्टी की ओर लोग खिंचेंगे. गुप्ता का यह भी कहना है कि 2018 के चुनावों में त्रिशंकु सदन के अनुभव के बाद मतदाता स्पष्ट जनादेश सुना सकते हैं. गुप्ता कहते हैं, ''मुकाबला कड़ा है.’’ राजनैतिक और आर्थिक रूप से अहम दक्षिणी राज्य की गद्दी किसे मिलेगी? इंतजार कीजिए 13 मई के नतीजों का.
-साथ में अजय सुकुमारन

