एक इंच का भी फासला नहीं था बंदूक की नली और उसकी कनपटी के बीच. बीच में अगर कुछ था तो उसकी पहचान बन चुका सिर पर बंधा वह सफेद साफा, जो ठीक उसी तरह बंधा था जैसे उसके तांगेवाले पिता इलाहाबाद की चिलचिलाती गर्मियों में अरसा पहले बांधा करते थे. अचानक न जाने कहां से निकली एक बंदूक, दहकती रोशनी की कौंध, ताबड़तोड़ गोलियों की बौछार और उत्तर प्रदेश का दुर्दांत माफिया डॉन हट्टा-कट्टा अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ जमीन पर ढेर हो गए.
उनके साथ अपराध का वह साम्राज्य भी ढह गया जिसने लंबे वक्त से सत्ता की राजनीति के दूसरे हिस्सों का वेश धारण कर लिया था—इसमें लोकसभा का एक और उत्तर प्रदेश विधानसभा के कई कार्यकाल शामिल हैं. लाइव टीवी पर माफिया-सियासतदां की हत्या इतनी नाटकीय थी कि दुनिया भर के मीडिया में उसे जगह मिली, और शायद उस नैरेटिव से अनचाहा भटकाव भी थी जिसका ताना-बाना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुन रहे हैं.
लेकिन गैर-इरादतन जुड़ाव के हिसाब से भी तस्वीर का वह ठहरा हुआ टुकड़ा ऐसा लम्हा बन गया है जिसमें कानून की एक महाकाव्यात्मक लड़ाई अपनी काली, सफेद और धूसर रंगतों के साथ समाहित है. यह लड़ाई माफियाओं के गहरे रचे-बसे उस नेटवर्क के खिलाफ है जिसने दशकों से राज्य की राजनैतिक अर्थव्यवस्था का दम घोंट रखा है. यह वह लड़ाई है जिसने अराजक जंगल के कुछ हिस्सों की सफाई कर दी है, जबकि उसकी जगह सवालों का एक बादल भी छोड़ दिया है. इस लड़ाई ने इंसाफ की परिभाषा को कगार पर धकेलकर उसका एक नया अध्याय लिख दिया है.
यह वह लड़ाई भी है जो 2017 में देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य की सत्ता में आने के बाद से ही मुख्यमंत्री ने छेड़ रखी है और जिसका ब्लूप्रिंट लगातार विकसित होते हुए दोहरी परत हासिल करता जा रहा है, जो हमेशा सतह पर दिखाई नहीं देती. एक स्तर पर लोककथाओं के बेबाक और कटुभाषी हाकिमों की तरह भगवाधारी योगी के पुलिस बल ने गोलियों से उकेरकर एक दंड संहिता लिख दी है—
13 अप्रैल को झांसी में अतीक का बेटा असद अहमद उनकी हुकूमत के बीते छह महीनों में पुलिस के साथ 'एनकाउंटर’ में मारा गया 183वां मुजरिम बन गया. इसके साथ-साथ चलने वाली एक नीति के तहत राज्य सरकार ने 2,500 करोड़ रुपए की ऐसी संपत्तियां जब्त कर लीं या धराशायी कर दीं जो गैंगस्टरों के हाथों गैर-कानूनी ढंग से हासिल की गई बताई जाती हैं.
यूपी के गिरोहों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई
आपराधिक गिरोहों के खिलाफ 'शून्य सहिष्णुता’ की मुहिम छेड़ते हुए भी योगी ने इंसाफ के एक ज्यादा किताबी संस्करण को आगे बढ़ाया, जिसने उनके दूसरे कार्यकाल में रफ्तार पकड़ ली है. बंदूकों से निकले धुएं और बुलडोजरों से उठी धूल के पीछे उन्होंने समूचे पुलिस बल, न्यायिक प्रणाली और राज्य प्रशासन के कायाकल्प की शुरुआत कर दी. दशकों के दौरान राज्य में अपराध की एक भूमिगत दुनिया ने पुलिस और प्रशासन के भ्रष्ट अफसरों के साथ बिल्डर-ठेकेदार-माफिया के गठजोड़ के इर्द-गिर्द खुद को गहराई से स्थापित कर लिया, और अपराध की ऐसी भूमिगत दुनिया जिसके ऊपरी पायदानों ने तमाम पार्टियों के जरिए ऐन सत्ता के गलियारों में अपने बाजू फैला लिए.
योगी ने राज्य प्रशासन और पुलिस से अतीक अहमद सहित राज्य भर के 66 शीर्ष माफियाओं की सूची तैयार करवाई (देखें, यूपी के मोस्ट वांटेड). अपनी-अपनी पनाहगाहों में हुकूमत करने वाले 1,105 छोटे-मोटे सरगनाओं का उनका विस्तारित नेटवर्क भी इसमें शामिल था—अवैध खनन में लगे 30, अवैध शराब के कारोबार में लगे 228, गोवंश के व्यापार में लगे 168, जमीन के धंधे में लगे 347, शिक्षा के रैकेट में अपने पंजे गड़ाए 18 और छिटपुट सरगना 359. फिर इनके तमाम किरदारों के बारे में विस्तृत डोसियर तैयार किए गए, जिसमें उनकी तमाम करतूतों के ब्योरे थे, ताकि हरेक आपराधिक सरगना की कमजोरियों पर निशाना साधा जा सके.
ऐसे व्यवस्थागत दानव की गर्दन पर हाथ रखना तेज-तर्रार और ग्लैमरस एनकाउंटर स्पेशलिस्टों के जरिए ताबड़तोड़ कार्रवाई करना कम और पुलिस की कार्यप्रणालियों की दुष्कर और थकाऊ चक्की पीसने की तरह ज्यादा था. सबसे पहले पैटर्न और तौर-तरीकों का अध्ययन किया गया. आखिर किस बदौलत वे इतने निरापद और महफूज थे? आपराधिक सरगनाओं को कभी कानून के कठघरे में क्यों खड़ा नहीं किया जा सका? व्यवस्था में दरारें कहां थीं?
खुद अपनी ही काहिली और जड़ता के खिलाफ कानूनी मशीनरी कैसे छेड़े? कई डॉनों के खिलाफ बीते कई दशकों के दौरान 100 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, पर कभी मुकदमा नहीं चलाया गया. नतीजे आश्चर्यजनक नहीं थे. उत्तर प्रदेश के एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस आशुतोष पांडेय कहते हैं, ''पहले माफिया डॉन कमजोर ढंग से आरोप तय करने के कारण छूट जाते थे. वे उसे प्रभावित करने में हमेशा कामयाब हो जाते थे. अदालतों में मुकदमा शुरू होने से पहले ही उनके वकील प्रक्रिया में देरी करने के लिए सामान्य बहानों की आड़ लेते, जिससे उनके सहयोगियों को गवाहों को प्रभावित करने के लिए काफी वक्त मिल जाता.’’
मुख्यमंत्री के लिए अगला कदम राज्य की कानूनी प्रणाली को अर्ध-लकवाग्रस्त हालत से बाहर निकालना था. पूरी अभियोजन प्रक्रिया को आरोप तय होने से लेकर गवाहों की हिफाजत तक और समय पर सुनवाई से लेकर जुर्म साबित होने तक पहली बार एक झटके से माफियाओं के खिलाफ हरकत में लाया गया. जब सभी चीजें चुस्त-दुरुस्त और चाक-चौबंद कर ली गईं तो जाल चारों तरफ से कस गया. पुराने मामलों को फिर ताजा किया गया.
बहुत पहले खामोशी के गर्त में चले गए गवाहों को ढूंढ निकाला गया. ऐसे सरकारी वकीलों की पहचान की गई जिनका मुकदमे हारने का सधा-सधाया पैटर्न था और उन्होंने पाया कि उन्हें हटा दिया गया है. जिन जजों ने आदतन अत्यधिक सतर्कता बरतने की गलती की, उनका तबादला कर दिया गया. दोनों मोर्चों पर मजबूत कर्मियों को लाया गया, जिनके लिए जनादेश साफ था—मामलों को उनकी तार्किक परिणति पर पहुंचाएं. इस फोकस के नतीजतन अकेले पिछले साल बड़े गिरोहों के 18 सरगनाओं पर जुर्म साबित हुए हैं.
अतीक अहमद उन्हीं में से एक था, जिसने पाया कि वह अपने अतीत के पापों से बुने जाल में फंस चुका है. यह कम चौंकाने वाला नहीं कि 2007 के वकील और रियल्टर उमेश पाल के अपहरण के मामले में 28 मार्च को जब उस पर जुर्म साबित हुआ, तो चार दशकों में फैले उसके अपराध के करियर में यह पहली बार हुआ था. 2023 का यह हिंसक उपसंहार दरअसल कानून की पकड़ कसने का नतीजा था.
उमेश पाल अपने साले और तब इलाहाबाद पश्चिम से विधायक राजू पाल की 2005 में सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर की गई सनसनीखेज हत्या के मुख्य गवाह थे, जो उन दिनों सबसे चर्चित मामलों में एक था और जिसके पीछे अतीक के गिरोह का हाथ बताया गया. उमेश पाल को गवाही देने से रोकने के लिए उसका अपहरण किया गया था. फिर मौजूदा वक्त में लौटें, 24 फरवरी को जब प्रयागराज में उनके घर के नजदीक एक गली में उमेश पाल की सरेआम गोलियों से भूनकर नाटकीय ढंग से हत्या कर दी गई, तो इसीलिए कि इतने लंबे वक्त बाद अंतत: उन्होंने गवाही दे दी थी.
कहा जाता है कि नौजवान असद अहमद ने इस हत्या से जुर्म की दुनिया में पहला कदम रखा था, जो उसका आखिरी कदम भी साबित हुआ. अपने सिर पर 5 लाख रुपए का इनाम लिए सात हफ्तों तक फरार रहने के बाद असद का हश्र झांसी 'एनकाउंटर’ में गोलियों की बौछार में हुआ. उमेश पाल की हत्या के बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि सपा उसे पालती है, ''मिट्टी में मिला देंगे,’’ जैसे वह पूरा हुआ. वह 13 अप्रैल की तारीख थी. उसी दिन अतीक को उमेश पाल मामले में प्रयागराज की मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया. हर चीज यही कह रही थी कि कानून का पहिया बारीकियों और तफसीलों से बेपरवाह अनवरत घूम रहा था. दो दिन बाद अप्रत्याशित रूप से यह अतीक और उसके भाई अशरफ तक के लिए एक झटके से पूरा घूम गया.
तुर्की की बनी जिगाना पिस्तौल जब पुलिस का महीन घेरा तोड़कर सनसनाई और अतीक के भेजे में उतर गई, तब उसने अपनी सजा और वाक्य दोनों बमुश्किल शुरू ही किए थे. सजा जो तीन हफ्ते पहले उसे सुनाई गई थी और शब्द जो वह उस दिन अपने बेटे की अंत्येष्टि में शामिल न हो पाने के बारे में टीवी क्रू के माइक्रोफोन में बुदबुदा रहा था. उत्तर प्रदेश के मुफस्सिल इलाकों के तीन अनजान-से लड़कों ने बेरहम पेशेवराना ढंग से इस हत्या को अंजाम दिया— ठीक उस मुकाम तक जो सोचे-समझे आत्मसमर्पण की तरह मालूम देता था.
अपने साधनों से कहीं ज्यादा महंगी बंदूकों से उन्होंने जो खुला छोड़ दिया, वह सवालिया निशानों की झड़ी भी हो सकती है (देखें, अतीक की जिंदगी और जरायम). उत्तर प्रदेश के कई तजुर्बेकार जानकार शूटरों को समर्थ बनाने वाले इत्तेफाकों के सिलसिले का हवाला देते हैं और उन लोगों की तरफ इशारा करते हैं जो शायद अतीक को खत्म करवाना चाहते हों. यह जानी-मानी बात है कि अतीक का प्रशासन के कुछ हिस्सों के अलावा तमाम पार्टियों के लोगों के साथ उठना-बैठना था और वह वाकई बहुत कुछ जानता था. एक बार जेल में सजा काटना शुरू करने के बाद और जब उसके पास खोने को कुछ नहीं होता, अगर वह मुंह खोलने लगता, तो उनके लिए खतरा हो सकता था.
झटका और उसके बाद
अपनी कार्रवाई को ज्यादा ठोस कानूनी ढांचे के भीतर स्थापित करने की कोशिश कर रहे योगी के लिए उस नाटकीय हत्या का संभावित असर एक बार फिर अंतर्विरोधी परतों से मिलकर बना हो सकता है. एक स्तर पर अगर मानो तो यह झटका है. उन्होंने यूपी के एक बड़े डॉन को अदालतों के जरिए इस कदर दीवार से जड़ दिया था कि वह कुछ नहीं कर सकता था. झांसी से 30 किमी बाहर एक अंधेरी सड़क पर भगोड़े असद को पुलिस की गोलियों से मौत के घाट उतार दिया जाना अलग बात थी.
योगी ने 'मुठभेड़ में हत्या’ के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर दांव लगाना जारी रखा है—ऐसी प्रजातियों के तौर पर जो इंसाफ की धुंधली सरहदों पर निवास करती हैं, उन्होंने अपनी शैली और विश्वसनीयता को कोई नुक्सान न पहुंचाते हुए भयपूर्वक अपराधों से दूर रहने का सीधा और दोटूक संदेश दिया है.
मगर लाइव टीवी पर हत्या के बगैर भी उनका काम चल सकता था, खासकर उन ढीले-ढाले पुलिसवालों के सामने, जिन्होंने वक्त रहते एक उंगली तक नहीं उठाई या उठा नहीं सके. वह भी हत्या के बाद 'जय श्री राम’ के नारे लगा रही एक बेढंगी तिकड़ी के हाथों, जो बामुश्किल ही किशोर अपराधियों की श्रेणी से ऊपर थी. कडिय़ों को जोड़ें तो यह माफियाओं के खिलाफ उनकी कार्रवाई को ऐसे रंगों में रंग सकती थी, जिनसे वे बचने की कोशिश कर रहे थे.
यह भौचक कर देने वाला था? जैसे पहले ही मृत्यु-लेख लिखा जा चुका हो? आखिरकार अतीक और अशरफ ने जो कोई सुनना चाहे, अपनी जान के खतरे से आगाह किया था और सुप्रीम कोर्ट से भी अपील की थी कि यूपी से शिफ्ट कर दिया जाए. फिर, घातक आशंका से जुड़ा एक सीलबंद लिफाफा भी था, जिसे जरूरत पड़ी तो तीन ओर भेजना था. वाकई मीडिया का उन्मादी कवरेज भी आशंका बढ़ाता लगा...जो अंतत: अंत का हिस्सा बन गया.
हर हाल में, उमेश पाल की हत्या के सीसीटीवी फुटेज के बाद यह दूसरी बार था जब संगठित अपराध के तड़ातड़ गोलियां चलाने वाले तरीके का सीधा प्रसारण हुआ—यह 'कानून-व्यवस्था’ के उस अफसाने का बेहतरीन नुस्खा तो नहीं ही है जिसका मुख्यमंत्री ने इतना गुणगान किया था. यह हकीकत कि अतीक पुलिस की हिरासत में था और राज्य पुलिस ने अपना फर्ज निभाने में ढिलाई बरती, कोई सम्मान का तमगा तो नहीं है.
ऐसे समय जब भाजपा मुसलमानों और खासकर पसमांदा मुसलमानों को रिझाने की असंगत जान पड़ती राजनैतिक उपलब्धि हासिल करने का जतन कर रही हो, मुसलमानों में असुरक्षा की भावना तीखी करने वाली एक हत्या कोई अच्छी बात तो नहीं हो सकती. इसीलिए मुख्यमंत्री ने अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए पक्का किया कि घटना का कोई सिलसिलेवार असर न हो. पूरे राज्य में धारा 144 लगा दी गई और प्रयागराज में इंटरनेट ठप कर दिया गया.
फिर पुलिस व्यवस्था पर लगा दाग भी मिटाना था. यह पक्का करने के लिए कि जांच में किसी भी तरह का कोई समझौता न हो, उसे जांच की त्रिपक्षीय प्रकिया बना दिया गया. एक हत्या की जांच के लिए तीन सदस्यों की न्यायिक समिति है, जिसके प्रमुख इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज अरविंद कुमार त्रिपाठी हैं और सेवानिवृत्त जज बृजेश कुमार सोनी और पूर्व डीजीपी सुबेश कुमार सिंह अन्य दो सदस्य हैं. फिर उत्तर प्रदेश पुलिस ने दो विशेष जांच दल बनाने का ऐलान किया. एडिशनल डीसीपी (क्राइम) सतीश चंद्र की अध्यक्षता में पहला जांच दल हत्या की जांच करेगा. दो शीर्ष पुलिसजनों और एक फोरेंसिक लैब डायरेक्टर से बना दूसरा दल निगरानी करेगा.
जब योगी ने 19 अप्रैल को अतीक के मामले की तरफ पहली बार इशारा करते हुए 'कानून के शासन’ का जिक्र किया, तब उनका आशय शायद व्यवस्था की इसी बहाली से था—और इसकी वाजिब वजह भी थी. लखनऊ के शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय में पूर्व डीन ऑफ एकेडमिक्स प्रो. ए.पी. तिवारी कहते हैं, ''योगी की 2022 की जीत के पीछे कानून-व्यवस्था का नैरेटिव बड़ी वजहों में से एक था...इसके बगैर इतना आसान नहीं होता. यूपी को निवेश के जैसे बड़े प्रस्ताव मिले, उसमें भी भूमिका है. पहले राज्य की छवि थी कि माफिया काम नहीं करने देता, मुनाफे का बड़ा हिस्सा हड़प लेता है.’’
इससे अलबत्ता एक समानांतर नैरेटिव के फलने-फूलने पर विराम नहीं लगा. उत्साही जनता और भाजपा में उनके साथी-सहयोगी अतीक की हत्या को योगी के ऑपरेशन क्लीनअप के हिस्से के तौर पर देख रहे थे. आखिर, एक मुस्लिम डॉन का मारा जाना कट्टर हिंदुत्व के उस सांचे से पूरी तरह मेल खाता था जिससे योगी को जोड़ा जाता है. और टीवी के रिमोट का बटन दबाते ही तुरत-फुरत इंसाफ, 'जय श्रीराम!’ का नारा, तकरीबन इस जमाने के हिसाब से लिखी गई पटकथा मालूम देता था. नगर निकायों के चुनाव जब महज महीने भर दूर हैं, योगी उस घोड़े से शायद पूरी तरह उतरना न चाहें, रकाबें भले थोड़ी-बहुत इधर-उधर खिसक गई हों.
जुर्म और जमात
यूपी का संगठित अपराध अपनी जड़ में पार्टी के प्रति संशयवादी और धर्म के प्रति तटस्थ है. कुछ हद तक इसे और इसी तरह इसके खिलाफ योगी की कार्रवाई को भी जनता की नजरों में पूरी तरह समझा नहीं गया है. ठीक उन दूसरे क्षेत्रों की तरह जिनमें वे राजकाज के ज्यादा सार्वभौम नजरिये तक पहुंचने की खातिर इकरंगे हिंदुत्व की कट्टरपंथी छवि से ऊपर उठने की कोशिश करते रहे हैं, आंकड़े बताते हैं कि अपराध के खिलाफ योगी की लौह मुट्ठी उससे कहीं ज्यादा निष्पक्ष और न्यायसंगत है जितनी मानी जाती है.
असद और गुलाम से पहले हुए एनकाउंटरों के 181 शिकारों में महज 31.5 फीसद मुसलमान थे, और समुदाय के आपराधिक सरगनाओं की संख्या 66 में से महज 11 थी. बाकी विभिन्न जाति समूहों के हिंदू थे, जिनमें ठाकुर भी शामिल थे. विशेष पुलिस महानिदेशक, कानून एवं व्यवस्था प्रशांत कुमार, जो मेरठ के आइजी के पद पर काम करते हुए सुशील मूंछ, सुनील राठी और हाजी याकूब कुरैशी सरीखे बदमाशों का अदालत में समर्पण करवाकर योगी के सबसे भरोसेमंद पुलिस अधिकारी बन गए, कहते हैं, ''हमारी कार्रवाइयां धर्म, क्षेत्र और जाति के प्रति तटस्थ थीं.’’
योगी प्रशासन की नजरों में चढ़ा अगला बड़ा डॉन मऊ का बाहुबली और पांच बार का पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी है. वर्ग अतीक को मुख्तार से अलग करता है—डॉन होने के लिहाज से मुख्तार असाधारण रूप से कुलीन खानदान का है—लेकिन दमकती मूंछ से लेकर उससे झलकने वाले सामंती दबदबे तक बाकी सब एक जैसा है. सुनवाइयों से पीछे हटने वाले जजों को ही लीजिए: 2012 में एक के बाद लगातार 10 जज अतीक की जमानत याचिका पर पीछे हट गए थे, तो मुख्तार के मामले में एक भयभीत जज पिछले साल ही दो मामलों से पीछे हट गए थे.
या जघन्य अपराधों से चमचमाती हिस्ट्री शीट को लीजिए: अतीक के हाथों 2005 में राजू पाल की हत्या के बराबर उसी साल गाजीपुर में कथित तौर पर अंसारी के गिरोह के हाथों विधायक कृष्णानंद राय की गोली मारकर की गई हत्या थी. या जेल के भीतर से निरापद ढंग से अपनी जागीर चलाने की उनकी क्षमता को लीजिए: अतीक 40 करोड़ रुपए की एक संपत्ति अपने नाम लिखवाने के लिए, और वह भी उतने नफीस तरीके से नहीं, कथित तौर पर रियल एस्टेट के कारोबारी मोहित जायसवाल को उठवाकर देवरिया जेल ले आया था, तो मुख्तार एक जेलर को मौत की धमकी देने के जुर्म में सात साल की सजा काट रहा है.
या राजनैतिक व्यवस्था में उनकी गहरी पैठ को लीजिए: दोनों कई बार विधायक रह चुके हैं. 15 साल से जेल में बंद मुख्तार पर अब मुकदमों की भरमार के साथ कानून का हथौड़ा चला है. 2001 की उसरी चट्टी गैंगवार में एक हत्या के लिए जनवरी में उस पर एक मामला दर्ज किया गया. ईडी में मनी लॉन्ड्रिंग का एक मामला पहले ही चल रहा है और गैंगस्टर कानून के तहत एक व्यापक मामला 29 अप्रैल को अदालतों के सामने आने वाला है.
इस अफसाने में असुविधाजनक खामोशियां भी हैं. योगी ने हिंदू माफियाओं पर भी जहां इतनी ही कड़ी कार्रवाई की, स्थानीय बारीकियां अक्सर इसे जाति का ऐंगल दे देती हैं. जुलाई 2022 में कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर, जो सबसे खूनी मुठभेड़ों में एक था और जिसमें आठ पुलिसवालों की जान गई थी, दोनों पहलुओं का उदाहरण है. वह 1980 और ’90 के दशकों में हरिशंकर तिवारी और अमरमणि त्रिपाठी से चली आ रही यूपी के ब्राह्मण गैंगस्टरों की लंबी कतार में एक नाम था.
उसके खूनी अंत ने एक बार फिर इस विरोधी सुझाव को न्यौता दिया कि जब डॉन की फेहरिस्त में ठाकुर नाम शामिल होते हैं, तब योगी प्रशासन अपनी पूरी ताकत से प्रहार नहीं करता. यह सबसे ज्यादा पूर्वी उत्तर प्रदेश के आपराधिक बीहड़ों में गूंजता है. इस इलाके ने इतनी कुख्याति हासिल कर ली है कि ओटीटी के लिए मिर्जापुर और रंगबाज सरीखे खून से लथपथ हिट शो बने हैं.
योगी के आलोचक पहली मिसाल के तौर पर पूर्वांचल के दुर्दांत डॉन बृजेश सिंह का हवाला देते हैं. कभी दाऊद इब्राहीम के शार्प-शूटर रहे इस डॉन के खिलाफ मकोका का एक मामला दर्ज है और वह मुख्तार अंसारी का जानी दुश्मन है. विडंबना यह है कि 2001 के जिस उसरी चट्टी हत्याकांड में मुख्तार अब कानून के कठघरे में है.
उसमें बृजेश सिंह के गिरोह ने ही मुख्तार के काफिले पर सनसनीखेज हमला किया था और जो आदमी मारा गया था, जिसके पिता ने अब हत्या का मामला दर्ज करवाया है, वह उसके शूटरों में एक था. वाराणसी की एक एमएलसी सीट पर 25 साल से बृजेश के परिवार का एकाधिकार कायम है—योगी के यूपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पिछले साल उसकी पत्नी ने भाजपा के खिलाफ यह सीट जीती थी. और उसका भतीजा भाजपा का विधायक है.
मुख्यमंत्री के आलोचकों का कहना है कि वह अकेला नहीं है. पूर्व सांसद और माफिया धनंजय सिंह है, जो जौनपुर को अपना गढ़ मानता है और 2021 की एक जघन्य हत्या के बाद इंसाफ के कठघरे से चालाकी से बच निकला. या पश्चिम में मेरठ का फैशनपरस्त बदन सिंह बद्दो है, जिसने फरार रहते हुए इंस्टाग्राम पर पुलिस के एक पूर्व शीर्ष अफसर का मजाक उड़ाया, तो योगी के बुलडोजरों ने उसकी अवैध फैक्ट्री गिरा दी. दूसरे भी हैं:
उन्नाव के बलात्कार के मामले से कुख्यात कुलदीप सिंह सेंगर जिसे काफी छूट दी गई, पुराने रघुराज प्रताप सिंह उर्फ 'राजा भैया’ कुंडा में अपना कानून खुद हैं... दरअसल सिंह उपनामों की एक पूरी श्रेणी है. एक अपवाद, जिस पर गैंगस्टर कानून लगा और साथ ही जिसकी 2.5 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त कर ली गई, आजमगढ़ का ध्रुव या कुंटू सिंह था. अधिकारी ऐसी आलोचना को परे झटक देते हैं और कहते हैं कि मुख्यमंत्री समान पैमाने से सभी डॉन का पीछा करते हैं. खुद योगी इसे निरा झूठ कहकर खारिज कर चुके हैं.
नेता-अपराधी गठजोड़
अतीक किसी भी विचारधारा से मुक्त संगठित अपराध और इसमें राजनीति के घालमेल की एक मिसाल था और ऐसा करने वाला वह कोई पहला इंसान नहीं था. 1980 के दशक में विकास निधि मिलना शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश ने डकैती के अपने पुराने दौर से बाहर निकलकर आधुनिक संगठित अपराध की दुनिया में कदम रख दिए, जब निविदाओं और ठेकों के लिए खूनी संघर्ष होने लगे और पुरानी रंगदारी या जबरन वसूली भी बदस्तूर जारी रही.
इस सबमें महारत रखने वाले बेईमान किस्म के कुछ लोगों ने पहले तो संसाधन-संपन्न अन्य क्षेत्रों का फायदा उठाना शुरू किया और अंतत: राजनीति को 'इस सबका हिस्सा बनाने’ में कोई कसर नहीं छोड़ी. हाल यह हो गया कि कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं रही. पूर्वांचल के पहले सरगना कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी ने कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी तक पर अपना प्रेम उड़ेला और कल्याण सिंह, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह और मायावती के शासनकाल में बाकायदा राज्य मंत्रिमंडल में पद संभाला. रही बात अतीक की तो उसका सबसे अधिक जुड़ाव सपा के साथ रहा, और कई लोगों के लिए वह मुलायम के 'जंगलराज’ के दिनों का प्रतीक है, जिसके लिए बाकी सरकारों की तुलना में वही समय सबसे मुफीद रहा था.
हालांकि, गहराई से नजर डालें तो इस सबमें कुछ जटिल परतें उघड़ती नजर आती हैं. अतीक दो बार अविभाजित अपना दल के साथ रहा और आखिर में तीन साल तो उसने बतौर अध्यक्ष इसकी जिम्मेदारी संभाली—इस पार्टी के मुख्य धड़े की मौजूदा प्रमुख अनुप्रिया पटेल एक केंद्रीय मंत्री हैं.
एक दशक पहले जब अतीक ने उनके पिता सोनेलाल पटेल के साथ कुछ सियासी ताकतों से हाथ मिलाया और इलाहाबाद के आसपास के क्षेत्रों से उम्मीदवार उतारे तो मुस्लिम वोट बंट गया और इसका एक हिस्सा पटेल के कुर्मी वोट बैंक के साथ मिलकर जाहिरा तौर पर सपा विरोधियों को फायदा पहुंचाने वाला साबित हुआ, जिसमें भाजपा भी शामिल थी. और अतीक जैसी विवादास्पद शख्सियत को फिर से पार्टी में जगह दिया जाना मुलायम और अखिलेश के बीच पारिवारिक झगड़े का एक बड़ा कारण रहा. अतीक के भाजपा में भी गहरे संपर्क रहे हैं—और इसकी एक लंबी फेहरिस्त दिवंगत केशरीनाथ त्रिपाठी से शुरू होकर योगी कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्रियों तक जाती है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि योगी एक जटिल चुनौती से जूझ रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो एक पीढ़ीगत परिवर्तन नजर आ रहा है जिसके लिए खुद उत्तर प्रदेश दबाव बना रहा है. दरअसल, मुख्यमंत्री समय के साथ कदमताल करके राज्य को एक निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं, और इसके लिए माफिया पर कार्रवाई अपरिहार्य शर्त है. साथ ही शासन की तरफ से अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी है.
पिछले साल जुलाई में मस्जिदों में अजान को लेकर विवाद के बाद उन्होंने सभी धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकरों को हटाने (या उनकी आवाज कम रखने) का आदेश जारी कर दिया. राज्य के हजारों मंदिरों, मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटा दिए गए—यहां तक कि उनके अपने गोरखनाथ मंदिर के लाउडस्पीकरों का डेसिबल घटा दिया गया.
पिछले साल रामनवमी और हनुमान जयंती के दौरान कई अन्य राज्यों में हिंसा की घटनाएं सामने आईं लेकिन जुलूस की अनुमति पर सख्त मानदंड अपनाने और शांति बनाए रखने के लिए पूर्व में शपथपत्र भराने का ही नतीजा था कि यूपी में अनपेक्षित रूप से शांति रही. मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी का दावा है, ''25 करोड़ लोगों की आबादी वाले इस राज्य में रामनवमी पर 800 से अधिक रैलियां आयोजित हुईं और इस दौरान रमजान भी चल रहा था. लेकिन एक भी अप्रिय वारदात की सूचना नहीं मिली.’’
कार्रवाई का जमीनी स्तर पर प्रत्यक्ष प्रभाव नजर आता है—तमाम आम नागरिक सुरक्षा मोर्चे पर हालात बदलने की पुष्टि करते हैं. और मेरठ के ऑटो-चोरी सिंडिकेट जैसे आपराधिक ठिकाने ध्वस्त कर दिए गए हैं. इसमें बुलडोजर एक अहम हथियार बनकर उभरा है, यह बात अलग है कि इसे पूरी तरह कानून-सम्मत नहीं माना जाता. मुख्यमंत्री के आलोचक कहते हैं कि यह अक्सर किसी माफिया की हवेली और किसी राजनैतिक शिकार के बीच अंतर करने में नाकाम रहता है.
इस संदर्भ में वे दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट एक्टिविस्ट आफरीन फातिमा के प्रयागराज स्थित घर को रातोरात तोड़े जाने का हवाला देते हैं, जिनके 56 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता पिता पर 'दंगों का मास्टरमाइंड’ होने का आरोप था. जब इस फरवरी में कानपुर में बुलडोजर मुहिम के दौरान प्रमिला दीक्षित और उनकी बेटी नेहा की जलकर मौत हो गई थी तो बुलडोजर पर चर्चाएं तेज हो गईं और इसे बेजा इस्तेमाल का प्रतीक करार दिया जाने लगा. इस पर योगी प्रशासन ने अपनी रणनीति थोड़ी बदलकर बेहद दिलचस्प ढंग से रॉबिन हुड जैसा रुख दर्शाया: अतिक्रमण-मुक्त हुई जगहों पर कम लागत वाले आवास बनाए जा रहे हैं.
बहरहाल इसे कानून मंजूरी नहीं देता और अदालतें इस पर सवाल खड़े कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कई मौकों पर आवास/आश्रय के हक को मौलिक अधिकार बताए जाने का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील सैयद फरमान अहमद नकवी कहते हैं, ''लोकतंत्र और निरंकुशता के बीच की बारीक रेखा’’ पार नहीं की जानी चाहिए. वहीं, अधिवक्ता आइ.बी. सिंह बताते हैं, ''माफिया के खिलाफ बहुत सारी कार्रवाई विधिसम्मत थी, लेकिन संपत्ति कब्जे में लेने की होड़ सवालों के घेरे में है. लखनऊ की 50 फीसद से अधिक पुरानी इमारतों में सही नक्शे नहीं हैं, इसलिए इन सभी पर खतरा मंडरा रहा है. लोग कहां जाएंगे?’’
भाजपा के पास हमेशा हर बात का नपा-तुला जवाब होता है. सपा प्रवक्ता सुनील सिंह साजन सारी बात को तीन वाक्यों में समेटते हुए कहते हैं, ''राजनैतिक कार्यकर्ता, एक्टिविस्ट, और पत्रकार भी अगर सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उन पर मामले दर्ज हो जाते हैं. पहले हम पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते थे, अब देखिए यूपी में कौन-सी जाति मलाईदार पदों पर काबिज है...सब अच्छी तरह जानते हैं. इसी तरह कानून-व्यवस्था के नाम पर ऐसी दलीलें भी फर्जी हैं.’’
इस सबको गलत साबित करने के लिए योगी को ज्ञात माफिया तत्वों के साथ कड़ाई से निपटना हो सकता है. पूरे सिस्टम में माफिया ने गहरी जड़ें जमा रखी हैं और सिर्फ सामने नजर आ रहे खलनायकों से निबटने से आगे जाना होगा. अतीक अहमद को गोली मारे जाने के तीन दिन बाद योगी आदित्यनाथ ने जो कहा, वह परोक्ष रूप से इसी घटना के संदर्भ में था. उन्होंने ऐलान किया, ''अब पेशेवर अपराधी या माफिया किसी को धमका नहीं सकते. पिछले छह साल में कोई दंगा नहीं हुआ. कानून का राज कायम है.’’ खैर, अब यह तय करना होगा कि न्याय का सिद्धांत भी सही से लागू हो.
—साथ में प्रशांत श्रीवास्तव
पश्चिम के माफिया सरगना
सुशील मूंछ, अपराध क्षेत्र: मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुकदमे: 49
सुशील मूंछ, लंगड़ा और प्रधानजी जैसे नाम से भी चर्चित है. उसके गिरोह का नाम आइएएस 99 है. केबल ऑपरेटर के धंधे के साथ शुरुआत करके मूंछ भाड़े के हत्यारों का एक संगठित रैकेट चला रहा था. हत्या, डकैती और जबरन वसूली के आरोप में उसके खिलाफ मेरठ और मुजफ्फरनगर जिले में 49 मामले दर्ज हैं जिनमें हत्या के 10 से अधिक मामले शामिल हैं.
2012 में उसे हत्या के आरोप में पहली बार जब गिरफ्तार किया गया था तब वह एक कमउम्र लड़की के साथ फिल्म देखने जा रहा था. उसे 2017 में जमानत पर रिहा कर दिया गया था और 2019 तक पुलिस की पकड़ से बाहर था. लेकिन उसने मुजफ्फरनगर अदालत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया क्योंकि उसे डर था कि वह मुठभेड़ में मारा जाएगा. वह फिलहाल आंबेडकरनगर जेल में बंद है.
उधम सिंह, अपराध क्षेत्र: मेरठ, मुकदमे: 70
मेरठ के करनावल गांव का रहने वाला उधम सिंह के गुर्गे मनोज राणा की मूंछ ने कथित तौर पर 2016 में बिजनौर के सिविल लाइंस इलाके में हत्या कर दी और तब से उधम उससे हिसाब चुकता करने के लिए मौके की तलाश में था. जब उधम सिंह ने 2018 में खुलेआम यह ऐलान किया कि वह मूंछ की हत्या कर देगा तब उसके खिलाफ आइपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत बिजनौर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया था.
आखिरकार 2021 में उसे यूपी पुलिस ने तब गिरफ्तार कर लिया जब वह मेरठ में बैंक कर्मचारियों को धमकाने लगा. वह फिलहाल उन्नाव जेल में बंद है जहां से वह तब तक सफलतापूर्वक अपना रैकेट चलाता रहा जब तक कि पुलिस ने उसके गिरोह और गतिविधियों पर नकेल कसना शुरू नहीं कर दिया. उसके गिरोह के 30 से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है और उसकी कई संपत्तियों को जब्त कर लिया गया है.
बदन सिंह बद्दो, अपराध क्षेत्र: मेरठ, मुकदमे: 43
अड़तालिस वर्षीय बद्दो ज्यादा चुस्त-दुरुस्त और फैशनपरस्त है. वह अक्सर शर्ट, पैंट और मैचिंग पॉकेट स्क्वायर वाले ब्लेजर में दिखता है. उसकी तड़क-भड़क केवल कपड़ों तक ही सीमित नहीं है. 2019 में, बद्दो एक होटल में कथित तौर पर पुलिस टीम को शराब पिलाकर और उनकी ऐश-मौज का इंतजाम करके चंपत हो गया था.
माना जाता है कि बद्दो देश छोड़कर भाग गया है और उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस (आरसीएन) भी जारी किया गया है. उसके बारे में कहा जाता है कि वह ऑस्ट्रेलिया में अपना बिजनेस करता जहां उसकी अलग रह रही पत्नी और बेटी रहती हैं. हालांकि, पुलिस बद्दो से उनके संबंध से इनकार करती है. 1996 में वकील रविंदर सिंह की हत्या में उसे 2017 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. पुलिस का दावा है कि उसने उसके पूरे अपराध नेटवर्क को खत्म कर दिया है.
सुंदर भाटी, अपराध क्षेत्र ः दिल्ली एनसीआर, मुकदमे: 62
अतीक-अशरफ की हत्या में सुंदर भाटी का नाम सामने आ रहा है. बताया जा रहा है कि सुंदर भाटी के इशारे पर अतीक-अशरफ के हत्यारों तक जिगाना पिस्टल पहुंचाई गई थी. दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए आतंक का पर्याय रहे ग्रेटर नोएडा के घंघौला गांव निवासी कुख्यात सुंदर भाटी ने राजनैतिक संरक्षण के जरिए अपराध की जमीन को पुख्ता की थी.
पैठ भी ऐसी कि वह जेल में रहने के दौरान खेल प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर के साथ पुरस्कार बांटता था. हत्या, जमीन पर अवैध कब्जे, रंगदारी, आपराधिक साजिश समेत सुंदर भाटी पर कुल 62 मुकदमे दर्ज हैं. गौतम बुद्ध नगर जिला न्यायालय ने हरेंद्र प्रधान हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उसके बाद से सुंदर सोनभद्र की जिला जेल में बंद है.
योगेश भदौड़ा, अपराध क्षेत्र: मेरठ, मुकदमे: 60
योगेश भदौड़ा पश्चिमी यूपी के डी-75 गैंग का संचालन करता था. 1995 में योगेश के थाना रोहटा स्थित गांव में पड़ोसी वीरेंद्र से योगेश भदौड़ा का नाली को लेकर विवाद हो गया. इसमें योगेश भदौड़ा की मां की हत्या कर दी गई. कुछ दिन बाद योगेश के भाई दुष्यंत की भी हत्या हो गई. इसका बदला लेने के लिए योगेश ने वीरेंद्र के भाई और पिता की हत्या कर दी.
इसके बाद से योगेश का आतंक बढ़ता गया. वह 15 साल तक अपने गांव का लगातार प्रधान रहा. योगेश के गैंग ने पश्चिमी यूपी के साथ दिल्ली और हरियाणा में भी आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया. हत्या, हत्या का प्रयास, फिरौती, अपहरण जैसे दो दर्जन से अधिक मामलों में वांछित योगेश को 2013 में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया. पिछले वर्ष कोर्ट ने योगेश को दो साल के कारावास की सजा सुनाई है. एक दर्जन से अधिक मामलों में कोर्ट की कार्यवाही अंतिम चरण में है.
अनिल दुजाना, अपराध क्षेत्र: दिल्ली एनसीआर, मुकदमे: 62
नोएडा के बादलपुर इलाके के दुजाना गांव का रहने वाले अनिल नागर उर्फ अनिल दुजाना पर गाजियाबाद के कवि नगर थाने में हरबीर पहलवान की हत्या का पहला मुकदमा दर्ज हुआ था. साहिबाबाद स्थित भोपुरा में नवंबर, 2011 में माफिया सुंदर भाटी के साले की शादी थी.
उस मौके पर अनिल दुजाना ने अपने साथियों की मदद से एक-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग की, जिसमें तीन लोग मारे गए लेकिन सुंदर भाटी बच निकला. अनिल दुजाना तिहरे हत्याकांड में जनवरी 2012 में पकड़ा गया. वह जेल से अपने गैंग को चलाने लगा. दुजाना पर हत्या, हत्या का प्रयास, रंगदारी, अपहरण समेत कुल 62 मुकदमे दर्ज हैं. फिलहाल दुजाना अयोध्या जेल में बंद है.
पूर्वांचल के बड़े सरगना
विजय मिश्रा, अपराध क्षेत्र: भदोही, मामलों की संख्या: 83
यूपी सरकार ने जिन 66 बड़े माफिया डॉन पर नजरें गड़ा रखी हैं, उनमें दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा मामले भदोही जिले के ज्ञानपुर कस्बे से चार बार के विधायक रहे मिश्रा के खिलाफ ही दर्ज हैं. मिश्रा ने शुरुआत एक पेट्रोल पंप और परिवहन व्यवसाय के साथ की, और फिर रेत खनन और भूमि सौदों के क्षेत्र में कदम रखा. 2010 में मिश्रा ने नंद गोपाल गुप्ता पर बम हमले से सुर्खियां बटोरीं, जो उस समय बसपा सरकार में राज्य मंत्री थे और अभी योगी कैबिनेट में मंत्री हैं.
राष्ट्रीय राजमार्ग-2 स्थित औराई टोल प्लाजा पर टोल वसूलने का अधिकार हासिल करने वाले एक ठेकेदार को धमकाने के आरोप में 18 जुलाई, 2020 को उसके खिलाफ गुंडा ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था. 14 अगस्त, 2020 को मिश्रा के तब गिरफ्तार किया गया जब संपत्ति विवाद को लेकर उसके ही एक रिश्तेदार कृष्ण कांत तिवारी ने उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई. 2020 में मिश्रा ने आरोप लगाया कि योगी सरकार उसे निशाना बना रही है क्योंकि वह एक 'ब्राह्मण’ है.
मुख्तार अंसारी, अपराध क्षेत्र: गाजीपुर, मऊ, वाराणसी, मामलों की संख्या: 61
मऊ से पांच बार विधायक रहे 59 वर्षीय अंसारी 15 साल से अधिक समय से जेल में है. हालांकि, पिछले साल ही उसे पहली बार दो मामलों में दोषी ठहराया गया.
मुख्तार अंसारी ने पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, गाजीपुर से छात्र राजनीति में कदम रखा. पहली बार 1996 में बसपा के टिकट पर विधायक बना. 2007 से 2017 तक खुद अपने संगठन कौमी एकता दल (क्यूईडी) के बैनर तले निर्दलीय चुनाव लड़ा और फिर बसपा का दामन थाम लिया. आखिरी तीन चुनाव तो जेल में रहने के दौरान ही जीते.
शुरू में संपत्ति कारोबार और ठेकेदारी से जुड़े अंसारी ने 90 के दशक के आसपास अपराध की दुनिया में कदम रखा. 2005 में उसका नाम भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की दिनदहाड़े हुई हत्या में सामने आया. हालांकि, 2019 में सीबीआइ ने उसे और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया.
यह बाहुबली नेता फिलहाल बांदा जेल में बंद है. यूपी पुलिस ने हालिया वर्षों में मुख्तार के गिरोह के स्वामित्व वाली लगभग 300 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है.
ध्रुव उर्फ कुन्टू सिंह, अपराध क्षेत्र: आजमगढ़, मामलों की संख्या: 75
ध्रुव सिंह उर्फ कुन्टू सिंह का गिरोह ''डी-11’’ नाम से जाना जाता है. इस गिरोह की गतिविधियों में जबरन वसूली, अवैध हथियारों का व्यवसाय और ठेके पर हत्याएं करना शामिल है. आरोप हैं कि जनवरी 2021 में कुख्यात गैंग्स्टर अजित सिंह की सनसनीखेज हत्या तथा 2013 में बसपा के पूर्व विधायक सर्वेश उर्फ सीपू सिंह की हत्या के पीछे कुन्टू सिंह का ही दिमाग था.
इस साल फरवरी में मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास ने दावा किया था कि कासगंज जेल में बंद कुन्टू सिंह से उसे जान का खतरा लगता है. गैंग्स्टरों, बृजेश सिंह और धनंजय सिंह, से अंसारी परिवार की लंबे समय से अनबन चली आ रही है. कुन्टू सिंह आजमगढ़ का रहने वाला है. जेल में बंद रहने के दौरान उस पर कानून का शिकंजा कसा है. पिछले वर्ष मई में पूर्व विधायक सर्वेश सिंह सीपू हत्याकांड के मुकदमे में अदालत ने कुन्टू सिंह समेत सात को उम्र कैद की सजा सुनाई थी. आधा दर्जन मुकदमों की सुनवाई अंतिम चरण में है.
बृजेश कुमार सिंह, अपराध क्षेत्र: वाराणसी, पूर्वी यूपी, मामलों की संख्या: 11
बनारस के धरहरा गांव के रहने वाले बृजेश सिंह ने सन् 1984 में हुई अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में कदम रखा था. तीन दशक लंबे आपराधिक जीवन में बृजेश कुमार सिंह पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ओफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम ऐक्ट), टाडा (टेररिस्ट ऐंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज ऐक्ट) और गैंगस्टर ऐक्ट के तहत हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश रचने से लेकर, दंगा-बवाल भड़काने, सरकारी कर्मचारी को इरादतन चोट पहुंचाने, झूठे सरकारी कागजात बनवाने, जबरन वसूली करने और धोखाधड़ी से जमीन हड़पने तक के मुकदमे लग चुके हैं.
एमएलसी चुनाव के दौरान दिए गए शपथपत्र के अनुसार बृजेश कुमार सिंह पर केवल 11 मुकदमे ही दर्ज हैं. बृजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था. 2008 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भुवनेश्वर से उसको गिरफ्तार किया था. इसके बाद एक अन्य मामले में भी बृजेश को जेल जाना पड़ा. पिछले वर्ष जमानत पर रिहा हुआ.
एनकाउंटर का दौर
मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से पिछले छह साल में राज्य पुलिस ने 183 अपराधियों को एनकाउंटर में मार गिराया है, या पुलिस ने अपनी भाषा में 'आत्मरक्षा की कार्रवाई’ को अंजाम दिया है. मार गिराए गए इन लोगों में 59 यानी 32 फीसद मुसलमान थे, जो आंकड़ा इस धारणा के उलट है कि खासकर इस समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाया जाता है.
विशेष पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था, प्रशांत कुमार के मुताबिक, यूपी में एनकाउंटर आम तौर पर पुलिस और अपराधियों के बीच मुठभेड़ के दौरान होते हैं. वे कहते हैं, ''कुछ अपराधी आसानी से समर्पण कर देते हैं, लेकिन कुछ फायरिंग या हमला शुरू कर देते हैं. पुलिस भी अपने बचाव में जवाबी फायरिंग करती है. जो लोग एनकाउंटर पर सवाल उठाते हैं, उन्हें पहले इन अपराधियों की पृष्ठभूमि जानने के साथ यह भी देख लेना चाहिए कि उनके पास किस तरह के हथियार होते हैं.’’
लेकिन यह उमेश पाल हत्याकांड में वांछित अतीक अहमद के बेटे असद और उसके सहयोगी गुलाम के 'एनकाउंटर’ को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब नहीं है. इन दोनों को 13 अप्रैल को झांसी में मार गिराया गया था. एसटीएफ का दावा है कि पीछा करने के दौरान उनकी बाइक पलटकर सड़क से नीचे उतर गई.
लेकिन सवाल यह है कि पथरीली और उबड़-खाबड़ सतह के बावजूद बाइक पर एक खरोंच तक नहीं आई. यही नहीं, मौके से कोई हेलमेट भी बरामद नहीं हुआ है. अगर सुरक्षा के लिहाज से न भी देखें तो क्या पहचान छिपाने के लिए वे हेलमेट का इस्तेमाल नहीं करते? और फिर पूरे राज्य से गुजरते हुए ये लोग झांसी पहुंचने में कैसे सफल हुए, जैसा पुलिस दावा कर रही है?
ऐसे तमाम मुठभेड़ फर्जी होने के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर प्रशांत कुमार ने इससे साफ इनकार किया. उन्होंने मुठभेड़ों की जांच का हवाला भी दिया. जैसे 2020 में गैंगस्टर विकास दुबे एनकाउंटर में यूपी पुलिस को क्लीन चिट मिल चुकी है. वे पुरजोर ढंग से कहते हैं, ''तमाम जांच के बावजूद अब तक एक भी एनकाउंटर फर्जी नहीं साबित हुआ है.’’
समाजवादी पार्टी के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि अपराधियों के 'एनकाउंटर’ संबंधी योगी आदित्यनाथ के कथित आदेश ने पुलिस बल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी है. उन्होंने कहा, ''मुख्यमंत्री चाहे विधानसभा में मौजूद हों या किसी अन्य मंच पर, अक्सर ही 'ठोक दो’ कहते रहते हैं. कभी-कभी पुलिस समझ नहीं पाती कि किसे 'ठोकना’ है और कभी-कभी लोगों को पता नहीं होता कि किसे 'ठोकना’ है.’’
‘‘इलाहाबाद हाइकोर्ट के एक वरिष्ठ वकील सैयद फरमान अहमद नकवी कहते हैं, ''एनकाउंटर किसी तरह से न्याय सक्वमत नहीं हो सकता. न्याय कानूनी प्रक्रिया से हो सकता है, बंदूक से नहीं.’’
अतीक अहमद की जिंदगी और जरायम
अतीक और चांदबाबा के बीच कई बार गैंगवार हो चुकी थी. 1989 में विधानसभा चुनाव आया तो अतीक ने शहर पश्चिमी से निर्दलीय चुनाव लड़ा और चांदा बाबा को पटखनी देकर पहले ही प्रयास में विधायक बना.
संगम नगरी प्रयागराज में सिविल लाइंस चौराहे से करीब 3 किलोमीटर दक्षिण में चकिया चौराहे से केसारी-मसारी रोड पर अल हसन फारूकी गर्ल्स इंटर कॉलेज के ठीक सामने पड़े मकान के मलबे की चौकीदारी में दर्जन भर पुलिस वाले तैनात हैं. यह माफिया अतीक अहमद का पुश्तैनी मकान था, जो कभी 100 वर्ग मीटर में फैला था. जैसे-जैसे अतीक अहमद का आपराधिक रसूख बढ़ता गया मकान की चौहद्दी भी बढ़ती गई.
बुलंदी पर पहुंचने पर अतीक का पुश्तैनी मकान 10 हजार वर्ग मीटर जमीन पर फैला किला बन गया था. 1979 में इसी जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर बने मकान में रहकर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) रेलवे स्टेशन पर तांगा चलाने वाले फिरोज अहमद के बड़े लड़के 17 साल के अतीक पर पहली बार हत्या का आरोप लगा. चकिया मोहल्ले में रहने वाले वकील विनायक राय बताते हैं, ''उन दिनों इलाहाबाद के पुराने इलाके में चांद बाबा नाम के अपराधी का एकछत्र राज था. इलाहाबाद के बड़े नेताओं और स्थानीय पुलिस ने चांद बाबा के खिलाफ अतीक को संरक्षण दिया. अतीक जरायम की दुनिया का बड़ा नाम बन गया.’’
अतीक और चांदबाबा के बीच कई बार गैंगवार हो चुकी थी. 1989 में विधानसभा चुनाव आया तो अतीक ने शहर पश्चिमी से निर्दलीय चुनाव लड़ा और चांदा बाबा को पटखनी देकर पहले ही प्रयास में विधायक बना. कुछ महीने बाद ही गैंगवार में चांद बाबा की मौत हो गई. अतीक का खौफ इस कदर फैला कि लोग इलाहाबाद पश्चिमी सीट से टिकट लेने से मना कर देते. उसने निर्दलीय रहकर 1991 और 1993 में भी लगातार चुनाव जीते.
इस बीच 1996 में वह सपा के टिकट से चुनाव लड़ा और चौथी बार विधायक बना. 1999 में अपना दल का हाथ थामा. प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा. लेकिन जीत नहीं पाया. 2002 में अपना दल से ही 5वीं बार शहर पश्चिमी से विधानसभा में पहुंचा. इसी दौरान अतीक का विवाह शाइस्ता परवीन से हुआ. अतीक और शाइस्ता के पांच बेटे उमर, अली, असद (एनकाउंटर में मारा गया), ऐजम और अबान हैं.
2003 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अतीक की सपा में वापसी कराई. 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक ने सपा के टिकट पर फूलपुर से चुनाव लड़ा और जीता. इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा सीट खाली हुई. अतीक ने अपने भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को उतारा. लेकिन जितवा नहीं पाया.
कभी अतीक का दाहिना हाथ रहा राजू पाल बसपा के टिकट पर 4 हजार वोटों से जीत गया. 25 जनवरी, 2005 को राजू पाल की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. विनायक राय बताते हैं, ''9 दिन पहले ही राजू की शादी हुई थी. 2005 में उपचुनाव हुआ. बसपा ने पूजा पाल को उतारा. सपा ने अशरफ को उतारा. पूजा पाल हार गईं.’’
2007 के राज्य चुनाव में इलाहाबाद पश्चिमी से एक बार फिर पूजा पाल और अशरफ आमने-सामने थे. इस बार पूजा ने चुनाव जीता. बसपा अध्यक्ष मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी. सपा ने अतीक को बाहर कर दिया. मायावती सरकार ने ऑपरेशन अतीक शुरू किया. अतीक को मोस्ट वांटेड घोषित किया. रिकॉर्ड में गैंग का नाम दर्ज हुआ आइएस (इंटर स्टेट) 227. उस वक्त गैंग में 120 से ज्यादा सदस्य थे.
2012 में विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए अतीक ने अपना दल से पर्चा भरा. हाइकोर्ट में जमानत की अर्जी दी. लेकिन 10 जजों ने केस से खुद को हटा लिया. 11वें जज ने जमानत दे दी. 2014 के लोकसभा चुनाव में श्रावस्ती से सपा उम्मीदवार और 2018 में फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में अतीक को निर्दलीय के रूप में हार का सामना करना पड़ा.
इसी वर्ष दिसंबर में रंगदारी वसूलने के लिए लखनऊ के कारोबारी मोहित जायसवाल को कथित तौर पर देवरिया जेल में पीटने के बाद अतीक को गुजरात की साबरमती जेल में शिफ्ट कर दिया गया था. अतीक को पहली सजा 44 साल बाद प्रयागराज के एमपी-एमएलए कोर्ट ने 28 मार्च को 17 साल पुराने मामले में सुनाई, जिसमें बसपा विधायक राजू पाल की हत्या में गवाह रहे उमेश पाल का अपहरण कर लिया गया था. कोर्ट ने अतीक अहमद और तीन अन्य आरोपियों को उम्रकैद के साथ एक-एक लाख जुर्माने की सजा सुनाई.
पहली बार इसी वर्ष मार्च में उमेश पाल के अपहरण के 17 साल पुराने मामले में सजा सुनाई गई, जो राजू पाल की हत्या का गवाह था
101 मामले दर्ज थे अतीक अहमद के खिलाफ
416 करोड़ रुपए की संपत्ति अतीक और परिवार की अब तक जब्त की गई है
17 वर्ष की उम्र में पहली हत्या की.
''मार देते तो 'मैच फिक्सड’ होने का आरोप लगता’’
अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या से उपजे सवालों पर उत्तर प्रदेश के स्पेशल डीजी (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार की एसोसिएट एडिटर आशीष मिश्र से बातचीत के अंश:
● प्रयागराज में उमेश पाल और फिर अतीक-अशरफ की हत्या पुलिस के खुफिया तंत्र पर सवाल उठे रहे हैं?
खुफिया तंत्र ने अपना काम किया है. अतीक-अशरफ की हत्या के बाद प्रदेश में पुलिस ने कहीं भी तनाव पैदा नहीं होने दिया.
● अतीक-अशरफ की हत्या के दौरान हथियारबंद पुलिसवालों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. उमेश पाल के सुरक्षागार्ड भी किसी प्रकार की जवाबी कार्रवाई नहीं कर पाए थे? यह पुलिस की ट्रेनिंग पर सवाल है?
उमेश पाल के हत्यारों ने गनर को संभलने का मौका ही कहां दिया था. अतीक और अशरफ के हत्यारों पर पुलिस जवाबी फायरिंग करती तो मीडिया के लोगों के चोटिल होने की आशंका थी. अगर पुलिस अतीक-अशरफ के हत्यारों को मौके पर मार देती तो आरोप लगता कि 'मैच फिक्सड’ था.
● अतीक-अशरफ को मारने वाले तीनों शूटर के पीछे क्या किसी अन्य का हाथ है?
स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) जांच कर रही है.
● झांसी में असद के एनकाउंटर पर भी सवाल उठे हैं?
एनकाउंटर की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश हुए हैं. असद ने पुलिस पर फायर किया, यह किसी ने नहीं देखा. पहले यही लोग कह रहे थे कि पुलिस की अतीक से सेटिंग है. पुलिस करे तो बुरी और न करे तो और भी बुरी.
● पुलिस पर बृजेश सिंह जैसे ठाकुर जाति के अपराधियों को बचाने का आरोप लग रहा है? बदन सिंह बद्दो जैसे कई पुलिस की पकड़ से बाहर हैं?
पुलिस विभाग ने प्रदेश के अपराधियों की जो सूची जारी की है उसमें ठाकुर, ब्राह्मण, जाट, गुर्जर समेत सभी जातियों के माफिया हैं. इसमें बृजेश सिंह का भी नाम है.
● अतीक और अशरफ को रात में मेडिकल के लिए प्रयागराज के काल्विन अस्पताल ले जाने पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं?
अस्पताल में डॉक्टरों की पूरी टीम रहती है. थाने में मेडिकल करा पाना संभव नहीं था.
‘‘अब प्रोफेशनल अपराधी या माफिया किसी को धमकाते नहीं...पहले राज्य की साख पर सवाल था; अब अपराधियों के सामने संकट है. पिछले छह साल में दंगे नहीं हुए. प्रदेश में कानून का राज कायम है’’
—योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
‘‘उत्तर प्रदेश में अपराध चोटी पर पहुंच चुका है और अपराधियों के मनोबल बढ़े हुए हैं...जब कोई सुरक्षा घेरे में खुलेआम गोली चलाकर मारा जा सकता है तो आम आदमी की सुरक्षा का क्या होगा?’’
—अखिलेश यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश और अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
‘‘उत्तर प्रदेश 'एनकाउंटर प्रदेश’ बन गया है. सुप्रीम कोर्ट को इस बेहद संगीन और चिंताजनक हालात का संज्ञान लेना चाहिए’’
—मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश और बसपा प्रमुख
‘‘उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर अब जैसे कोई सामान्य बात हो गई है. मैं राज्य में खुली अराजकता और कानून-व्यवस्था को पूरी तरह बदहाल देखकर अवाक हूं’’
—ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख
‘‘अपराधियों को कठोर सजा दी जानी चाहिए, लेकिन यह कानून के मुताबिक होना चाहिए. राजनैतिक मकसद केलिए कानून के राज से खिलवाड़ लोकतंत्र के लिए भला नहीं है’’
—प्रियंका गांधी, कांग्रेस की उत्तर प्रदेश, प्रभारी महासचिव

