
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट 2023 पेश करने खड़ी हुईं, तो हर कोई जानता था कि यह संतुलन साधने की मुश्किल कवायद होने वाली है. भले इस वित्त वर्ष में देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7 फीसद रहने का अनुमान है, जो सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ऊंची है और वित्त मंत्री ने खुद उसे दुनिया में ''चमकता सितारा’’ कहा है, मगर उन्हें कई अहम मसलों से टकराना है.
कोविड-19 और रूस के युक्रेन युद्ध की वजह से भारी महंगाई और तीखी आर्थिक ढलान के चलते दुनिया भर में छाई मंदी के साए लंबे होते जा रहे हैं. जी-20 देशों के ताकतवर समूह का अध्यक्ष होने के नाते भारत के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में देशों के रुख में फर्क पाटने और भरोसा बहाली की प्रेरणा बनना भी बेहद जरूरी है. यह साल नरेंद्र मोदी के लिए राजनैतिक तौर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नौ राज्यों के विधानसभा और 2024 में आम चुनाव भी होने हैं. विपक्ष, खासकर कांग्रेस बढ़ती बेरोजगारी के साथ-साथ महंगाई के लिए सरकार पर बुरी तरह हमलावर है.
अपने भाषण की शुरुआत में सीतारमण ने तीन महत्वपूर्ण आर्थिक एजेंडों का जिक्र किया, जो बजट का फोकस है. पहला, ''वृद्धि और रोजगार सृजन को सर्वाधिक प्रोत्साहन देना.’’ पहले से ही जुड़ा दूसरा यह है कि ''देश के लोगों, खासकर युवाओं को अपनी आकांक्षाएं पूरी करने के लिए ढेर सारे अवसर मुहैया कराना.’’ तीसरा, राजकोषीय घाटे को काबू में रखकर ''व्यापक आर्थिक स्थायित्व को प्रश्रय देना.’’ यह आसान काम नहीं था.
अलबत्ता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन से वित्त मंत्री ने पूंजीगत खर्च में भारी इजाफे का ऐलान किया और उसके लिए 10 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया, जो 2022-23 के मुकाबले 33 फीसद की बढ़ोतरी थी. रेलवे और सड़क तथा राजमार्ग के लिए भी भारी प्रावधान किया गया, जो क्रमश: 48 फीसद और 24.4 फीसद की बढ़ोतरी थी. पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए घर की मद में भी 66 फीसद बढ़ोतरी का प्रावधान है. इसके अलावा पर्यटन और सूक्ष्म, लघु, और मझोले उद्योग (एमएसएमई) जैसे प्रमुख रोजगार संभावना वाले क्षेत्रों के लिए भी कई प्रोत्साहन का प्रावधान है, जिनमें बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की गुंजाइश है.
ऐसा बजट पेश करने के लिए मोदी सरकार की काफी वाहवाही हुई, जिसमें पूंजीगत खर्चों में इजाफा और कर काटौती के जरिए वृद्धि को रफ्तार देने और साथ ही राजकोषीय प्रबंधन को दुरुस्त रखने का प्रावधान है. आदित्य बिड़ला समूह के कुमार मंगलम बिड़ला ने कहा, ''वित्त मंत्री ने ठोस वित्तीय प्रबंधन को ध्यान में रखकर वृद्धि को बढ़ावा देने का अनोखा कार्य किया है. वह भी ऐसे समय में जब ज्यादातर विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी के हालात से जूझ रही हैं.’’
हालांकि सबके के लिए कुछ न कुछ वाले सीतारमन के खुशनुमा बजट की आखिरी परीक्षा इसी से होगी कि इसके प्रावधान बेरोजगारी की स्थिति को किस कदर सहज कर पाते हैं, जो खासकर महामारी के बाद युवाओं में नाजुक स्थिति में पहुंच गई है. केंद्रीय श्रम मंत्रालय के सावधिक श्रम बल सर्वे (पीएलएफएस) की ताजा सितंबर 2022 की रिपोर्ट में कुल बेरोजगारी दर को 7.2 फीसद आंका गया है, जो महामारी के चरम पर 9.8 फीसद से कुछ कम है. सरकार भले बेरोजगारी दर में कमी श्रेय ले सकती है, मगर असली मुद्दा यह है कि यह दर 20-29 वर्ष आयु वर्ग में सर्वाधिक है, जिसके दायरे में देश का ज्यादातर कार्यबल आता है.
असली दुखती रग
दिसंबर में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़ों के मुताबिक, 20-24 आयु वर्ग के लोगों में बेरोजगारी दर 48 फीसद (2017-18 में 20 फीसद की तुलना में दोगुनी से अधिक, जबकि महामारी से ठीक पहले यह दर 30 फीसद थी) और 25-29 वर्ष आयु वर्ग में 14 फीसद रही. इसकी तुलना में अमेरिका में दिसंबर 2022 में 20-24 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 7.3 फीसद और कुल दर 3.5 फीसद थी. चीन में दिसंबर में 16-24 वर्ष आयु वर्ग में 16.7 फीसद यानी भारत से 2.8 फीसद अंक कम थी. हालांकि भारत में फरेबी रोजगार से समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि रोजगार की तलाश में अनेक युवा बेहद कम तनख्वाह वाली अल्पकालिक नौकरियां कर लेते हैं, जब तक उन्हें अपने योग्य नौकरियां नहीं मिलती हैं.
लखनऊ के इंदिरा नगर में रहने वाले 24 वर्षीय कुलदीप नारायण त्रिपाठी जानते हैं कि इंतजार लंबा रहने वाला है. बजट के दिन वे भोपाल हाउस पार्क की बेंच पर अपने मोबाइल एसेसरी सजाने में लगे थे. उनके संभावित ग्राहक पार्क से ही सटे शर्मा टी हाउस में चाय पीने आते हैं. वे मोबाइल कवर, हेडफोन और चार्जर बेचकर रोजाना 400-500 रु. कमा लेते हैं. हालांकि, त्रिपाठी ने 2019 में लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज से बी.कॉम की अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद इस तरह के किसी काम की तो उम्मीद नहीं की थी.
लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान जब उनके पिता को फोटो स्टूडियो बंद करना पड़ा तो परिवार की पूरी जिम्मेदारी कुलदीप पर आ पड़ी. अपना छोटा-मोटा व्यवसाय चलाने और परीक्षाओं की तैयारी के बीच संतुलन साधते हुए त्रिपाठी ने कर्मचारी चयन बोर्ड की परीक्षा दी, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. हताश होने के बावजूद, वे फिलहाल राज्य पुलिस भर्ती बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन चयन प्रक्रिया जल्द शुरू होने पर संदेह बना हुआ है.


त्रिपाठी ने वित्त मंत्री के भाषण को कुछ मिलेजुले भाव से सुना. उनके लिए खुशखबरी यह थी कि मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग के कच्चे माल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से फोन की बिक्री में इजाफा हो सकता है और उनके धंधे को फायदा हो सकता है. लेकिन उन्हें लगता है कि वित्त मंत्री को रोजगार के मोर्चे पर ज्यादा कुछ करना चाहिए था. वे कहते हैं, ''मेरे जैसे गरीब परिवार के युवाओं में सिर्फ सरकारी नौकरियों का ही आकर्षण है. हमें उम्मीद है कि विभिन्न सरकारी योजनाओं के प्रावधानों में बढ़ोतरी से हमारी संभावनाएं सुधरेंगी.’’
त्रिपाठी जैसे युवाओं की समस्या सीएमआइई के एमडी तथा सीईओ महेश व्यास एक संदर्भ में रखकर देखते हैं, ''सबसे ज्यादा मुश्किल तो कॉलेज से पढ़ाई पूरी करके निकले और कोई अनुभव न रखने वाले युवा की होती है. वह कम वेतन पर काम करने को तैयार नहीं है क्योंकि इससे उसका करियर हमेशा के लिए तबाह हो सकता है. इसलिए पढ़े-लिखे लोग अच्छी नौकरी की तलाश में कड़ी मेहनत करते हैं. उनमें बड़ी संख्या 30 साल की उम्र तक सरकारी नौकरी पाने के लिए हाथ-पैर मारते रहते हैं और अंतत: हार मानकर कम वेतन वाली नौकरी के लिए तैयार हो जाते हैं.’’
दूसरे आंकड़े भी हालात के संगीन होने का ही संकेत देते हैं. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की तरफ से 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में शामिल आंकड़ों के मुताबिक, उस साल 4.63 करोड़ सदस्यों ने ईपीएफ मंफ अंशदान किया. यह आंकड़ा दर्शाता है कि महामारी से पहले वर्ष 2019-20 में अंशदान करने वाले 4.89 करोड़ सदस्यों की तुलना में संगठित क्षेत्र की नौकरियों में गिरावट आई है. व्यास कहते हैं, ''जाहिर है, ईपीएफओ अंशदान के जरिये मापी जाने वाली संगठित क्षेत्र की नौकरियां कम से कम 2021-22 तक तो महामारी से पहले के स्तर पर नहीं पहुंच पाई थीं.
इसमें 5.3 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है.’’ अंतरराष्ट्रीय टेक कंपनियों और कुछ भारतीय स्टार्ट अप में छंटनी से भी हालात गंभीर ही हुए हैं. इन सबने ऐसे वक्त में लोगों को बेसहारा कर दिया, जब महामारी के दो वर्षों की मार से लोग और उद्यम उबर भी नहीं पाए थे. कंपनियां छंटनी कर रही हैं या भर्ती पर रोक लगा रही हैं (देखें, नौबत सिस्टम ही क्रैश होने की).
गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट इंक ने दुनिया भर में 12,000 लोगों को निकाल दिया, माइक्रोसॉफ्ट की इस साल 10,000 नौकरियां कम करने की योजना है, और मेटा ने इस साल 11,000 लोगों से ज्यादा को निकाला. ट्विटर ने पिछले साल नए मालिक एलॉन मस्क के आने के हफ्ते भर में 7,500 लोगों को चलता किया. रिपोर्टों के मुताबिक, सोशल मीडिया सर्विस ने भारतीय स्टाफ में से 90 फीसद की छंटनी कर दी, यानी 200 में से महज दर्जन भर रह गए हैं.
असल में भारत में रोजगार और नौकरियों के मुद्दे का सही पैमाना जानने के लिए देश में रोजगार के ढांचे पर गौर करने की दरकार है. देश में100 करोड़ कार्यबल होने का अनुमान है, इनमें से 41 करोड़ या 41 प्रतिशत के पास कोई न कोई रोजगार है. इनमें से 46 फीसद कृषि क्षेत्र में, 21 फीसद उद्योगों में और 32 प्रतिशत सेवा क्षेत्र में लगे हुए हैं.
कृषि देश में आजीविका का मुख्य साधन बना हुआ है, यही बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि जीडीपी में योगदान सिर्फ 20 फीसद है. जबकि उद्योग और सेवा क्षेत्र का योगदान क्रमश: 26 प्रतिशत और 54 प्रतिशत है. लिहाजा कृषि से उद्योगों और सेवा क्षेत्र की ओर रोजगार सृजन का बदलाव होना चाहिए था लेकिन दशकों से यह कई सरकारों के कार्यकाल में उस अपेक्षित तेजी से नहीं हुआ. देश के कार्यबल में हर साल 1.2 करोड़ का इजाफा हो जाता है. दिसंबर में देश में बेरोजगारों की कुल संख्या 3.3 करोड़ थी.
भारत की स्थिति में अलग बात यह है कि निजी क्षेत्र में बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी नौकरियों पर ही नौजवानों की नजर रहती है, क्योंकि उससे सुरक्षा, निश्चित वेतन और सम्मान का भाव जुड़ा हुआ है. देश के 100 करोड़ कार्यबल में केंद्र और राज्यों में 2 करोड़ या 2 फीसद लोग ही सरकारी नौकरियों में हैं. यह संख्या भी चीन से कम है, जहां 3.9 करोड़ या 4.6 फीसद कार्यबल सरकारी नौकरियों में है.
अमेरिका में भी 1.09 करोड़ या 6.9 फीसद कार्यबल फेडरल या राज्य संस्थाओं में कार्यरत है. अलबत्ता, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले साल सरकारी नौकरियों में अनुमानित 60 लाख पद खाली थे. पिछले अक्तूबर में प्रधानमंत्री मोदी ने 'रोजगार मेला’ की शुरुआत की, जिसका मकसद ज्यादातर सरकारी पदों पर भर्ती करके दस लाख लोगों को नौकरी मुहैया कराना था. हालांकि समस्या की गंभीरता के मद्देनजर पच्चीकारी के समाधान काफी नहीं हो सकते हैं. यहीं बजट 2023 की अहमियत है.
बजट-2023 का वादा
हमेशा 'आत्मनिर्भरता’ की पुरजोर वकालत करने वाली मोदी सरकार ने बजट 2023 में बेरोजगारों के लिए निर्धारित राशि में कटौती करके, इसके बजाय निवेश पर पूरा जोर दिया है ताकि विकास के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकें. ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का बजट 2022-23 में 73,000 करोड़ रुपए की तुलना में काफी ज्यादा घटाकर 2023 में 60,000 करोड़ रुपए कर दिया गया है.
इसके बजाय पूंजीगत व्यय में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है जिसे 2022-23 में 7.5 लाख करोड़ रुपए की तुलना में एक-तिहाई बढ़ाकर वित्त वर्ष 2023-24 के लिए 10 लाख करोड़ रुपए यानी जीडीपी का 3.3 प्रतिशत और 2019-20 में परिव्यय का करीब तीन गुना कर दिया गया है. फीडबैक इंफ्रा के चेयरमैन विनायक चटर्जी कहते हैं, ''केंद्र की तरफ से 10 लाख करोड़ रुपए के पूंजीगत व्यय को राज्यों को दिए जाने वाले 3.7 लाख करोड़ रुपए के अनुदान के साथ जोड़ लिया जाए तो प्रभावी तौर पर पूंजीगत व्यय कुल मिलाकर 13.7 लाख करोड़ रु. का हो जाएगा जो जीडीपी का करीब 4.5 फीसदी होता है. यह कदम बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने वाला होगा.’’
फिर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) के लिए बजटीय आवंटन को 1.34 लाख करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1.62 लाख करोड़ किया गया. इसके अलावा 100 महत्वपूर्ण परिवहन इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 75,000 करोड़ रुपए का आवंटन शामिल है. इन परियोजनाओं के तहत बंदरगाह, कोयला, इस्पात, उर्वरक और खाद्यान्न क्षेत्रों के लिए एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी सुविधा प्रदान की जानी है.
50 अतिरिक्त हवाई अड्डों, हेलीपोर्ट और वाटर एयरोड्रोम के निर्माण के लिए भी धनराशि आवंटित की गई है. रेलवे के लिए 2.4 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत व्यय आवंटित किया गया है, जो पिछले साल आवंटित 1.37 लाख करोड़ रुपए से 70 फीसद ज्यादा और अब तक का सर्वाधिक पूंजी परिव्यय है. यह राशि 500 नई वंदे भारत ट्रेनों और 1,275 से अधिक स्टेशनों के पुनर्विकास सहित विभिन्न परियोजनाओं पर खर्च की जानी है. परिवहन क्षेत्र के लिए इतनी बड़ी राशि के आवंटन से लाखों मजदूरों को रोजगार मिलने की संभावना है.
बजट 2023 में निर्माण क्षेत्र के वित्तीय आवंटन में भी भारी बढ़ोतरी की गई है, जो संबंधित उद्योग में 50 फीसदी के करीब रोजगार प्रदान करता है. शहरी क्षेत्रों में जरूरतमंदों के लिए 1.2 करोड़ घरों के निर्माण के लक्ष्य के साथ चलाई जा रही प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाइ) के लिए बजटीय आवंटन 66 फीसदी बढ़ाकर 48,000 करोड़ रुपए से 79,500 करोड़ रुपए कर दिया गया है. हीरानंदानी समूह के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक निरंजन हीरानंदानी कहते हैं कि पीएमएवाइ के तहत आवास पर पूंजीगत व्यय के अलावा, बजट में टियर-2 और टियर-3 शहरों में शहरी बुनियादी ढांचे पर जोर दिए जाने से भी बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न होंगे.

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, ''बुनियादी ढांचा और निर्माण ऐसे क्षेत्र हैं, जो बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा कर सकते हैं. कृषि के बाद जो क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार मुहैया कराता है, वह निर्माण क्षेत्र ही है.’’ पर्यटन क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने की संभावनाएं हैं. होटल और रेस्तरां जैसे संपर्क-आधारित उद्योगों की तरह, महामारी के कारण बड़े पैमाने पर प्रभावित पर्यटन क्षेत्र भी अब धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगा है. बजट में देशभर में 50 गंतव्य स्थलों का चयन कर वहां बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए निवेश बढ़ाने की घोषणा की गई है, जिसमें होटल और साइटों के निर्माण के जरिये घरेलू और विदेशी पर्यटन को बढ़ावा देना और सेवा क्षेत्र में नौकरियों में इजाफा करना शामिल है.
बजट 2023 में ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने पर भी खास जोर रहा है, खासकर कृषि और सहकारी क्षेत्रों में. पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्रों पर फोकस के साथ कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है. मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए एक नई सब-स्कीम पीएम मत्स्य संपदा योजना घोषित की गई है, जिसमें 6,000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ लागत घटाने और सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए बाजार का विस्तार करने करने जैसी सुविधाएं मुहैया कराने का प्रस्ताव है.
किसानों को ध्यान में रखकर बजट में बागवानी विकास को प्रोत्साहन और फसलों का उचित मूल्य आश्वस्त करने के खातिर भंडारण केंद्र स्थापित करने के लिए धन आवंटित किया गया है. अभी दायरे में न आने वाली पंचायतों और गांवों में बहुउद्देशीय सहकारी समितियों, प्राथमिक मत्स्य समितियों और डेयरी सहकारी समितियों की स्थापना के लिए भी धन निर्धारित किया गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को प्रोत्साहन पर खास जोर है ताकि बड़ी संख्या में महिलाएं फिर कार्यबल का हिस्सा बन सकें.
सहकार भारती के संस्थापक और भारतीय रिजर्व बैंक बोर्ड के निदेशक सतीश मराठे का कहना है कि सहकारी समितियों को प्रोत्साहन दिए जाने से कई परंपरागत मुद्दों को सुलझाकर प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों का संचालन आसान हो सकेगा. व्यावहारिक तौर पर देश के सभी गांवों और 75 फीसदी परिवारों को कवर करने वाली 65,000 सहकारी समितियों का भरा-पूरा नेटवर्क है. उन्होंने कहा, ''यह न केवल ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में मददगार है, बल्कि रोजगार के अवसर बढ़ाकर पलायन के कारण शहरों और कस्बों पर बढ़ने वाले दबाव को भी घटाता है.’’ स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्वनी महाजन का कहना है, ''अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी उपयोगकर्ताओं के साथ कृषि क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहन खासा उत्साहजनक है.’’
असंगठित क्षेत्र के रोजगार में 50 फीसद की हिस्सेदारी रखने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र के लिए बजट 2023 में कई प्रोत्साहन दिए गए हैं. कोविड अवधि के दौरान अपने सौदे पूरा न कर पाने वाले एमएसएमई के मामलों में सरकार और सरकारी उपक्रम जब्त की गई बोली या प्रदर्शन सुरक्षा से जुड़ी 95 फीसदी राशि लौटाएंगे. वहीं, कॉर्पस में 9,000 करोड़ रुपए डाले जाने के साथ 1 अप्रैल 2023 से संशोधित क्रेडिट गारंटी योजना भी प्रभावी हो जाएगी. इससे 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त कोलैटरल-फ्री गारंटीशुदा ऋण मुहैया कराया जा सकेगा.
इसके अलावा, ऋण लागत भी लगभग 1 फीसद घट जाएगी. फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एफआइएमएसएमई) के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं, ''एमएसएमई क्षेत्र अभी बेहद तनाव के दौर से गुजर रहा है, खासकर संपर्क-आधारित उद्योगों के लिहाज से.’’ एफआइएमएसएमई ने क्रेडिट गारंटी फंड में 9,000 करोड़ रु. डाले जाने और एमएसएमई को खरीदारों की तरफ से समय पर भुगतान आश्वस्त करने के उपायों का स्वागत किया है. एफआइएमएसएमई के बयान में कहा गया, ''बजट में बड़ी संख्या में सरकारी आपूर्तिकर्ता एमएसएमई को राहत देने का प्रस्ताव है, जिन पर ऐसे समय में जुर्माना लगाया गया या बैंक गारंटी जब्त की गई जब दुनिया कोविड से बुरी तरह पस्त थी. अब, जब्त राशि में 95 फीसद लौटाई जाएगी.’’
युवाओं को उद्योगों के लिहाज से कुशल बनाने के उद्देश्य के साथ बजट 2023 में कौशल विकास पर नए सिरे से फोकस किया गया है. अगले तीन साल में लाखों युवाओं को कौशल प्रदान करने के लक्ष्य के साथ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 शुरू होगी. एकीकृत स्किल इंडिया डिजिटल प्लेटफॉर्म के लॉन्च के साथ डिजिटल स्तर पर कौशल विकास के उपयुक्त माहौल तैयार किया जाएगा.
इसमें कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, मैकेट्रोनिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, 3डी प्रिंटिंग, ड्रोन और सॉक्रट स्किल्स जैसे कोर्स होंगे. युवा अंतरराष्ट्रीय स्तर के अवसरों के अनुकूल बन सकें, इसके लिए बजट में विभिन्न राज्यों में 30 स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर खोलने का प्रस्ताव है. जोशी कहते हैं, ''कौशल बढ़ाने के उपाय महत्वपूर्ण हैं. घोषित योजनाएं स्किलिंग, अपस्किलिंग और रिस्किलिंग के बिना फलदायी नहीं हो सकतीं. जब सीधे नौकरियों पर फोकस नहीं किया जा रहा है तो इन उपायों को ठीक से लागू करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए.’’
अमल सबसे अहम
जोशी की बात एकदम सही है. कार्यान्वयन सबसे अहम है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि पूंजीगत व्यय में वृद्धि ही काफी नहीं है, जरूरी यह भी है कि यह लागत घटाने, निवेश बढ़ाने और रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने में कारगर साबित हो. हर सरकारी परियोजना में 100 से 150 कंपनियां जुड़ी होंगी, जिनमें ज्यादातर निजी क्षेत्र की है, और उन्हें मिलने वाले ऑर्डर के मुताबिक श्रम जरूरतों का आकलन करने की जरूरत पड़ेगी.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदद सबनवीस कहते हैं, ''बड़े पैमाने पर पूंजीगत व्यय में अधिक रोजगार सृजन की क्षमता है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस्पात या सीमेंट जैसे क्षेत्रों में कंपनियों को अधिक श्रमिकों की जरूरत है.’’ ऐसे समय में जबकि भू-राजनीतिक परिदृश्य और वैश्विक मंदी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, कंपनियां पहले से ही सतर्क रुख अपनाए हुए हैं. ज्यादातर कंपनियों में श्रम क्षमता का उपयोग 70 से 72 फीसदी रहा है, ऐसे में विस्तार के प्रयास और अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर हिचक हो सकती है.
पुणे स्थित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स ऐंड इकोनॉमिक्स के कुलपति अजीत रानाडे के मुताबिक, बजट बुनियादी ढांचे में खर्च पर केंद्रित है, इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार सृजन होगा. वे कहते हैं, ''जहां तक प्रत्यक्ष रोजगार का सवाल है, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के आवंटन में कटौती की गई है. यह नकारात्मक पहलू है, क्योंकि मनरेगा भारत में बेरोजगारी दूर करने के मामले में एक बड़ा उपाय है.’’ इसके अलावा, पूंजीगत व्यय दीर्घावधिक परियोजनाओं पर किया जाता है, जबकि रोजगार सृजन के लिए अल्पावधि की योजनाओं में तेजी अहम होगा.
पश्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्री अमित मित्रा कहते हैं कि देश में 90 फीसदी नौकरियां असंगठित क्षेत्रों में हैं. उनके मुताबिक, ''ये जीडीपी में 40-50 फीसदी योगदान देते हैं. उनके लिए स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक सुरक्षा जैसा कुछ नहीं है.’’ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने 1 फरवरी को नई दिल्ली में सवाल उठाया, ''इस बजट से किसे लाभ हुआ है? गरीबों को तो नहीं हुआ. बेसब्री से नौकरी तलाश रहे युवाओं को भी नहीं हुआ. और न ही उन्हें जिनकी नौकरियां चली गई हैं.’’
रोजगार सृजन के लिए पूंजीगत व्यय के लिहाज से सरकार बस इतना ही कर सकती थी. निजी निवेश को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है. हालांकि, उद्योग पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे, जिसमें नौकरियां प्रदान करने की क्षमता है. व्यास कहते हैं, ''यह समस्या 2011-12 से ही कायम है, रोजगार उत्पन्न करने के लिहाज से निवेश अनुपात अपर्याप्त रहा है.’’ नए निवेश को दर्शाने वाला सकल स्थायी पूंजी निर्माण 2022 में सालाना आधार पर सिर्फ तीन प्रतिशत अधिक था.
उद्योग रोजगार सृजक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लगभग 531,000 प्रतिष्ठानों में अनुमानित 3.18 करोड़ नौकरियां हैं. रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र में 5.2 करोड़ लोग कार्यरत हैं, जिनमें 4.1 करोड़ अनौपचारिक श्रमिक हैं. खुदरा क्षेत्र चार से छह करोड़ प्रत्यक्ष रोजगार देता है. अनुमानित 6.3 करोड़ एमएसएमई हैं, जो 11 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं.
अर्थव्यवस्था आगे एक कठिन दौर की तरफ बढ़ रही जिसमें रोजगार के मोर्चे पर स्थिति और बिगड़ने की आशंका है. ऐसे में विकास की दिशा में बढ़ाने वाले ठोस प्रयास और रोजगार उत्पन्न करने वाले संभावना क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने से ही उन नौकरियों का सृजन हो सकता है जिनकी आज देश को सबसे ज्यादा जरूरत है. बजट 2023 इस दिशा में अच्छी शुरुआत करता है.

