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कुछ कहती है मुस्कान

खुशी का राज दरअसल वे तमाम तरह के तौर-तरीके सीखने में है जिनके जरिए हम जिंदगी में उठकर खड़े हो सकें और चारों ओर फिसलन के बावजूद संभलकर चलते हुए रास्ता बना सकें.

खुशी की खोज
खुशी की खोज
अपडेटेड 10 जनवरी , 2023

खुशी की खोज

यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है कि दुनिया दो साल से भी ज्यादा अरसे तक कोविड महामारी की मार से बमुश्किल अभी उबरी ही है और हम खुशी पर चर्चा-परिचर्चा करने बैठ गए हैं. उधर लड़ाई-झगड़े का आलम देखिए. यूक्रेन में तो लड़ाई कुछ इस तरह छिड़ी हुई है कि अगर इसे इसी तरह आगे बढ़ने दिया जाता रहा तो यह महाद्वीपों के बीच बड़े युद्ध में तब्दील हो सकती है.

एक ओर भयानक विश्वव्यापी मंदी की भविष्यवाणियां की जा रही हैं, जिनसे बड़े पैमाने पर नौकरियां छिन सकती हैं, भारी महंगाई आ सकती है और लोगों का जीना दुश्वार हो सकता है. ऐसे में आप हर्षोल्लास के साथ नए साल में प्रवेश की बात कैसे कर सकते हैं. इन सब तथ्यों और विडंबनाओं के बावजूद हमें खुशी के रहस्य तलाशते रहने चाहिए. और महात्मा गांधी ने तो कहा ही था न कि ''ताकत फतह हासिल करने से नहीं आती. आप जब मुसीबतों से गुजरते हैं और उनके आगे घुटने न टेकने का फैसला करते हैं, असली ताकत वह है.’’

तो यह उसी तरह से खुशी की तलाश के लिए है—लड़खड़ाते हुए भी आप किस तरह से उठते और नया जीवन शुरू करते हैं? बुद्ध ने जो चार आर्य सत्य प्रतिपादित किए, उनमें से पहला तो यही स्वीकार करना था कि संसार में अपार दुख है. बाकी तीन सत्यों की पड़ताल करते हुए वे मोक्ष यानी जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र से अंतत: मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं. अब यह सवाल कि ऐसा करने सबसे अच्छा तरीका क्या है, फिर अपने आप में एक तलाश बन जाता है.

संयुक्त राष्ट्र 2012 से एक स्वतंत्र एजेंसी को साथ लेकर सबसे खुशहाल देशों को रैंक देते हुए वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट प्रकाशित करता आ रहा है. देश की खुशहाली की अवस्था का आकलन करने के लिए वैश्विक सर्वे एजेंसी कुशलता के तीन प्रमुख संकेतों पर भरोसा करती है: व्यक्ति का अपने जीवन के बारे में मौजूदा मूल्यांकन, सकारात्मक भावनाएं और नकारात्मक प्रभाव. सर्वे से एक दिलचस्प बात पता चली: चिंता, उदासी और क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाओं के मुकाबले खिलखिलाहट, आनंद और कुछ नया सीखने जैसी सकारात्मक भावनाएं लोगों के उत्तरों में दोगुने से ज्यादा बार आईं. लगता है दुनिया मुश्किल हालात से पहले के मुकाबले बेहतर ढंग से निबटना सीख रही है.

अलबत्ता वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट के मौजूदा संस्करण की फेहरिस्त में भारत बिना किसी स्पष्ट वजह के सबसे निचले पायदान के देशों में आया, यहां तक कि पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल से भी नीचे. फिनलैंड रैंकिंग में शीर्ष पर है, और उसके बाद कई स्कैंडेनेवियाई देश हैं, जिन्हें भौतिक कुशलता, सामाजिक सुसंगति और सरकारी नीतियों में जनता की सहभागिता जैसे पहलुओं का निर्णायक फायदा मिला.

भारत हालांकि इस बात से तसल्ली कर सकता है कि उसके नागरिकों को संतुष्टि की इतनी संकीर्ण परिभाषाओं से अनिवार्यत: बंधे होने की जरूरत नहीं. वह इसलिए क्योंकि इसी अध्ययन से यह भी पता चला कि बीते दशक में ''खुशी’’ शब्द प्रगति के पुराने संकेतात्मक मुहावरों ''सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)’’और ''आजीविका तथा आय’’ के मुकाबले ज्यादा बार आया. इन दोनों जुमलों के इस्तेमाल में कमी आई है.

तो अब हम एक नए वर्ष के दोराहे पर हैं और सोच रहे हैं कि जिंदगी में अचानक आने वाले मोड़ और घुमावों से निबटते हुए उनके बीच आगे का रास्ता कैसे बनाएं, वह भी इतने धैर्य और संतुलन के साथ कि जो खुशी की धारणा को नई इबारत दे सके. और यह सब न तो जीडीपी बढ़ाने के राष्ट्रीय प्रयासों के रूप में और न ही सुख-सुविधाओं की निजी तलाश में. बल्कि जैसा कि इस विशेषांक में कई गुरुओं ने प्रसन्नता के बारे में कहा है—यह सिर्फ जीने की नहीं बल्कि साझा करने की कला है, जिसमें एक तरह का मायावी आनंद मिलता है.

इस अंक में आपको अनुकरणीय लोगों की मर्मस्पर्शी कहानियां भी मिलेंगी जिन्होंने अपने निजी ऐशो-आराम तजकर दूसरों को खुशहाल महसूस करवाने में आनंद खोजा. यहां ऐसे लोग हैं जिन्होंने खुशी की अपनी भिन्न-भिन्न परिभाषाओं के जरिए हमें ठहरकर यह सोचने का मौका दिया है कि हम अपने वजूद के अंतिम सत्य को कैसे देखें और उसे प्राप्त या अनुभव करने के लिए कौन-सी राह चुन सकते हैं. तो पढ़िए और खुशी के इस सफर का आनंद लीजिए.

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