खुशी की खोज : गुरुवाणी
हिज ग्रेस अनिल जोसफ थॉमस काउटो
हर इंसान खुशी के लिए तरसता है, चाहे वह अच्छी सेहत के रूप में खुशी हो, धन की खुशी हो, व्यक्तिगत संबंधों में हो या सामाजिक पदों के रूप में मिलने वाली खुशी. कोई दुखी नहीं रहना चाहता. जब भी हमारे सपने पूरे होते हैं, हमारी योजनाएं साकार होती हैं, हमारी जरूरतें पूरी होती हैं, चाहे भावनात्मक हो या भौतिक, हम खुशी का अनुभव करते हैं.
लेकिन ईसाई दृष्टिकोण से खुशी का अभिप्राय इससे कहीं अधिक गहरा है, जिसे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने हमें बताया है. यीशु जिस खुशी की बात करते हैं वह दरअसल खुशी नहीं बल्कि आनंद है. उन्होंने कहा है, ''मेरा आनंद तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनंद पूर्ण हो.’’
हमारे प्रभु यीशु ने हमें जो दिया है वही सही मायने में आनंद है. वे कहते हैं कि जब आपका हृदय ईश्वर की कृपा को स्वीकारने के लिए खुला होगा तो आप आनंदित होंगे. इसलिए पश्चाताप और हृदय परिवर्तन आनंद, शांति और प्रेम के जीवन की शुरुआत है. जब हमारे प्रभु यीशु मसीह ने अपनी मिनिस्ट्री शुरू की वे जंगल में थे, उपवास और प्रार्थना कर रहे थे और शैतान उन्हें लुभाकर भौतिक सुख, शक्ति, धन और लोकप्रियता के जीवन की कामना जगाकर पथभ्रष्ट करने की नीयत से आया था.
उन्होंने यह कहते हुए शैतान को उलटे पांव लौटा दिया: ''तुम्हें अपने स्वामी की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए क्योंकि मनुष्य केवल रोटी से जीवित नहीं रहेगा, बल्कि उसे हर एक वचन से जीवन मिलेगा जो परमेश्वर के मुख से निकलता है.’’ और इसलिए, हमारे ईश्वर ईसा मसीह ने हमें परमानंद का मार्ग दिखाया है. परमानंद का अर्थ है प्रसन्न होना, आनंदित होना. और यह रास्ता कौन-सा है?
वे कहते हैं, ''धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं.’’ इसलिए वास्तविक आनंद अधिक से अधिक धन प्राप्त करने में नहीं बल्कि मन के दीन होने में है. परमानंद तब आता है जब हम दयालु होते हैं. इसलिए, जब हम दूसरों के करुणामय और कृपालु होते हैं, दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं, तब हमें खुशी और भरपूर आनंद का अनुभव होगा.
साथ ही, जब हम विभाजन के बजाय दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित करेंगे, तो हमें बहुत खुशी का अनुभव होगा. और ठीक यही आनंद का रहस्य है जिसे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने प्रकट किया है: ''एक दूसरे से उसी तरह प्रेम करो जैसा प्रेम मैंने तुमसे किया है.’’ और उसने हमसे कैसे प्यार किया है?हमारे लिए अपने प्राणों की आहुति देकर. इस प्रकार, सच्चा आनंद दूसरों के लिए अपना जीवन बलिदान करने में आता है न कि अपने लिए सब कुछ हासिल करने की कोशिश में. जब हम अपने हृदय को उन सारी चीजों से मुक्त कर देते हैं जो परमेश्वर को पसंद नहीं—नफरत, बुराई और दुष्टता के सभी विचार—और अपने हृदय को परमेश्वर के अनुग्रह से परिपूर्ण होने देते हैं, इसे ही ''हृदय की शुद्धि’’ कहा जाता है. यही आनंद का रहस्य है.
खुशी के सूत्र
''असली आनंद स्वार्थी होने में नहीं है. अपना ध्यान जरा दूसरों की ओर घुमाएं, देखें कि हम दूसरों के जीवन में कैसे आनंद ला सकते हैं, कैसे दूसरों की मदद कर उनके जीवन को ऊपर उठा सकते हैं’’.
(हिज ग्रेस अनिल जोसफ थॉमस काउटो दिल्ली के आर्कबिशप हैं)

