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समृद्धि का सम्राट

अपने दम पर अरबपति बने गौतम अदाणी के लिए 2022 खुद उनके पैमाने से भी असाधारण रहा, जिसमें बुनियादी ढांचे का सबसे बड़ा सौदा भी शामिल, जो देश में पहले नहीं देखा गया .

गौतम अदाणी
गौतम अदाणी
अपडेटेड 10 जनवरी , 2023

आवरण कथा : सुर्खियों का सरताज 2022

गौतम अदाणी

त्योहारों का समय है. अहमदाबाद के शांतिग्राम में कांच की दीवारों से घिरे अदाणी औद्योगिक साम्राज्य के मुख्यालय के प्रांगण को शंकु की शक्ल में कतार से रखे कार्डबोर्ड के सफेद डिब्बों से सजाया गया है, इस तरह कि वह आसमान छूते विशाल पिरामिड की तरह दिखता है. इस स्थापत्य को 'कंवर्जेंस’ या मिलन नाम दिया गया और इसका मकसद अदाणी की भविष्य की एकजुट दूरदृष्टि दिखाना है.

अदाणी ग्रुप और उसके संस्थापक-चेयरमैन गौतम अदाणी की दूरदृष्टि 2022 में पूरी तरह निखरकर आई, जिसमें जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ था. धमाकेदार रफ्तार से विस्तार करते हुए समूह का बाजार पूंजीकरण महज तीन साल में नौ गुना बढ़कर 23 दिसंबर को 17.9 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया. इसके बूते वह भारत की दूसरी सबसे मूल्यवान फर्म बन गई, जो बस टाटा ग्रुप से पीछे है पर रिलायंस इंडस्ट्री से आगे है.

कुल 125.8 अरब डॉलर (फोर्ब्स की सूची के अनुसार, 28 दिसंबर को) से ज्यादा की विशुद्ध निजी संपत्ति के साथ अदाणी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर शख्स बनने के अलावा रिलायंस इडंस्ट्रीज के मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ते हुए भारत और एशिया के सबसे अमीर शख्स; बन गए. बड़े दांव लगाना अदाणी की फितरत में है और इसी का प्रदर्शन करते हुए सितंबर में उन्होंने 10.5 अरब डॉलर (87,000 करोड़ रुपए) में एसीसी और अंबुजा सीमेंट्स में स्विस फर्म होल्सिम की हिस्सेदारी खरीद ली, जो बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सबसे बड़ा एकल अधिग्रहण था.

इसी के साथ उनका समूह, उद्योग की अगुआ आदित्य बिड़ला ग्रुप की अल्ट्राटेक के बाद, देश का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट मैन्युफैक्चरर बन गया. इस साल अदाणी ने कई अलग-अलग क्षेत्रों में भी अधिग्रहण किए, जिनमें दो चावल ब्रांड, सबसे बड़ी समुद्री सेवा कंपनी, एक ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट और मीडिया कंपनी एनडीटीवी शामिल हैं. यह सब ऐसे समय और इसके बावजूद किया गया कि जब दुनिया भर के कारोबारों में विघ्न पैदा करते हुए कोविड की महामारी अब भी अपने पैर पसारे है और यूक्रेन में युद्ध लंबा खिंच रहा है.

बाधाओं और संघर्ष के बावजूद अदाणी ग्रुप हैरतअंगेज रफ्तार से बढ़ा. एक दशक से कुछ ज्यादा वक्त में अदाणी भारत के निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बिजली उत्पादक, बंदरगाह संचालक, हवाई अड्डा संचालक, उपभोक्ता गैस कारोबार और इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन कंपनी बन गए, और इसके अलावा वे सबसे बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपर और अक्षय ऊर्जा के उत्पादक भी हैं. अदाणी 1991 के सुधारों के पोस्टर बॉय थे, तो किसी भी चीज को हाथ लगाकर सोना बना देने के अपने वरदान के साथ आज वे भारत की कहानी का निचोड़ हैं—अपने दम पर बना एक अरबपति, जिसने तीन दशक से कम वक्त में विशाल और विविधतापूर्ण साम्राज्य खड़ा कर दिया.

अब उनकी महत्वाकांक्षाएं वैश्विक हैं और विदेशों में (कभी-कभी भारत में भी) अपने उद्यमों के सामने आने वाले तीव्र प्रतिरोधों से निपटने के लिए तैयार हैं. जैसा कि उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''हार मान लेना कभी अदाणी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा. भारत सरीखे इतने गतिशील लोकतंत्र में अपने हुनर को निखारने के बाद मुझे और मेरे समूह को पूरा विश्वास है कि हम दुनिया के किसी भी हिस्से में डिलिवर और बिजनेस कर सकते हैं. मैंने बचपन से कठिनाइयां और संकट झेले. हर मौके ने मुझे कई बेशकीमती सबक सिखाए और ज्यादा मजबूत बनाया. 

धन का मतलब

जब अदाणी बोलते हैं, शांत विश्वास और निहत्था कर देने वाली साफदिली से बोलते हैं. उन्हें पता है कि वे कामयाब हैं, पर इससे वह सादगी जरा नहीं बदली जिससे वे अपनी भावनाएं जाहिर करते हैं और न ही वह विनम्रता बदली जिससे वे अपने कारोबारी साम्राज्य के खिलाफ होने वाली आलोचना का जवाब देते हैं. 16वें तल पर उनके दफ्तर की दीवारों पर कतार से जाने-माने कलाकारों की विशाल पेंटिग लगी हैं, पर अदाणी स्वीकार करते हैं कि वे उनमें से आधों के भी नाम याद नहीं कर सकते.

वे पार्टियों से दूर रहते हैं और अपनी महंगी कारों के बेड़े का इस्तेमाल करने के बजाए वे काली सुर्ख बुलेटप्रुफ टोयोटा अल्फार्ड से दफ्तर आना पसंद करते हैं. बॉडीगार्ड का काफिला उनके साथ चलता है. उनके मुख्यालय के वीआइपी प्रवेशद्वार पर भारतीय गोंड और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी कलाकारों की बनाई विशाल पत्थर की मूर्ति लगी है, जो हिंद महासागर से बंटी दो अलग-अलग संस्कृतियों का जश्न मनाती है और ऑस्ट्रेलिया की कोयला खदान सहित उनकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय पहुंच का प्रतीक है.

अहमदाबाद शहर के उनके डिजाइनर हाउस में भगवान शिव की मूर्ति स्थापित है, जो बहते फव्वारों वाले सजे-धजे बगीचे के बड़े हिस्से में फैली है. घर के विशाल कक्षों में भी चारों तरफ मशहूर चित्रकारों की पेंटिंग लगी हैं. धन अपने आप में उनके मन को खुशी और संतोष नहीं देता. वे समझते हैं कि धन का मतलब अंतत: ताकत है, न केवल अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए बल्कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए भी.

लेकिन, जैसा कि वे कहते हैं, आप ''धन की जुगाली नहीं कर सकते” और सबसे ज्यादा खुशी समाज को वापस देने से मिलती है. वे कहते हैं, ''मुझे अपना रोमांच चुनौतियों से जूझने से मिलता है... जितनी ज्यादा बड़ी वे होती हैं, उतना ही ज्यादा खुश मैं होता हूं.” वापस देने की यह भावना इस साल जून में बड़े पैमाने पर जाहिर हुई जब अदाणी 60 वर्ष के हुए. जन्मदिन के तोहफे की तौर पर उनके परिवार ने 60,000 करोड़ रुपए अदाणी फाउंडेशन के लिए अलग रखने का फैसला किया, जिसकी प्रमुख उनकी पत्नी प्रीतिबेन हैं.

इसका इस्तेमाल जरूरतमंदों के लिए स्वास्थ देखभाल, शिक्षा और कौशल विकास में किया जाएगा. प्रीतिबेन ने दंतचिकित्सा की पढ़ाई की है और 1986 में गौतम से उनकी शादी परिवारों की तरफ की गई अरेंज्ड मैरिज थी. दोनों ही मूलत: मध्यमवर्गीय परिवार थे, जिनके बीच कारोबारी रिश्ते भी थे. गौतम के लिए आरामतलबी का मतलब अब भी रात में प्रीति के साथ रमी खेलना है, तब भी जब वे आधी रात को दफ्तर से लौटते हैं.

थोड़ी उदास आतुरता से वे कहते हैं कि जीतती हमेशा वही हैं और उन्हें अंतत: पत्नी को पैसे देने होते हैं. प्रीति हंसती हैं और बताती हैं कि वे गौतम की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता की प्रशंसक हैं और इस बात की भी कि एक बार जब वे किसी चीज के बारे में मन बना लेते हैं तो तब तक चैन से नहीं बैठते जब तक उसके बारे में सब कुछ नहीं जान लेते. उन्हें अच्छा लगता है कि उनके पति नए विचारों का हमेशा स्वागत करते हैं, अच्छे श्रोता हैं और सबसे बढ़कर यह आश्वस्त करते हैं कि उनके और दोनों बेटों करण और जीत के साथ अच्छा वक्त बिता सकें.

गौतम कहते हैं कि प्रीति उनकी ''लेडी लक’’ हैं, क्योंकि शादी के बाद ही वे निजी और पेशेवर जिंदगी में आगे बढ़े. मुस्कराते हुए वे यह भी कहते हैं, ''वे मुझसे ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं—मैं महज 10वीं पास हूं और वे डॉक्टर हैं.’’ विचार का यह सिलसिला उन्हें अपनी सफलता के एक मंत्र तक ले जाता है: ''पढ़ाई आपको ज्ञान से लैस करती है, पर अक्लमंदी तो जिंदगी के तजुर्बों से ही आती है. अक्लमंदी के साथ मिलकर ज्ञान सफलता दिलाता है.’’

निर्णायक मोड़

उनके 'कमाते हुए सीखो’ मॉडल और खुद अपनी सहजबुद्धि में यकीन ने गौतम को बड़ी ऊंचाइयों पर पहुंचाया. आठ बच्चों में सातवें गौतम अहमदाबाद में पले-बढ़े, जहां उनके पिता शांतिलाल अदाणी टेक्सटाइल और कमोडिटी व्यापारी थे. गौतम पढ़ाई में अच्छे थे, पर उन्होंने 10वीं पास करके पढ़ाई छोड़ दी और हीरा व्यापारी बनने के लिए (रेल से तीसरे दर्जे में सफर करके) मुंबई जाने का फैसला किया.

उनका तर्क यह था कि उनके एकाधिक बड़े भाई भी उच्च अध्ययन के लिए गए, पर परिवारिक कारोबार में काम करने के लिए लौट आए. अदाणी को आंत्रप्रेन्योर के तौर पर पहला बड़ा अवसर तब मिला जब उनके बड़े भाई ने अहमदाबाद में प्लास्टिक की फैक्टरी खरीदी और उसे चलाने में मदद के लिए उनसे लौट आने को कहा. जल्द ही गौतम को पता चला कि न केवल उनके भाई के लिए बल्कि दूसरे छोटे-मोटे मैन्युफैक्चरर के लिए भी कच्चे माल की जबरदस्त कमी थी. लिहाजा, 1985 में जब राजीव गांधी ने आयात-निर्यात नीति को उदार बनाया, तो गौतम ने यह मौका झपट लिया. वे कच्चा माल आयात करके उन्हें सप्लाइ करने लगे और उस पर मुनाफा कमाने लगे.

दूसरा बड़ा निर्णायक मोड़ 1991 में आया जब पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने लाइसेंस राज खत्म करके उदारीकरण का सूत्रपात किया और बुनियादी ढांचे का विकास सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए खोल दिया. आयात पर मुनाफा घट रहा था. ऐसे में अदाणी ने अपने निर्यात के कारोबार का विस्तार करने का फैसला किया और अपनी कंपनी अदाणी एक्सपोर्ट्स के शेयर आम जनता के लिए खोल दिए.

युवा गौतम निष्णात निर्यातक थे, पर जल्द उन्हें एहसास हुआ कि कंपनी का असल मोल परिसंपत्तियों के निर्माण में है. तब 1995 में तीसरा बड़ा निर्णायक मोड़ खुद-ब-खुद उद्घाटित हुआ जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने राज्य के तटीय इलाके को विकसित करने पर पूरा जोर देने का फैसला किया. तकरीबन उसी वक्त वैश्विक कमोडिटीज ट्रेडर कार्गिल कच्छ के तटों पर बनने वाला नमक मंगवाना चाहती थी और उन्होंने बंदरगाह विकसित करने की सबसे अच्छी संभव जगह के तौर पर मुंद्रा को चुना (उसका ड्रॉट अच्छा था जिससे बड़े जहाजों को बांधना और रखना आसान था).

कार्गिल ने घाट के निर्माण के लिए अदाणी एक्सपोर्ट्स के साथ भागीदारी कायम की, पर बाद में कंपनी सौदे से मुकर गई. अदाणी ने संकट में अवसर देखा. व्यापारी होने के नाते वे जानते थे कि बंदरगाह कितना फायदेमंद हो सकता है और घाट को पूरी तरह विकसित बंदरगाह में बदलने की इजाजत के लिए अर्जी दाखिल कर दी. साथ ही, मुंद्रा पोर्ट स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एमपीएसईजेडएल) की स्थापना की. 2001 आते-आते उन्होंने मुंद्रा बंदरगाह को 30 साल तक चलाने के अधिकार हासिल कर लिए.

यह उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा निर्णायक मोड़ था. अगर दूसरों ने मुंद्रा को सुनसान इलाके में दलदली समुद्रतट मानकर खारिज कर दिया, तो अदाणी ने इसे उसी रोशनी में देखा जिसमें धीरूभाई अंबानी ने जामनगर को देखा था—यानी ऐसा बंदरगाह शहर जो उनके सपनों को साकार करने की बुनियाद तैयार करेगा. धीरूभाई और उनके बेटों मुकेश और अनिल ने देश का सबसे बड़ा तेल रिफाइनरी संयंत्र लगाया, तो गौतम ने आहिस्ता-आहिस्ता मुंद्रा में लंबी-चौड़ी जमीनों का अधिग्रहण कर लिया.

2007 आते-आते उनके पास 40 किमी लंबी तटरेखा पर फैली कुल 15,000 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन थी, जिस पर वे लंगर डालने की 26 जगहों के साथ अत्याधुनिक बंदरगाह का निर्माण कर पाते और उसे देश की सबसे बड़ी बंदरगाह सुविधा बना पाते. उनका वह नजरिया आज वाकई फलप्रद हुआ और वह भी ऐसा, जिसकी मिसाल हमेशा बनी रहेगी. यही खासियत गौतम अदाणी को खास बनाती है.

अदाणी का तरीका

मुंद्रा बंदरगाह ने अदाणी के दूसरे कारोबारों में दाखिल होने का दरवाजा खोल दिया—बिजली उत्पादन, क्योंकि उसके पास विशाल जमीनें थीं और वे एक प्रमुख आगत कोयले का निर्यातक था; खाद्य तेल का कारोबार, क्योंकि यह जिंस वे सिंगापुर के विल्मर के लिए आयात किया करते थे, जिसके साथ बाद में उन्होंने 50:50 का संयुक्त उद्यम स्थापित किया; बिजली के ट्रांसमिशन, वितरण और अक्षय ऊर्जा के कारोबार, क्योंकि वे बिजली के स्वाभाविक विस्तार थे, उसी तरह जैसे पाइप से पहुंचाई जाने वाली गैस थी.

बंदरगाह और सड़कें, जो बुनियादी ढांचे की कहानी का विस्तार थीं; और अब सीमेंट, क्योंकि इसके लिए फीडस्टॉक के तौर पर अदाणी के बिजली संयंत्रों की फ्लाई ऐश का इस्तेमाल किया जा सकता है. आज समूह 12 बंदरगाहों का या तो मालिक है या उनका संचालन करता है, जो सात राज्यों में फैले हैं और देश की एक-चौथाई बंदरगाह क्षमता से लैस हैं. वे भारत के सबसे बड़े एयरपोर्ट संचालक भी हैं, जो 25 फीसद यात्री यातायात और 40 फीसद हवाई कार्गो संभालते हैं. साथ ही, देश के सबसे बड़े खाद्य तेल वितरक भी हैं. समूह प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से दुनिया भर में 1,00,000 से ज्यादा लोगों को काम देता है.

मुंद्रा बंदरगाह अदाणी के कारोबार करने के तौर-तरीकों को परिभाषित करता है. उनका एक खास और अलग कदम अपनी कारोबारी दूरदृष्टि को उस वक्त की सरकार की प्राथमिकताओं के साथ मिलाना था. दूसरा कारोबार का उन उद्यमों में विस्तार करना था, जिन्हें वे ''एड्जेसेंसीज’’ यानी नजदीकी या जुड़े हुए क्षेत्र कहते हैं, या ऐसे क्षेत्र जो उनके हितों के अनुपूरक हैं, जिन्हें वे ''बिंदुओं को जोड़ना’’ कहते हैं. अदाणी कहते हैं, ''हमारी सोच साफ है कि हम देश की कैसे मदद कर सकते हैं.

इससे कारोबार देश की आकांक्षाओं के साथ मेल खाते हैं और हमारी गतिविधियों को अनुकूल हवा का जरूरी सहारा भी मिल जाता है जिससे काम सुचारू चलता है.’’ दिग्गज निवेश बैंकर निमेश कंपानी को यह कहते हुए उद्धृत किया गया, ''गौतम अदाणी साम्राज्य निर्माता के आदर्श उदाहरण हैं जो अपनी वृद्धि के लिए नए जमाने की टेक्नोलॉजी के ऋणी नहीं हैं. इसके बजाए उन्होंने देश के विकास परिदृश्य का हिस्सा बनना चुना और समाज को अपने भरसक योगदान के जरिए कामयाबी हासिल की.’’

फिर सीमेंट कंपनियों का अधिग्रहण उनकी कुल कारोबारी महत्वाकांक्षाओं में कैसे फिट होता है? अदाणी बताते हैं कि उनके कारोबारी साम्राज्य के दो बड़े वर्टिकल या हिस्से हैं. एक तरफ बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और हवाई अड्डे हैं, जिन्हें मोटे तौर पर बंदरगाह और परिवहन के खाने में रखा जाता है. दूसरी तरफ ऊर्जा और उपयोगिता सेवाएं हैं. ऊर्जा पोर्टफोलियो में समूह के ताप बिजलीघर, अक्षय ऊर्जा उद्यम, ट्रांसमिशन, वितरण, एलएनजी ट्रमिवनल और सिटी गैस वितरण आते हैं.

वे कहते हैं, ''हम हरेक वर्टिकल में अपनी स्थिति बढ़ा रहे हैं, पर साथ ही मिलकर खड़े इन अलग-अलग वर्टिकल के साथ हम 'एड्जेसेंसीज’बना रहे हैं. सीमेंट इन्हीं एडजेसेंसीज से आ रहा है.’’ मौजूदा कारोबार से ''नजदीकी’’ रखने वाले कारोबारों की तरफ इशारा करने वाले इस शब्द की बहुत करीबी गूंज आगे और पीछे एकीकरण की उस नीति में सुनाई देती है जिसे रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी (जिन्हें अदाणी अपनी 'प्रेरणा’ मानते हैं) ने अपने विशाल पेट्रोकेमिकल साम्राज्य का निर्माण करते वन्न्त अपनाया था.

हरित ऊर्जा पर बड़ा दांव

अदाणी सबसे ज्यादा जोर हरित ऊर्जा के कारोबार पर दे रहे हैं. यह भी अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली उत्पादन अच्छा-खासा बढ़ाने की केंद्र की योजनाओं से मेल खाता है. 2015-16 में नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक बड़ी पनबिजली परियोजनाओं को छोड़कर 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के आक्रामक लक्ष्य की प्रतिबद्धता जताई थी. इसमें मार्च 2023 तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य था, जिसमें 40 गीगावाट रूफटॉप सोलर और 60 गीगावाट जमीन पर स्थापित थी.

लक्ष्य बेशक महत्वाकांक्षी थे, पर इसने अपनी हरित ऊर्जा योजनाओं को परवान देने की अदाणी की योजनाओं में ईंधन का काम किया. अदाणी की सोच साफ है कि जब देश के ऊर्जा क्षेत्र में जबरदस्त बदलाव आ रहा हो, तब यह चीन पर निर्भर नहीं होना चाहिए और वे सबसे एकीकृत हरित ऊर्जा मूल्य शृंखलाओं में से एक स्थापित कर रहे हैं. गीगा कारखानों का विस्तार पॉलीसिलिकन से सोलर मॉड्यूल तक, पवन टर्बाइनों की पूरी मैन्युफैक्चरिंग और हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइजर की मैन्युफैक्चरिंग तक किया जाएगा.

वे भविष्यवाणी करते हैं, ''जब इस शृंखला पर हमारा पूरा अख्तियार होगा, हम देखेंगे कि भारत दुनिया का सबसे सस्ता ईंधन प्रोड्यूस कर सकता है.’’ ये कारखाने अदाणी ग्रुप की मौजूदा 20 गीगावाट क्षमता में जोड़ने के लिए 2030 तक अतिरिक्त 45 गीगावाट अक्षय ऊर्जा और साथ ही 30 लाख टन हाइड्रोजन ऊर्जा पैदा करने में मदद करेंगे. हाइड्रोजन ऊर्जा के जल्द मुमकिन होने की संभावना के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ''केंद्र सरकार बेहद आकर्षक उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना लेकर आई है जिसने हाइड्रोजन के कारोबार को आकर्षक और व्यावाहारिक बना दिया है.’’

हरित ऊर्जा के मामले में उनके और भारत के दूसरे सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी के बीच प्रतिद्वंद्विता साफ दिखाई देती है. अदाणी ने यह घोषणा तब की जब कुछ ही दिन पहले अंबानी—जिनकी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने उत्पादन संयंत्र, सौर पैनल और इलेक्ट्रोलाइजर सहित अक्षय ऊर्जा के बुनियादी ढांचे में 75 अरब डॉलर के निवेश की योजनाएं बनाई हैं—ने कम कार्बन वाली ऊर्जा में आरआइएल के निवेश के हिस्से के तौर पर पांचवीं गीगा फैक्टरी लगाने का ऐलान किया था.

अदाणी, जो अंबानी के साथ कारोबारी प्रतिद्वंद्विता की बात से सरासर इनकार करते हैं, कहते हैं कि ''मुकेशभाई’’ के साथ उनका रिश्ता परस्पर सम्मान का है, पर वे यह भी कहते हैं कि किसी भी नई टेक्नोलॉजी को ''कहीं न कहीं से तो शुरू होना ही होगा.’’ समय के साथ कारोबार की लागत कम होगी, जिससे ऐसी टेक्नोलॉजी ज्यादा खरीदी जा सकेंगी. वे सौर ऊर्जा कारोबार का हवाला देते हैं, जिसमें सोलर पैनलों की ऊंची लागत से शुरू के दिनों में बिजली 18 रुपए प्रति यूनिट जितनी महंगी थी. लागतें ज्यों-ज्यों कम हुईं, शुल्क की दर भी कम हो गईं, और आज यह 2.50 रुपए प्रति यूनिट से भी कम है. 

वित्त पर प्रश्न 

सीमेंट कंपनी जैसे बड़े अधिग्रहण में भारी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता होती है. वास्तव में, अदाणी की जो ऊंचाई है, वह पिछले सात वर्षों में खरीदी गई 50 कंपनियों की वजह से है. अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बैंकों से भारी उधार लेने के बाद, मार्च 2022 तक समूह का कर्ज लगभग 1.88 लाख करोड़ रुपए हो गया था. और बहुत सी खरीद योजनाएं अभी पाइपलाइन में हैं.

न्यू एनर्जी, परिवहन और उपभोक्ता व्यवसायों में रुचि रखने वाले अदाणी एंटरप्राइजेज ने 2024 तक पूंजीगत व्यय के रूप में 10.4 अरब डॉलर (करीब 86,000 करोड़ रुपए) खर्च करने की योजना बनाई है. उसके बाद के पांच वर्षों में, कैपेक्स 49 अरब डॉलर (लगभग 4 लाख करोड़ रु.) होगा. कुछ आलोचकों का कहना है कि समूह ने 'बहुत ज्यादा कर्ज’ ले रखा है और समूह का ढांचा जिस तरह से बनाया गया है, उससे उसके ऋण और इक्विटी की समेकित स्थिति निर्धारित करना मुश्किल हो जाता है.

अदाणी इस तरह की आलोचना से बेफिक्र हैं. उनका तर्क यह है कि वैश्विक रेटिंग एजेंसियों, जिनकी क्रेडिट रेटिंग विदेशों में पूंजी जुटाने के लिए महत्वपूर्ण होती है, ने उनकी कंपनियों को रेटिंग दी है जो संप्रभु रेटिंग (देश की रेटिंग) के बराबर है. इसके अलावा, बुनियादी ढांचा क्षेत्र में सबसे बड़ा कच्चा माल पूंजी है, और पूंजी ऋण तथा इतमकटी का मिश्रण है.

अदाणी समूह का कर्ज और ईबीआइटीडीए या एबिटडा (ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पूर्व की कमाई जो मुनाफे का एक मापदंड है) का अनुपात जो लगभग सात साल पहले 7.6 प्रतिशत था, अब घटकर 3.2 प्रतिशत रह गया है. समूह का बैंकों से उधार जो नौ साल पहले 86 प्रतिशत था, अब घटकर 32 प्रतिशत रह गया है और लगभग 50 प्रतिशत उधारी अंतरराष्ट्रीय बॉन्डों से आ रही है.
 
व्यापार की राजनीति 

अदाणी ने इतने कम समय में यह सब कैसे हासिल किया और शेयर बाजारों को भी कैसे खुश रखा? मृदुभाषी उद्योगपति के बारे में कहा जाता है कि उनके पास संबंध बनाने और उस संबंध को बनाए रखने की अनूठी क्षमता है. उनकी प्रतिष्ठा ऐसे व्यवसायी की है जो करार करने के बाद किसी सौदे से पीछे नहीं हटते. वे अपने साझीदारों को खरीदने या फिर उन्हें निचोड़ने की कोशिश नहीं करते. जब कोई सौदा उम्मीद के मुताबिक नहीं होता है, तो अदाणी साझीदारों के साथ बैठकर आपसी परेशानियों को दूर करके रास्ते तलाशने पर जोर देते हैं ताकि बात बिगड़ने न पाए.

निवेशक उनसे प्यार करते हैं क्योंकि वे किसी व्यवसाय से तब तक धन जुटाने की कोशिश कतई नहीं शुरू करते जब तक कि वह व्यवसाय नकदी पैदा करना शुरू नहीं कर देता. उनकी यह नीति उन्हें धन उगाहने के समय ऊंची बोली प्राप्त करने की अनुमति देती है. उनके करीबी अदाणी-विल्मर का उदाहरण देते हैं. जनवरी 1999 में स्थापित 50:50 संयुक्त उद्यम अब भी एक बराबर की साझेदारी वाली कंपनी बनी हुई है और अदाणी ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोई इच्छा नहीं दिखाई. लेकिन अदाणी बड़े आकार, पैमाने और रफ्तार में विश्वास करते हैं और वे जिस भी उद्योग में कदम रखते हैं, उसमें हावी होना चाहते हैं.

इसके अलावा, उनके बारे में यही कहा जाता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी हैं लेकिन वे पार्टी लाइनों से परे सबके साथ अपने संबंध बनाए रखते हैं, जिससे वे हर सरकार के लिए स्वीकार्य हो जाते हैं. पत्रकार आर.एन. भास्कर अपनी किताब गौतम अदाणी: रीइमेजिनिंग बिजनेस इन इंडिया ऐंड द वल्र्ड में लिखते हैं, ''उन्होंने कांग्रेस सरकार, भाजपा सरकार, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, केरल में वामपंथी दलों और यहां तक कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी की सरकार के तहत परियोजनाओं को पूरा किया है.’

दिलचस्प बात यह है कि केरल के दक्षिणी छोर पर अदाणी की विझिमजाम बंदरगाह परियोजना के खिलाफ मछुआरों और कैथोलिक पादरियों के एक वर्ग ने हाल ही में विरोध शुरू किया तो एक दूसरे के कट्टर दुश्मन सत्तारूढ़ सीपीआइ (एम) और भाजपा दोनों, परियोजना के समर्थन में एक साथ आ गए. इस पर अदाणी का कहना है कि विरोध प्रदर्शन उन्हें परेशान नहीं करते क्योंकि वे ''लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा’’ हैं. 

वे इन आरोपों को भी खारिज करते हैं कि उनके व्यापारिक साम्राज्य के उदय का कोई संबंध मोदी के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में, सत्ता में होने से है. अदाणी जोर देकर कहते हैं कि 2001 में सीएम और 2014 में पीएम बनने पर मोदी की लागू की गई नीतियों के अलावा उनकी उद्यमशीलता की यात्रा को तीन बड़े अवसर पूर्व प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी और नरसिंह राव, और गुजरात के पूर्व सीएम केशुभाई पटेल की नीतियों के कारण मिले थे.

अदाणी कहते हैं, ''ये आरोप निराधार हैं और हमारे समूह की सफलता को संकीर्ण नजरिए से देखने वाले एक हालिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं. मेरी पेशेवर सफलता किसी एक नेता के कारण नहीं बल्कि तीन दशकों से अधिक की लंबी अवधि में कई नेताओं और सरकारों की शुरू की गई नीतियों और संस्थागत सुधारों के कारण है.’’ केंद्रीय वित्त मंत्री के एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार के ''कलंकित पूंजीवाद’’ वाले आरोपों को खारिज करते हुए अदाणी कहते हैं कि अपने व्यवसायों को राजनैतिक संरक्षण के आरोपों से बचाने के लिए उन्होंने हमेशा एक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया पर जोर दिया है.

साम्राज्य का साज-संभाल

अदाणी अपनी कंपनियों को परिवार के भीतर और बाहर के पेशेवरों के विवेकपूर्ण मिश्रण के साथ चलाना पसंद करते हैं. भाई राजेश अदाणी ग्रुप के एमडी हैं, बेटे करण और जीत क्रमश: अदाणी पोट्र्स और एसईजेड के सीईओ और वी.पी., ग्रुप फाइनेंस हैं. भतीजे प्रणव और सागर क्रमश: कृषि, तेल तथा गैस कंपनियों के एमडी और अदाणी ग्रीन एनर्जी के कार्यकारी निदेशक हैं.

यह पूछे जाने पर कि वे इतने बड़े समूह का प्रबंधन कैसे करते हैं, अदाणी बताते हैं, ''हमारे सभी व्यवसाय पेशेवर और सक्षम सीईओ चलाते हैं. मैं कंपनियों के दिन प्रति दिन के कामकाज में दखल नहीं देता. मेरी भूमिका रणनीति तैयार करने, पूंजी आवंटन और कामकाज की समीक्षा तक सीमित है. यही वजह है कि मेरे पास न केवल इतने बड़े और विविध संगठन का प्रबंधन करने का वक्त है, बल्कि कई नए व्यवसायों को शुरू करने और अधिग्रहण के नए अवसरों की तलाश करने का भी वन्न्त रहता है.’’

अदाणी गर्व से बताते हैं कि पिछले सात साल में उन्होंने जो भी 50 से अधिक संपत्तियां खरीदी हैं, उनमें से कई संकटग्रस्त थीं फिर भी उनकी ''प्रतिबद्ध टीम’’ के कारण उनमें से कोई भी सौदा नाकाम नहीं हुआ है. वे अपने प्रबंधकों को पूरे अधिकार के साथ ''आंत्रप्रेन्योर’’ की तरह निर्णय लेने को प्रेरित करने में विश्वास करते हैं. अधिकारियों को बड़े दांव लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और गलत निर्णयों को सबक के रूप में लेने को कहा जाता है.

अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वे सीईओ को संचालन की आजादी देते हैं और व्यापक रणनीतियों और पूंजी आवंटन पर अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं. अदाणी निर्णय लेते समय अपनी अंत:प्रेरणा पर भरोसा करते हैं, सरल और तार्किक समाधान पसंद करते हैं, और उन्हें लच्छेदार बातें या शब्दजाल बिल्कुल पसंद नहीं. वे 2008 में आतंकी हमले के दौरान मुंबई के ताज महल होटल में फंसने सहित कई ऐसी स्थितियों में भी घिर चुके हैं जहां जान का खतरा था.

हमले के दौरान अदाणी को तब तक बेसमेंट में छिपना पड़ा जब तक कि आतंकियों का सफाया नहीं हो गया. वे कहते हैं, ''मैं सकारात्मक सोच वाला आदमी हूं और किसी भी स्थिति में परेशान नहीं होता हूं. जब चीजें आपके नियंत्रण में हैं ही नहीं, तो फिर फिजूल की चिंता क्यों करना? भाग्य ऐसी चीजें तय करता है. यहां तक कि वे दिन जो दर्दनाक हों, मैं उनमें भी शांति से सोता हूं.’’

अदाणी का मानना है कि यह भारत की सदी है और उनका अनुमान है कि देश 2050 तक 300 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा (फिलहाल यह 30 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था है), क्योंकि उस समय तक भी जनसंक्चया की औसत आयु 38 साल होगी जो किसी भी अन्य देश की तुलना में कम होगी. युवा और महत्वाकांक्षी कार्यबल के अलावा, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मध्यम वर्ग की आबादी भी होगी.

ऐसा लगता है कि इस दृष्टि ने उन्हें आने वाले वर्षों में अदाणी समूह की यात्रा के लिए स्पष्ट खाका दिया है. वे 2023 में वैश्विक मंदी की भविष्यवाणियों को लेकर भी चिंतित नहीं हैं. उन्होंने कहा, ''मैं पैदाइशी आशावादी हूं और कभी उक्वमीद नहीं खोता. भारत इससे और मजबूत बनकर उभरेगा.’’

'हर संकट एक अवसर के रूप में आता है’ अदाणी का यह दृष्टिकोण उन्हें हर फैसले में भारी मूल्य पैदा करने की असाधारण क्षमता देता है. इसने अदाणी को कुछ दशकों में भारतीय व्यवसाय के शिखर पर पहुंचा दिया है. गौतम अदाणी ने आज तक जितनी भी ऊंचाइयां छूई हैं, उनमें बहुत से बड़े अवसर 2022 में आए. वे बेशक 2022 के सुर्खियों के सरताज हैं.

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