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प्रेरक शक्ति

भारत को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की कोशिशों की अगुआई करने से लेकर चुनावी राजनीति में भाजपा का तुरुप का पत्ता होने तक, मोदी 2022 में भी जबरदस्त ताकत रहे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 3 जनवरी , 2023

अन्य सुर्खियों के सरताज   
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

यह एक शख्स की रचनात्मकता की गाथा है कि वह पहली बार राष्ट्रीय चेतना पर छाने के 20 साल बाद भी सुर्खियां बनाना और उन्हें तय करना जारी रखे हुए है. नरेंद्र मोदी ऐसा करने में इसलिए सफल हुए हैं क्योंकि उन्होंने अपनी राजनीति और अपनी नीति-निर्माण क्षमताओं का निरंतर विकास किया है. प्रधानमंत्री की अपनी भूमिका में उन्होंने स्थानीय स्तर की सूक्ष्मता से लेकर वैश्विक सियासी कौशल की अपनी समझ का बहुत व्यापक फलक निर्मित किया है.

पहला पहलू उन्हें भाजपा के लिए वोट खींचने वाला प्रमुख शख्स और चेहरा बनाए हुए है. उन्होंने अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश और अपने गृह राज्य गुजरात में जिस तरह जबरदस्त बहुमत दिलाया है, वह शायद किसी भी सियासी शख्सियत के लिए बेजोड़ है. हां, इस साल उनकी पार्टी को झटके भी लगे हैं—इसी साल हिमाचल प्रदेश और पंजाब में उसकी दो चुनावी हार हुई है—पर मोदी के निजी करिश्मे और सार्वजनिक कद पर इससे किसी तरह का ग्रहण नहीं लगा है.

उनका दूसरा पहलू उन्हें परिपक्व तरीके से बड़ी तस्वीर पर ध्यान केंद्रित करने में सफल बनाता है. उन्होंने कोविड-19 महामारी के संकट को इस तरह संभाला कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनी हुई है. उन्होंने एक साहसिक बजट पेश किया जिसने बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक खर्चों पर भारी पैसा लगाया और भविष्य के विकास की नींव रखी. और, वह भी ऐसे वक्त में जब मांग सुस्त है और निजी क्षेत्र में उत्साह की कमी है.

यह उत्पादन आधारित प्रोत्साहन  (पीएलआइ) के जरिये बाजार की भावनाओं को बहाल करने की कोशिश है जिसे उन्होंने शुरू किया है. विनिर्माण आपूर्ति शृंखला के एकीकरण को मदद करने के लिए पीएलआइ योजना को विभिन्न क्षेत्रों में विस्तारित किया जा रहा है. संकेत हैं कि अगला केंद्रीय बजट जो मोदी के दूसरे कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट होगा, घरेलू खपत को बड़े पैमाने पर बढ़ाने पर जोर दे सकता है.

ऐसे वक्त में यह आसान नहीं होगा जब उभरती अर्थव्यवस्थाएं संकट में हैं और महामारी की पिछली लहर के बाद के-टाइप रिकवरी देखी जा रही है. अत्यंत गरीबी में जी रहे लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. इसी विषय को मोदी ने बाली में जी20 की भारत की अध्यक्षता स्वीकार करते हुए छुआ तथा वैश्वीकरण को और अधिक समावेशी और सहभागी बनाने की बात की. यहां तक कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की महामारी नीति लड़खड़ा गई.

पर भारत ने मोदी शासन के कुछ दूरदर्शी कदमों से खुद को बचा लिया, मसलन, अर्थव्यवस्था में पैसा फूंकने की बजाय बुनियादी ढांचे के जरिये दीर्घकालिक मूल्य बनाने पर ध्यान केंद्रित करके. 25 दिसंबर को अपने रेडियो शो 'मन की बात’ के आखिरी एपिसोड में प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ ऐसी चीजें गिनाईं जिन्होंने 2022 को उनके लिए 'अद्भुत’ बना दिया. अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के मंत्र के तौर पर देश को आत्मनिर्भर बनाने के उनके विचार में कुछ नई कोंपलें फूटने लगी हैं. यह क्षमता उन्हें दुनियाभर में भरोसेमंद कद और जी20 की उनकी अध्यक्षता को आभा प्रदान करती है.

उन्होंने यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ जो व्यापार सौदे किए हैं, वे वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऐसे वक्त में थोड़ी जान फूंकने की कवायद हैं जब द्विपक्षीय सौहार्द कहीं भी नजर नहीं आ रहा. ऐसे ही वे यूक्रेन-रूस संघर्ष में भी तटस्थ रहने में सफल रहे. ऑस्ट्रेलिया-भारत आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता (ईसीटीए) नए साल के आरंभ के साथ अमल में आ जाएगा.

इसका मकसद—कपड़ा, चमड़ा, फर्नीचर, आभूषण और मशीनरी समेत—6,000 से ज्यादा व्यापक क्षेत्रों के भारतीय निर्यातकों को ऑस्ट्रेलियाई बाजार तक शुल्क-मुक्त पहुंच प्रदान करना है. भारतीय-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) ने अमीरात को 99 फीसद निर्यात के लिए टैरिफ लाइनों को शून्य कर दिया. अगले साल यूरोपीय संघ, अमेरिका और कनाडा के साथ भी इसी तरह के सौदे हो सकते हैं.

वापस घरेलू मोर्चे पर देखें तो चीन चिंता का विषय बना हुआ है और तवांग घुसपैठ संघर्ष की नवीनतम घटना है. लेकिन, मोदी  ने फिर से संघर्ष को हवा देने की बजाय उसके समाधान का रास्ता चुना है. यह राष्ट्रीय प्राथमिकता की अहमियत को किसी भी तरह से कम नहीं करता, जो भाजपा का पसंदीदा मुद्दा रहा है.

रेडियो संबोधन में मोदी ने पिछले साल सितंबर में कमीशन किए गए नौसैन्य विमान वाहक आइएनएस विक्रांत को देश के घरेलू विकास और विनिर्माण के पराक्रम के तौर पर दर्ज किया. साल 2022 में अंतरिक्ष, ड्रोन और रक्षा सरीखे क्षेत्रों में पूंजीगत सामान की निर्माण क्षमता में तरक्की देखी गई.भारत की रक्षा जरूरतों को इस तरह रचनात्मक रूप से अर्थनीति से जोड़ा जा रहा है.

अलबत्ता, रूस-यूक्रेन युद्ध के लंबा खिंचने से उनकी कोशिशों को कुछ प्रतिकूल थपेड़ों का सामना करना पड़ा. ऊर्जा के मोर्चे पर, युद्ध और असमान्य जलवायु की निष्ठुर परिस्थितियों के दोहरे असर से हालात दुनियाभर में और पेचीदा हो गए. भारत को ज्यादा बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा क्योंकि  देश के कई शहरों को गर्मियों में बिजली के संकट का सामना करना पड़ा.

इससे साल 2023 में प्रधानमंत्री का काम ज्यादा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उन्हें वस्तुओं की घरेलू मांग को मजबूत करना होगा और उसे थामने वाले बुनियादी ढांचे को भी सहारा देना होगा. अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति, दोनों मोर्चे पर यह मुश्किल वक्त है. वे इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं, यही बात 2023 को तय करेगी. 

सही लहरों को हवा
›मोदी ने कोविड-19 महामारी के संकट को इस तरह संभाला कि भारत दुनिया में सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है

›ऐसे संकेत हैं कि अगला केंद्रीय बजट घरेलू खपत को बड़े पैमाने पर बढ़ाने पर जोर दे सकता है

›प्रधानमंत्री ने नौसैन्य विमान वाहक आइएनएस विक्रांत को देश के विनिर्माण के पराक्रम के तौर पर दर्ज किया

›यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ किए गए व्यापारिक सौदे वैश्विक अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान फूंकने की दिशा में उठाए गए कदम हैं

›अत्यंत गरीबी में जी रही आबादी खुद को उपेक्षित महसूस कर रही है. जी20 की भारत की अध्यक्षता को स्वीकार करते हुए मोदी ने इसी मसले को छुआ

›अंतरिक्ष, ड्रोन और रक्षा सरीखे क्षेत्रों में पूंजीगत वस्तुओं के लिए क्षमताओं के विस्तार में प्रगति.

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