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आठ अफ्रीकन चीते
भारत लाए गए
भारत में शिकार के चलते खत्म हो जाने के दशकों बाद चीता धूमधाम से भारत लौट आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन 17 सितंबर को नामीबिया से मंगवाए गए आठ चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में छोड़ा. यह महत्वाकांक्षी योजना अपनी पहली परिकल्पना के 50 साल बाद परवान चढ़ सकी. शुरुआत में ईरान से एशियाई चीते लाए जाने की योजना थी, पर यह हो न सका.
2009 में नए सिरे से शुरू की गई यह योजना 2012 में फिर धराशायी हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मांसाहारी पशु के अपने किस्म के पहले अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण पर रोक लगा दी. अंतत: 2020 में इसे निर्णायक मंजूरी मिली.
जहाज से भारत लाए जाने के बाद तीन नर (एल्टन, फ्रेडी और ओबान) और पांच मादा (आशा, साशा, त्बिलिसी, सियाया और सावाना) चीते पहले अलग-थलग रखे गए. उसके बाद उन्हें ज्यादा बड़े बाड़े में ले जाया गया, जहां उन्होंने खुद को अपने नए घर की जलवायु के हिसाब से ढाल लिया, जिसकी तस्दीक चितकबरे हिरण और नीले बैल के उनके कामयाब शिकार से भी होती है. चीतों का भारत आना और रहना अब तक तय योजना के मुताबिक ही हुआ है.
अब इस परियोजना के इर्द-गिर्द मंडराते संदेहों का धुंधलका छंटने लगा है, जो लंबे वक्त से संरक्षण बिरादरी के प्रचंड विरोध का सामना कर रही है. उधर, मध्य प्रदेश सरकार ने पड़ोसी शिवुपरी जिले के माधव नेशनल पार्क में बाघों को नए सिरे से बसाकर इस समूचे इलाके को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की बड़ी योजना बनाई है.
अगला और बहुप्रतीक्षित कदम है इन चीतों को जंगल में छोड़ना. महीने-दो-महीने में ही ऐसा किए जाने की उम्मीद है. तब इस अभूतपूर्व प्रयोग की असल परीक्षा होगी, क्योंकि जमीन पर सबसे तेज दौड़ने वाले इन जानवरों को अंतत: पार्क के बाहरी छोरों पर जाने दिया जाएगा, जहां उनके इनसानों के संपर्क में आने का जोखिम है. 12 चीतों की नई खेप इस बार दक्षिण अफ्रीका से आएगी, इसके जनवरी के अंत तक कुनो आने की उम्मीद है.
अपने आप में अनोखे, पहली बार किए गए इस प्रयोग की परख तब होगी जब इन चीतों को जंगलों में रहने के लिए छोड़ा जाएगा

